Monday, March 9, 2009

डार्क जोन (पंजाबी कहानी )
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लेखक - जसबीर राणा (पंजाबी कहानी), अनुवाद : हरकीरत कलसी 'हकी़र'

अभी भी पानी की बूंदे टपकने की आवाज आ रही है।हालत उस बुढि़या जैसी हुई पडी़ है जो कहा करती थी, 'सप् तों नी डरदी ...सिंह तों नी डरदी!..पर आह तुपके ने मारी...!!'(साँप से नहीं डरती...शेर से नहीं डरती...किन्तु आह! पानी की बूंदों ने मार दिया)
'यह दुनियाँ लिप्सा की मारी है..!' माँ का तर्जुबा मेरी चेतना में उतर रहा है।
भाभी शायद सीढियाँ चढ़ रही है। उसके सैंडिलों की टिक - टिक बडी़ डरावनी लग रही है। मुझे तो वैसे भी कोठी से बडा़ डर लगता है। इस कोठी ने मेरी माँ खा ली। गृह प्रवेश से पहले ही वह घर की तरह ढह गई थी। इस बनने ढहने की प्रकिया में पता नहीं क्या है मैं जडो़ तक हिल जाती हूँ। स्मृति में जड़ विचरने लगती है। पेट में चीरा सा पड़ने लगता है।फिर नल के पास जा खडी़ होती हूँ परंतु नल तो बंद पडा़ है। फिर ... फिर यह पानी की बूंदे टपकने की आवाज कहाँ से...???
शायद कई आवाजें भीतर पैदा होती हैं पर सुनाई बाहर देतीं हैं।
मैं ध्यान से सुनने लगती हूँ......!
पानी की बूंदे टपकने की आवाज अब पानी के उछालों में बदलने लगी है। मैं दरिया के संग बहने लगी हूँ। स्मृति तीनों कालों में घूमने लगी है। मैं वैदिक काल जा पहुंची हूँ। ईसा से पहले का समय है। पूरी धरती हरी-भरी है। दूर दूर तक वृक्षों की कतारें, नीचे विद्वान ऋषियों की समाधि। मैं भी समाधि में जा पहुंची हूँ।मस्तिष्क के मध्य का नेत्र खुला है,सामने वेद पडे़ हैं। मैं पढ़ने लगी हूँ। अर्थ वेद का एक पन्ना है- जो पानी रेगिस्तान में है, जो पानी तालाब में है, जो पानी घडे़ में होता है, जो जल बारिश से प्र।प्त होता है,वह सारा पानी हमारे लिए कल्याणकारी बने....।
आर्युवेद में लिखा है- हे जल! संसार की जीव सृष्टि को अपने जिस जल से तृप्त करते हो,वह सम्पूर्ण जल हमें प्र।प्त हो.....।
मेरी प्राप्ति है कि मैं अब्दूल रहीम के पास जा पहुंची हूँ। आसमान की ओर बांहें उठाये वह गा रहा है,' बिन पानी सब सून रे....प्र।णी बिन पानी सब सून रे....!
' पवन गुरु पानी पिता,माता धरती महत्...!' आदि ग्रन्थ की बाणी बोल रही है।
मैं मंत्र मुग्ध सी सुन रही हूँ। यशु मसीह और महावीर जैन की आवाजें ऊँची होती जा रहीं हैं, ''परमआत्मा पानी ऊपर विराजमान है।..जल का उपयोग घी के उपयोग की तरह संयम से करना चाहिए...!''
''संयम..!!...यह क्या गैर कुदरती बातें करती जा रही हो नीती....!!'' भाभी की आवाज है।
उसकी आवाज में कोई और भी आवाज है। मैं पहचानने की कोशिश करती हूँ। वह फर्श पर बिखरे कांच और नकली फूलों के बिखरे टुकडो़ं को समेटने लग पडी़ है। मैं अपनी बाँह देखने लगी हूँ जो पता नहीं कैसे उस फूलदान से जा टकराई थी। पूरी बाँह भूचाल आई धरती की तरह कांप रही है। पर भाभी का चेहरा शांत है। वह मुस्कुराने लग पडी़ है। जाते समय मेरी ओर देख मुस्कुराई है,'' रिलैक्स नीती..! थोडा़ सहज होने की कोशिश कर....!''
मैं जाती भाभी की पीठ देख रही हूँ। पीठ दिखा कर जाना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा। कमरे से बाहर आकर मैं कोठी के अंदर का 'वातावरण' देखने लगी हूँ।मेन गेट से अंदर घुसते ही अंग्रेजी घास का लाँन है। दीवार के साथ गमलों की लंबी कतार लगी है।..जिसमें नाग-डाउन,मनी प्लांट तथा कैक्टस लगे हैं। दो गमलों में वट और पीपल भी लगा रखे हैं। पूरी कोठी में कीमती टाइलों का फर्श है। भाभी को मिट्टी का एक कण तक पसंद नहीं। उसकी पसंद सबकी पसंद है। हमारी कोठी की सियासत उसकी ऊँगली पर नाचती है। जो भी बात उसकी पसंद के खिलाफ हो वह ऊँगली भर हिलाती है और बात दो फाड़ हो बिखर जाती है। पीछे बचता है सिर्फ शोर...!

हाँ शोर....! अंतरिक्ष में आवाजों का शोर है, ''यह पंच आब (पाँच तरह का पानी) यह पंच नद है....
यह पैंटापोटामिया है,....यह पंजाब प्रं।त है,...यह सिख राज है....!!''
भीड़ एकत्रित्र होती है , भीड़ बिखर जाती है।
फौजी जूतों की आवाज भीड़ का पीछा कर रही है।
लार्ड कर्जन के हाथ में पंजाब का नक्शा है। उसने एक काट का निशान लगाया है। एक टुकडा़ अलग हो गया। यह दिल्ली है ।
'' दिल्ली खुदा का दिल नहीं!...नहीं....नहीं...!....दिल्ली भारत की राजधानी है..!!'' आवाजों में कोई उलझन है।
यह सुलझ नहीं रही, कोई गांठ पड़ गई है। काट-छाट, कत्ल, मार-धाड़, लूट, बलात्कार..फसाद शुरू हैं। पानियों में लकीर पड़ गईहै। खून के दरिया बह चले हैं। दो दरिया उधर चले गये हैं दो दरिया इधर आ गये हैं। बीच वाला दरिया कन्ट्रोल लाईन बन गया है,मैं डरी खडी़ हूँ। फिर द्देड़-खानी हो रही है,वे पुनरगठन कर रहे हैं। कमाल का जोड़-घटाव है। पंच+आब=ढाई आब।
वियोग में डूबी मैं बुल्लेशाह की तरह नाचने लग पड़ी हूँ।
चौबारे में सी. डी. प्लेयर की झंकार गूंज रही है। भा आजादी का जश्न मना रहा है। मेरी आंखों में आँसू छलक आए हैं। भगत सिंह ने ठीक कहा था कि गोरे अंग्रेजों से आजादी तुम्हें खुद हासिल करनी है। उस समय उसे अपना भाई काला अंग्रेज सा जान पडा़ था,जिस वक्त उसने कहा था ,''अंग्रेज तो मुर्ख थे....!''
मैं मानती हूँ अंग्रेजी कौम हमारी कौम के लिए खतरनाक थी पर लार्ड डलहौजी की रिपोर्ट में मुझे समझदारी नजर आई थी जिसमे उसने कहा था के पंजाब में जंगलों और वृक्षों की स्थिति तसल्लीबख़्श नहीं है। मुझे तो अंग्रेजों का लैंड प्रिजरवेशन एक्ट भी अच्छा लगा था जिसमें उन्होंने अनेकों जगहों से वृक्ष एवं जंगल काटने पर पाबंदी लगाई थी।
''अंग्रेजों की नीतियाँ अंग्रेजों के साथ चलीं गई नीती....! अब हम आजाद हैं....!'' पापा की बातों से मुझे गुलामी बू आ रही है।
'' ये सब माया के गुलाम हैं....!'' सुबह-शाम धूप-बत्ती करते वक्त अक्सर माँ पापा से कहा करती।
उसमें मुझे समझने की संभावना थी।
'' नहीं अब कोई संभावना नहीं!......हमें भी अब समर्सीबल बोर करवाना ही पडेगा....!'' इस बात से पहले पापा ने एक और बात कही थी।
वैसे दोनों ही बातें खतरनाक हैं। पर इनमें से किसी को भी कोई खतरा नजर नहीं आ रहा। सबकी अक्ल पर पर्दा पड़ गया है।
'' पर्दा तो तेरी अक्ल पर पड़ गया है नीती...!ये पेड़ मुद्दतों से धरती पर गडे खडे हैं...! हम तो इन्हें
आजादी दिला रहे हैं...!'' जिस वक्त सभी हंस रहे थे मैं रो रही थी। '' वृक्षों को धरती से अलग करना आजादी
नहीं, उनकी मौत होती है पापा...!''
'' भले ही कुछ भी होता हो, मैं तो वृक्षों कटाई का ठेका दे आया बस...! '' पापा का अंतिम फैसला सुन
भाभी के होठों पर थिरकती मुस्कान मुझे तिलमिला गई है।
मन में आता है कि सुन्दरलाल बहुगुणा की तरह उसे चुनौती दे डालूं,'' वृक्षों को काटने से पहले तुम्हें हमें काटना होगा...! क्योंकि ये हमारे कुछ लगते हैं...!''
'' कुछ वृक्ष मुझे पुत्र से जान पड़ते हैं और कुछ माँ समान...!'' वृक्षों को आलिंगन में लेकर गाता हुआ
शिवकुमार बटालवी मेरी ओर देख रहा है।
मैं उसकी फैन हूँ । वह मेरी ओर हाथ बढा़ रहा है। मैं उसके पास जा खडी़ होती हूँ।पता नहीं उसे कितना गम़ है। शराब पीता जा रहा है,गाता जा रहा है। वृक्ष झूम रहे हैं। मैं उदास हो गई हूँ। शिवकुमार बटालवी गायब है ,मैं उसका गीत गाने लग पडी़ हूँ।
''वैल डन !...वैरी नाइस! तुम्हारा गीत गलत नहीं है...!'' वातावरण में एक आवाज गूंजी है।
मैं तेजी से पलटी हूँ,खुशी से चीख निकल गई है.. ''ओह..!..डाँ. साहब आप...!!''
''हाँ मैं!...डाँ. जगदीश चंद्र बोस! आज मैं सिद्ध करके दिखलाऊँगा कि तुम्हारा गीत गलत नहीं है...!'' नजदीक आते हुए डा. बोस ने रहस्यमयी आवाज में कहा है।
रहस्य में जकडी़ मैं उसकी ओर देखती हूँ। नजर वाली ऐनक ठीक करते हुए उसने मेरे हाथों में एक कुल्हाडी़ पकडा़ दी है। मैं घबरा गई हूँ पर डा. बोस के होठों पर मुस्कान है,'' घबरा मत मैं तुम्हें एक प्रयोग करके दिखा रहा हूँ...।''
मुझे कई बातें समझा वह वृक्षों की ओर चल पडा़ है। उसने चार वृक्षों से विशेष प्रकार के यंत्र लगा दिये हैं। हर यंत्र की स्क्रीन पर ' लाईफ लाइन ' दौड़ रही है। हर वृक्ष का ग्र।फ बन रहा है। हाथों में कुल्हाडी़ पकडे मैं काफी दूर खडी़ हूँ। डा. बोस ने इशारा किया है। मैं वृक्षों की ओर चल पडी़ हूँ । अभी यह निर्णय नहीं लिया गया कि चारों में से किस वृक्ष को काटना है। डा. बोस ने फिर इशारा किया है। मैंने दूसरे नम्बर वाले वृक्ष को काटने का निर्णय लिया है कुल्हाडी़ उठाये मैं पास जा रही हूँ वह वृक्ष डर गया है उसमें कंपन हो रहा है। उसकी 'लाईफ लाइन' डावाँ-डोल हो रही है जबकि शेष तीनों वृक्षों का ग्र।फ पहले की तरह सामान्य रहा।
''देख तूने अभी दो नम्बर वाले वृक्ष को काटा नहीं...केवल काटने का विचार भर किया है उसी से वृक्ष में उत्तेजना पैदा होने लगी है जो कत्ल होने से पहले मानवी मन में होती है । इसका अर्थ है कि वृक्ष इतने संवेदनशील होते हैं कि हमारे विचारों का भी उन पर प्रभाव पड़ता है ...!'' मेरे हाथों से कुल्हाडी़ लेकर डा. बोस वृक्षों से यंत्र उतारने लगे हैं।
मैं कुछ सोचने लगी हूँ। डा. बोस आलोप हो गए हैं।
मानव जाति इस तरह आलोप नहीं होती!..जैसाकि वैज्ञानिक कहते हैं!...इन्हें क्या पता अकाल पुरुष के हुक्म के बिना पत्ता भी नहीं हिलता... !'' हुक्म की पालना करते हुए पापा दीवान में जाने की तैयारी कर रहे हैं।
आज दाना मंडी में चढाई वाले संतों का दूसरा दिन है ,''जिन क्षणों में झड़प हुई मैं संतों के विरूद्ध भी
बोल पडी़ थी। जो इंसान प्रकृति से प्यार करना नहीं सिखाता ... वह कादर से प्यार करना भी नहीं सिखा सकता...''
'' शिक्षा का एक अर्थ पर्यावरण से प्रेम करना भी है...!'' मैंने आज स्कूल में भी 'पर्यावरण- दिवस' पर लेक्चर दिया था। पर सारा स्टाफ मुझे सनकी कहता है। कोई मेरी इस नई पहल पर खुश नहीं। जिस दिन मैंने स्टाफ मीटिंग में 'पर्यावरण- दिवस' मनाने की योजना रखी थी कई अध्यापक मजाकिया सी हंसी हंसे थे। चर्चा अजीब मोड़ ले गई थी। जियोग्र।फी वाला बलबीर कहता सबसे पहले तो यह जाटो. को रोके...पता नहीं हर साल यह कितने वृक्षों को फसलों पर झटकाते हैं...।
''चुप कर यार! तुम्हारी जात ने क्या कुछ कम किया है? अपने बाप-दादा की ओर देख पहले बकरियों को खिलाने के बहाने कितने कीकर के वृक्षों को मुसलमानो की तरह हलाल करते रहे हैं...!!'' पंजाबी वाले हरचेत का जवाब सुन पोलिटिकल वाला अनवर भी भड़क गया था। बोल पडा़,''सरदार जी! आपसी झगडे़ में हमारी जात का नाम लेने से पहले सोच लेना जरा..!!''
''बस करो प्लीज!...यह जाति-गोत्र से पार का मामला है...!'' मेरे तेवर देख हिन्दी वाला बनारसी कोई प्रवचन सुनाता- सुनाता- सोने की एक्टिंग का बहाना करने लगा था।
मैं सब जानती हूँ उसने हमेशा की तरह कहना था कि हम हिन्दू तो पीपल देवता की पूजा करते हैं। पर कौन नहीं जानता कि इसने अपने लड़के के 'शोरूम' के आगे खडा़ पीपल दिन-दहाडे़ कटवा दिया था।
''आज कल लोग दिन-दहाडे़ दाढी़-केस कटवाते जा रहे हैं...!!'' दाना-मंडी वाली ओर से 'चढाई वाले संतों' की आवाज आ रही है।
पर मेरी चेतना में पाली की आवाज घूम रही है। मुझे गिफ्ट पकडा़ने से पहले वह कुछ बोला था। ज्यों ही मैं पकड़ने लगी ठीक वही पल था जब चल रहा फसाद शिखर छू गया। कोठी में कोई 'ऊपरी हवा' आ घुसी। भाभी, भईया और पापा सभी सर घुमा देखने लगे । पाली के हाथ आलोप हो गए। कोई आरी मेरा अंतर चीर गई। इक पाइप पेट में से आर-पार हो गया। मैं दर्द से दोहरी हो गई हूँ।
'' प्रकृति का दर्द बाँटना भी मनुष्य की जिम्मेदारी है...!'' संत बलबीर सिंग सींचेवाल का विचार मेरी चेतना में उभर आया है।
मुझे उनका कार्य हमेशा अच्छा लगा है। उन्होंने चढा़ई वाले संत की तरह लंबी कारों का काफीला नहीं जोडा़। थोथे उपदेशों की लडी़ नहीं चलाई। जिस नदी में डुबकी लगाने के बाद बाबा नानक धरति-लोकाई सोधने चला था, उन्होंने उस 'काली वेई' नदी की सफाई और संभाल की जिम्मेदारी उठाई है। हाथों में कुदाल तसला उठाये उनकी स्मृति सदा कार-सेवा में लीन रहती है।
सारी संगत भी कथा-कीर्तन में लीन बैठी है। कोई इलाही-नदर (ईश्वरीय दृष्टि) सवाल कर रही है। सिक्ख भाइयो! यहाँ से माछीबाडे़ का जंगल कहाँ गया...? वह वृक्ष कहाँ गया जिसके नीचे मैं रहट का तकिया बना आराम किया करता था...??... सिंहों तुम कुछ बोलते क्यों नहीं...???
पर संगत चुप है। नीला घोडा़ सरसा नदी की तलाश में सरपट दौड़ पडा़ है। उसके टापों की आवाज मध्यम पडती जा रही है और एक डरावनी आवाज ऊँची होती जा रही है,....''हमने तो नामी वृक्ष नहीं छोडे़..! साधार वृक्षों की तो औकात ही क्या है...?''
मैं इसे अच्छी तरह पहचानती हूँ , यह उसी लकडहारे की आवाज है जिसकी कहानी मैंने बचपन मैं पढी़ थी। बडा़ गरीब था यह । एक लोहे की कुल्हाडी़ और एक रस्सी का टुकडा़ जागीर थी इसकी। यह जंगल मैं जाता वृक्ष काटता और उसे शहर में बेच देता। इसी से इसकी रोजी रोटी चलती थी। एक दिन यह एक वृक्ष के ऊपर चढ़कर उसकी डाल काट रहा था नीचे नदी बह रही थी। इसकी कुल्हाडी़ नदी में गिर पडती है। यह नीचे उतर नदी के किनारे बैठ रोने लगता है। रोना सुन पानी का देवता प्रकट हुआ औररोने का कारण पूछा। इसने बताया कि इसकी कुल्हाडी़ पानी में गिर गई है, सुनते ही पानी का देवता ने पानी में डुबकी लगायी और जब बाहर आया तो उसके हाथ में सोने की कुल्हाडी़ थी। ''यह लो तुम्हारी कुल्हाडी़'', पानी का देवता बोला।
''नहीं महाराज यह मेरी कुल्हाडी़ नहीं....!'' आँखें पोछते हुए इसने इन्कार कर दिया।
दुसरी बार डुबकी लगाकर पानी के देवता ने चाँदी की कुल्हाडी़ निकाली, ''यह रही तुम्हारी कुल्हाडी़...!''
'' नहीं महाराज !... यह भी मेरी नहीं...!''
'' हाँ महाराज !... यही मेरी कुल्हाडी़ है...!'' तीसरी बार डुबकी लगाकर लायी गई कुल्हाडी़ को देख यह झूम उठा।
पानी का देवता इसकी इमानदारी पर बडा़ प्रसन्न हुआ और इनाम के तौर पे तीनों कुल्हाडि़याँ इसे सौंप आलोप हो गया।
पर यह फिर प्रकट हो गया है। पता नहीं किसे गालियाँ निकाल रहा है,'' यदि तीनों कुल्हाडि़याँ लेकरयह वृक्ष काटने का इरादा न छोड़ता, आज हम कहीं के कहीं पहुँच गए होते।''
मैं बिलकुल नजदीक जा पहुँची हूँ।
वह मजदूरों की टोली को कुछ समझाने लग पडा़ है।
मैं आगे बढ रही हूँ परंतु यह क्या...? यह तो पापा का चेहरा है! भईया और भाभी जोर- जोर से हंस रहे हैं। मैं ठेकेदारकी ओर देख रही हूँ।
वह हमारी कोठी में बैठा है। एक हाथ में पानी का गिलास और दुसरे हाथ में सिगरेट सुलग रही है। मैं उसपर झपटती हूँ। कुछ टूटने की आवाज आती है। ठेकेदार डरावनी सी हंसी हंसने लगता है,''दिस इज द रिवूलेशन बेबी ! ... यह क्रं।ति है...!''
'' नहीं यह क्रं।ति नहीं भ्रं।ति है !... क्रं।ति तो खून बहाने से आती है पर पानी बहाने से चली जाती है ...!!'' यह बात मैंने भईया से कही जब उसने कहा था,'' घर के संकल्प की मौत हो चुकी है नीती..!... यह दौर कोठी का हिमायती है...!!''
मैंने इस बात का सख्त विरोध किया था। स्कूल में पर्यावरण -दिवस मना आई थी परंतु घर में यह क्या मनाने की तैयारी चल रही है..? मैं सहन न कर सकी। पापा का अपना तर्क था,'' देख नीती..अब कुंओं वाले बोर पानी नहीं खींचते !... और पानी बिना न खेती संभव है न कोई जमीन ठेके पे लेता है.... इसलिए समर्सीबल बोर को अपनी मजबूरी ही समझ ले...!''
परंतु पापा जब समर्सीबल बोर भी पानी छोड गए तब...? फिर हमारे पास क्या विकल्प रह जायेगा...?'' जब मैंने सवाल किया भाभी की ऊँगलियाँ नाचीं थीं,'' तब की तब देखेगें पहले अबकी फंसी से तो निबट लें...!''
'' जहाँ आप फंसे हैं वहाँ कोई निबटारा नहीं होता...!'' माँ की कही बात अभी मैंने कही ही थी कि सारे भड़क उठे ,''बस कर नीती..!...पहले तेरी माँ कोठी बनाने के खिलाफ बोलती मर गई....अब तुम...!!''
'' हाँ ! अब मैं मर जाऊँगी,...ताकि तुम सब बच सको...!'' माँ की याद मेरी आँखे नम कर गई थी।
मेरी स्मृति में उसका चेहरा उभर आया है। उसे पीली मिट्टी से बडा़ मोह था। मैंने उसे आंगन में पीली मिट्टी का लेप करते देखा था। चुल्हे-चौके को पांडू मिट्टी का घोल लिपते देखा था। उसकी सहायता करती अगर कभी मैं पानी गिरा देती तो वह नसीहतें देने लगती, '' संयम से काम किया कर नीती.. संयम सबसे अच्छी नीति है...!''
''संयम..? हुँह!... क्या रुढि़वादी विचारहै..!'' एक दिन हिन्दी वाले बनारसी का लड़का भाभी की तरह हाथ नचा कर बोला।
वह शोरू में बैठा फोन पर किसी से बातें कर रहा था। उस दिन से वह मुझे बडा़ बुरा लगता है। बुरा मुझे भईया भी लगा था जब वह क्रं।ति की बातें करने लगा था। उसके शब्दकोश में क्रं।ति का अर्थ कुछ और ही है। मुझे माँ की विचार धारा सच्चाई के काफी नजदीक लगती है। वह कहा करती थी, सावन के अंधे हैं सब इन्हें सब हरा ही हरा नजर आता है। उसने एक बार बताया था,'' तुम्हारे ननिहाल में तुम्हारा बीच वाला मामा एक चाल खेला करता था।... जिस दिन वह हरा चारा न काटता, सारा चारागाह भूसे से भर देता !...फिर भैंस की आँखों में हरा चश्मा पहना देता!...मुझे तो यह हरित क्रं।ति भी भूसे को हरा चारा समझ खाने वाली पशु-मति ही लगती है...!''
'' नहीं हरित क्रं।ति एक रामबाण का नाम है!... इसने आप बसकी कमजोर आर्थिकता के रावण को हमेशा के लिए मार देना है...!!'' स्टेज पर खडा़ एक धुंधला सा चेहरा लैक्चर दे रहा था।
पगडि़याँ सम्भालती भीड़ नारे लगाने लगी है,'' हरित क्रं।ति!... जिंदाबाद!!... हरित क्रं।ति!... जिंदाबाद!!...
मैं कांपने लगी हूँ। भीड़ खेतों में जा घुसी है। ट्रैक्टर टयूबवैल चल पडे़ हैं। मेरा अंतराल छलनी हो गया है। मैं नीचे गिर पडी़ हूँ। गेहूँ धान की फसल ऊपर बढ रही है । रसायनिक खाद्दों एवं कीटनाशकों का छिड़काव हो रहा है मैं सड़ रही हूँ। गेहूँ धान मंडि़यों में जा रहा है। ढोल बज रहे हैं। नोट उड़ रहे हैं। बकरे बोल रहे हैं, ''आग लगा फूंक दूँगा सारे लंदन शहर को...!''
पापा के हाथ में माचिश है। उन्होंने तीली छुआई है। कटी हुई फसल ने आग पकड़ ली है। खेत जल उठे हैं। धुंऐं का गुब्बार उठ रहा है। हवा में तपस है। मैं मोटर वाले कमरे में जा घुसीहूँ। स्टाटर का स्वीच दबा दिया है। मोटर चल पडी़ है। लेकिन बोर पानी नहीं खींच रहा। मैं बाल्टी उठाकर गाँव की ओर चल पडी़ हूँ। गाँव वाला पोखर...!
हैं...!! पोखर..गायब है।पत्थर की हुई जगह पर बाबा ग्यानदास मार्केट बन चुकी है। गाँव के बाहर का छप्पर उजड़ गया है। वेद- मंदिर वाला तालाब भी सूखा पडा़ है। मैं कालोनियों से होती हुई बाजार पहुँच गई हूँ। उफ...! कितना ट्रैफिक है। कान फोड़ता शोर,पेट्रोल डीजल का धुंआँ...!! कई लोग चेहरों पर मास्क लगाए घूम रहे हैं। उनकी पीठ पर आक्सीजन सिलेंडर टंगे हैं। मैंने खाली बाल्टी सिर के ऊपर उलटी मार ली है। अस्पताल के पास सटी शिवा कैमिकल फैक्टरी के नजदीक आ गई हूँ। फैक्टरी का गंदा पानी पक्के नाले में गिर रहा है। मैंने बाल्टी नीचे करदी है। पानी उसमें गिरने लगा है। मेरे हाथ जलने लगे हैं। नसों के बीच खून खौलने लग पडा़ है। मैं चंडीगढ़ लैबरटरी की ओर दौड़ पडी़ हूँ। 'प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड' के आगे हमारे गाँव की करतार कौर रेहडी़ लगाए खडी है। वह 'विसलेरी-वाटर' की बोतलें बेच रही है। मैंने एक बोतले मांगी है। वह पैसे मांगने लग पडी है। मैं हंसने लगी हूँ। लोगों का तो दूध नहीं बिकता यह पानी बेचने चली है।
''देखते जाओ बेटा!...अब क्या-क्या बिकता है..!'' घुमावदार सड़क पर खडी़ बुजूर्गों की टोली बातें बंद कर गाने लग पडी़ है,''होऽऽऽ मलकी खूह दे उत्ते भरदी सी पाणी... बई कीमा कोल आके बेनती गुजारे...!!''( मलकी कुंऐं पर भरती थी पानी...भई कीमा पास आकर बेनती करे)
'' कट...कट...कट...इस तरह नहीं!...प्लीज वाच द सीन! डाइरेक्टर मुझसे कह रहा है। मैं ठिठक गई हूँ। खेतों का दृश्य है। टी-शर्ट और जींस पहने तीन लड़कियाँ चली आ रही हैं। बीच में मलकी है उसे प्यास लगी है। टी-शर्ट का कालर घुमाती वह मुस्कुराई है, ''क्या पानी मिलेगा मैन...?''
'' ओ..श्योर!...यारों का टशन देख लो...!'' कुंऐं की मुंडेर पर खडा़ कीमा रस्सी से बंधी बाल्टी नीचे गिराने लगा है।
लड़कियों के साथ खडी़ मलकी मुस्कुरा पडी़ है।
कीमा ने रस्सी खींची और कोका-कोला से भरी बाल्टी पर आ गई है।
अन्य लड़कियों की तरह मलकी ने भी ठंडी बोतलहोठों से लगाली है।
''यही है राइट च्वाइस बेबी आह...ह...हा...!''
भाभी को छेड़ता भईया चौबारे सीढि़याँ उतर रहा है।
भाभी नाचती हुई बैड-रूम में जा घुसी है। भईया भी उसके पीछे हैं । भाभी चुडि़याँ छनक रही है। भईया बाहर निकले हैं,उनकी ऊँगली में मोटर-साइकिल की चाबी घूम रही है। मैं जालीदार दरवाजे पास जा खडी़ हुई हूँ। भईया फर्श पर ठोकर मारते हुए पूछते हैं,' यहाँ से नीती की जड़ किसने उठाई...?'' भाभी कुछ बोलीं नहीं। मैं समझ गई हूँ भाभी की ऊँगली मेरे कमरे की ओर घूमी होगी। मैं मेज के पास जा खडी़ होती हूँ। पानी वाले गिलास में पडी़ जड को देखने लगती हूँ। भईया ने मोटर-साइकिल स्टार्ट किया है। मेरा दिल जोर से धड़का है। निगाह पानी में तैरती जड़ पर टिक गई है। पेट में उठा चीर छाती की ओर बढ़ने लगा है।
''कूल डाउन नीती!... पानी का गिलास लाऊँ...?'' भाभी ने मेरे कमरे में आते हुए कहा है।
मेरी नजर उसके हाथ में पकडे़ तौलिए पर जा टिकी है।
मुझे घूरती हुई वह शिव कुमार बटालवी का बिरहा गाने लगती है लेकिन उसके भीतर कभी बिरहा नहीं उपजा। नहाते समय घंटा- घंटा भर शावर छोडे़ रखती है पर उसके मन का मैल कभी नहीं धुलता। जब फ्लश में जाती है तो पता नहीं कितनी बाल्टियाँ पानी की गिराती होगी,शायद उसके नाक में कोई नुक्स है। नाक सिकोड़ती हुई वह नहाने जाने लगी है।
'' भाभी...!'' मैंने आवाज लगाई।
''यस...!'' वह एडी़ पर घूमकर बोली थी।
''जिस दिन मरना पडा़... उस दिन नाक डुबोने के लिए भी पानी नसीब न होगा...!''मेरी बात सुन वह हंस पडी़ थी। '' चौबारों को चारदीवारी से कोई फर्क नहीं पड़ता नीती...!''
'' फर्क पड़ता है...!'' दिमाग में डा. त्रिपाठी की बात स्मरण हो आई है। पूरे स्कूल में सिर्फ वही हैं जिनकी हर बात अर्थ रखती है। मैं अक्सर उनके पास 'साइंस लैब' में जा बैठती हूँ। जब परसों गई तो वे चिंता में डूबे कोई कागज देख रहे थे।
''क्या बात है डा. साहब...?'' उन्हें चिंता में देख मैं भी चिंतित हो उठी थी। काफी देर तक वे कुछ नहीं बोले बस चुपचाप कागज देखते रहे। मैं दीवार से लगी शीशे की अलमारी की ओर देखने लगी हूँ जिसके ऊपर चिपकी पर्ची पर लिखा है,''परागदानियों की मौत।'' अंदर पडी़ शीशियों में छोटे- छोटे जीव-जन्तु,कीडे़- मकौडे़,केंचुए और घुमियार भरे हुए हैं। मैं हैरान हुई बैठी हूँ।
'' हैरानी हो रही है...? यह देखो कल क्या रिपोर्ट आई है...!'' डा. त्रिपाठी की आवाज सुन मैं तबक उठी हूँ।
उनसे रिपोर्ट लेकर पढ़ने लगी हूँ। पंजाब के अलग-अलग गाँवों में से चुने गए बीस लोगों की खून-जांच की रिपोर्ट थी। सबके खून में कीटनाशक दवाइयों की मात्रा पायी है। एक अखबार की कटिंग थी,''माँ का दूध पीने से बच्चे ने म तोडा़। जांच के उपरांत माँ के दूध में खतरनाक किस्म का जहर पाया गया।''
'' क्या यह संभव है डा....?'' मुझे यकीन नहीं हो रहा है।
''हाँ!...यह सिद्ध हो चुका है...!'' डा. त्रिपाठी की खोजी नजर मेरे चेहरे पर आ टिकी थी, हम बडे़ खतरनाक समय से गुजर रहे हैं। हमारी धरती तेजी से सूखे की ओर बढ रही है।... बीसवीं सदी में तेल के भंडारों पर कब्जा करने के लिए युद्ध हुए थे...इक्कीसवीं सदी में पानी को लेकर युद्ध लडे़ जायेगें...!''
''अटैक एण्ड फायर...!!'' वल्ड ट्रेड सैन्टर की आवाज बादलों की तरह गरजने लगी है।
मोबाइल फोन के टावर पर बैठा हरदेव ताऊ शोर मचानेलग पडा़ है,''उड़ जाओ चिडि़यो, भाग जाओ चिडि़यो...!!
''चिडि़याँ रेत में नहा रहीं हैं। आसमान में पक्षियों की कतार लंबी होती जा रही है। बच्चो की टोली गीत गा रही है, ''रब्बा-रब्बा मींह बरसा...!''
''यहाँ मींह (बरसात) नहीं पड़ता भाई!... यहधरती तो अब यूँ ही तपेगी...!'' धान वाले खेत की फटी दरारों की ओर देखता हुआ बुजूर्ग बड़बडा़ रहा था।
गुडिया जलाने जा रही लड़कियों की आवाज ऊँची होती जा रही है,...'' हाली पुख्खे ते खेत तेयाये रब्बा घुट पाणी देंवीं...!'' (किसान भूखे और खेत प्यासे हैं रब्बा घूँट पानी बरसा) ( पंजाब में ऐसी मान्यता है कि गुडिया जलाने से बरसात होती है)
लोग तो आजकल असली गुडियाओं को जलाते जा रहे हैं...तब भी बरसात नहीं होती! ...फिर भला
इन नकली गुडियों के जलाने से क्या बरसात होगी...? वही बुजूर्ग फिर बड़बडा़या था।
मैं सूखी आड़ पर जा खडी़ हुई हूँ। आज के अखबार में लिखा है हमारा जिला 'डार्क-जोन' घोषित हो चुका है। अंधेरे जिले में बाहर वालों का प्रवेश बंद है।
'' पक्षियों को एन्टरी-पास की जरुरत नहीं होती...'' एक प्यासे कौवे की आवाज है।
''यू थ्रस्टी क्रो...!!'' होठों पर जीभ फिराती मैं आसमान की ओर देखने लगती हूँ।
कौवे ने आँख घुमायी , उडा़न थोडी़ नीची की,अब बंजर में पडा़ एक घडा़ कौवे के पंजों में है। प्यास भड़क उठी है। खाली घडा़ कौवे को पीने लगा है। कौवा चिल्लाने लगा है। घडा़ उड़ने लगा है कौवे की आँख निकल गई है,पंख टूट गये हैं। घडा़ घूमने लगा है। ठाह...ह..ह की आवाज आई है।
''यह क्या हुआ...?'' पापा की आवाज है।
''लगता है धूरीआली वाली सड़क के ट्रं।सफार्मर का पटाखा बोल गया...!'' भईया ने दूर सड़क की छोर की ओर देखते हुए कहा है।
''इधर देख इधर !... आज पानी की हमारी बारी थी,मै पूछता हूँ आपने हमसे पूछे बगैर समर्सीबल चलाया कैसे...?'' चाचा लाठी उठाये सामने खडा़ था।
'' रुक जा ओए!...तेरी.. माँ नुँ....! समर्सीबल में हमारा भी बराबर का हिस्सा है...ओए तू अकेले का साला लगता है...?'' पापा ने कही (फावडा़) हाथ में उठा ली है।
''आप लोग बाद लड़ना! ...पहले मुझे पानी लेने दो!...मेरी फसल मर रही...!'' हमारे खेत का पडो़सी हरदेव ताऊ , चाचे की लाठी और पापा की कही पकड़ते हुए बोला।
कई साल पहले उसके खेत के सबसे गहरे कुँऐं का बोर भी पानी छोड़ गया था। वह खरीद कर पानी
लेता है।
''चल भाग ओए यहाँ से!...कल हमारे खेत की बाडो़ में से डंडे से आड़ बना कर अपनी क्यारी में पानी खींच रहा था!...तू तो पानी चोर है ..पानी चोर...! आज से तुझे पानी कभी नहीं मिलेगा। आवाजों का शोर आपस में उलझ रहा था।
''अगर हिस्सेदारी निभानी नहीं आती तो डालते क्यों हो...?' इस बार भईया कोठी से गंडासा उठा लाया।
चाचा की लाठी लहराई है, पापा का फावडा़ घुमा है,भईया ने चाचा के सर पर गंडासा दे मारा है।
हरदेव ताऊ भाग खडे़ हुए हैं।
गई बिजली लौट आई है पर समर्सीबल बंद है।
चाचा मर चुकाहै।
गाँव से विलाप की आवाज रही है।
लड़कियाँ सुहाग के गीत गा रही हैं। मेरा विवाह हो रहा है। ससुराल जा पहुँची हूँ। औरतों का जमावडा़ है। अपने पति के साथ गेट पर खडी़ हूँ। सास पानी वार कर पीने लगी है, पर गड़वी (लोटा) खाली है।
'' कोई नल पानी नहीं खींच रहा चाची,तू बस पानी पीने भर की ऐक्टिंग कर ले..!'' लड़कियों के झुण्ड ने हँसते हुए कहा।
मैं रोने लग पडी़ हूँ। चाचा की लाश को अंतिम स्नान के लिए नल के पास ले जाया जा रहा है। लोगों में खुसर-फुसर हो रही है। नल पानी नहीं खींच रहा। लाश नहलाए बगैर अर्थी में रख दी गई है। खाळी घडा़ उठाये नाई आगे-आगे चल रहा है। चौराहे पर घडा़ फोडा़ जाता है। ठीकरे बिखर जाते हैं। दूर कहीं से कौवे के रोने की आवाज आ रही है। श्मशानघाट में कुत्ते रो रहे हैं। दूर-दूर तक कोई वृक्ष नजर नहीं आ रहा।
''तो क्या ... अंतिम स्नान और अंतिम संस्कार के बगैर ही...??'' डरी हुई लोगों की भीड़ भागने लगी है।
''मैं भागने की बात नहीं कर रहा हूँ नीती तुझे समझा रहा हूँ...!!'' भईया की यह समझावनी मेरे अंदर प्रदूषित हवा की तरह घुमने लगी है।
उसकी आत्मघाती दलीलें सुन मैं तैश में आ गई हूँ,'' समझाने की जरुरत मुझे नहीं है भईया आपको है!... मैं आपको डार्क-जोन नहीं...!''
''बस नीती बस!... अपनी दार्शनिकता अपने पास रख नहीं तो...!'' भईया की गुस्सैल आँखों में आँखें डाल मैं पेड़ सी तन गई हूँ,'' नहीं तो क्या कर लोगे तुम...?''
ठीक वही वक्त था जब मेन-गेट की घंटी बजी। भाभी भाग कर गई पर उन्हें निराश होना पडा। मेरा विद्यार्थी पाली था। हाथों में छोटा सा पौधा उठाये वह मेरी ओर चला आ रहा था। ज्यों ही मैंने उसका गिफ्ट पकड़ना चाहा भईया उसपर झपट पडा़...,'' नहीं तो यह करुंगा...!!'' वह बोला।
उसने पौधे की एक-एक पत्ती नोंच कर दी और जड़ उठाकर वो मारी।
''कुछ माँ जैसा मर गया पापा...! '' मैं धीमे से बोलती हूँ।
पर अंदर की आवाज तेज होती जा रही है। जहरीली गैसों का गुब्बार सिरकी ओर बढ़ रहा है। धरती की तरह शरीर का तापमान भी बढता जा रहा है। बर्फ की सिल्ली की तरह पिघलती मैं गांव की ओर बढ़ चली हूँ।
सारा गांव लगभग खाली हो चुका है बस किसी-किसी घर से विलाप की आवाज आ रही है। हवा में लाशों की दुर्गध फैली हुई है। मैं अपने बच्चे की लाश ढूंढती फिर रही हूँ। मुँह-सिर बाँधे कुछ लोगों की भीड़ घमावदार सड़क पर खडी़ है। उन सबके हाथो में हथियार हैं। पडो़स के गांव में पानी होने की खबर है। उस पर हमले की तैयारी चल रही है। सबसे आगे हरदेव ताऊ खडे़ हैं। मैं उनके पास जा खडी़ होती हूँ,''...ताऊ!...मेरे भईया और पापा...?''
उसने दीवार से लगे पंचायती नल की ओर इशारा किया है। उफ...फ...!! एक कुत्ते की लाश के साथ पापा की लाश पडी़ है। दोनों के मुँह नल की ओर उठे हुए हैं। मंजर देख मेरी छाती फफक उठी है। मै दुपट्टा नाक पर रख दुसरी ओर चल पडी़ हूँ। होश खोता जा रहा है। सामने हमारी कोठी है। मैं भईया को आवाज देती हूँ परंतु वह बोलता नहीं है। उसके कंधे पर भाभी की लाश है। भाभी की जीभ बाहर निकली है। भईया तेज कदमों से श्मशान की ओर बढता जा रहा है। मेरा हलक सूखने लगा है भईया श्मशानघाट में प्रवेश कर गया है। मैं डरी हुई खडी़ हूँ वह लाशों के ढेर पर भाभी की लाश को फेंक कर नीचे गिर पडा़ है। मैं उसकी ओर देख रही हूँ। उससे उठा नहीं जा रहा, मैं पथराई आँखों से खेत की ओर देखने लगती हूँ।
खेतों में दूर- दूर तक रेत ही रेत है। रेतीली हवा चल रही है। कंटीली झाडि़यों में ऊँट घूम रहे हैं। मैं एक झाडी़ में जा फंसी हूँ। बडी चुभन हो रही है। आँखें खोलती हूँ तो देखती हूँ सामने भईया पडा़ है। वह मेरी ओर सरक रहा है। मैं उठकर नजदीक जाना चाहती हूँ पर उठा नहीं जा रहा। आँखें बद होती जा रही हैं। कोई चीज मुझपर आ चढी़ है। मैं तबक कर आँखें खोलती हूँ। भईया का हाथ है। मेरी गोद में सर रखकर रोने लग पडा़ है... ''पा..आ..नी...!!''
मैंने अपनी कमीज ऊपर उठाई है। एक स्तन निकाल कर भईया के मुँह में लगा दिया है।
''घोर कलयुग आ गया है भाई...!!'' पापा की शराबी आवाज संतों का गुणगान कर रही है,''... कमाल का प्रवचन था संतों का।... कह रहे थे मांस खाना छोड़ दे बंदे... अब तो गिद्धें भी शाकाहारी हो गई हैं...!!''
भईया भाभी को मांस वाला लिफाफा पकडा़ रहा है। वह अभी नहाकर आई है। लिरील साबुन महक भईया की आँखो में उतर रही है।
पापा को शराब चढ़ गई है।
मैंने अंतिम फैसला ले लिया है और चिराग ,माचिश और जड़ लेकर पाली को फोनकर कोठी से बाहर आ गई हूँ।
वह गली में खडा़ है।
'' चल पाली...!'' मैंने उसे आवाज देते हुए कहा है।
'' पर चलना किधर है मैम...?'' वह सोच में पडा़ पश्चिम में डूब रहे सूरज की ओर देखने लगा है।
मैं सूरज की अंतिम ढलती हुई रोशनी की ओर देखती हुई खेतों की ओर चल पडी़ हूँ।
मेरे पीछे पाली और आगे पानी का कुंड है।
मैं कुंड की मुंडेर पर बैठी ख्वाजा पीर का चिराग जलाने लग पडी हूँ।
पाली धरती में जड़ लगाने में व्यस्त है।

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लेखकः जसबीर राणा
ग्र।मः अमरगढ़
जिलाः संगरूर-१४८०२२
(पंजाब)
फोनः९८१५६५९२२०





अनुवाद : हरकीरत कलसी 'हकी़र'
१८, ईस्ट लेन, सुन्दरपुर
हाउस न. ५
गुवाहाटी -५
(असम)
फोनः ९८६४१७१३००

12 comments:

  1. मुबारकबाद !!
    टिप्पणी में क्या कहूं ....

    आपको... एक समृध्द लेखिका , सशक्त समीक्षक , और
    बहुत ही कुशल अनुवादक के तौर पर पहले से ही जानता हूँ ....
    आप साहित्य की दुनिया में पुख्ता दस्तखत हैं....
    इस बात ko कोई भी नकार नहीं सकता

    आपका अनुवादित-साहित्य आपको
    रचनाकारों की अग्रणी श्रेणी में ला कर
    आपको एक नयी दिशा और पहचान देगा....
    यह मेरा विश्वास भी है....aur कामना भी ......
    ---मुफलिस---

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  2. Harkirat ji..it is a great story and you have done a wonderful job of translating it into Hindi. Jasbir Rana ji aur unki kahanion ke baare mein maine Darshan Darvesh ji se bahut tareef sunni thi..aaj parh bhi leya...Jasbir ji aur aapko bahut mubarakbaad bhej rahi hoon. Keep it up :)Jasbir ji ki bhi haazri jald hi Aarsi pe lagegi.
    Tandeep Tamanna
    Vancouver, Canada

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  3. Jasbir Rana is a gem of new punjabi short story.
    Darshan Darvesh

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  4. harkiraat ji ,

    aj to kamaal par kamaal hai , pahle punjabi poems , phir ye anuwaad , bhai kya ho raha hai , itni saari pratibha se pahle to kabhi ruburu nahi karwaaya ..

    jai ho ,

    aur bahdhai bhi ho

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  5. आप एक कुशल अनुवादक भी हैँ
    यह इसको पढ कर समझा जा सकता है

    भावभीनी रचना प्रस्तुतिकरण के लिये बधाई

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  6. jas bir rana ji ki tariif mein kya kaheN .pahli baar padha hai maine to par soch kar yakin nahi hota ki jo kai baar mein mehsoos karta hun un bhavo ko mehsoos hi nahi lafz dene vale bhi hai..
    aapka anuvaad bhi sarahniiy hai na aap anuvaad karti na ye humen padhne ko milta.

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  7. aapka yah paksch anjana tha . aksar anuvad me bhav bhasha ke parivartan se mar jate hain ya to ubhar hee naheen pate . is kahanee me anuvad mehsoos hee naheen hua . anuvadak me bhee jab tak ek achcha kissago na chupa ho aisee bat naheen ban patee.
    kya aapne kahaniyan bhee likhee hain ? agar haan to kahan padh sakte hain . utsukta ho chalee hai .
    baharhal ham sab ka farz hai ki kam se kam bhartiy bhashaon me kiye ja rahe kamon se ek doosre parichit hote rahen aur is disha me aap jaise log upkrit hee kar rahe hain.
    ummeed hai kam aur kram jaree hee rahega .

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  8. hindyugam men doha kee kaksha men guru nanak dev jee ke kuchh dohe diye gaye hain. unka hindee men anuvad kar deejiye. kuchh pathak unhen samajh naheen pa rahe hain. aapka aabhar hoga.

    aapkee punjabee kavitaaen mool uchchara devnagree lipi men tatha hindee anuvaad divyanarmada.blogspot.com men bhejiye. -salil

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  9. अनुवाद के क्षेत्र में भी अपना कमाल दिखाने के लिए बधाई हरकीरत जी। अच्छे अनुवाद को भी मैं सृजन का ही हिस्सा मानता हूँ। आपमें अनुवाद की गहरी समझ है और चूँकि आप स्वयं लिखती हैं, इसलिए आपका अनुवाद कृत्रिम नहीं लगता। आप अपनी इस रुचि को बनाये रखें पर ध्यान रहे अपने मौलिक लेखन की क्षति न हो। जसबीर राणा की एक बहुचर्चित कहानी "चूड़ेवाली बांह"का मैंने भी हिंदी में अनुवाद किया था जो 'नया ज्ञानोदय' में छ्पी थी। वह पंजाबी की नई कथा पीढ़ी के एक समर्थ कथाकार हैं और भविष्य में उनसे बहुत सी आशाएं हैं। मेरी शुभकामनाएं !

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  10. बहुत खूब सभी तरफ जै जै कार हो रही है आपकी

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  11. हरकीरत जी अनुवाद हर किसी के वश की बात नहीं है.........मैंने इस पीडा को भोगा है......दूसरे के बच्चे को अपने बच्चे से ज़्यादा ममता दे कर पालने-सा कुछ है......आपने इतनी अच्छी कहानियाँ दे दी हैं हिन्दी साहित्य को इस का हिसाब तो वक्त को रखना होगा . अपनी एक अनुवाद की किताब मेँ कनाड़ा के दो पंजाबी कवियों श्री नवतेज भारती और श्री अजमेर रोड़े की कविताओं का अनुवाद मैं भी कर चुका हूँ...इन दिनोँ फोकस जापान पर है........ आप से मिल कर अच्छा लगा..शुभकामनाएँ...

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  12. I was reading a skech of Mohan Sapra by Darves
    suddenly you appeared. Appreciate your chioces about music, literature and life. carry on ....

    www.swarnjitsavi.blogspot.com

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