Wednesday, August 10, 2016

लेखक परिचय :
नाम :जसवीर सिंह 'राणा'
जन्म- १८ सितम्बर 1968
शिक्षा : एम.ए,बी.एड
संप्रति :शिक्षण
प्रकाशित कहानी संग्रह :( १) खितियाँ घूम रहीआं ने ( २) शिखर दुपहिरा(३) मैं ते मेरी ख़ामोशी (४) बिल्लिआं अक्खां दा जादू
उपन्यास - चुस्त जीभ दी शब्द लीला (पंजाबी, छपने को तैयार  )
पुरस्कार : कहानी संग्रह 'शिखर दुपहिरा ' को पंजाब भाषा विभाग द्वारा 'नानक सिंह' पुरस्कार
कहानी 'नस्लाघात ' बी.ए.के पंजाबी सिलेबस में शामिल
कहानी 'चूड़े वाली बांह '२००७ में सर्वश्रेष्ठ कहानी घोषित
कहानी 'पट्ट ते बाही मोरनी ' २००९ की सर्वश्रेष्ठ कहानी घोषित
संपर्क- ग्र।मः अमरगढ़
जिलाः संगरूर-१४८०२२ (पंजाब)
फोनः०९८१५६५९२२०
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कहानी -:         बिल्ली आँखों का जादू -लेखक -जसवीर सिंह राणा , अनुवाद -  हरकीरत 'हीर'
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" राम नाम ....सत्य है ! ... राम नाम ....सत्य है ! " अर्थी लिए आती भीड़ करीब आ गई थी ।
मैंने बिंदी को चोर नज़रों से देखा ,उसकी नज़रें भी मुझसे मिलीं । हम अर्थी वाली भीड़ के पीछे -पीछे चल पड़े । मरने वाला पता नहीं कौन था !
एक व्यक्ति जल का कलश  , दूसरा पूजा सामग्री की थाली, चार आदमियों के कन्धों पर अर्थी और उनके पीछे 'राम नाम सत्य है' करता पण्डित चला जा रहा था । वह थोड़ी -थोड़ी देर बाद छुट्टे पैसे और खील की मुट्ठी अर्थी के ऊपर से उछाल देता । पैसे और खील धरती पर जा गिरते। उन्हें पैरों से रौंदती भीड़ आगे बढ़ जाती ।
जब आखरी व्यक्ति भी आगे बढ़ जाता , हम धरती पर गिरी खील और पैसों पर झपट पड़ते । खील खा लेते और पैसे जेब में डाल लेते । किसी को कोई ख़बर न थी। पर भीड़ के संग चला जा रहा नाथ ब्राह्मण थोड़ी-थोड़ी देर बाद पीछे मुड़कर देख लेता । उसकी आँखें हमें घूरती सी प्रतीत होती । हम रुक जाते । जब वह देखना बंद कर देता ,हम फ़िर से पैसे और खील उठाने लग जाते।
जिस वक्त अर्थी श्मशान पहुँची । पीछे की ओर मुड़ते हुए नाथ ने जूता उतार लिया , " ठहर जाओ तुमलोग कुत्तो ....."
" भों ...भों ....भों ...!!" उसे कुत्तों की सी आवाज़ से भौंकते हुए हम पुल की ओर भाग खड़े हुए ।
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पुल के पास दारू का ठेका था और साथ ही शराब की एक दुकान भी । वहाँ कई लोग बैठे शराब पी रहे थे । हम उनकी ओर देखने लगे ।
" क्यों लगाना है पैग ....? "  एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा।
मेरे साथ खड़े बिंदी ने नहीं में सर हिला दिया ।
वह व्यक्ति साथियों को बताने लगा , " मैं तो बहुत परेशान हूँ यार  ..! .. साला मरने को दिल करता है अब तो  ...! "
" परेशान तो आजकल हर ज़मींदार है बूटे !" .... यूँ ही नहीं तमाशा करते ...!" दूसरे व्यक्ति ने हमारी पोटली की ओर देखा ।
खील खाता हुआ बिंदी उनकी ओर देखने लगा , " क्या कहा तमाशा ! ...बोलो तो सही !.... दिखाते हैं अभी ....!"
"अच्छा !..... चलो तुम भी दिखा लो ! ...आ जाओ बूटे ! ... देखें क्या साँप निकालते हैं ....!" दुकान से निकल शराबियों का जुट बैंच पर बैठ गया ।
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मैं पोटली टटोलने लगा ।
जादू दिखाने के लिए एक रूपये की ज़रूरत थी । बिंदी ने उनलोगों से सिक्का माँगा ।
बिंदी से सिक्का लेकर मैंने डमरू उठा लिया , " चल भई जमूरे !.... ये सिक्का पकड़ कर वो सामने बैठ जा ....!"
वह थोड़ी दूर जा मेरे सामने बैठ गया । शराबी आँखें तमाशा देखने लगीं ।
" ला भई जमूरे !.... रुपया मुझे पकड़ा ...!"  मैंने जोर से डमरू बजाकर हाथ यकसार रोक लिया ।
कमर में कपड़ा बाँधे बिंदी मेरे क़रीब आ गया ।
मैंने उससे सिक्का पकड़ा , लोगों को दिखाया, फ़िर उसके हाथ में रख मुट्ठी बन्द कर दी । वह सीधा होकर खड़ा हो गया । मैंने आँखें बन्द कर लीं । काली देवी को याद किया । डंडे से झुलरु - ढिचक किया और फ़िर बन्द मुट्ठी पर फूंक मारी , " ले भई जमूरे !... अब मुट्ठी खोल दे ....!"
ज्यों ही बिंदी ने मुट्ठी खोली , सिक्का गायब !  मुट्ठी में से मिट्टी गिर रही थी ।
"वाह ! ....कमाल कर दी बूटे !.... रुपया गायब ....!" शराबियों का जुट खाली जेबें टटोलने लगा ।
बिंदी उनसे पैसे माँगने लगा और मैं जोर जोर से डमरू बजाने लगा ।
" न रुपया ग़ायब कहाँ हो गया ....?"
तुम्हारी माँ के सर में ग़ायब हो गया ....!" आवाज़ें आपस में उलझने लगीं थीं ।
अठन्नी , रुपया, दो का सिक्का ... धरती पर छुट्टे गिरने लगे ।
जिस वक्त हम पैसे चुन रहे थे, एक मोटरसाइकिल आकर सामने रुकी ।
उसमें से एक लड़का नीचे उतरा और शराबियों के पास जाकर बोला , " घर चलो बापू !.....माँ दवाई पीकर मर गई है ....!"
" वह क्यों मर गई कमबख्त ! ... मरना तो मुझे था  ....!!" एक शराबी रोने लगा ।
बिंदी भी रोने लगा , " जादू ! .... हम इनके पैसे वापस न कर दें  ...?"
" नहीं ....!"  होठों पर जीभ फिराकर मैंने पोटली उठा ली ।
हम चाय की दुकान की ओर चल पड़े ।
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चाय की दुकान के सामने एक बड़ी दुकान खुल गई थी । उसमें चाय मिठाई और भी कितना ही कुछ मिलने लगा था ।
जिस दिन से वो दुकान खुली , मद्दी को गुस्सा आने लगा था । वह काटी को गालियाँ बकता रहता , " जल्दी चाय बनाया कर मुर्ख !.... तुम्हारे कारण कोई ग्राहक नहीं आता ....!"
" वो ...उन लड़कों को पूछ ! ... चाय पीनी है....!" हमें देख वह हल्का सा हँस दिया था।
काटी को आते देख बिंदी ने दो अंगुलियां खड़ी कर दीं । वह मुड़ गया । मद्दी फटाफट चाय बनाने लगा ।
छींके में गिलास रख काटी हमारी ओर आने लगा । मद्दी बड़ी दुकान की ओर देखने लगा ।
" माँ का यार साला ....!" हमें चाय पकड़ा कर काटी ने मालिक को गाली दी ।
मैं उसकी कटी हुई बाँह को देखने लगा ।
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"तुम्हारी यह बाँह कैसे कट गई थी ...?" चाय का घूँट भरते हुए मैंने काटी से पूछा ।
मेरी बात सुनकर वह क़मीज़ से नाक साफ़ करने लगा, पहले कितनी बार तो बताया ....!"
" एक बार और बता दे ! .... तुम्हारा कौन सा पेट्रोल ख़र्च होता है ...!" बिंदी ने चाय सुड़कते हुए कहा ।
" सालों पर गर्म गर्म चाय फैंक दूँ  ..." मद्दी ने बड़ी दूकान के ग्राहकों को गाली दी ।
मैंने काटी की क़मीज़ खींची , " बता दे भाई .... ऐसा क्यों कर रहा है यार ....!"
" वह तो यार बात यूँ थी .....मेरा बापू आटा चक्की में लगा हुआ था !... एक दिन बोगी उठाते वक़्त पचास किलो के बाट पर गिर गया । काफ़ी चोट आई ! ...फ़िर ....!"  रोनी सी सूरत बना काटी मद्दी की ओर देखा ।
वह काटी को पीटता था , कहता  " अगर अब किसी को वह राम कहानी सुनाई  तो साले छड़ी से पीट पीट मार दूँगा...! "
" फिर क्या हुआ काटी ...?" मेरी बात का जवाब दिए बिना वह चुपचाप मद्दी की ओर चल पड़ा ।
पर उसकी कटी बाँह बता रही थी , " ..फिर मैं बापू की जगह आटा चक्की जाने लगा ....एक दिन चक्की चल रही थी । ... बोरी पाड़छे लगी हुई थी ।..मेरा पैर बोरी में फंस गया ...मैं पलट कर मशीन के पटे के ऊपर जा गिरा ... जब होश आई ...मेरी कटी हुई बाँह उधर गिरी हुई थी । ...वह खून से लथपथ तड़प रही थी । .. मैं रोने लगा ... फ़िर पता नहीं मन में क्या आया ..मैंने कटी हुई बाँह उठाई और घर की ओर चल पड़ा ! ... जब देहली पर पैर रखा ...सबकी चीखें निकल गई ! ... मैंने कहा बापू ये ले मेरी बाँह पकड़ .....!"
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काटी मेरी बाँह हिला रहा था । वह चाय के पैसे माँग रहा था । मैंने उसकी आँखों में झाँका ।
" इसकी आँखों में क्या उसकी माँ को ख़ोज रहा है..? सीधे होकर पैसे निकाल और रस्ता पकड़ अपना ...!" मद्दी की फटकार सुन मैं चुपचाप पैसे निकालने लगा ।
वह फ़िर किसी ग्राहक को उल्टा -सीधा बकने लगा । मैंने आँख बचाकर काटी से कहा ," यहाँ मार खाते रहते हो ... कहीं और काम कर ले ...!"
ना मुझे कहता है ! ... तू ख़ुद क्यों नहीं कर लेता ... साला जादूगर कहीं का ...
!"
मुझसे पैसे पकड़ वह मद्दी की ओर चल पड़ा ।
मैंने गुस्से में अपने दाँत किटकिटा दिए ! मद्दी ने देख लिया ।
उसने थप्पड़ दिखाकर आँखें तरेरते हुए अपनी भाषा में गाली दी ,.. "  सालो जांदे हो या नहीं ... कुत्ते ना होण किसे थाओं दे ....!!
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" ओये बिंदी ! लोग हमें कुत्ता क्यों कहते हैं ....?" मैंने बिंदी से पूछा ।
हम सड़क के किनारे चले जा रहे थे । एक कुत्ता मिट्टी में सर गिराये पड़ा हुआ था । बिंदी ने उसे ठोकर मारते हुए कहा , " आजा ! ... इस कुत्ते से पूछ लेते हैं ...!"
कुत्ता मिमिया कर भाग खड़ा हुआ । मैं उसकी टेढ़ी पूँछ को देखने लगा ।
" बिंदी ! उस शराबी के लड़के की माँ दवाई क्यों पी गई ...? "
" उसका तो मुझे पता नहीं ! ... मुझे तो अपनी माँ का पता है । ... वह मेरे जैसी थी  .... बिल्ली आँखों वाली ..! " बिंदी ने पोटली में से फटा कम्बल निकाल लिया ।
उसे ठण्ड लग रही थी । मैंने उसकी बिल्ली आँखों की ओर देखा । कम्बल लेकर वह झल वाले बोलू जैसा लग रहा था । कहता , " बापू तेरे जैसा था ....जादूगर ...!"
" झल वाला बोलू उस बरगद के नीचे बैठता था ....!" बिंदी का हाथ पकड़ मैं चौंकी वाले बरगद की ओर चल पड़ा ...!
वह इस बरगद के नीचे बैठा होता । हाथ में कटोरी ...छोटा कद ...काला रंग ... घुटनों तक लम्बा कुर्ता। गर्मी हो या सर्दी , न वह जूते पहनता न नीकर । नंग- धड़ंग  ही बना रहता । अग़र कोई उसे छेड़ता , " ओये बोलू !... बरगद की जडें दिखा ...!"
" ये ... ले ...! " कहता हुआ वह अपना कुर्ता ऊपर उठा देता ...।
उसकी इस हरक़त में लोगों को आनन्द आता । बस अड्डे से चौंदे वाला मोड़ , फ़िर मोड़ से चौंकी वाला बरगद, उसका रोज का राह था । सड़क पर जाते हुए वह ख़ुद ही बकते जाता , " झल नूं लै जाऊँ फड़के ...!"
पर वह किसी को कभी पकड़ न सका । अक़्सर वह बरगद के नीचे ही बैठा होता । पर एक रात पता नहीं उसके मन में क्या आया । वह बाज़ार के बीच लेट गया । ठण्ड बहुत थी । पहले अपने आपको बोरी में घुसाया फिर ऊपर कम्बल डाल लिया और पैरों के पास कटोरी रखकर सो गया ।
सुबह सबसे पहले उसकी लाश हमने देखी । वह रब्ब जी हलवाई की दूकान के आगे मरा पड़ा था । रात कोई ट्रैक्टर ट्राली उसके ऊपर से गुज़र गई थी । उसका सर कुचला हुआ था । उसकी लाश को देख हमने एक दूसरे की आँखों में देखा । बिंदी ने कटोरी उठा ली । मैंने लाश के ऊपर से कम्बल उतार लिया ।
जगह मलने के लिए हम चौंकी वाले बरगद की ओर चल पड़े ।
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बरगद के नीचे बचना पीटर बैठा था । बिंदी डर गया । मैं भी पीछे की ओर मुड़ लिया ।
" साला लुच्चा ! ... कमीना ...!!" मन ही मन गालियाँ देते हुए हम आगे बढ़ गए ।
बचना अपनी लुच्ची हरकतों की वज़ह से घर से निकाल दिया गया था । अब वह सारा दिन गुरूद्वारे की सीढ़ियों पर बैठा लोगों को आते जाते देखता रहता । जब रात होती गुरूद्वारे रोटी खाकर कभी कहीं पड़ा रहता कभी कहीं । उसके पास रजाई थी । एक दिन हमसे बोला , " अगर तुम्हें ठण्ड लगती है तो आकर मेरे साथ सो जाया करो ।"
हमने उसकी बात मान ली । ठण्ड  थी भी बहुत , रजाई मिल जाने से आराम से सोने लगे । कुछ दिन तो मजे में कटे । पर इक सुबह बिंदी कहने लगा , " यार जादू !... करीब आधी रात जब मेरी नींद खुली मुझे यूँ लगा जैसे किसी ने मेरी निक्कर उतारी हुई थी ...!!
" चल साले पागल ! यूँ ही हांके जा रहा है ...!" मैंने उसे थप्पड़ जमाते हुए कहा ।
वह रोने लगा , मुझे रजाई का लोभ था । मैंने उसकी बात पर विशेष ध्यान नहीं दिया । पर जब आधी रात गुजरी, मेरी आँख खुल गई । बचना मेरी निक्कर उतार रहा था । मैंने चीख मारी । बचने ने मेरे थप्पड़ दे मारा । मैंने उसके लात मारी। बिंदी ने दाँतों दे काटा । बचना उलझ गया । हमने रजाई परे फैंकी ।
" बिंदी भाग ...! मैंने पोटली उठाते हुए कहा ।
हम दोनों काफी देर भागते रहे । चौंदे वाले मोड़ पर ख़्याल आया मेरी निक्कर तो बचने की रजाई में ही रह गई थी ..!
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रुक जा जादू !... यह देख कितनी अच्छी ज़गह है ... यहीं बैठ जाते हैं ...! " बिंदी ने मेरा कुर्ता खींचते हुए कहा ।
हम डाक घर की दीवार से पीठ टिकाये बैठ गए । मैं पैसों वाला डब्बा खड़काने लगा , " अक्कड़ बक्कड़ भम्बे भो, अस्सी नब्बे पूरा सौ ! ...सौ ग्लोटा तितर मोटा , चल मदारी पैसा खोटा ....!"
" कितने पैसे बच गए ...!"  डब्बे की ओर देखकर बिंदी ने मेरी ओर लात मारी । मैंने भी उसे झापड़ जमाते हुए कहा , " सात बचे हैं यार !... कितनी बार तो गिन लिया ....!"
" ला मैं गिनकर देखूँ ...! " वह डिब्बा छीनने लगा ।
मैंने उसे धक्का मारा । उसने मेरा कुर्ता पकड़ लिया । मैंने उसके बाल पकड़ लिए । हम उलझ गए । पैसों वाला डिब्बा नीचे गिर गया । हम मिट्टी में लोटने लगे । आते जाते कई लोग रुक गए । आवाज़े आने लगीं , " ओये छोड़ो !... हटो ....हटो ! ...छोड़ो क्या हो गया ....!"
" हमें तो कुछ नहीं हुआ ! ...तुमलोगों को क्या हुआ है ...!" मुझे छोड़ बिंदी ने छलांग मारते हुए कहा ।
" साले तमाशा करते हैं ! ... कुत्ते कहीं के...!" गालियाँ सुनकर मैं भी खड़ा हो गया ।
लोग परत कर जाने लगे । हम मिट्टी में गिरे पैसे ढूँढने लगे । एक रुपया कम था । हमने बहुत ढूँढा  । ...पर ....!
" तुम्हारा रुपया यह रहा ....!"  हमें सिक्का दिखाकर पांडी भागने लगा । बिंदी ने एक पत्थर उठाकर उसे दे मारा । निशाना चूक गया , पत्थर गुजरते हुए एक व्यक्ति की पीठ में लगा । वह बिफर गया ,..." रुक जाओ कमीनों ....तुम्हारी माँ की ....!"
डिब्बा , पोटली और फटा कम्बल उठा हम भाग खड़े हुए ...!
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" बता अब जायेगा या नहीं...? ...बता अब ..! " पांडी का बापू उसे जूते से पीट रहा था ।
पांडी चीख़ रहा था , " मैं नहीं जाऊँगा ..मैं नहीं जाऊँगा ...!"
वह माँगने जाने से इंकार कर रहा था । उसका बापू माँगने जाता था ।
सूरज चढ़ने से पहले ही वह लोगों का द्वार खड़खड़ाने लगता , "  शनिवार का दिन है भाई  ! ... शनि देव !... दान देव !....महाराज राजी रक्खे भाई ...!"
कोई उसके तेल वाले कलश में पैसे डाल देता कोई झोली में आटा डाल देता तो कोई गालियाँ देने लगता , " चल ...चल ...गाहां जा !... दिन नी चड़न दिँदै ! ... मंग खाणी जात साली ....!"
" जब मैं बाजार जाता हूँ ...कोई पैसे नहीं देता ...दुकानों वाले गालियाँ देते हैं बापू ....!" जूते खाता पांडी बाजार की ओर हाथ दिखा रहा था ।"
उसका बापू ज्योत्षी को गालियाँ देने लगा ," एक ये कम्प्यूटर वाले ज्योत्षी ने मार लिया मुझे ।  वर्ना अपना ये माँगने का धंधा बढ़िया चल जाता था ।"
" धंधा तो साले पहले ही नहीं चलता ...! ऊपर से तू जाने से इंकार कर रहा है ....बोल मांगने जायेगा या नहीं ..?" बापू का जूता हवा में घूमने लगा । पांडी डर गया .., " जाऊँगा बापू ....जाऊँगा ...! " बस होर न मारीं ..!" वह डरकर बोला ।
बिंदी मुझसे बोला , " रूपये वाली बात चल इसके बापू को बता देते हैं ।"
" आह थोडा मुंडा ..? साडा रुपैया चक ले आया है बाबा ...!" मैंने जल्दी से कह डाला ।
मेरी बात सुन उसने बीड़ी सुलगाई । माचिस की डिब्बी जेब में रखी और बीड़ी का कश लेता हुआ बोला , " उरे आ ओये मुंडिया ! ... किहड़ा रुपैया चक के लिआंदा इहना दा !.... लिया मैंनू दिखा ...!"
जूते से डरता पांडी नज़दीक आ गया । उसने पगड़ी के नीचे छिपाया रुपया निकाला और बापू की हथेली पर रख दिया । ज्यों ही मैं उठाने लगा पांडी का बापू मुँह से धुआँ निकालने लगा , " किहड़ा रुपया ओये ! ..जाने आं के लाहां जुत्ती ....!"
जूते से डरता बिंदी मुझसे चिपक गया । मैं उसका हाथ पकड़ धूरी की ओर जाती सड़क पर भाग खड़ा हुआ।
कुछ दूर जाकर हमने अपना गुस्सा निकाला , " हे काली देवी ! ... आज़ रात 12 बजे ये दोनों मर जाएं ....!"

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" चल डमरू बजाकर देख ...!"  घरों के दरवाजों के पास लगी चौंकड़ियों के पास खड़ा हो बिंदी आस -पास देखने लगा ।
मैं उसकी बात समझ गया । उसे आस थी , मैंने भी बच्चों को घरों से निकालने के लिए डमरू बजाना शुरू कर दिया । हम कितनी ही देर डमरू बजाते रहे पर कोई घर से बाहर न निकला ।
जब हम चलने लगे , तब कुछ बच्चों की माँयें अपने बच्चों को लेकर बाहर निकलीं । वे अपने बच्चों को ट्युशन पढ़ाने वाली मैडम के घर छोड़ने जा रही थीं । एक टोली मोगरी- गेंद से क्रिकेट खेलने लग पड़ी । चौंकड़ियों पर बैठा लड़कों का टोला मोबाईल में फ़िल्में देखने लगा ।
मैंने डमरू पोटली में डाला और बिंदी का हाथ पकड़ पुल की ओर चल पड़ा ।
ठण्ड बढ़ती जा रही थी ।
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चौंकी वाले बरगद के नीचे बचना रजाई में आ बैठा था । जब हम उधर से गुज़रे वह लुच्ची सी हँसी हँसता हुआ बोला , " मेरी रज़ाई में नहीं सोना आज़ ....?"
बिंदी ने उसे जीभ दिखा दी और मैंने थप्पड़ । उसने मुँह दूसरी ओर फेर लिया ।
" वह देखो जादू ! ... वही शराबी रोता हुआ जा रहा है ...!" बिंदी श्मशान की ओर जाती भीड़ की ओर देखने लगा ।
दवाई पीकर मरने वाली औरत की अर्थी जा रही थी ।
" बस कर बूटे ! ... मत रो मेरे वीर !... सब्र कर !"  अर्थी के पीछे कई लोग शराबी को पकड़े हौसला दे रहे थे ।
चाय की दूकान में मद्दी काटी को पीट रहा था । उसकी नज़र बड़ी दुकान की भीड़ को घूर रही थी ।
सूरज धीरे -धीरे छिपने लगा था । पुलों के नीचे अब अँधेरा उतर आया था ।
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वह गंदे नाले का पुल था ।
पुल के नीचे उतरने के लिए पगडण्डी सी बनी हुई थी । सड़क की तरह वह किसी ने बनाई नहीं थी । रोज़ उतरने चढ़ने के कारण ख़ुद ब ख़ुद बन गई थी ।
हम पगडंडी से धीरे- धीरे नीचे उतर गए । पुल के नीचे कई बड़े- बड़े सीमेंट के पाइप पड़े थे । उन पाइपों में ही हमारा घर था । जो बाप का घर था उसे तो माँ बेच गई थी ।
" न यहाँ क्या तुम्हारी माँ बैठी है ...? अगर रोटी खानी है तो पैसे निकालो । "
मंगी की आवाज़ सुन मैंने पोटली पाइप में रख दी ।
वह लोगों की इकट्ठी की हुई जूठ बेचता था ।
मैंने पैसे वाला डिब्बा उसके आगे ढेरी कर दिया । उसने पैसे उठा लिए और रोटी हमारी ओर उछाल फैंकी । बिंदी ने हाथों में दबोच ली । हम भूखों की तरह रोटी पर टूट पड़े ।
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खासा अँधेरा हो गया था । सब ने अपने पाइपों के मुँह के आगे कम्बल , चादरें , बोरियाँ तान दीं ।
रात टिकने लगी । ठण्ड भी बढ़ गई । फ़टे कम्बल में लिपटा बिंदी मुझसे चिपट गया । मैंने उसके सर पर हाथ फेरा । उसे ठण्ड लग रही थी ।
मंगी किसी से बातें कर रहा था । मैंने ध्यान से सुना । उसके पाइप में से कागज़ चुनने वाली शम्मी की आवाज़ आ रही थी । दूसरे एक पाइप में रजाई ओढ़े पड़ा जोगी शम्मी के भाई को कह रहा था , " ठण्ड बहुत है ..! आजा मेरी रज़ाई आजा ...!"
" बचना पीटर साला ....!" मैंने उसे गाली दी ।
बाहर खड़खड़ाहट हुई । कोई साथ वाले पाइप से निकल किसी और पाइप की ओर चल पड़ा । मेरी नज़र हमारे पाइप के मुँह पर गई । अँधेरे में एक बिल्ली पोटली को खोलने की कोशिश कर रही थी । थोड़ी - थोड़ी देर में वह पोटली को पंजा मारती । कुछ न मिलता देख वह मेरी ओर देखने लगती । मैं उसकी आँखों में झाँकता हुआ धीरे से कहता , " म्याऊँ ..!'
मेरी आवाज़ सुन वह बजी 'म्याऊँ' कर देती । जिस वक़्त वह बोलती मुझे माँ जैसी लगती । मैं उसे फ़िर बुलाने लगता । टिकी रात हमारी ' म्याऊँ - म्याऊँ ' की खेल चल रही थी । पाइपों में बसी दुनियां सो चुकी थी । क़रीब आधी रात ज्यों ही मेरी आँख लगी । शोर मच गया , " उठो  ..!  भागो ... भागो ...पानी आ गया ...!"
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जिसका जिधर मुँह हुआ उधर ही समान उठाकर भाग खड़ा हुआ । हम भी भागकर बापू वाले घर के आगे जा बैठे थे ।
भीगे हुए कम्बल में पड़ा बिंदी सारी रात काँपता रहा । मैं बापू की तरह सख़्त हड्डी का था । न काँपा न सोया । मेरी सुरति कभी घर के अंदर चली जाती कभी बाहर निकल आती । बापू को यह घर दादू से मिला था । पर हमें यह भी नहीं मिला । माँ ने भी अच्छी की ... रिक्शे वाले संग भाग गई । रिक्शे वाले को ही घर भी बेच गई । बिंदी ठीक कहता था , वह बिल्ली थी ।
उसकी आँखें बिल्ली जैसी थीं । हर कोई उसे बिल्ली कहता । बापू कहता था , " बिल्ली आँखों में जादू होता है ..!...जिसे यह जादू करना आ गया वह महान जादूगर बन जाता है ....!"
बापू की बात न माँ समझ सकी , न ही मैं समझ सका । न बापू को समझ आई ।
अगर वह बिल्ली आँखों का जादू करना जानता होता वह दुनिया का महान जादूगर होता । पर वह तो छोटा मोटा जादूगर था ।
जब से हमने होश संभाला , मैं और बिंदी उसके जमूरे थे ।
रुमाल का फूल बना देना , रस्सी काटकर जोड़ देना , हवा से मिठाई पकड़नी ।
वह बिंदी को पीठ करके खड़ा कर लेता और ख़ुद उसके पीछे डिब्बा लेकर खड़ा हो जाता । जब बिंदी खाँसता पैसे निकल कर उसके डिब्बे में गिरने लगते ।
बापू मुझे चादर के नीचे डालता , छूरी उठाता , मेरा सर धड़ से अलग करके फ़िर से जोड़ देता ।
यह उसका सब से बड़ा जादू होता था ।
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" जादूगर ... ओ ....जादूगर ! ... चाय पीनी है ...?" शम्मी की आवाज़ सुन मैं डर गया ।
गोबर के ढेर से वह कागज़ चुनती लोगों के घरों से चाय भी माँग लेती थी । उसके हाथ में चाय का डोलू था । मैंने अपना मग उसकी ओर बढ़ा दिया । वह चाय डालकर चली गई । फ़िर परत कर मुझे दो लड्डू पकड़ाती हुई बोली , " यह रूड़ी के ढेर से मुझे एक लड्डुओं का डिब्बा मिला है ...ले पकड़ ...साफ़ करके खा लेना ...!"
मैं कम्बल से लड्डू साफ़ कर बिंदी को जगाने लगा । वह तो न जगा अंदर से रिक्शे वाला जाग गया । वह दरवाज़ा खोल हमें देख कहने लगा , " बिल्ली आँखों वाली स्त्री चालाक होती है ....!"
उसकी बात सुन बिंदी जाग गया । रिक्शे वाला अंदर चला गया । हम चाय के संग लड्डू खाने लगे ... ।
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" जादू ! वह देख लड्डू और उसके साथी जा रहे हैं  ...!' चाय सुड़क कर बिंदी खड़ा होते हुए बोला ।
लड्डू , अंजलि और दीसा भीख माँगने जा रहे थे । मैंने लड्डू और कम्बल पोटली में डालते हुए बिंदी से कहा , " इन लोगों को आवाज़ दे ...!"
" लड़ ....डू ....डू ....!!" उसने जोर से आवाज़ दी ।
तीनों रुक गए । ठण्ड से काँपती अंजलि बोली ," क्या है बे ....?'
" हमें भी साथ ले चलो ...!" मैं काम की बात पर आया ।
दीसा उसकी ओर देखने लगा । वह होंठ काटकर बोली , " आ जाओ ...! "
हम भी उनके साथ चल पड़े ।
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बस स्टैंड पर अभी भीड़ कम ही थी ।
बस में चढ़ने से पहले दीसे ने हमें माँगने का तरीका समझा दिया था ।
लड्डू ने अपनी निकाली गई आँख खोल ली और दूसरी साबूत आँख बन्द कर ली और मेरे कन्धे पर हाथ रख लिया । मैं पोटली उठा आगे -आगे चलने लगा । बिंदी और लड्डू दूसरी ओर चल पड़े । कतार बनाकर हम बस में चढ़ गए । लड्डू ने मेरे कन्धे में चिकोटी काटी । उसका इशारा समझ मैं रोनी सी सूरत में बोलने लगा , " अंधे पर तरस करो बाबा ! ....दो दिन से रोटी नहीं खाई ! ... पैसे दे दो बाबा ...!"
एक बुढ़िया ने एक रुपया दे दिया । बाकी सवारियों ने देखकर मुँह फेर लिया । हम पिछली ओर से चढ़े थे आगे की ओर से उतर गए । बस से उतरते ही लड्डू ने अपनी दूसरी आँख खोल ली । मुझसे रुपया ले लिया और बोला , " चलो अब अगली बस में ...!"
पर अगली बस से कुछ भी न मिला । दो बसें और खाली गईं ।
" चलो अब बाज़ार चलते हैं ...!" लड्डू की बात सुनकर हम रिक्शा स्टैंड की ओर चल पड़े ।
वहाँ अंजलि और दीसा खड़े थे ।
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बाज़ार में घुसने से पहले दीसे ने उसे नई स्कीम समझा दी थी । दीसा और लड्डू तेलियों के बाज़ार की ओर चले गए । मैं , अंजलि और बिंदी लाल बाज़ार की ओर चल पड़े ।
" जरा सा रुकना ...!"  अंजलि ने अपनी टेढ़ी टाँग ऊपर उठाकर पीछे की ओर मोड़ ली ।
हमारे कन्धे का सहारा लेकर वह एक टाँग से चलने लगी , " ठण्ड लगती है बाबू जी तरस खाओ ! ... जूतों के लिए पैसे दे दो बाबा ....!"
हम दुकानों के आगे जा -जाकर हाथ पसार माँगने लगे ।
" चलो ....चलो ...आगे बढ़ो..!" कहते हुए पहले तो किसी ने कुछ न दिया । फ़िर दो दुकानदारों को तरस आ गया । जब हम तीसरी दूकान के आगे आये , दुकानदार आग बबूला हो गया । वह क्रोध में बाहर आया और बिंदी को एक जोरदार चांटा जमा दिया । अंजलि को धक्का मार नीचे गिरा दिया , मुझे बाँह से पकड़कर बोला , " चल जरा ..खोल अपनी ये पोटली .... दिखा  तो ज़रा...!"
मैं डर गया । पोटली नीचे रख दी । उसमें हम तीनों टूटे हुए जूते थे ।
दुकानदार जोर -जोर से चीखा , " देखो ! ... देखो इनकी चलाकी !..... जूते पोटली में छिपाकर रखे हैं ... माँगने का अच्छा धंधा बना रखा है सालों ने .....!"
" न यह क्या तमाशा है ओये ...!" पहले उसने हमें लातों से मारा फ़िर धक्के मारकर बाज़ार से निकलवा दिया ।
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तुम लोगों को कोई चीज़ मांगनी नहीं आ सकती ...! तुम लोग जाओ अपना तमाशा करो ...! " हमें फटकारती हुई अंजलि बीड़ी पीने लगी । उसके साथ लड्डू और दीसा भी कश लेने लगे । मैं बिंदी के साथ नए बाज़ार की ओर चल पड़ा । वहाँ से कुछ मिलने की उम्मीद थी ।
गांधी चौक के पास पहुंच कर जैसे हमारे पैर जम गए । कागज़ चुनने वाली शम्मी बिजली वाले खम्भे से बन्धी हुई थी । एक व्यक्ति उसके ऊपर ठंडा पानी डाल रहा था । वह जोर -जोर से रोये जा रही थी । लोग तमाशा देख रहे थे । पानी डालने वाला व्यक्ति बोला , " मेरी दूकान से रद्दी वाली टोकरी चोरी कर रही थी ...!"
जब उस व्यक्ति ने हमारी ओर देखा हम डर गए ।
वह हमारी ओर भागा ...।
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भागते -भागते हम हाँफ गए । पर रुके नहीं । वह थककर परत गया । भागने से ठण्ड लगनी तो कम हो गई पर भूख से अब जान निकलने लगी थी। जेब में कोई पैसा नहीं था ।
" बिंदी ! अब क्या करें ...?" बिंदी की ओर देखकर मैंने पोटली ठीक की । मेरी बात सुनकर वह सोच में पड़ गया । कुछ पल सोचता रहा ।
फ़िर बापू की तरह बोला , " जादू का तमाशा ...!"
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"अगर जीना है तो तमाशा करो ....!" बापू का कथन याद कर मैंने बिंदी की आँखों में झाँका ।
बिल्ली आँखें ....!
जब वह लोगों की ओर देखता । देखन1े वाला सम्मोहित सा हो जाता । उसकी 8तरह माँ भी लोगों को सम्मोहित कर लेती थी ।
बापू की मौत के बाद वह बाज़ार में जूते पालिश करने ठीहा लगाने लगी थी । सुबह सवेरे उठकर धूप बत्ती करती और बन संवर कर ठीहे पर बैठ जाती । जो भी जूते पॉलिश करवाने आता माँ की आँखों की ओर देखता रहता । एक रिक्शे वाला तो सारा सारा दिन उसे निहारता रहता ।वह भी उसकी और देखती रहती ।
वे एक दूसरे को क्यों देखते थे हमें तो उस दिन पता चला जिस दिन वह रिक्शे वाले के संग भाग गई थी ।
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"चलो बाहर निकलो ! .... यह घर अब मेरा है । ...तुम्हारी माँने इसे मुझे बेच दिया है ....! " जिस दिन रिक्शे वाले ने हमें घर से निकाला ,लोग कहने लगे , " बहुत बुरा हुआ इन मासूमों के संग ।  ... माँ भी भाग गई ... बापू भी मारा गया ।.....रिक्शा चलाये बिना क्या गुज़ारा न होता उसका ? .... इससे अच्छा था तमाशा ही करता रहता ...!"
वह कभी जादू का तमाशा दिखाने लगता तो कभी रिक्शा चलाने लगता । जिस दिन सवारी न मिलती वह अस्पताल के आगे जा खड़ा होता । अग़र किसी को खून की ज़रूरत होती , वह पैसे लेकर अपना खून भी दे देता ।
" कहते हैं उसदिन भी किसी को खून बेचकर आया था !.... कमजोर पहले ही था ...खून देने की वज़ह से शरीर में और कमज़ोरी हो गई ! ... उस पर उसी वक़्त उसे सवारी मिल गई । सवारी को बिठाकर कहते हैं बीस क़दम भी न चला होगा कि ये अनहोनी हो गई ! ....आँखों के आगे अँधेरा ....और रिक्शा सीधे ट्रक से भीड़ गया ....!"
बापू की अंत्येष्टी करने के बाद लोग बातें कर रहे थे । उस दिन सवारी , रिक्शा , बापू तीनों की मौत हो गई थी ।
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" अब मौत की बातें मत कर जादू ! ....विवाह की ....खाने की बात कर ....!" मैं बिंदी की बात समझ गया ।
भूख और तेज़ हो गई थी । मैंने अपने हाथों की ओर देखा । बापू की बात याद आ गई । वह कहता था , " जादू कुछ नहीं होता !..... देखने वाले की आँख का धोखा होता है ! ... या करने वाले की हाथ की सफ़ाई होती है ..!"
हमें जादू दिखाने की ज़गह मिल गई थी ।
हम विवाह वाले पैलेस की ओर चल पड़े ।
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पैलेस के गेट पर एक व्यक्ति बुलबुले बेच रहा था । वह साइकिल लेकर गेट के एक तरफ़ खड़ा था । हम दूसरी ओर जा बैठे ।
रंग - बिरंगा पैलेस , कारें , सुंदर - सुंदर लोग । हमारी आँख बच्चों पर टिकी हुई थी ।
जिस वक़्त कोई बच्चा बुलबुला लेने आता । उसके साथ उसके माता - पिता या भाई- बहन भी होते । उनकी ओर देख मैं डमरू बजाने लगता । " हाँ ! भई मेहरबान ! ..... कद्रदान ! ... तुहाडी खैर होवे ! .... साडा जादू ....."
पर कोई भी मेरी बात पूरी न होने देता । हमारी ओर बिना देखे ही परत जाता ।
डमरू बजा- बजाकर, बोल - बोलकर मैं थक चुका था । भूख से पेट अंदर जाता जा रहा था । पर फ़िर भी इक आस लिए मैं डमरू बजाये जा रहा था ।
" बन्द करो यह तमाशा ....!"  गेट पर खड़े  वर्दी वाले गार्ड ने हमें घूरते हुए कहा ।
हम उन बच्चों की ओर देखने लगे जो अंदर चटकारे लेकर भोजन का आनन्द ले रहे थे ।
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" चल जादू ! ... अब मौका है ! .... लोग अंदर खाने जा रहे हैं.....!"
बिंदी की बात सुन मुझे रोटी की खुशबू आने लगी ।
मैंने पोटली बगल में दबा ली और बिंदी का हाथ पकड़ अपने आस -पास देखा । हमें कोई देख नहीं रहा था । हम आँख बचाकर बेलों के क़रीब से अंदर जाने लगे ।
अंदर के गेट के पास रुककर अंदर नज़र मारी । अंदर गीत - संगीत चल रहा था । स्टेज़ पर लड़कियाँ नाच रही थी । नीचे बाराती नाच रहे थे । उनकी तरफ़ से ध्यान हटाकर दीवार की ओर से हम रोटी वाले मेज तक जा पहुँचे । लोग भोजन करने में मग्न थे । हमारी ओर किसी का ध्यान नहीं था ।
" आ जा अब ....!"  मैंने पोटली संभालते हुए बिंदी की बाँह खींची ।
वह मेरे साथ एक मेज की ओर खिसकने लगा ।
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मेजों की चद्दरें नीचे तक लटक रहीं थीं । हम लटकती हुई एक चद्दर को हटाकर मेज के नीचे जा घुसे । बिंदी मुझसे बोला , " आज़ आयेगा मज़ा ...!"
खाना खाकर कोई जब प्लेट पास पड़ी टोकरी में रख देता या कोई मेज के नीचे सरका देता , हम उसपर टूट पड़ते । रोटी , दाल , सब्जी , चावल , दही , पनीर , सलाद .....पहली बार इतना कुछ खाने को मिला था ।
जिस वक़्त हम मेज के नीचे बैठे जूठन खा रहे थे । पंडाल में शोर मचने लगा , " कमाल की बात है ! ...घडी , चूड़ियाँ , पैसे  ....इतना कुछ एक साथ कैसे चोरी हो गया ....?"
" जिसने भी चोरी किया होगा वो अभी यहीं होगा  ....गेट बन्द कर दो ..! ...कोई हॉल से बाहर न जाये ...!" तरह तरह की आवाज़ें आने लगीं ।
स्टेज पर गाने बजने बन्द हो गए । लड़कियों का नाच बन्द हो गया । गेट बन्द कर दिया गया ।
" अब ये लोग क्या करेंगे जादू ...? "  बिंदी मुझसे चिपक गया ।
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" ये रहे चोर ...!!! " मेज के नीचे प्लेट रखने को झुका एक व्यक्ति हमें देख 'चोर -चोर' चिल्लाने लगा ।
उसका चिल्लाना सुनकर सारे लोग मेज के इर्द -गिर्द एकत्रित हो गए । हमें घेर लिया गया । दो लोगों ने खींच कर हमें बाहर निकाला । बिंदी रोने लगा । एक व्यक्ति हमें गालियाँ देने लगा , " क्यों बे कुत्तो ! ....हरामियो ! ...लाओ  चोरी किया समान बाहर निकालो ....!"
ना ... ना... हमने कोई चोरी नहीं की ! हम तो जूठन खाने मेज के नीचे छुपे हुए थे ...!" मैंने बिंदी को अपने से चिपटाते हुए कहा ...।
पर किसी ने हमारी बात न सुनी । आवाज़ें आने लगीं , " ये लोग ऐसे नहीं बकेंगे ...! उल्टा करो इन्हें ...और जूतों से धुलाई करो इनकी ..!"
" ना जी ..ना जी ...हमने चोरी नहीं की ... कसम ले लो काली देवी की ....!"
मैं मिन्नतें करने लगा ।
एक थप्पड़ मेरे मुँह पर आ पड़ा । किसी ने बिंदी की पीठ में लात मारी ।
हमारी गीदड़-धुलाई होने लगी ।
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" बस अब बहुत हो गया ! ....ये उठाइगिरों की जात यूँ नहीं मानती !....पहले हम लोग डोली विदा कर लेते हैं ...फ़िर इन लोगों को ......!" एक ग्यानी सा बाबा सब को समझाने लगा ।
हमारी गीदड़- धुलाई बन्द हो गई । स्टेज पर गान बजने लगा । लड़कियों के साथ आधी भीड़ भी नाचने लगी । कुछ लोग भोजन करने लगे । ग्यानी ने हमें पकड़ कर खड़ा कर लिया  और बोला , " सेठ जी ! आप बेटी की विदाई करवाओ !....इन कुत्तों से मैं निपट लूँगा ...!"
हमें बाँह से पकड़ वह पैलेस के मालिक के पास ले गया ।
उसकी बात सुनकर मालिक सोच में पड़ गया । बोला , " देखो सरदार जी ! यह हमारे पैलेस की इज़्ज़त का सवाल है ! ....आप डोली विदा करो मैं पुलिस को बुलाता हूँ ....!"
उसने हमें अपने कमरे में बन्द कर दिया ।
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हमारी नज़र डोली वाली कार पर टिकी हुई थी । जब डोली विदा होने लगी , लड़की के पिता ने डोली के ऊपर से पैसे फेंके । चुनने का बड़ा दिल किया ,पर हम तो कमरे में बन्द थे ।
" जादू ! ...अब हमारा क्या होगा ...!"  जब ये बात बिंदी मुझसे पूछ रहा था कमरे के आगे खड़ा मालिक पुलिस को फोन कर रहा था ।

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" तूँ डर ना बिंदी !" ....आपां किहड़ा चोरी कित्ती आ....!" पुलिस की गाड़ी देख मैंने बिंदी को हौंसला दिया ।
वैसे डर मैं भी रहा था । लम्बा - चौड़ा ,  सर से गंजा , काली मूँछे , दाढ़ी सफ़ाचट , लाल आँखें ....थानेदार बड़ा डरावना था ...!
गाड़ी से उतर वह कमरे की ओर आने लगा । उसके साथ पैलेस का मालिक और विवाह वाले कई अन्य लोग भी थे । बाहर बन्दूकों वाले सिपाहियों के पास वह ग्यानी खड़ा था । हमारी ओर अंगुली करके वह उन्हें कुछ बता रहा था ।
" वर्मा साहेब ! ये बैठे हैं आपके चोर ....!" कमरे का दरवाजा खोल पैलेस के मालिक ने हमारी ओर अँगुली की ।
अंदर आते ही थानेदार नीचे झुका । लाल आँखों से हमें घूरा । उसकी आँखें देख बिंदी रोने लगा । मैंने पोटली जोर से पकड़ ली । हमें देख पहले तो थानेदार हँसा फ़िर उसका हाथ उठा ... एक-एक थप्पड़ रसीद कर बोला , " मैं सिखाता हूँ तुम्हें चोरी करनी ...!"
ना जी ना...हमने चोरी नहीं की साहेब जी .....हम तो ...!" डर से बिंदी का पेशाब निकल लगा ।
" इनको उठाकर गाड़ी में फेंको ...!"  कान से फोन लगाकर थानेदार बाहर की ओर चल पड़ा ।
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जब गाड़ी थाने में घुसने लगी , सूरज छिप रहा था और अँधेरा उतरने लगा था । ठण्ड भी बढ़ गई थी । गाड़ी नीम के नीचे जाकर रुक गई । थानेदार नीचे उतरा । सिपाहियों ने हमें भी उतार लिया ।
" इनका स्वागत करो ...!" हुकुम सुनाकर थानेदार कमरे की ओर चला गया ।
"  ना क्या बैंड - बाजे वाले लेने आएंगे तुम्हें अब....?.... चलो आगे बढ़ो ...!" एक सिपाही ने मेरे थप्पड़ जमाते हुए कहा । दूसरा धक्के मारता हुआ हमें टुटियों के पास ले गया । तीसरा सिपाही डंडा उठाये खड़ा था ।
जब थानेदार बाहर आया हम बेवकूफों की तरह खड़े झाँक रहे थे । वह आते ही बोला , " इन पोटलियों  में क्या है ओये ....दिखाओ ...!"
मैंने पोटली का सारा सामान उलट दिया । डिब्बा , डमरू , चद्दर, झुलरु, फटा कम्बल ।
" तमाशा जादूगर साले ....!" समान देख थानेदार हँसने लगा ।
हम रोने लगे ।

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" चोरी का समान निकालो ! ....बताओ कहाँ छुपाया है ....?" थानेदार ने हमें थप्पड़ जमाते हुए कहा ।
बिंदी फूलों वाली क्यारी में जा गिरा। मैं दीवार से टकराया । थानेदार आँखें निकालकर बोला , " बताओ समान कहाँ रखा है ....?"
" जी ... हमने चोरी ... न ..नहीं की ..हम तो जी ..." मेरी बात सुन थानेदार ने पास खड़े सिपाही के हाथों से डंडा पकड़ लिया ।
" आ...आ ...ई...माँ ...!" हम चिल्लाते हुए इधर -उधर भागने लगे । वह भी हमारे पीछे भागा । सिपाहियों ने हमें हाथ -पैरों से पकड़ लिया । डंडा चलने लगा । हम बचने के लिए हाथ -पैर मारने लगे । डंडा और जोर से चलने लगा । जब आँखों के आगे तारे नज़र आने लगे सिपाहियों ने हमें नीचे गिरा दिया । मैं तो बड़ी मुश्किल से उठकर बैठ गया पर बिंदी धरती पर लोटने लगा ।
" इन्हें नंगा करो ...!' डंडा फैंक थानेदार ने सिगरेट जला ली ।
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हमारे शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था । हम काँप रहे थे । भरपेट भोजन करआया थानेदार शराब के नशे में मदमस्त था ।
" मैं निकालता हूँ इनसे चोरी का माल ...!" उसने कुर्सी पर रखा सरिया उठा लिया ।
मैं हाथ जोड़ने लगा , " मेरे भाई को मत मारना जी ! ....आप मुझे मार लो ...!"
पर थानेदार ने उलटी बात की । वह बिंदी को सरिये से पीटने लगा ।
मैं बिंदी के ऊपर लेट गया , " ना जी इसे मत मारो .... मुझे ...मा ..र ...."
"आ ...आ....आई ...आ ...आ ....!!! हमारी चीखों से थाना काँप गया ।
थानेदार हमारी टांगों , बाँहों , पैर , पीठ पर सरिये से प्रहार करने लगा । एक सरिया बिंदी के सर पर लगा । वह चीख़ कर धरती पर गिर पड़ा । मैं उसकी ओर भागा । एक सरिया मेरे माथे पर लगा । मैं भी नीचे गिर गया । किसी सिपाही की आवाज़ आई , " बस करो जनाब ! बच्चे हैं ...! ....इतना क्यों मारते हो ...! अग़र इन्होंने चोरी की होती ... चार थप्पड़ों में ही क़बूल लेते ...!"
" अग़र नहीं देख सकते ...तो दफ़ा हो जाओ यहाँ से ...!" थानेदार उसे गालियाँ देते हुए बोला ।
सिपाही चुप कर गया । कुछ देर बाद सरिये के गिरने की आवाज़ आई ।
फ़िर थानेदार की आवाज़ आई , " इन्हें इस दरख़्त से बाँध दो ...!"
उसका हुक़्म सुन हमें नीम के पेड़ से बाँध दिया गया ।
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" माँ ....माँ .....मर गया ....माँ ....!" बिंदी आधी रात तक बोलता रहा । मैं दाँतों में जीभ दबाये उसका बुरा हाल देखता रहा ।
हमारे  नंगे शरीर बर्फ़ की तरह जमते जा रहे थे । सारा थाना सो चुका था ।
रात बहुत धीरे- धीरे बीत रही थी ।
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" लगता यह तो मर गए ....!" सिपाहियों की आवाज़ सुनकर मुझे ज़रा सी होश आई ।
पर मैं आँखें बन्द किये बिंदी की तरह लटकता रहा । उसका सर नीचे की ओर लटक गया था । बाहें हवा में झूल रहीं थीं । मैंने चोर आँखों से देखा वह ठण्ड से नीला हुआ पड़ा था ।
सिपाहियों की बात सुनकर थानेदार बाहर आ गया । उसने बारी - बारी से हमें हाथ लगाकर देखा । कुछ पल खड़ा सोचता रहा फिर बोला , " जादूगर हैं ! ....तमाशा  कर रहे हैं साले ...! इन पर ठंडे पानी की दो बाल्टियाँ डालो ....!"
ज्यों ही नंगे शरीरों पर पानी फेंका गया ।
मैं बिंदी की तरह सारी ठंड चुपचाप पी गया ।
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"इन्हें नीचे उतारो....!" हुक्म सुना थानेदार सिगरेट पीने लगा ।
हमें मरा हुआ समझ नीम से खोल नीचे उतार लिया गया । एक सिपाही कम्बल ले आया । हमें उसमें लपेटकर दीवार के संग रख दिया गया । मैं सारा दिन साँस रोके बिंदी के साथ वहीं पड़ा रहा ।
उसकी नब्ज़ डूबती जा रही थी ।
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जिस वक़्त मेरी आँख खुली । घुप्प अँधेरा था । कार चलने की आवाज़ आ रही थी । कम्बल में लपेट कर हमें पिछली सीट पर रखा गया था ।
एक जगह कार रुकी । दरवाज़े खुले । दो जन नीचे उतरे । थानेदार की आवाज़ आई , " क़िस्मत ख़राब है अपनी ....! आज़ कोई मसान नहीं जल रही वर्ना यहीं फेंक देते इन्हें ....!"
शायद वे श्मशानघाट में खड़े थे । मैं डर गया ।
कार के दरवाजे बन्द हो गए । कार चल पड़ी । पता नहीं कितनी देर सड़कों पर भागती रही । आखिर एक ज़गह जाकर रुक गई ।
पिछला दरवाजा खुला । चार हाथों ने हमें उठाया और झाड़ियों में उछाल दिया ।
हमारे कपड़े और समान वाली पोटली भी वहीं फैंक दी ।
कार की आवाज़ दूर होती गई ।
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मैं काफी देर साँस रोके वहीं पड़ा रहा । जब कार की आवाज़ सुनाई देनी बन्द हो गई मैंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं । बिंदी को हिलाया पर वह नहीं बोला । बेसुध पड़ा रहा । कम्बल हमारे चारों ओर बिस्तरे की तरह लपेटा गया था । मैंने पलट - पलट कर बड़ी मुश्किल से उसे खोला ।
ठण्ड से सुन्न , मार से बेहाल , हम नंगे पड़े थे । मैं पड़ा -पड़ा अँधेरे में कपड़े टटोलने लगा । कपड़े पोटली के पास ही पड़े थे ।
वे हमें झाड़ियों में फेंक गए ये बात तो समझ आई पर वे हमारे कपड़े और पोटली भी फेंक गए , ये बात मुझे समझ नहीं आई ।
मैंने पहले बिंदी को निक्कर और कुर्ता पहनाया । वह ठण्ड से अकड़ा हुआ था । अपना निक्कर कुर्ता पहन मैंने उसे कम्बल में लपेट दिया और अपने ऊपर भी फटा हुआ कम्बल ले लिया ।
" अब क्या करूँ ? ....किधर जाऊँ ....?" कम्बल में पड़ा मैं आधी रात तक सोचता रहा ।
अधचेतन अवस्था में मेरी सुरति में बापू घूमता रहा ।
जैसे वह कह रहा हो , " जीना है तो तमाशा करो ....!"
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बापू के कथन की स्मृति मुझे ऊर्जा दे गई । मेरा शरीर गर्म होने लगा । मैंने बिंदी के शरीर पर हाथ फिराया वह बर्फ़ की तरह ठंडा था ।
" बिंदी ! ...ओये बिंदी  ...!" मैं उसे हिलाने लगा ।
पर शायद अभी उसकी सुरति नहीं लौटी थी , नहीं तो वह बोलता । उसकी बेहोशी देख मुझे डर लगने लगा ।
मैंने बिंदी को अपने संग लिपटा लिया । रात बीतने लगी ।
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गुरूद्वारे के पाठी की आवाज़ गूँजने लगी  , मन्दिर में घण्टियाँ बजने लगी , मौलवी ने बांग दी ...। रात बीत चुकी थी पर बिंदी अभी भी बेसुध था । मैं हौले - हौले बड़ी मुश्क़िल से उठा । पूरा शरीर दुख रहा था । इतनी मार पड़ी थी कि अंग - अंग टूटा जा रहा था । मैंने दाँतों में जीभ दबा ली । अपना कम्बल ठीक किया , पोटली उठाई और हिम्मत करके पूरे जोर से बिंदी को अपने कन्धे पर डाल लिया ।
एक उसका भार , दूसरे कम्बल , पोटली...मैं गिरते- गिरते बचा। दर्द से आँखें बन्द हो गईं । बड़ी भूख लगी हुई थी । पर मैंने हिम्मत न हारी । धीरे - धीरे मैं बाजार की ओर चल पड़ा ...!
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बस स्टैंड के पास धूनी जल रही थी । कोई कुर्सी पर बैठा आग ताप रहा था ।
बिंदी को उठाये मैं उसकी ओर चल पड़ा । वह चौकीदार था । आग की रौशनी में उसकी आँखें मुझे घूर रही थीं ।
" क्यों जादूगर ! इतनी सवेरे -सवेरे  किधर को ...? रात कहीं तमाशा करते रहे हो क्या ...?" उसने कुर्सी के पास रखा डंडा धरती पर मारा ।
मेरा दिल किया यही डंडा उसके दे मारूँ । पर पिटाई का ख़्याल आते ही मुझे थानेदार का चेहरा नज़र आने लगा । उसकी लाल आँखें मुझे डराने लगीं ।
मैं उसकी बात का ज़वाब देने की बजाय धूनी के पास बैठ गया । धीरे से बिंदी को नीचे रखा , पोटली रखी और बैठकर आग तापने लगा । मेरा जमा हुआ खून गर्म होने लगा ।
मैंने बिंदी को खींच कर धूनी के पास कर लिया ।

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" ओये तेरा भाई तो मर गया ....! .... लाश को उठाये फिरता है साले ....!"
चौकीदार की आवाज़ सुनकर मेरी आँख खुल गई ।
धूनी की गर्माहट से मुझे नींद आ गई थी । मैं बिंदी को जगाने लगा , " बिंदी ! ....ओये बिंदी ! ....उठ ...!"
" यह अब नहीं उठेगा पगले  ....!" चौकीदार मुझे समझाने लगा ।
वह यह क्या कह रहा है ...? बिंदी मर गया ....??  नहीं .... नहीं ....यह नहीं हो सकता !
" बिंदी मर नहीं सकता ...!" लाश के ऊपर गिरकर मैं रोने लगा ।
चौकीदार बड़ी डरावनी आवाज़ में बोला , " जा ...अब जाकर इसका संस्कार कर दे ....!"
बिंदी को आग लगा दूँ ....? नहीं ....नहीं ...मैं ये नहीं कर सकता !
"पर ये तो करना ही पड़ेगा ...!" मुझे चौकीदार की आँखों में मसान जलता दिखा।
मैंने खाली जेब में हाथ मारा । काली देवी का नाम लेकर पोटली उठा ली ।
बिंदी को कंधे पर डाल श्मशान की ओर चल पड़ा ।
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बाज़ार खुलने तक मैं श्मशान में छिपा बैठा रहा ।
मेरे सामने बिंदी की लाश पड़ी थी । उसकी बिल्ली आँखें मुझे घूर रही थीं । मैं थोड़ी -थोड़ी देर बाद रोने लगता , " तूँ वी धोखा कर गया बिंदी ....!"
" कौन किससे धोखा कर गया ! ...यह तो वही जानता है बूटे ....!" लोगों की आवाज़ सुनकर मेरे भीतर एक डर सा समा गया ।
पोटली कन्धे पर रख मैंने बिंदी की लाश उठाई और श्मशान की पिछली टूटी हुई दीवार से बाहर निकल गया।
शराबी की घरवाली की अस्थियां चुनने आई भीड़ श्मशान में जा घुसी ।
सूने पुल पर निगाह डाल मैं सड़क पर आ गया ।
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रस्ते में काटी मिल गया । वह मद्दी की दुकान की ओर जा रहा था । लड्डू , अंजलि , दीसा भीख माँगने बस स्टैंड की ओर जा रहे थे । शम्मी कागज़ बिन रही थी ।
" ये बिंदी को क्या हो गया ...?" सबका यही सवाल था ।
पर मैं कुछ न बोला और तेज -तेज चलने लगा ।
गाँधी चौक थोड़ी ही दूर था ।
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मैं बिंदी को उठाये चौंक में खड़ा था ।
दूर दूर तक शीशे की बड़ी-बड़ी दुकाने थीं ।
दुकानों की ओर देख मैंने कमर में कपड़ा बाँध लिया ।
भूख से आंतें ऐंठ रही थीं । पेट की आग के लिए , मसान की आग के लिए मैं खाली जगह पर खड़ा हो गया ।
मज़मा लगाना शुरू कर दिया ।
धरती पर कम्बल बिछाया । धीरे से बिंदी को नीचे रखा । ऊपर चद्दर डाल दी ।
पोटली से झुरलू निकाला। उससे लाश के चारों ओर एक लकीर खींच दी ।
मैंने आँख बचाकर डमरू उठा लिया ।
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" हाँ जी ! .....मेहरबान ....कदरदान ! .... ज़िन्दगी और मौत का खेल देखो  ....!" बाँह ऊँची करके मैं बापू की तरह बोलने लगा ।
डमरू बजने लगा ! एक ....दो ....तीन ....चार ! लोगों की भीड़ जुटने लगी ।
मैं बिंदी के चारो ओर खीचीं लकीर की परिक्रमा करने लगा , "जै काली कलकत्ते वाली ! ...तेरा वार न जाये खाली ! ... बच्चा लोग बजाओ ताली ....!!"
तालियाँ बजने लगीं । मैं चद्दर के नीचे पड़ी लाश से बातें करने लगा , " चल भई जमूरे ! ....उठकर खड़ा हो ...!  ... देख तुझे देखने वाले आये हैं ....!"
" क्या कहा ! .... सर की न पैर की ! ....तू बिंदी सारे शहर की ....!"
चद्दर से कान लगा मैंने ख़ुद ही ज़वाब दे दिया ।
लोगों की ओर देख डमरू बजाया । काफ़ी भीड़ जमा हो गई थी । अगर सम्भाला न गया ......?
पर मैंने बापू की तरह दिमाग लगाया । मैंने ऐलान किया , " लो बदमाशो ! ...अपनी आँखों पर यकीन रखना ! ...आज़ सबसे बड़ा जादू ....!"
" ऐसे ही बकवास करता है ! ....इनके पास हाथ की सफ़ाई होती है ....!" मेरी बात सुनकर खुसर -फुसर होने लगी ।
एक व्यक्ति बोला , " यह अपने जादू से देखने वालों की नज़र बाँध देते हैं ...!"
" नहीं माई - बाप ! यह हाथ की सफ़ाई नहीं !....यह नज़र का धोखा नहीं  ! ....यह बिल्ली आँखों का जादू है ....!" मैंने बापू की तरह शब्दों का जाल फेंका  ...!
डमरू बजाता हुआ मैं बिंदी के सर की तरफ़ जा बैठा ।
आँखें बन्द कर काली देवी को याद किया । मुँह में मन्त्र पढ़ा । चद्दर के ऊपर से सात बार झुरलू घुमाया ।
मैंने लोगों की नज़र बाँध दी ।
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जो भी अपनी जगह से हिला ....उसे माँ -बाप की कसम लगे ....! " मेरी आँखों के आगे रोटी नाचने लगी थी ।
मैंने डमरू और झुरलू नीचे रखा । पोटली में से छूरी निकाल ली ।
" भूख का ....आग का ....ज़िन्दगी और मौत का सवाल है माई बाप ....! .... कोई भी अपनी जगह से ......" कहते हुए ज्यों जी मैंने अपनी छूरी वाला हाथ चद्दर की ओर बढ़ाया .... भीड़ की नज़र कुछ ढूँढने लगी । आवाजें शोर करने लगीं , " नकली छूरी है ....!"
" ये ले ....! ...अब दिखा जादू ....! " किसी ने मेरी तरफ़ असली छूरी उछाल दी ।
मैंने छूरी उठाकर अपना हाथ चद्दर के नीचे बढ़ा दिया ।
भीड़ में खुसर -फुसर होने लगी । चद्दर लाल हो गई ।
" नकली लाल रंग है ....!" भीड़ हँसने लगी ।
मैंने बिंदी की लाश से चद्दर उठा दी ।
उसका सर धड़ से अलग हो गया था ।
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" जादू ! तूँ अज्ज  अपणा अंदर क्यों मरण दित्ता पुत्त ....? " आसमां से बापू जैसे मुझे पूछ रहा था...!
मेरी ओर छूरी फेंकने वाला व्यक्ति अपनी जगह छोड़कर खिसकने लगा । लोगों की भीड़ भी बाजार की ओर चल पड़ी ।
मैं लाल हुई चद्दर की ओर देखने लगा । बिंदी का कटा हुआ सर मेरी ओर देख रहा था ।
उसकी बिल्ली आँखों में आँसू थे ।
" जब कोई मर जाता है ...उसकी आँखों से आँसू नहीं बहते ...!"  बापू की कही ये बात याद आते ही मेरी चीख़ निकल गई ।
                                                                                       समाप्त
सम्पर्क -

लेखकः जसबीर 'राणा '
ग्र।मः अमरगढ़
जिलाः संगरूर-१४८०२२ (पंजाब)
फोनः९८१५६५९२२०
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अनुवादिका  :हरकीरत 'हीर' १८ ईस्ट लेन , सुन्दरपुरहॉउस - , गुवाहाटी-७८१००१ (असम) फोन- ९८६४१७१३००

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