Tuesday, July 30, 2013

मोनालिसा की जगह …

आर्ट स्कूल में
एक दिन हमारी सारी  क्लास
 नैशनल मियुजियम में
पेंटिंग के मास्टर पीस
स्डीज कर रही थी
मोनालिसा की मुस्कराहट देखकर
एक स्टूडेंट ने टीचर को  लिया
सर यह मुस्कराहट कभी हँसती नहीं ?
यह पेंटिड मुस्कराहट है
यह जवाब सुनकर मोनालिसा की जगह
साड़ी क्लास हँस पड़ी …

(२)

पेंटिंग …

ज़िन्दगी की पेंटिग
पता नहीं कब की बनती
आ रही है
पर अभी तक पूरी नहीं हुई
नए - नए हाथों के साथ
नए रंगों के साथ
यह पेंटिंग बन रही है
बनती जा रही है
न कभी ज़िन्दगी ने पूरा होना है
 और न ही ज़िन्दगी की पेंटिंग ने
पूरा होना है
बनती रहना ही
इसका पूरा होना है - जीते रहना है
मुहब्बत की तरह …

इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

(3)

फूल बन ….

फूल तोड़ा
फूल मर गया
तोड़ने वाला नहीं मरा
पर बचा भी नहीं
वह कभी फूल नहीं बनेगा  ….

(४)

मुहब्बत की हीर …
मुहब्बत से कोई रांझा हो सकता है
कला से कोई शायर
पर कला से कोई रांझा नहीं हो सकता
शायर की नज्में
शायर की शायरी क्यों नहीं बनती
शायर की ज़िन्दगी
ज़िन्दगी की खूबसूरती
शायर की कला ही है शायरी लिखने की
सोचता रहता हूँ कि किसी तरह
शायरी की कला भी
जीने की कला खूबसूरत जीने की कला हो जाये
सोच सच भी तो हो जाती है …
इक बार अपनी इस सोच को
सच होते मैंने भी देखा है और सब ने भी
इक खूबसूरत शायरा को जब मुहब्बत हुई
उस की शायरी और खूबसूरत हो गई
और उसकी ज़िन्दगी उसकी शायरी से भी खूबसूरत ….
मुहब्बत  के साथ कोई हीर भी हो सकती है
और शायरा भी …

इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर 

(५)

लाइल्टी ….

किसी भी क्रिमनल वकील को
पूछकर देख लो
कि तुम्हारी लाइल्टी किसके साथ होती है ?
हमारी लाइल्टी  हमारे क्लाइंट के साथ होती है
सभी तरह के कातिल
उनके क्लाइंट होते हैं
सब तरह के कातिल ही
इन वकीलों को करोड़पति बना रहे हैं …
हैं कुछ वकील
जिनकी लाइल्टी आम लोगों के साथ भी है
और इन्साफ के साथ भी …

(६ )

बीबा - 'खामोश चीखां ' को अब हिंदी में छाप लेना
पंजाबी में फिर छापने की जरूरत नहीं
कुछ मात्राएँ ठीक नहीं यह ख़ास बात नहीं
नज्में ठीक हैं यही ख़ास है
जिसने सबसे पहले तेरी किताब पढ़कर
तुझे लिखा था वह पंजाबी पढ़ाती है
टीचर है उसे पहले स्पेलिंग दिखे
कविता बाद में …
जिसने कविता पढ़ी उसे बहुत अच्छी लगी
जिसने स्पेलिंग पढ़े टीचर हैं
टीचरों को मत सोच
तू कविता है कविता को सोच
कविता को जी …
कहीं 'चीखां' बोलते हैं तो कहीं 'चीकां '
तेरे ख़त में 'चीखां' ही थीं -
क्योंकि चीखां वाले इलाके में ही तू
जन्मी पली है - टीचर ही
गलतियों पर शोर मचा रहे हैं
कविता पढ़ने वाले नहीं
कम पैसे लेकर छापने वाले अच्छा नहीं छाप सकेंगे
किसी की बातों में आकर पैसे न गवा लेना
खराब छप गई किसी ने जिम्मेवारी नहीं लेनी
किताब भी और ड्राइंग भी तुझे रजिस्ट्री कर दी हैं
हिंदी में छापने के लिए ….
मैं अमृता को 'है ' लिखता हूँ टीचर 'थी' लिखते हैं
टीचरों को कभी मुहब्बत समझ नहीं आई
न कभी कविता ….
.
इमरोज़ ….

1 comment:

  1. vaah...........hare aalfaz gahera hai..bahut khub

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