Wednesday, November 30, 2016

Gursewak Singh Preet <gursewak3@gmail.com>

I, Gursewak Singh Preet allow the permission for translation of my Story " Jeen Joga" to Respected  Harkeerat Heer of Assam, in Hindi script.

Nov 22 (11 days ago)


to me

 पंजाबी कहानी -           जीने लायक़       जीण जोगा (लेखक - गुरसेवक प्रीत ) अनु . हरकीरत हीर
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'' अरे बन्धु मैं वक़्त बोल रहा हूँ ...सर्वज्ञाता  ... सर्वशक्तिमान ... सर्वव्यापक ..! पर बन्धु ...आजकल ख़ुद ही वक़्त में खड़ा हूँ . .. तभी तो आप जी के साथ अपनी बात सांझी कर रहा हूँ . ..हाँ  ...हाँ ..जब मैं आपको सारी बात बता दूंगा तो आपजी अवश्य मेरा दुःख समझ जाओगे ... अब बन्धु उधर देखो  ...!''
इंदर सिंह खत्री के घर चीख़- पुकार मची हुई थी . सारा पिंड (गाँव ) वहां एकत्रित था . इंदर सिंह के पास बैठे लोग उसे बातों में उलझाये 'बड़े -बड़े' दुखों की कहानियाँ सुनाकर उसके दुःख को 'छोटा' करने की कोशिश में लगे थे . पर पत्थर बना इंदर न कोई प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा था  न ही किसी की ओर देखता . बल्कि आँख बचाकर दूसरी ओर झाँकने लगता . वह सर झुकाए कभी माथे पर हाथ रख लेता तो कभी आँखें बंद कर दीवार से टेक लगा लेता .
'मौत के आगे किसी का जोर नहीं भाई ... दरिया को कदमों से फलांग जाने वाला शिंदा  ज़रा सी नहर में गिरकर मर गया ...समझ नहीं आता ..!'
' वह गिरने वालों में से नहीं था ..बच्चा तो नहीं था ..गिरा नहीं होगा .. ..मैं तो कहता हूँ उसने ख़ुद छलांग लगाई होगी .'
' हाँ ..हाँ ..! तू तो ठहरा बड़ा  सी आई डी वाला  ...ख़ुद मरने का किसका दिल करता है ओये .., क्या तू मर सकेगा इस तरह ...बोल ..? .सारा दिन चऊँ- चऊँ करता रहता है ...यह तो किसी ने दुश्मनी निकाली है दुश्मनी ...देख लेना क़त्ल निकलेगा क़त्ल ...!'
'ओये चुप करो कंजरो ..कोई वक़्त -बेवक़्त  भी देख लिया करो ..यूँ ही बकवास किये जा रहे हो ...!' बाबा कैला बोला ....
औरतें विलाप कर रहीं हैं .
कई दिनों से लापता हुए शिंदे की लाश आज टैलां से मिली थी . अब सरकारी अस्पताल में पोस्ट मार्टम के लिए पड़ी थी . साठ बसंत देख चुके इन्दर का एक ही आसरा था उसका पुत्र शिंदा .
'दुःख का गोला बैठ गया भाई इन्दर सिंह के कलेजे में तो ...'प्राण ठहर जाते हैं ..जवान पुत्र की मौत कोई छोटी बात नहीं  ....पर रोये बिना दिल हल्का न होगा ...ऐसे तो दिमाग हिल जायेगा बेचारे का  ...इससे  कहो कोई बात करे ..जी हल्का हो जायेगा ..!' छिन्दों नाइन बोली .
'इंसान के क्या बस में है भाई ... सब्र करो ..अब उसके क्रिया -कर्म की सोचो ..' नम्बरदार ने लोगों की ओर देखते हुए बात पलटी  .
दोपहर हो चली थी . पिंड वाले शिंदे के पोस्ट मार्टम के लिए अस्पताल पहुंचे तो इंदर ने बुझी सी आवाज़ में पास खड़े सरपंच से पूछा ....' शरीर पूरा था शिंदे का ...?'

'.... हाँ भाई पूरा था ..जैसे अभी सोया हो ...बस रंग काला हो गया था ...पानी में बहुत देर पड़े रहने के कारण हो जाता है ...वैसे पूरा ही था . ..!' सरपंच बोला .

'...हाँ भाई पूरा था ' यह वाक्य सुनते ही इंदर और परेशान हो गया. गुमसुम ...आसपास छुपी सी नज़र दौड़ाता हुआ वह  दूर शीशम के नीचे खड़े लोगों की ओर पीठ करके बैठ जाता है .

' लो भई, इंदर तो अब चार दिन नहीं काटेगा ...लिखा लो मुझसे ...!' चौकीदार लाभा चुचियाई आँखें मलता हुआ बोला .

' जब जग से ही मोह ख़त्म हो गया तो किसलिए जीना भाई ..!' देशराज ने भी हाँ में हाँ मिलाई .

' आखिर इंसान हैं ..भगवान तो नहीं ..इतना दुःख झेलकर जीना तो देवतों के बस में नहीं ..इंसान क्या चीज है ..सब कर्मों का खेल है ...!' ज्ञानी हरनाम सिंग ने अंगोछा बिछाते हुए कहा .

उस दिन सारे पिंड ने शिंदे की मौत का शोक मनाया ...किसी के घर आग न जली ..पर इन्दर की आँख से एक बूंद पानी का न गिरा .
'अरे बन्धु यही तो मैं चाहता हूँ ..कि इन्दर न रोये ..मैं ...मैं .. महाबली वक़्त ने बड़ी -बड़ी सल्तनतों  को मिट्टी में मिला दिया ...ये बेचारा इन्दर सिंग किस खेत की मूली है ...अब इन्दर सिंग खत्री ख़त्म हो रहा है ..धीरे ..धीरे ..बस आप देखते जाओ ...ये मरे तो मैं आगे चलूँ ...बड़ा काम पड़ा है .

                            
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इन्दर सिंग का परिवार बंटवारे के समय पाकिस्तान से इधर आया था . काफ़िले के साथ चलते वक़्त उसने माँ की अंगुली कसकर पकड़ी थी . पर राह में हुए मुसलों के हल्ले में उससे अंगुली छूट गई . वह बहुत चीखा पर माँ कहीं नहीं मिली . चालीस लोगों के बड़े कुटुंब से कुछ लोग फसादियों ने मार दिए . बाक़ी जो बचे कैम्पों में दर -दर भटकते मर गये . इन्दर और उसका बड़ा भाई जैसे -तैसे बच निकले .

अमृतसर की तंग गलियाँ अब उनका घर बन गईं थीं . जहां आसरा मिलता दिन गुज़ार लेते . किशना ट्रक पर क्लीनर लग गया . महीने छह महीने में लौटता . कभी इन्दर से मिलता कभी ठिकाना बदलने के कारण बिना मिले ही लौट जाता . धीरे -धीरे किशना उसकी जिंदगी से आलोप हो गया . 
कड़वी सच्चाइयों ने इन्दर को उम्र से पहले ही सयाना बना  दिया था  . खत्री खानदान का खून और बाल उम्र में मिली पिता की सीख ने उसे ज़िन्दगी की कठिन चढ़ाइयों पर चढ़ते वक़्त सांस फूलने से बचाए रखा . लाइलपुरियों के कपड़े के बड़े शोरुम में थान और डंडे संवारता वह गज-गिरह की गिनती -मिनती सीख गया था . स्वभाव का ठंडा , जुबान का मीठा और पेट तक उतरने का हुनर जानने के कारण वह सरदारों का चहेता बन गया था . उसके लिए सब कुछ सरदार ही थे . न कभी तनख्वाह ली न खर्च पूछा . सरदारों के घर रोटी खाता , दूकान पर काम करता और स्टोर में पड़ा रहता .
कई वर्ष बीत गये . इक दिन सरदारों के खूब घर शोर-शराबा हुआ . पता चला इन्दर ने उनकी बेटी से जोर -जबरदस्ती की है . लड़की ने ख़ुद उसका नाम लिया है . लाइलपुरियों ने इन्दर को मार - मार अधमरा कर दिया .पर अगले दिन लड़की किसी और के साथ भाग गई .
निराश हुआ इन्दर अपने एक सयाने कपड़े वाले बख्शीश के पास मोगे आ लगा . अच्छा सेल्समैन होने के कारण दूकान की बढ़ी हुई कमाई ने बख्शीश के घर कुछ ही दिनों में ही रौनक ला दी . पर इन्दर का यह आसरा भी बहुत दिन न टिक सका . दूकान में चोरी हो गई . बख्शीश ने पुलिस के आगे इन्दर को खड़ा कर दिया . कई दिन उसकी धुलाई होती रही . उल्टा लटकाया गया .घोटना फेरा गया . बाँबी पर बिठाया गया . पर इन्दर को न कुछ पता था न उसने कुछ बताया . थाने - कचहरी में कई दिन पिसता रहा . कोई जमानत देने वाला नहीं था . जेल से निकला तो हाथ खाली , जेब खाली , पेट खाली . जिंदगी की कसकर पकड़ी डोर उसके हाथों पर गहरे निशान डालकर खिसकती रहीं . पीछे रह गई तो बस इक जलन . इन्दर को लगा जैसे एक बार फिर उसके हाथों से माँ की अंगुली छूट गई है .
वह कई दुकानदारों के पास गया पर किसी ने काम नहीं दिया . सबको गुरबख्श सिंग ने रोक दिया . बोला ..' मुझे दगा दे गया तो तुम्हारे यहाँ क्या भरोसा ...?' आखिर पेट भरने के लिए इन्दर दिहाड़ी करने लगा . उसका और कैले मिस्त्री का साथ बन गया . पिंड में जाटों का दासत्व कर -कर खांगड़ हुआ और 'चमार' सुन -सुनकर परेशान हुआ कैला शहर आ गया था .कई वर्ष धक्के खाकर करनी पकड़ने योग्य हुआ . कैला जहां काम करता इन्दर को भी साथ ले जाता . इन्दर कैले के घर ही रहने लगा . 
कैले की घरवाली ज्ञानो एक दिन कैले से कहने लगी , ' सुनो जी , इन्दर से विवाह की बात करूं ....अगर तुम कहो तो ...? '
'क्यों ..? मुझसे मुश्क आने लगा है अब  ... बहन की , अगर इन्दर से ही करना है तो मुझसे पूछ के करना है ..?'
लानत है ...यूँ ही बकवास करते रहते हो , सुख से उम्र हो चली है उसकी  ...क्या तुम्हें वो आधा मर्द लगता है ....तुम तो यूँ ही .... ।'
' ले आओ फिर कोई मेम ...वह कौन सा हनुमान का भगत है ... ।'
' लो तुम तो बात को हँसी में उड़ा रहे हो ...उसका कौन सा माँ -बाप है बेचारे का ..अब तुम्हारे पल्ले लगा है तो तुम्हें ही कुछ सोचन पड़ेगा ... ।'
' यह सब औरतों के काम होते हैं ..पूछ लो किसी से अगर बात बनती है तो ....हाँ पर सुन , यूँ मत मजबियों (हरिजनों ) के घर करेले देती फिरना ...खत्रियों का बेटा है इन्दर ... ।'
' लो जी ....पता है मुझे ...खत्री भी बेचारे बहुत फिरते हैं इन्दर की तरह ...वक़्त के मारे ...यह तो पैसे ने इन्सान को बाँट दिया ...है तो सारे एक ही खून के .... ।'
'...चल ठीक है ,अब ज़्यादा ज्ञान मत बघार ..सोने दे दो घड़ी ... ।'
ज्ञानो ने कई खत्रानियों ,क्षत्राणियों , भटियानियों से बात की ...पर किसी ने पल्ला न पकड़ाया ।
मनियारी वाली शिला ने तो उससे बखेड़ा ही खड़ा कर दिया ... कहती ,' लड़का गरीब हो तो बात अलग है ज्ञानो ..पर कोई आगे -पीछे तो होना चाहिए ...खाता तो वह चमारों के चूल्हे में ही है और तुम लड़की ढूँढती फिर रही हो शोभा सिंग खत्री की ...सुन ...कोई चमारन -वमारन मिल जाये तो भली जान ... ।'
' देख वीरे ..मैंने तेरी खातिर कई खत्रियों के घर बात चलाई ...अब तुम्हारा कोई अपना होता तो फ़िक्र करता ...भाई हक तो है नहीं ...देख ले ..अगर तुम कहो तो किसी नीची जाति में लड़की देख लूँ ..होगी सुंदर इतनी मेरी गारंटी है  ... ।' ऊहा-पोह में ज्ञानो ने सारी बात इन्दर को बता दी ।
''बीबी जिवें तुहानू चंगा लगदा ...मैनू कोई फ़र्क नहीं ... मैनू ते बस जीण जोगा आसरा चाहिदा ...' इन्दर ने भी अपनी सहमति जता दी ।
ज्ञानो ने रामदासियों की एक लड़की पसंद कर ली ।
' लो भई दिन अच्छे हों तो रब्ब ख़ुद ही 'नक्के (खेतों में दिया जाने वाला पानी ) मोड़ देता है' ...तेरा रिश्ता पक्का कर दिया ...गेली (लम्बी,सुडौल) जैसी है लड़की है ...सुख से ..दहेज में बना बनाया घर मिल जायेगा ...घर जमाई बनने के लिए तैयार हो जा बेटे अब । ' ज्ञानो ने बड़े चाव से इन्दर को कहा ।
लड़की की माँ मनजीत कौर वक़्त की मारी थी । उसका घरवाला फैक्ट्री में काम करते वक़्त मशीन की चपेट में आ गया था । मालिक ने ख़ूब मीठी - मीठी बातें कर मनजीत से कोरे कागज़ों पर अंगूठे लगवा लिये । बहुत कुछ देने का वादा किया ,पर बाद में पूरा कुछ न किया । वह रोटी से भी मोहताज़ हो गई । रिश्तेदारों ने भी आँखें फेर लीं । सारा दिन कपड़े सीने वाली मशीन चला -चलाकर घर चलाती मनजीत ने अपनी सारी सयानप जवान हो रही बेटी करतारो के जहन में उतार दी । गरीब की बेटी का हुस्न ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन होता है । बुरे वक़्त से डरती मनजीत ने ज्ञानो के शब्द नीचे न गिरने दिए और अपनी बेटी का हाथ इन्दर के हाथ में दे दिया ।

इन्दर अब ससुराल में रहने लगा था । घर में किरयाने की दूकान खोल ली । नई कबीलदारी और अपनों के मोह ने उसके सोये चाव जगा दिए । सुबह तड़के ही डग्गी (पीठ पर उठाई गठरी) लेकर गांवों में जाता और आकर दूकान में बैठता । तारो घर में ही कपड़े सीती । जिंदगी ख़ुशहाली से चल पड़ी।

' तारो....आधी उम्र तो खाली - खाली सी ही निकल गई , अब तुम आ गई हो तो खुशियाँ लौट आईं हैं ...हम दोनों ने अब बाकी की उम्र इकट्ठे ही गुज़ारनी है ...और इकट्ठे ही मरेंगे ।' वह अक्सर करतारो से कहता ।

पहलौठी बेटी की उन्होंने दिल खोलकर खुशियाँ मनाई । सारे पिंड में गुड़ बाँटा । लोहड़ी जलाई । गुड़िया - गुड्डों से घर भर दिया । तारो कहती रानी का इतना मोह मत किया करो ...बेटियाँ तो बेगाना धन होती हैं । '

इन्दर हँसकर ज़वाब देता यह तो मेरा शेर पुत्तर है ...मैं इसे पढ़ा -लिखाकर अफसर बनाऊँगा ...जिधर से गुज़रेगी लोग कहेंगे इन्दर सिंग खत्री की बेटी रंजित कौर जा रही है ...रहती दुनिया तक मेरा नाम करेगी ।'
पर लड़की दो साल की होने से पहले ही गुज़र गई । लम्बे इंतज़ार के बाद आई बदली बिना बरसे ही चली गई । इन्दर गुमसुम सा रहने लगा । रानी बड़े आपरेशन से हुई थी । डॉक्टरों ने कहा दूसरा बच्चा करतारो की जान का खतरा हो सकता ।
'अगर कर्मों में नहीं था तो रब्ब मत देता पर देकर छीन क्यों ली । ' इन्दर रब्ब को उलाहना देता ।
उसने डग्गी ले जानी छोड़ दी । दूकान पर भी कम ही बैठता । सारा दिन गुमसुम पड़ा रहता ।
' किसके लिए धक्के खाऊँ  ...यहाँ कौन से बच्चे भूखे मर रहे हैं ।'

मास्टर रामजस अक्सर इन्दर से बातों ही बातों में कहता ...'पुत्तरा ...जीना - मरना कोई इंसान के बस में नहीं ...सयानो ने कहा है भई तृप्त इंसान के तो मौत आने के सौ बहाने बन जाते हैं ...भूखा तो तड़प -तड़प कर भी नहीं मरता ...सब मालिक के रंग हैं भाई...हौसला रख ...। '
वह ज़िन्दगी की बाजी लड़ने से पहले ही हाथ खड़े किये बैठा था ।
' सारी उम्र इसी हौसले से काटी ...कि कल औलाद दुःख -सुख के साथी बनेंगी....पर ...। '
'अगर तुम कहो तो किसी का बच्चा गोद ले लें ...कहते हैं शहर में यतीम खानों में मिल जाते हैं ।' करतारो दुःख कम करने का उपाय गढ़ती ।
' तारो ...मेरा जीजू बड़ा दानिशमंद इन्सान था ...पर पंचायत उसकी बात कभी नहीं टालती थी ...वह कहता था औलाद हो तो अपनी हो ...बेगाने खून का कोई भरोसा नहीं ..अपना मारेगा तो छाँव में फेंकेगा ...और फिर अगर किस्मत में ही नहीं है तो यूँ ही ....।' इन्दर ने आह भरी ..।
'' बस बन्धु आगे क्या बताऊँ तुझे  ...मेरा काम पूरा होने वाला ही था कि इन्दर ने अगली सुबह दूकान खोल ली ...फिर चल पड़ा ...मरता - मरता उठ खड़ा हुआ...इसी लिए तो मेरा काम टल गया ...लो अब आगे सुनो .... '
' इन्दर .... तुम करतारो को डॉक्टर गुलाटी को दिखा लाओ...कहते हैं बड़ा सयाना है ...शायद कोई मेहर हो जाये ..।' कैले मिस्त्री ने इन्दर से बात की ।
औलाद की दबी ख्वाहिश एक बार फिर इन्दर के ह्रदय में जोर मारने लगी । उसने तारो से सलाह की । कुछ दिन आनाकानी के बाद तारो डॉक्टर के पास जाने के लिए तैयार हो गई । डॉक्टर ने कई टेस्ट लिए ...
' बीबी तुम माँ तो बन सकती हो ...पर केयर करनी पड़ेगी ...अगर ज़रा भी चुक हुई तो जान का ख़तरा हो सकता है ..हम पूरी कोशिश करेंगे ...डर तो कोई नहीं अब आगे रब्ब की रजा ...तुम लोग सलाह कर लो ..।' डॉक्टर ने तारो जी जाँच करने के बाद  कहा  ।
' डॉक्टर साहब ...खर्चा ...? ' इन्दर ने संशय जाहिर किया ... ।
'टेस्ट ..दवाइयों ..ऑपरेशन आदि का कुल मिलाकर तीस , चालीस हजार का खर्चा मानकर चलो ..।'
' चालीस हजार ...!! तारो को चक्कर सा आ गया । जैसे किसी ने झुला झुलाकर शिखर पर झूले की रस्सी तोड़ दी हो ।
' सलाह करके बता देंगे जी ..।' इन्दर ने डॉक्टर की मेज से उठते हुए कहा  ...उसकी टांगें काँप रही थीं ।
इन्दर के लिए एक नई जंग शुरू हो गई । उसने अनुमान लगाया ..घर के गहने कपड़े बेचकर भी इतने पैसे इकत्रित नहीं हो रहे थे । उसपर तारो की जान का ख़तरा अलग । वह किसी हालत में तारो को खोना नहीं चाहता था ।
उसे कहीं भी चैन न आता । रात को सपने आते , सपनों में देखता उसके आस -पास बच्चों की भीड़ लगी है । वह एक बच्चे को पकड़ने की कोशिश करता तो सभी भाग जाते और एक बड़े से बरगद के पीछे जाकर आलोप हो जाते । वह ढूँढता - ढूँढता हाँफ जाता और आखिर जोर -जोर से आवाजें देने लगता ।
हाल तो करतारो का भी बुरा था पर बेचैनी इन्दर को ज़्यादा थी । बच्चे की चाहत ने उसे पागल सा कर दिया था ।दूसरी ओर पैसों का पहाड़ पार करना उसके बस की बात नहीं थी ।
' अगर कोई मुझे मोल लेना चाहे तो चालीस हजार से एक कौड़ी ज़्यादा न माँगू ...और सारे पैसे डॉक्टर को पकड़ाकर फटाफट बच्चा ले लूँ ..बस फिर पीछे मुड़कर नहीं देखूंगा ...रात - दिन कंधों पर उठाये फिरूंगा उसे ।'
और जो तुम्हें मोल लेगा उसका काम तुम्हारा बाप करेगा ..? '
' बावरी ..बाप को क्यों बीच में घसीटती है ..उस कर्मों वाले का तो आँगन भरा रहता था किलकारियों से ...यह तो अपने ही कर्मों में ....। '
' देखो -देखो बन्धु इन लोगों की करतूत देखो ...पता नहीं कहां से लाये इतने पैसे और इलाज शुरू भी कर लिया ...मेरे से ...मेरे से पंगा ...वक़्त से ...? अब देखना मैं इन्हें कैसे -कैसे मजे चखाता हूँ ...वक़्त से आँखें मिलाते हैं ससुरे ...दो कौड़ी के आदमी ..और ...और ..मेरे से ...मेरे से ... '
आँखें बंद किये छह महीने गुज़र गये । इलाज ठीक था । बच्चा ठीक था । इन्दर और तारो एक अलग दुनिया में गुम हुए रहते । एक पल तो उन्हें चारो ओर हरियाली ही हरियाली दिखती ...नर्म -नर्म ...कोमल ...सुंदर ...पर दुसरे ही पल अँधेरे झूलते ...झाड़ और उजड़ा हुआ बाग़ दिखाई देता । इन्दर रात को कई -कई बार उठकर तारो का मुँह देखता ।
' रब्बा एक बार जग में सर डाल दे, फिर चाहे मेरी जान ले लेना ...करतारो देवी - देवताओं के आगे झोली फैलाती ।
' अगर तारो को कुछ हो गया मैं चार दिन भी जी नहीं पाऊँगा ...मैं मर जाऊंगा ' ...इन्दर रब्ब के आगे मिन्नतें करता ..।
दिन पूरे होने से कुछ दिन पहले ही डॉक्टर ने करतारो को अस्पताल बुला लिया । ऑपरेशन के प्रबंध मुकम्मल कर लिए । इन्दर करतारो के पास से एक घड़ी के लिए भी न हटता । सारा दिन बैठा ' वाहेगुरू- वाहेगुरू' करता रहता और अस्पताल के सारे स्टाफ की जी हजुरी में लगा रहता । उसे उस अस्पताल का हर कर्मचारी उसकी आस पूरी करने वाला फरिस्ता जान पड़ता । रात ढलते ही करतारो को दर्द उठने लगा । इन्दर साँसें रोके बैठा रहा  । जब तड़के गुरूद्वारे में अमृत वाणी की आवाज़ सुनाई दी तभी इधर उसके कानों में नवजात बालक के रोने की आवाज़ भी सुनाई पड़ी ।
' तारो ...! उसके दिल में ठसका सा उठा । कुछ समय बाद डॉक्टर गुलाटी तथा कुछ और डॉक्टर लेबर रूम से बाहर निकले । 
' इन्दर सिंग आप बाप बन गये ...पर आप एक मिनट पहले मेरे साथ आओ ' डॉक्टर गुलाटी उसे साथ ले चला ।
' डॉक्टर साहब क्या बात है ...? तारो ठीक तो है ..? ....डॉक्टर साहब लड़का -लड़की की आप चिंता न करें ...मुझे तो लड़कियाँ लड़कों से भी ज़्यादा प्यारी हैं ...नर्स बहन जी से पूछ लो , मैंने तो पहले ही कहा था भई लड़का हो या लड़की मैं लोहड़ी जलाऊँगा .. है न बीबी जी ...? मैंने तो पहले भी लड़की होने पर बहुत खुशियाँ मनाई थी जी ।' इन्दर डॉक्टर के आगे हाथ जोड़ता ..उसके पैर पकड़ता पागलों की सी अवस्था में बके जा रहा था ।
'आप प्लीज़ एक मिनट अन्दर आइये ज़रुरी बात करनी है । '
दरवाजे के पास खड़े इन्दर ने डॉक्टर की बांह पकड़ ली ।
' डॉ ...डॉक ...डॉक्टर साहब ..देखना कहीं ..मैं दुनिया को आग लगा दूँगा अगर तारो को कुछ ....आप जो मर्जी करो ...बड़े से बड़ा डॉक्टर बुला लो ...जो कहेंगे मैं करूंगा ...पर ..डॉ ...डॉक्टर सा....ह....ब ...।' इन्दर जोर -जोर से रोने लगा ।
' इन्दर सिंग ...इन्दर सिंग ...प्लीज़ ट्राई टू अंडरस्टैंड ...अच्छा ऐसा करो आप तारो और बच्चे से मिल आओ पहले...फिर मेरे पास आना ...घबराओ मत ...सिस्टर इनको पेशेंट के पास ले जाओ ।'
करतारो का चेहरा पीला, आँखें अधखुली और होठों पर सकून भरी मुस्कराहट थी । इन्दर ने कपड़े में लपेटे हुए छोटे से बाल को लपक कर अपने दोनों हाथों में उठा लिया । वह रुई सा कोमल था । इन्दर का चेहरा लाल हो गया ।
मासूम से बच्चे पर इन्दर को बहुत प्यार आया । उसने बच्चे को छाती से लगा लिया । आँखें बंद करके रब्ब का शुक्रियाअदा किया । उसका चेहरा शांत हो गया । उसने बच्चे को बिस्तर पर लिटा दिया । फिर करतारो की ओर देख कर हँस पड़ा । उसने बच्चे के ऊपर से सौ का नोट वारकर नर्स को पकड़ा दिया । नर्स ने चुपचाप नोट पकड़ लिया और मुँह फेरकर खड़ी हो गई । इन्दर चाहता था वह पैसे लेने के लिए नखरे करे और कहे कि उसे सौ नहीं हजार चाहिए ...इतना सुन्दर बच्चा दिया आपको और सौ रूपये ...? ' पर न नर्स ने पैसे लेने में आना -कानी की न करतारो की मुस्कराहट हँसी में बदली ।
ख़ुशी और परेशानी में लिपटा  इन्दर बोला , 'अच्छा, तारो मैं डॉक्टर साहब को मिलकर आता हूँ ...कहते थे मेरे पास आना (हँसकर) मुझे पता है पैसों के लिए कहेगा ...यह देख मैंने सारा इंतजाम कर लिया है ...अभी पैसे देकर छुट्टी लेकर हम फटाफट घर चलेंगे ...कैले लोग इंतज़ार कर रहे हैं ...तुम फ़िक्र मत करना ..अच्छा ये तो बता लड़का है या लड़की ...?  ...?'
' तारो ...तारो ...तुम बोलती क्यों नहीं ..तारो ...? '
' भाई साहब पेशेंट को इंजेक्शन लगे हुए हैं ...वह अभी पूरी तरह होश में नहीं ...आप डॉक्टर साहब के पास से हो आइये...।' नर्स ने कहा ।
' बहन जी लड़का है या लड़की ...? '
' प्लीज़ डॉक्टर साहब के पास जाइये, वही बतायेंगे आपको ' नर्स ने मुँह फेरकर कहा ।
' हुँह ...! कैसी रूखी और झगड़ालू औरत है ..इनको किसी की ख़ुशी से कोई मतलब नहीं ...बस नोट चाहिए ....हुंह ...डॉक्टर साहब बतायेंगे ।'
' आओ इन्दर सिंग बैठो ' डॉक्टर गुलाटी बोला ।
' डॉक्टर साहब आपका लाख -लाख शुक्रिया है जी ...मैं सारी उम्र आपका कर्ज़ा नहीं उतार सकता ...आप जब चाहो मुझे पुकार लेना ..जान भी हाजिर है जी आपके लिए ...। डॉक्टर  साहब बस बच्चे की कमी थी जो पूरी हो गई ...परमात्मा लम्बी उम्र करे ...हाँ पैसे बता दीजिये जी ...और जल्दी छुट्टी दे दीजिये...तीन दिन हो गये दूकान बंद पड़ी है ...कितने पैसे हो गए जी डॉक्टर साहब ...? '
' इन्दर सिंग ..बात यह है ....पैसों की कोई बात नहीं तुम तो घर के आदमी हो ...भाई बात यह है कि ....ऑपरेशन बहुत बड़ा था ..डिलीवरी सही हो गई ..करतार कौर को अभी कुछ दिन अस्पताल में और रखना पड़ेगा ...तुम पैसों की कोई चिंता मत करो ..तुमसे हमने अब और कोई पैसा नहीं लेना .. बस तुम माँ और बच्चे की अच्छी तरह देखभाल करना ...ठीक है ...और ...
' अच्छा डॉक्टर साहब मैं अपने सम्बन्धियों को सुचना दे आऊँ ...वह तो कब से पार्टी मांग रहे हैं ..घर में दो बोतलें भी मँगवा रखी हैं ...।'
' इन्दर सिंग ...बात यह है ... कि ..बच्चा ...बच्चा ...
'...जी ....? ...'
' बच्चा हिजड़ा है ...'
'....हैं ...!!'
चीरने -फाड़ने की क्रिया के बाद करतारो यूँ ही अधमरी हो गई थी । उसने ने हफ़्ता भी न निकाला और चल बसी । करतारो का चले जाना इन्दर के लिए असहनीय था । उसे लगता जैसे एक बार फिर भगदड़ मच गई हो और उसके हाथ से माँ की अँगुली छूट गई हो ...।
''अब बोलो इन्दर सिंग जी ...महाबली वक़्त से पंगा लेते थे ...ले लिया स्वाद ..घरवाली मर गई ...अब ढोते रहना चार सेर माँस ...न आगे न पीछे कुछ ...अरे क्या सोचने लगे बन्धु ...अरे भाई ऐसा न करूं तो लोग वक़्त को भूल ही जायें ....फिर ये आदमी मुझसे कैसे डरेगा  ...बोलो ....बोलो ....!''
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इन्दर सिंह ने सबको बता दिया कि 'लड़का' हुआ है । यारों - दोस्तों संग उसने करतारो की मौत का दुःख और लड़के की ख़ुशी मनाई । बच्चा अस्पताल में ही रहा । नाईन ने इन्दर के दरवाजे पर बन्दनवार टांग दी । सारे पिंड में गुड़ बाँटा गया । सवा महीने डॉक्टर ने दो महीने तक किसी को भी बच्चे के नजदीक आने से रोके रखा । इन्दर ने पिंड छोड़ दिया । हट्टी (दूकान ) छोड़ दी । कभी कहीं चार दिन काम करता ..कभी कहीं । बच्चा गोद में उठाकर चला रहता । 'बेटे' को प्यार से 'शिंदा पुत्त' कहकर बुलाता । दिन -रात अपने सीने से लगाये रहता । सात वर्ष बीत गए ...इन्दर फिर पिंड वापस आया । शिंदा अब थोड़ा बड़ा  खूबसूरत हो गया था ।
'देख बेटे किसी के सामने चड्डी नहीं उतारनी ...किसी के सामने पेशाब नहीं करना ..न किसी से कोई ऐसी बात करनी है ...नहीं तो भूत पकड़ लेगा ।'
' मुझे पता है पापा जी ...।'
छोटे से शिंदे को इन्दर ने बहुत कुछ सिखा दिया था । उसने फिर से दूकान खोल ली । डग्गी  भी लगाने लगा । कहता कबीलदारी चलाने के लिए जितना काम कर लो कम है । आज तो 'लड़का' छोटा है कल बड़ा होगा तो ख़र्च भी तो बढ़ेगा । शिंदे को स्कूल डाल दिया गया । मास्टर ने स्कूल के रजिस्टर में शमशेर सिंग सपुत्र सरदार इन्दर सिंह कौम खत्री दर्ज कर लिया ।
सातवें साल में स्कूल में दर्ज हुआ शिंदा साथियों से दुगुनी उम्र का था । एक दिन की बात है ..दर्जियों की लड़की लाली ने उसे बोक (बकरा) कह दिया । उसने लड़की को चोटी से पकड़ घुमाकर दे मारा । लड़की का सर फट गया । घर में उलाहना आया तो इन्दर ने शाम को मीट पकाया ।
' साले ...अपनी औलाद को नहीं समझाते कि लड़कों से कैसे बातें की जातीं हैं ...पता चल गया न अब बेगाने पुत्र को बोक कहने का मज़ा ...आ गये बड़े उलाहना लेकर ....बेटे तुम डरना नहीं किसी से ...मैं हूँ न ....।
पांचवीं तक शिंदा बिना पढ़े पास होता रहा । पर छठवीं में पैर अड़ गये ।
' इन्दर सिंह ...लड़के को समझाओ  ...खत्री का पुत्र है ..चार अक्षर पढ़ेगा तो कहीं कमाने योग्य होगा ...हमारे कौन से हल चलते हैं ।' मास्टर ने इन्दर को स्कूल में बुलाकर कहा ।
' कोई बात नहीं मास्टर जी ...बहुत कमाया हुआ पड़ा है मेरे पास...भले दो पीढ़ियों तक बैठ के खाता रहे शिंदा ..ये शिव का लड़का चौदह जमात पढ़ा है ...इसे तो कहीं नौकरी मिली नहीं ...अब चूड़ियाँ बेचता फिरता है बेचारा ...आप चिंता मत करो ..जितना पढ़ता है पढ़ा दो ..और फिर पढ़-लिखकर आप कौन सा जज लग गये हो जी ...मास्टरी से चार गुना ज़्यादा कमाई तो मैं हट्टी से कर लेता हूँ ।'
शिंदे की यारी बड़े घरों के लड़कों से हो गई ..कभी किसी की जीप में शहर जाता ..कभी किसी की मोटर साइकिल पर । ज़ुल्फों के नित नये डिजाइन बनाता । मीट - दारू अब इन्दर के घर में नमक - तेल सा हो गया था ।
धीरे -धीरे शिंदे के नाम के साथ वैली (बदमाश) जुड़ गया । नित नये - नये लड़के उसके दोस्त बनते । उसके दाहिने डौले पर गंडासे का निशान ..ऊपर की दंतपीठ का टूटा हुआ तीखा दांत और से कटा दाहिना अंगूठा उसकी काबलियत के सर्टिफिकेट बन गये थे । अगर कोई इन्दर से शिंदे को संभालने की सलाह देता तो वह उसे एक की सौ सुना देता । उसदिन आंगन में बैठा जग्गा बढई इन्दर से कहने लगा , ' इन्दर सिंह शिंदे को काबू में रख , बिगड़ता जा रहा है ...बेटे तो मेरे भी चार हैं ..पर मजाल है कहीं चूं भी कर जायें ...लड़के को और खुरपे को जितना मारा -पीटा जाये उतना ही ठीक रहता है  ।
' चाचा ... अब छोकरे -वोकरे अक्सर ऐसा करते ही हैं ...वे हिजड़े होंगे जो अन्दर घरों में घुसे रहते हैं ...और फिर तुझ दूध धुले को मैं अच्छी तरह जानता हूँ ...भूल गया जब वर्षों पहले लोगों ने कपास में तुझे पकड़ा था इज्ज़त उतारते हुए ।' इन्दर ने बात पलट दी ।
' इन्दर सिंह ..सुख से बेटे की उम्र हो गई है ...विवाह कर दो शिंदे का ..और फिर घर में कोई खाना बनाने वाली भी आ जाएगी ...अब सारी  उम्र तूने ही तो हाथ नहीं जलाने ।' टिबड़ी वालों का शेरा बोला ।
'
' हाँ ...हाँ ..जैसे तुम तो खूब खाते हो बहुओं के हाथ के पकाये परांठे ...देखो  तो सही कौन दे रहा मत ...चल फेंक पत्ता ...आया बड़ा श्रवण पुत्र ।' शेरे की बात को बीच में काटकर जैले ने उसे टका सा ज़वाब दिया ।
लगातार तीन दिन गायब रहने के बाद शिंदा घर वापस आया तो इन्दर ने पूछा , ' शिंदे कहां गये थे ..? बता के जाते यार ...मुझे फ़िक्र हो रही थी ...तीन दिन हो गये ..सब ठीक तो है ...?'
' पापा जी क्या बताऊँ बहुत बुरी तरह फँस गया था । मेरा मित्र इकबाल और पटवारियों का गुरदीप होटल में लड़की ले गये । साथ में मैं भी था । किसी ने पुलिस को ख़बर कर दी । हमें पुलिस पकड़कर ले गई । आवारागर्दी का केस डाल दिया ...पापा जी मैं तो निकल सकता था । मुझ पर तो कोई केस नहीं बनता था ...पर इसके लिए मुझे डॉक्टरी जांच करवानी पड़ती ...पर फिर आपका जीना दूभर हो जाना था ...पापा जी मैं आपको दुखी नहीं देख सकता ...इसलिए मैंने अपने ऊपर आवारागर्दी का केस होने दिया ...आज जमानत हुई है ...पापा जी मैंने ठीक किया न ...?'
' शिंदे पुत्तर  ....तूने मुझे मरने से बचा लिया ..पुत्तर यह बदनामी हमारे लिए कालिख़ का टीका नहीं जीने का आसरा है ...अब तो हमने यूँ ही अपनी दिन गुज़ारने हैं ...मैं तुझे वो सब कुछ तो नहीं दे सकता जो तुझे मर्द बना दे ...पर दुनिया तुझे मर्दों की तरह ही पूजेगी । एक बात मेरी और सुन ..दुनिया को जो दिखलाओ वो उसे ही सच मान लेती है ...जिस दिन इन्हें पता चल गया तुम हिजड़े हो , तो ये जो आज तुझसे डरते -फिरते हैं न , यह तुम्हें तालियाँ पीट- पीट कर मार देंगे ...शिंदे पुत्तर मैंने बहुत कठिन लड़ाई लड़ी है अब बाजी तेरे हाथ में है ....।'
'' अरे ! ....अरे !..बन्धु बूढ़ा तो बूढ़ा ....ये लड़का भी बड़ा चालू निकला ...हर चाल में मात कर देते हैं ...बीस साल होने को आ गये ...मैं अभी तक दुनिया को यह नहीं बता सका कि ये जो बड़ा बदमाश बना फिरता है ये हिजड़ा है ...बताऊँ कैसे ससुरे मौका ही नहीं देते ...पर मैं भी वक़्त हूँ ...देखता हूँ कहाँ तक भागते हैं ....''
' क्या बात है पुत्तर ...चुप से क्यों बैठे हो ...? रोटी भी नहीं खाई ...?'
उस रात शिंदा बहुत उदास था ।
' पापा जी ...मैं यह बनावटी ज़िन्दगी जीते -जीते थक गया हूँ । '
' पुत्तर जीने की मज़बूरी है ...कोई हल भी तो नहीं ।'
' रोज -रोज के झंझट से एक ही बार कड़वा घूँट भर लेते ...कितने दिन झूठ के सहारे जीयेंगे ....थानेदारों की ज्योति मुझे प्यार करती है ..विवाह करने को कहती है ...बताओ मैं उसे क्या जवाब दूँ ...मुझे जन्म होते ही मार देते या डेरे में छोड़ आते ..।'
उस दिन बाप -बेटा रात भर रोते रहे ।
'' हा ...हा ....हा ...बन्धु क्या देख रहे हो ...अब आया न ऊँट पहाड़ के नीचे ...अब देखना कैसे गिड़गिड़ाकर मौत मांगता है ये इन्दर सिंह खत्री ...अरे बन्धु ...वक़्त हूँ मैं वक़्त ...वक़्त की मार से कौन बच सका है भला ...है न ....!''
लोग फिर शिंदे की मौत के बारे बातें करने लगे । शिंदे के कपड़ों और दाँतों से ही उसकी शिनाख़्त हुई । जब इन्दर को लाश दिखलाई गई तो वह बार -बार टागों की तरफ़ से चद्दर उठाकर देखने की कोशिश करता ...पर उसे पकड़कर खड़े लोग उसे जबरदस्ती बाहर ले आये ।
डॉक्टर पोस्ट मार्टम से निर्वृत्त होकर अपने दफ़्तर की ओर चल पड़ा । जब वह शीशम के पास खड़े इन्दर के पास गुज़रने लगा तो इन्दर हाथ जोड़कर बोला , ' डॉक्टर साहब मैं उसका बाप हूँ  ....सच बतलाइयेगा  ...शिंदे का शरीर पूरा था न  ....? ..उसके धड़ पर मांस था ... ? '
' नहीं भाई ...डॉ धीमे से बोला , 'कुछ मांस तो मछलियों ने खा लिया था ...कुछ गल -सड़ गया ...शरीर के ऊपर तो मांस था ही नहीं ...बस हड्डियां ही थीं वो भी पूरी नहीं ...जानवर खा गये होंगे ...जो रब्ब को मंजूर ..हौसला रख ...महीने तक पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट आ जाएगी ...फिर मौत के कारण का भी पता चल जायेगा .. ।' डॉक्टर  उसके दोनों दबाकर सहानुभूति जताता हुआ चला गया   ।
'' अब तो गया ...बन्धु ...मेरी बरसों की जद्दो -जहद अब पूरी हो गई ...बड़ा सख्त हड्डी का निकला ससुरा ...पर अब गया ...अब नहीं बचता ...अरे बन्धु जीयेगा किसके सहारे ...सभी तो मैंने ....हा ...हा ...हा ....वक़्त हूँ न ...काम है ये मेरा बन्धु ....''
' शरीर के ऊपर तो मांस था ही नहीं ......शरीर के ऊपर तो मांस था ही नहीं ......शरीर के ऊपर तो मांस था ही नहीं....!' इन्दर के इर्द -गिर्द  ये शब्द गूंजने लगे । उसने एक लम्बी साँस खींची । ठंडी हवा से अन्दर काँप उठा । आँखों के आगे धुंध सी छितरा गई ... ।
इन्दर ने पीछे  मुड़कर देखा ...सारा पिंड उसकी ओर गहरे दुःख और हमदर्दी से देख रहा था , उसका जवान पुत्र जो मर गया था ।
' शिंदे पुत्तर ...तुम तो मरकर भी मुझे जीने लायक छोड़ गए ओये ....!' इन्दर के अंतर से आवाज़ आई .... ।
दोपहर से बांधकर रखा दुःख का दरिया टूटकर बह निकला ...चीखें ...आँसू ...और दहाड़ें...वह पेड़ के तने से सर टकरा -टकराकर रोने लगा ... । दूर खड़े लोग उसे सम्भालने के लिए दौड़ पड़े ... ।
'' अरे ....! ...अरे ...! ..यह क्या ...? ...यह तो फिर चल पड़ा ....जीने की बात करता है तो मरेगा कैसे ..? ...बस ..बस ... यही है मेरी मुसीबत ...इस आदमी ने तो मुझे हराकर रख दिया ...देखो बन्धु मैं कैसा वक़्त हूँ जो ख़ुद वक़्त में पड़ा हूँ ....!''

अनु : हरकीरत हीर 
18 , ईस्ट लेन, सुन्दरपुर , हाउस न - 5, गुवाहाटी - 5
मोब - 9864171300





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