Thursday, March 28, 2013

संक्षिप्त परिचय -
नाम- परगट सिंह सतौज
जन्म- १९८१ , संगरूर , पंजाब
शिक्षा - स्नातकोत्तर
कृतियाँ - तेरा पिंड ( काव्य संग्रह ), भागू  (उपन्यास ) , तीवीयाँ (उपन्यास )
सम्मान - , कर्नल नारायण सिंह भट्टल कहानी सम्मान , नंगे हर्फ़ साहित्य पुरस्कार , प्रकाश कौर सोढ़ी कहानी पुरस्कार, साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार
सम्प्रति - शिक्षक 
संपर्क -गाँव - सतौज , -  धरमगढ़ , जिला- संगरूर- 148028 (पंजाब)
मोब - 09417241787, 09592274200

पंजाबी कहानी - गलत-मलत  ज़िन्दगी          

          लेखक - परगट सिंह सतौज (अनु : हरकीरत हीर )

         मौसम हुमस भरा है, पूरी तरह तूफ़ान आने के पहले की सी शान्ति। पर मैंने उसके घर आज तूफ़ान जरुर ला देना है। उसने मुझे समझा क्या है ..? मैं इतना भी गया -गुजरा नहीं कि अपना हक़ गवांकर यूँ चुप बैठा रहूँ। मैंने भी उसे आज दिखा देना है , अगर तू मेरे साथ ऐसा कर सकता है तो बनिये के मैं भी नहीं जन्मा। ध्या ले आज जिस भगवान को ध्याना है ... मांग ले जौन सी मनौतियाँ मांगनी हैं ....!

         ''मैंने कहा सुनो जी  ! मैं कब की आवाजें देती जा रही हूँ ''  मेरी पत्नी रसोई में रोटियाँ सेंकती मेरे सर पर आ खड़ी हुई। मैं तबक कर उसकी तरफ देखता हूँ जैसे काफी सालों से बिछड़ी को बड़ी मुश्किल से पहचान रहा होऊँ।
         ''बाहर मुंडा (लड़का ) कब से रोये जा रहा है उसे देख लो जरा मैं रोटियाँ सेंक रही हूँ। '' पत्नी मुझे घूरती सी मुड़  रसोई में जा घुसी है। मैं बाहर से अपने तीन साल के बेटे को गोदी में उठा कमरे में आ गया हूँ। थोड़ी देर बाद पत्नी गीले हाथ तौलिये से पोंछती अन्दर आ जाती है।  
''तुम्हारी नज़रें आज कैसी उखड़ी - उखड़ी  सी लग रही है ..?  '' पत्नी मेरी आँखों में देखती,  मेरी अन्दर की उथल-पुथल को पकड़ने की कोशिश करती है।
          '' नहीं तो !  यूँ ही वहम हो रहा है तुम्हें   '' मैं अपने आस-पास झूठ की दीवार चिनता हूँ ताकि वह मेरे अन्दर प्रवेश न कर सके। 
        ÒÒ रोटी लाऊँ ..? ÓÓ पत्नी पूछती है।
        ÒÒ हैं ..! हाँ ....! ÓÓ मैं अपने भीतर के समुंदर में फिसलता- फिसलता मुड़ परत के उसे Òहाँ Ó कर देता हूँ और मुड़ उसी समुंदर में डुबकी लगा जाता हूँ।

           'कभी माँ भी इतनी निर्मोही बन जायेगी?' मैंने यह कभी सपने में भी नहीं सोचा था पर यदि कभी यह सच हो जाए तो ...? तो बन्दे के अन्दर ऐसे झक्खड़ झूलते हैं कि जहां से भी ये पार हो जाएँ सबकुछ पलों में तहस-नहस हो जाए  ।
            माँ को तो मैं दुसरा नहीं पहला  दर्जा देता था रब्ब का । फिर उसे क्या मज़बूरी आन पड़ी थी कि उसने मेरा मांस काटकर किसी दुसरे को खिला दिया ? जब मुझे पता चला तो मैं तो जीता जी ही  मर गया था। माँ ने मार दिया था। माँ ने अपने हिस्से की सारी  जमीन बड़े के नाम लगवा दी थी। मैंने रिश्तेदारों को भी बुलाया पर उसने किसी की न मानी। उलटे भैया मुझे मारने दौड़ा ।
पत्नी ने तो मुझे पहले ही बहुत समझाया था, '' यह काला नाग है, काला नाग ! इसे दूध मत पिला एक दिन तुझे ही डस लेगा. '' 

           ''अरे भोली ! खून के रिश्ते हैं , यूँ ही नहीं टूटते !'' मुझे उसकी बातें बुरी लगतीं।
''तुम तो सतयुग की बातें करते हो। अब पहले जैसा खून नहीं रहा !'' वह समाज के ऐसे सच का आइना मुझे दिखाने की कोशिश करती पर मैं आँखें  मूंद लेता।  
पर जब जमीन बड़े के नाम हो गई तो मेरी आँखें , मुंह , कान सब खुल गए और फिर बंद नहीं हुए।

           मुझे पिछले समय के दौरान उनकी ओर से मेरे साथ की गई ज्यादती इस अनहोनी के लिए अभ्यास   लगी। अगर मैं पहले ही सचेत हो जाता तो .....!
           पहली बार बड़े ने मेरे साथ तब की,  जब मैं किसी दोस्त के पास तीन - चार दिन बाहर गया हुआ था। मुझे पीछे से मामा जी का फोन आया , '' मक्खन अलग होना चाहता है। कहता है बना हुआ घर मैंने लेना है। अब कैसे करें ..?''
'' मामा जी अभी उसे अलग होने की क्या आन पड़ी थी ...? अभी तीन महीने ही तो हुए हैं  उसकी शादी को  ...?''

          '' हमने तो बहुत समझा के देख लिया पुत्तर , मानता ही नहीं किसी की ! ''

           '' चलो यूँ करो फिर जो घर माँगा है दे दो उसे। '' मैं ज्यादा बखेड़े में नहीं पड़ना चाहता था । 
जब मैं वापस गाँव आया तो माँ-बाप के साथ मेरा समान तुड़ी (भूसे ) वाले कमरे में पड़ा था। फिर कितने ही समय में मैं उसे धीरे- धीरे बैठने योग्य बना पाया था। 

          ''लो जी रोटी !''

          ''........! ''

          '' रोटी ...!  कहाँ खो गए ...?'' पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा। उसकी मुस्कराहट के पीछे छुपा व्यंग मुझे प्रत्यक्ष दिख रहा था। 

           मैं रोटी खाने लग पड़ा।  वह पता नहीं क्या बोलती  गई। मुझे उसकी बात समझ नहीं आई। मैं बस ऊपरी सी  ' हाँ -हूँ' करता रहा।  मेरे मन में तो उसकी एक ही बात कील की सी गडी थी,  '' तुझे मर्द कौन कहता है  ? तू तो नामर्द  है नामर्द।  दुसरा  चाहे तो तुम्हारे सर पर हग जाए तुझे फिर भी सुरति नहीं आएगी।  अब तो अपने हिस्से की जमीन भी ले उड़ा वह  अब इससे ऊपर क्या होगा ? अब खुद तो मरे ही पड़े हैं कहीं वह सर पर ही न चढ़ बैठे  , पर तुम जैसे मिटटी के ढेर पर कोई असर हो इन बातों का तब  न ...? '' 

           जब से पत्नी ने यह बात कही हैं  मेरे अन्दर कोहराम सा मच गया है।  क्रोध का गोला मेरे सर की तरफ चढ़ने लगा है। जी करता है बम सा फट जाऊं। खुद भी तबाह हो जाऊं और अपने आस -पास का सबकुछ तहस - नहस कर दूँ।  मैं अपनी पत्नी के सामने नीचा नहीं होना चाहता था । मैं तो हर बार दूर की  सोचकर चुप  रह जाता था। पर मेरी इसी सोच ने मुझे मेरी पत्नी के आगे नामर्द बना दिया था। डरपोक और कमजोर। पर अब मैंने उसे दिखा देना है, तेरा सुक्खा कमजोर नहीं। मैं अपनी मर्दानगी के गिर रहे मीनार को मुड़ उसकी आँखों के आगे उसारूंगा। आज के बाद वह मुझे कभी नहीं कहेगी तुझ में तो जरा भी अनख नहीं है। '' 

           '' मुझमें अनख है राजी।  कल का सूरज तेरे सुक्खे की अनख  की गवाही लेकर चढ़ेगा, तुम देखती रहना !'' मेरा अंतर बोलता है। 

           पत्नी बर्तन मांजकर बिस्तर पर आ बैठी है। मैं आने वाले समय को देखते हुए उसका मन पढ़ने की खातिर बात चलाता हूँ , '' अगर मैं मर जाऊं तो तुम क्या करोगी ...?''
            '' लो जी ..! ऐसी बातें क्यों करते हो जी , मरें तुम्हारे दुश्मन !'' पत्नी के इस जवाब पर मुझे लगा मैंने बात कुछ ज्यादा करड़ी पूछ ली है। मैंने बात को जरा नरम करते हुए दोहराया, '' अगर मैं कई सालों के लिए बाहर चला जाऊं , घर को तुम अकेली संभाल लोगी  न ...?'' मेरी आँखों के आगे जेल दिखाई दे रही थी। 

             '' बाहर कहाँ ..?'' वह मेरी बिना सर -पैर की बातों पर हैरान होती है।
             '' ना, मान लो अगर मैं चला जाऊं तो ...? ''
             '' मुझे नहीं तुम्हारी कोई भी बात समझ आती।'' वह नराजगी सी दिखाती पासा पलट लेती है जैसे मुझे देख कर अपने मन का दरवाजा बंद कर लिया हो। उसने अपना मन पढ़ने देने से पहले ही मुझे दर से वापस मोड़ दिया था।
          अब मैं उसके सो जाने का इन्तजार करता हूँ। वह मेरे साथ कुछ देर बातें करती है और फिर बेटे को दूध पिलाकर सो जाती है। मुझे उस समय की इतनी बेसब्री हो रही है कि मैं  बीत रहे एक - एक मिनट को गिन रहा हूँ। समय चींटी की चाल चलता १२ तक पहुँच गया है। मैं धीरे से उठकर चप्पलें पहनता हूँ और अन्दर आ जाता हूँ फिर अलमारी की ओट से  किरच (दाव जैसा हथियार ) उठा लेता हूँ । उसे उलट-पुलटकर किसी कीमती  शय की तरह निहारता हूँ  और फिर कमर में खोंस लेता हूँ। अलमारी के पास से गुजरने लगता हूँ तो मुझे आदमकद शीशे में से अपना चेहरा नज़र आता है। एक पल रूककर मैं शीशे में अपना चेहरा निहारता हूँ , '' मुझे अपना चेहरा ही अपना नहीं लगता। मैं और नजदीक होता हूँ तो माथे पर पड़ा काट का पक्का निशान मुझे यकीन दिला देता है कि यह मैं सुक्खा ही हूँ। मैं निशान के ऊपर हाथ फेरता हूँ जैसे वह दुबारा ताजा हो गया हो और उसमें से लहू रिस -रिस कर चेहरे पर लकीरें बना  गया हो।

             उस दिन भी इसी तरह खून की धारें चलीं थीं  जब दीवार  की लड़ाई के पीछे बड़ा मुझे सोते वक़्त गंडासा मार गया था। वह आया तो मुझे मारने के इरादे से ही था पर निशाना  गलत लगने के कारण मैं जल्दी से उठकर पीछे हो गया था। वह उलटे पैर वापस भाग गया था।
         यह निशान  देखकर मेरा क्रोध और उबाल खा गया। मैं बाहर निकलता हूँ। राजी और जोनी  सोए हुए हैं। मैं उनके सिरहाने जा खड़ा होता  हूँ। जोनी सोया हुआ हँस रहा है। मुझे उसके भोले चेहरे पर तरस आता है। फिर मुझे उसका हँसता चेहरा रोता हुआ जान पड़ता है। उसके फटे मैले-कुचैले कपडे  हैं। राजी का भी यही हाल है। बिखरे बाल,  टूटी चप्पलें , पैरों में मोटी -मोटी  बिवाइयां। चेहरे पर बिवाइयों जैसी क्रूर झुर्रियां; जैसे कोई भिखारन हो। वे दोनों दरवाजे पर खड़े मेरा इन्तजार कर रहे हैं पर मैं नहीं आता। जब मैं वापस आता हूँ तबतक वे खड़े - खड़े वहीँ बुत बन जाते हैं। 

           राजी पासा पलटती है तो मुझे सोच में से बाहर खींच लाती है। मैं जोनी का एक बार मुंह चूमता हूँ और किरच को संभालता बाहर निकल जाता हूँ। 
      
           बाहर गली में आता हूँ तो अमरु बाबे के घर के बाहर का बल्ब जलता हुआ दिखता है। उसके दरवाजे  के आगे पड़ी चौकड़ी सूनी है। मुझे बाबे अमरु की बात याद आती है। वह परसों चौकड़ी पर बैठा मेरी सुनाई किसी घटना पर टिप्पणी करता हुआ जैसे मुझे समझा रहा था ,   ÒÒ अब वो वक़्त नहीं रहा पुत्तरा सतयुग वाला। अब तो सारी  ज़िन्दगी ही गलत -मलत सी हुई पड़ी है। जैसे कई रंग एक साथ गिर कर इकट्ठे हो जायें , तो फिर उनकी कोई पहचान नहीं रहती। आज के जमाने के बन्दे भी बस ऐसे हुए पड़े हैं। हमें पता ही नहीं चलता कौन अपना है और कौन बेगाना ? यह भी नहीं पता कब हमारा भाई ही दुश्मन का सा काम कर जाए या कोई गैर भाई से भी बढ़कर निकल जाए। इस समय तो पुरानी कहावतों के अर्थ ही सारे उलट हो गए हैं ! बस रब्ब भली करे ! ÓÓ बाबे ने किलोमीटर का सा लंबा सांस लिया था जैसे वह सारे रिश्तों की कड़वाहट को अपने अन्दर भरकर खत्म कर देना  चाहता हो।

         ÒÒ हाँ बाबा तेरी बात सोलह आने सच निकली ÓÓ यह बोल मेरे अन्दर से उठे और फिर अन्दर ही जप्त हो गए। 

          मैं बाबे अमरु  के घर की ओर  देखता हुआ आगे की ओर चल पड़ता हूँ। पीछे फ़म्मन के डेरे की ओर से आये दो कुत्ते मुझे देखकर भौंकने लगते हैं। पर मैं उनकी ओर से बेध्याना हुआ चला जा रहा हूँ। आगे जी . टी . रोड पर वाहनों की लाइटें उनकी गूंज के साथ- साथ भागी जा रही हैं।  मैं सड़क पर आ गया हूँ। सामने आ रहे ट्राले की गूंज सुनकर रुक जाता हूँ। वह शोर मचाते  , दैत्य की तरह धरती हिलाता पार हो जाता है।  उसके जाने के बाद धरती फिर शांत हो जाती है जैसे भूचाल झटके देकर लौट गया हो। मैं आस-पास देखता सड़क पार कर जाता हूँ।


         मैंने अपने खेत की ओर जाती पगडण्डी पकड़ ली है। धान के खेतों से गर्माहट भरी इक भड़ास सी आ रही है । खेतों में कोठियों में लगे बल्ब जुगनुओं की तरह चमक रहे हैं। ज्यों -ज्यों मैं आगे बढ़ता जा रहा हूँ सड़क पर चलते वाहनों की आवाज़ भी किसी के मुंह पर हाथ रख देने जैसी गहरी होती जा रही है। मैं समय देखता हूँ: एक बजने वाला है। दो बजे खेतों वाली लाईट भी चली जायेगी । मक्खन एक बजे किसी क्यारे में नक्का करके पड़  जाएगा और फिर सुबह उठकर घर को जाएगा। जाएगा नहीं,  जाता था पर अब नहीं जाएगा।

        मैं कुछ समय और  पार करने के इरादे से पक्के सूए की पुलि पर बैठ जाता हूँ और उसकी मौत की घड़ियाँ गिनने लगता हूँ।

         मक्खन अब तक मेरे ऊपर चढ़ता आया था। पहले घर के बंटवारे के समय मुंह लगा फिर ट्रैक्टर के बंटवारे पर अड़कर खड़ा हो गया। मैंने , ''चलो भाई है समझ कर वह भी छोड़ दिया। फिर जमीन की आध भी करवा ली। बोला मैं बापू को आधे कीले का ठेका दे दिया करूंगा। दो साल दिया फिर ठेका भी बंद। बोला जिधर काम करता है उधर ही रोटी भी खाए। मैंने फिर मन को समझा लिया, Ò वह बेशक कपूत बन जाये पर मैं नहीं बनता  , मैं करूंगा  सारा खर्च माँ -बाप का !Ó
         कोई साइकिल वाला मेरे पास से गुजरने लगता है तो मैं सर झुका लेता हूँ ताकि मुझे पहचान न ले। उसकी मौत के बाद तो मैंने खुद ही प्रत्यक्ष हो जाना है।

            मैं फिर समय देखता हूँ एक से पार हो चुका है। मैं उठकर चल पड़ता हूँ।  बड़ी पगडण्डी से हमारे खेत की और जाती पगडण्डी पर मुड़  जाता हूँ। आगे हमारी जमीन है पूरे छह कीले का टक । मैं फसल पर निगाह मारता हूँ।  मेरे दो कीलों  की फसल मेरे जैसी ही दब्बू हुई खड़ी थी।  उसके चार कीलों में खड़ी फसल मेरी फसल से दुगुनी फैली हुई लगती है जैसे वो भी मक्खन के जैसे हकारी हुई मेरी फसल के ऊपर से फ़ैल जाना चाहती हो। मैं उधर से ध्यान हटाता मुड़कर कोठे की ओर चला जाता हूँ। सामने खाट  पर वह पड़ा है। कभी बापू की लाश भी यहीं पड़ी थी।जब बापू रात जीरी को पाने देने गया सुबह मुड़कर नहीं लौटा ... तो मैं साईकिल लेकर उसे देखने चला गया था। धूप चढ़ी हुई थी पर बापू अभी भी मच्छरदानी में इस तरह पड़ा हुआ था जैसे उसके लिए अभी भी आधी रात हो। मैंने पास जाकर देखा बापू का चेहरा मुझे बड़ा डरावना लगा। एक डर मेरे शरीर में जहर जैसे फ़ैल गया। मैंने मच्छरदानी उतारकर बापू को हिलाया पर वह तो .....!

           मेरी चीख निकल गई।  मुझे जोर -जोर से रोता देखकर बाबे अमरु का बेटा जमेर मेरे पास आया। होनी तो घट चुकी थी। उसने ही मुझसे मोबाईल लेकर मक्खन को फोन लगाया । वह कई लोगों को साथ भी ले आया था । लाश घर ले जाई गई।

            '' अब मिटटी रोलने से क्या मिलेगा ताऊ; हमें सबकुछ दिख तो रहा है !'' जब बापू की लाश को डाक्टर के पास ले जाने की बात चली तो बड़े ने आँखें पोंछते हुए दबी सी आवाज़ में ना नुकर कर दिया था।
बापू की लाश को तो खपा दिया गया था पर लोगों के मनों के अन्दर के सवाल उनके अन्दर न खपे। कुछ ही दिनों के बाद बात की भाप उठने लगी थी। जिसका सारा शक मक्खन की ओर जाता था। लोग बातें करते थे , लाश के गले में नील पड़े हुए थे , आँखें बाहर को निकली हुई थीं . '' किसी ने बापू का गला घोंटा था। सिद्दर मज़बी ने तो उस रात मक्खन को खेत की ओर जाते भी देखा था।

             लोगों की इन बातों ने मुझे सोच में डाल दिया था।


         पहले तो मुझे ऐसा सोचने की होश ही नहीं थी। पर लोगों की अजीब -अजीब बातों ने मेरे अन्दर कई सवाल उठा दिए थे। जिससे  शक की सुई मक्खन के ऊपर ही जा खड़ी होती थी।
            
           उसी रात मैं पेशाब करने उठा था तो मुझे माँ और मक्खन की खुसर - फुसर सुनाई दी और फिर उनका बाहर का बार भी खड़का था। इस सब में माँ भी शामिल थी।
           शराबी बापू से मार खाने के बाद माँ जब भी बापू को गालियाँ देती तो वह अपनी इस भयानक नियत का संकेत जरुर कर दिया करती थी ,ÒÒ टैठिया! मैं तां कहिनी आं तूं पिआ ही रहिजे।जे तूं मरजें , मैं शुकर मनावा! तेरे बिना मेरा कोई देश सूना नहीं हुंदा। जेहडियाँ रंडियां ने वधिया नींद सोंदियाँ ने वधिया नींद उठदिआं नेÓÓ (ÒÒ नीच मैं तो कहती हूँ तुम पड़े ही रह जाओ। अगर तू मर जाये मैं शुक्र मनाऊँ। तेरे बिना मेरा कोई देश सूना नहीं हो जाएगा। जो रंडियां हैं खुद की  नींद सोती हैं और खुद की नींद उठती हैं !ÓÓ)
        
           कभी - कभी लड़ाई के बिना भी माँ के अन्दर की यह ख्वाहिश होंठों पर आ जाती। वह कितनी - कितनी देर गाँव की रंडी औरतों के सुखी जीवन की बातें करती रहती।
         
          अब मुझे लगता है बापू ने भी अपनी मौत की राह आप ही तैयार कर ली थी। बापू बड़ा जिद्दी था। जो बात कह देता , करके दिखाता। वह जब भी मक्खन के साथ लड़ता यह सुनाई जरुर करता, मैं मरने से पहले तुझे मांगने जरुर लगाके जाऊंगा , देखते जाना तुम जो तुझे मांगने न लगवाकर गया तो।  बच्चू ! आँखों में घूंसे दे-दे  रोयेगा !

          मक्खन को डर था बापू जमीन उसे नहीं देगा। उसने मन में यह डर पाल रखा था बापू सारी  ज़मीन  मेरे नाम लिखवा देगा। मैंने  उसके इस डर को कितनी बार निकालने की कोशिश भी की, उसे यकीन दिलाया , कसमें खाईं , मैं बापू को ऐसा नहीं करने  दूंगा पर वह मेरे यकीन दिलाने पर भी विश्वास न कर पाया।

          बापू की मौत से कुछ दिन पहले मैंने माँ और मक्खन को कितनी बार खुसर -फुसर करते सुना था। जैसे वे कोई गहरी साजिशें रच रहे हों। पर उस समय मेरे ध्यान में यह बात बिलकुल नहीं आई थी ।
       अब मुझे बापू का मौत देखता वह चेहरा नज़र आने लगा है।पीला पड़ गया बापू का चेहरा, गिड़गिड़ाती आँखें। मुझे दिख रहा है मक्खन ने बापू की गिड़गिड़ाहटों को पैरों तले रौंदते हुए गले पर पकड़ और मजबूत कर दी है। बापू हाथ-पैर मारता है , देह तोड़ता है और फिर शांत हो जाता है। मक्खन हँस रहा है। उसकी इस हँसी में माँ भी शामिल हो जाती है और फिर उसकी पत्नी भी। हँसते हुए उन्होंने मुझे सामने खड़ा देख लिया है। उनके हँसते चेहरे गंभीर हो गए हैं। वे तीनों आपस में नज़रें मिलाते हुए मेरी ओर बढ़ने लगे है और .....!
           सामने की डाल से कोई पक्षी चिर .....चिर .....करता उड़ जाता है। मेरी सुरति लौट आती है। मैं कोठे के पास खड़ा मक्खन को देख रहा हूँ। वह डरावने खर्राटे मार रहा है जैसे कोई लोक कथाओं  के बीच  का दैत्य मानव खून पीकर डकारें मार रहा  हो ।
           मैं किरच अपने हाथ में कस लेता हूँ। इक ताप मेरे पैरों से निकलकर सर तक फ़ैल गया है। मुझे महसूस होता है जैसे मेरे अंगों में दुगुनी ताकत भरती जा रही है। मैं धीरे - धीरे पैर उठाता उसकी खाट  की ओर बढ़ने लगता हूँ। मैं उसकी खाट के बराबर जा खड़ा हुआ हूँ। वह मेरी रातों की नींद , दिन का चैन छीनकर  खुद बेफिक्र सोया हुआ है। उसे यूँ सोया देख मेरा क्रोध भड़क उठता है। मेरा दिल तेज - तेज धड़कने लगता है। बस ! आज सब हिसाब बराबर करने का मौक़ा है। अगर यह मौक़ा छिन गया तो .....!

           मैं अपने शरीर में इतनी शक्ति भर लेना चाहता हूँ कि उसे जागने का मौक़ा भी न मिले। वह जागने से पहले ही सदा की नींद सो जाए।
                
            मैं खाट के और नजदीक हो गया हूँ। बिजली की सी तेजी जितनी जल्दी से मैं मच्छरदानी का लड़ उठाता हूँ और पलों क्षणों में ही एक , दो , तीन , चार, पांच ...पता नहीं कितने वार मैं उसके ऊपर कर देता हूँ। मैं वार इतनी तेजी से करता हूँ कि  मुझे खुद भी पता नहीं चलता  कि उसने जागकर मेरा विरोध किया था या नहीं। जब मेरी सुरति लौटती  है, वह खाट पर खून से लथपथ पड़ा था।

            मैं जीत  के अंदाज़ में बाहें ऊपर उठाता हूँ। अपने खेत की मिटटी को चूमता हूँ फिर खेत का एक फेरा लगाता हूँ। मुझे लगता है जैसे मेरी फसल उसकी फसल से आज रात भर  में  ही दुगुना कद बढ़ा गई है। मुझे सुनाई देता है जैसे गाँव वाले कह रहे हों ,   ÒÒअच्छा किया,  इस पापी का तो यही अंत होना चाहिए था। जैसे मैं अपनी पत्नी के आगे एक बित्ता ऊंचा हो गया होऊँ। वह मुझे शाबाशी देती कह रही हो, ''वाह रे अनखिया !ÓÓ
             मैं गाँव की ओर तेज कदमों से बढने लगा हूँ। पर ..यह क्या ....?  धीरे -धीरे मेरी चाल कम होती जा रही है। मेरे अन्दर कुछ तिड़कने सा लगा है जैसे मैं अपने आप को कहीं पीछे छोड़ आया होऊँ। अन्दर कहीं सुनामी उठने की सी उथल - पुथल मची है। मुझे आगे कदम बढ़ाना मुश्किल हो रहा है जैसे मेरे पैर चलने से जवाब दे गए हों। मैं कुछ देर खड़ा सोचता रहता हूँ। फिर अचानक घूमकर पीछे की ओर भागने लगता हूँ। कोठे के पास जाते ही मैं भाई की मच्छरदानी उठाकर दूर फेंक देता हूँ। उसकी खून से लथपथ हुई देह से लिपट जाता हूँ। टिकी रात में मेरी दहाड़ें दूर-दूर तक सुनाई दे रही हैं .....

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अनु :   हरकीरत हीर
18 ईस्ट लेन , सुन्दरपुर, पोस्ट - दिसपुर 
हॉउस न -5 , गुवाहाटी -5 ( असाम )
मोब - 9864171300
          
        

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