Monday, December 2, 2013

इमरोज़ जी की कुछ नज़मों का अनुवाद ....

पंजाबी की कोयल  ....

बरसों की बात है
पंजाब के इक बाग़ से
इक कोयल मर्जी के गीत गाती - गाती
उड़ती -उड़ती कई राह और दरिया
पार कर ब्रह्मपुत्र की धरती जा पहुंची
इक हरे -भरे दरख़्त पर बैठ कर
गाती रही , गाती रही
गाते -गाते जवान हो गई
जवान होते -होते हीर हो गई
हीर होते -होते प्यार हो गई
प्यार होते -होते कविता हो गई
अब कविता लिखती रहती है
और अपने आपको चुपचाप
गाती रहती है ....... !!

इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

मुहब्बत का पंछी  ....
इक मुहब्बत का बाग़ था
इक दिन उसने उसका फल खाया
और मुहब्बत का पंछी बन गया
अब वो दीवानों की तरह हीर को तलाशता
कभी चनाब तो कभी ब्रहम्पुत्र पहुँच जाता है
रंगो से हीर बनाता
जुबां से हीर गाता
वो राँझा -राँझा हो जाता है .... !!

हीर  …

(२)

बराबर का  ....
 कुछ दिनों से
जब भी वो मुझे देखता
उसकी आँखों में
इक ख़ास सी चमक
मुझे दिखती थी
मुझे अभी वह छोटा दिखता था
और था भी वह मुझसे छोटा
उसने अभी कुछ भी नहीं देखा था
मैं तो माँ बनकर भी देख चुकी थी
और एक मुहब्बत करके भी  ....
इक दिन मेरा उसके साथ इक बात
करने को दिल किया
उसे बुलाकर पास बैठा कर कहा
तू पहले दुनिया देख आ
फिर भी अगर तुम्हें मेरी जरुरत हुई
जो भी तुम कहोगे मैं कर लूँगी
उसने मेरी ओर देखा
और उठकर सात चक्कर लगाये
और हँसता -हँसता मेरे पास आ बैठा और बोला
देख मैं दुनिया देख आया हूँ
मेरी ओर देखते उसके हँसते -हँसते बोल सुनकर
और उसे देखकर मैं हैरान रह गई
वह मेरे ही सात चक्कर लगा कर छोटा न रहा था
न दिखने में न समझ में
अब वह मेरे बराबर का भी हो गया था
और ज़िन्दगी के बराबर का भी  ....

(३)
रब्ब की पेंटिंग  ....
वह चुपचाप मुझे देखता
उसकी ड्रॉइंग खूबसूरत थी और मेरे नैन -नक्श
वह जब भी ड्रॉइंग करता
मैं उसके पीछे खड़ी होकर
उसकी ड्रॉइंग को देखती रहती
और उसके ड्रॉइंग में से उसे
उसकी खूबसूरत ड्रॉइंग देख -देख उसकी खूबसूरत पेंटिंग देख -देख
मैं और खूबसूरत होती रहती
आर्ट स्कूल का अंतिम दिन आ गया
एक -दूसरे को मिलकर सभी बिछड़ रहे थे
वह भी मेरे पास आ गया
मैं देख कर हैरान रह गई बोली
तुम तो सचमुच पेंटिंग बना-बनाकर
खूबसूरत हो गए हो
वह बोला हो सकता है पेंटिंग के साथ भी
थोड़ा बहुत हो गया होऊँ
पर खूबसूरत तो मैं रब्ब की पेंटिंग देख -देख हुआ हूँ
मैं हैरान भी और खुश भी हुई
उसके यह खूबसूरत बोल सुनकर
जिस के पीछे खड़े होकर जिसकी ड्रॉइंग से
उसे देखा करती थी
अब वह मेरे सामने बैठा है मैं उसका हाथ पकड़कर
उस खूबसूरत कलाकार को उसकी सोच की
खूबसूरती को  महसूस कर रही हूँ
उसे देख -देख  ……
(४)
खुशबू का फ़िक्र  …
खुश्बू का फ़िक्र करने वाली
आज याद आ रही है २० साल पहले
मैं भी आर्ट स्कूल में था और वह भी मेरी क्लास में थी
बड़ी सयानी और बड़ी प्यारी
वह मुझे भी अच्छी लगती थी और मैं भी उसे
वह सबसे खूबसूरत फूल पेंट कटरी थी मुझसे भी सुंदर
उसे मेरे साथ बोलना अच्छा लगता था
कभी पूछती तुम्हारे रंग बड़े नए हैं कहाँ से लेकर आये हो
मैं हँस कर कहता अपने पिंड से
वह फिर पूछती अपना पिंड कब दिखाओगे
मैं हँसकर फिर कहता जब तुम्हें उड़ना आ जायेगा  ....
वह अपना लंच हर रोज मेरे साथ शेयर करती
और मैं अपने ख्याल  ....
फूलों के एक मुकाबले में उसके फूलों को एक इनाम मिला
अपनी खूबसूरती में बैठी वह और भी खूबसूरत हो रही थी खुश भी थी
और उदास भी हजारों खूबसूरत फूल बनाये पर खुशबू
कभी एक फूल में से भी नहीं आई
जानती है कि पेंटेड फूलों में से खुशबू नहीं आती पर उस सोच में बैठी है
वह उडीक रही खुशबू  ....
जो कभी नहीं हुआ वह मैं करके देख रहा हूँ
मैं तुम्हारे फूल की खुश्बू बन सकता हूँ
पर पेंटेड फूलों की नहीं तुम खुद फूल बनो
तो उस फूल की खुशबू बन जाऊँगा
मंज़ूर जोर से बोली
मैं और कुछ बनूँ न बनूँ
पर मैं तेरी खुशबू के लिए फूल जरुर बनूँगी
तुम पता नहीं क्या हो अपनी उम्र से कहीं बढ़कर
न समझ आने वाले भी और समझ आने वाले भी  …
(५)
ख्याल  …
इक दिन
पेंटिंग में बैठी -बैठी लड़की
गंगा से उठकर चलती-चलती
पोयट्री में पहुँच गई
पोयट्री उस वक़्त
ख्यालों को रंग दे रही थी
और ख्यालों से रंग ले भी रही थी
रंगों की लड़की ने
ऐसे ख्याल कभी नहीं देखे थे न रंग
उसने मुस्कुरा कर देखा था
पर हँस कर नहीं देखा था
आज ख्यालों के पास खड़ी
ख्याल भी हो रही थी रंग भी हो रही थी
और हँस भी रही थी ……
इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

Friday, November 22, 2013

रेयर कौम  ....

अगर कभी किसी कौम के लोग ही
हमलावर सिकंदर की
नंगी तलवारों के आगे खड़े होकर
गुलाम होने से इंकार कर देते
तो पागल सिकंदर सारी कौम को कत्ल करके भी
उस रेयर इंकार को कभी भी
 पार न कर सकता  …
काश !
ऐसी रेयर निडर और आज़ाद
एक कौम पैदा हो गई होती अपनी ज़मीन पर
फिर तो अपनी ज़रखेज़ ज़मीन ने
पूरा देश बना देना था
हमेशा के लिए एक निडर देश -रेयर देश
हमलावर मुक्त सिकंदर मुक्त  …
(२)

प्यार  ....
अगर
प्यार ही मज़हब होता
न कोई पूजा होती न पाठ
और न ही किसी को माथा टेकना पड़ता
मज़हब भी आज़ाद होता
और बंदा भी  ....
(३)
दो मुहब्ब्तें  ....
इक औरत ने मुहब्बत से
मुझे ज़िन्दगी दी थी
और इक औरत ने मुहब्बत से
मुझसे ज़िन्दगी ले ली है  ....
(४)
रिश्ते  …
मर्जी रिश्ते बनती
पर मर्जी दखल नहीं बनती
रिश्ते दखल मुक्ति हो सकते हैं
अगर आदर रिश्ते जिए  ....
(५)
मुहब्बत  ....
शुक्र है
ज़िन्दगी में मुहब्बत है
चाहे स्वप्न जितनी ही सही
ज़िन्दगी जितनी तो सिर्फ
हीरों को मिलती है
रांझों को मिलती है  ....
(६)
दीदार  …

मुहब्बत
रब्ब का दीदार है
जितनी बार दिल करे
जब भी दिल करे
न पूजा की जरुरत है न पाठ की  …
मुहब्बत
रब्ब का भी दीदार है
और अपना भी  …

इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

Monday, November 4, 2013

आज पढ़ें इमरोज़ जी की लिखी कुछ उक्तियाँ  ……
(१)
आज़ाद  …
आज़ाद वह है
जो गुलाम होने से
इंकार कर सकता है …
(२)
धर्म  …
जो तुम सब के साथ चलता है
वह धर्म है
और जिसके पीछे चलना पड़े
वह धर्म नहीं होता ……
(३)
सच  …
किसी का सच
अपना सच नहीं बन सकता
अपना सच
खुद जी कर बनता है  ....
(४)
मज़हब  …
आज़ाद का आज़ाद होना ही
उसका मज़हब है
वैसे कोई भी मज़हब
आज़ाद नहीं  …
(५)
 ज्ञान  .... 
तेरा मेरा प्यार ही
ज्ञान है ज़िन्दगी का  …
(६)
आदर  .... 
न तरस करो
न रहम करो
इनमें आदर नहीं  …
(७)
स्कूल  .... 
आम स्कूल
सिर्फ जुबान सिखाते हैं
पर जीना सिखाते हैं
ज़िन्दगी के स्कूल  ....
(८)
अपना  .... 
जितनी देर मैं अपना हूँ
सब अपने हैं …।
(९)
दान  ....
 
पैसे बाँटना दान नहीं
अपना आप बाँटना दान है  …
(१० )
ख़ूबसूरती  … 
घर में तेरी-मेरी मौजूदगी
रेयर ख़ूबसूरती है
और रेयर घर की सजावट भी  …
(११)
किसी को  .... 
किसी को जानने से पहले
अपने आप को जान लो  …
(१२ )
तलवार  .... 
तलवार से
हकूमत हो सकती है
मुहब्बत नहीं  ....
(१३)
जरुरत  .... 
मैंने भगवान को
कभी नाराज नहीं किया
खुश करने की जरुरत ही नहीं  ....
(१४ )
ग्रेट  … 
हमलावर को
ग्रेट कहते जाना , लिखते जाना
इतिहास नहीं
ग्रेट गलत बयानी है  …
(१५)
भगवान  ....
इक नया ख्याल
पूज लो
चाहे जी लो  …
(१६)
मर्द  ....
मर्द अभी तक नहीं जागा
न अपना आदर करता है
न औरत का  ……
(१७)
जाल  ....
जाल को भूल जाओ
जब मछली पकड़ी गई
ग्रन्थ को भूल जाओ
जब समझ आ गई  ....
(१८)
अर्थ  .... 
यूँ ही ग्रन्थ न पढ़ो
अगर अर्थ नहीं बनता  …
(१९)
न - शब्द  .... 
प्यार सिर्फ एक
न - शब्द जुबान है
कल की हीर भी जानती थी
और आज की हीर भी जानती है   ....
(२०)
बटन पर कोट  ....

इक दीवाने ने
इक घर का दरवाज़ा खटखटाया
औरत ने दरवाज़ा खोला
तो दीवाना बोला
जी बड़ी मेहरबानी होगी
अगर आप मेरे कोट पर बटन टांक दें
औरत ने दीवाने को अंदर बुला लिया
दीवाने ने औरत को बटन पकड़ा दिया
बटन पकड़ कर औरत ने पूछा कोट किधर है ?
मेरे पास तो बटन ही है और सोच लिया था
आप इस बटन पर कोट सी देगीं
औरत सुनकर हैरान
कि बटन पर कोट कैसे सीए  …
अगर मुहब्बत औरत होती
दीवाने को देख - देख
उस के बटन पर भी कोट सी देना था
दीवाने ही रांझे होते हैं  …

इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

Wednesday, October 16, 2013

अपने आप की हीरे ….

कोई बुरी सोच आई होगी
जो सपना बनकर खत्म हो गई
तुम भी अच्छी भली और मैं भी अच्छा भला
एक हीर वारिश ने लिखकर जी ली
एक हीर हरकीरत लिखकर जी रही है
हीर होकर भी हरकीरत क्यों उदास है ?
उदासी की वजह देख कर
मैसेज भी किया सकता है स्पीड पोस्ट भी
बहुत हुआ तो किसी खाली कश्ती में
नज़्म लिखकर बहा दिया कर …
पर उदासी को ठहरने न दिया कर
जो मैं लिख रहा हूँ
तू इससेकहीं ज्यादा सयानी भी है
और प्यारी भी ….
मैंने भगवान को कभी नाराज़ नहीं किया
खुश करने की जरुरत भी नहीं पड़ी
पर तुझे खुश करने की जरुरत है
बता तू किस तरह खुश हो सकती है ?
खुश हो जाना
और बिल मुझे भेज देना….

इमरोज़ -
अनुवाद - हीर

(2)पूजा  ….



इक दिन

भगवान को पूछा

टूटे बाजारी फूलों से

किसी की पूजा हो सकती है ?

भगवान ने हँस कर कहा

तूने देखा होगा

मंदिरों में घरों में

जहाँ कहीं भी टूटे फूलों से

पूजा होती है या हो रही है

वहाँ मैं पत्थर हो जाता हूँ

न सुनता हूँ न बोलता हूँ न देखता हूँ

पर जो खुद फूल बनकर

मेरी पूजा करता है

वहाँ मैं बुत नहीं बनता

उसे देख -देख

मैं भी फूल हो जाता हूँ

प्यार हो जाता हूँ  …।

इमरोज़ -
अनुवाद - हीर


(४)
फूल …. 
 
मैं फूल देख - देख
फूल होता रहता हूँ
पूजा के रूप में
भगवान होने के लिए  … 
(5)
रब्ब  … 

रब्ब पाठ नहीं बनता
अरदास भी नहीं बनता
सिर्फ आने वाला ख्याल बनता है  …. 
(6)
भगवान  …. 

भगवान को मैंने
कभी नाराज़ नहीं किया
खुश करने की जरुरत भी नहीं हुई  …. 
(7)
पूरा अच्छा  …

पूरा अच्छा लेखक
किसी अच्छे लेखक को
कभी बुरा नहीं कहता  … 
(8)
शर्म  …. 

आदमी  रेप करता है
हमें शर्म आ जाती है
सिकंदर
मुल्कों के मुल्क
रेप करता रहा
उसे ग्रेट कहने वालों को
आज तक शर्म नहीं आई  …. 
(9)
जरुरत  … 
रांझे तख़्त हजारे के जन्म पल
जिन्हें औरत हीर दिखती है
ज़िन्दगी की खूबसूरती
बाकी के मर्द
हैरम की पैदावार
जिन्हें औरत जिस्म दिखती है
सिर्फ जिस्म की जरुरत  …. 
(10)
नया पानी  …. 
दरिया हर रोज़
नए पानी संग दरिया होता है
मज़हब भी एक दरिया था
नया पानी न मिलने के कारण
खड़ा पानी बनकर रह गया  ….
 (11)
ख्याल …
उसका ख्याल आया
बिजली सी चमकी
जंगल में भी राह दिख गया
मुझे भी और डर को भी  …. 
(12)
अपना मज़हब  …. 
मज़हब अब मज़हब नहीं रहा
ताकत बन गया है, सियासत बन गया है
अब वक़्त आ गया है
खुद
अपना मज़हब बनने का ….

इमरोज़ -
अनुवाद - हीर

Friday, October 4, 2013

 imroz ki kuchh nazmein .....
हीर भी शायरा भी  …
सोचता रहता हूँ
शायरी की कला भी
जीने की कला भी
खूबसूरत जीने की कला हो जाये
सोचें
सोच भी हो जाती हैं
 अपनी इस सोच को
सच होते मैंने भी देख लिया है
और सबने भी
इक खूबसूरत शायरा को जब मुहब्बत हुई
उसकी शायरी और खूबसूरत हो गई
और उसकी ज़िन्दगी
उसकी शायरी से भी खूबसूरत ….
मुहब्बत संग
कोई भी हीर हो सकती है
कोई भी शायरी भी  …।
(२)
मानता ……………
समझ, समझ के बनती है
पर मानता बगैर समझे ही बन जाती है मानता
लोग मानता के साथ ही
काम चला रहे हैं
मज़हब चला रहे हैं
ज़िन्दगी चला रहे हैं
और अपना आप भी  …
………………
(३)
दरिया ….
रोज नए पानी से
दरिया होता है
मज़हब भी दरिया था
नया पानी न मिलने के कारण
खड़ा पानी ही रह गया  ….
……………….
(४)
………………
मर्जी की मर्जी  ……
मैं सोहनी हूँ
सोहनी से सोहनी
मुझे मनचाहे की तलाश है
मास्टरपीस बनने की तलाश नहीं
 दुनिया के सारे मास्टरपीस
दीवारों से टंगे हुए हैं सब स्टिललाइज
मैंने खिला फूल बनना है
हमेशा रहने वाला पेटिंड फूल नहीं
मैं सोहनी हूँ
सोहनी से सोहनी
हर दरिया हर रोक
पार करूँ अपने आप संग
कच्चे घड़े के संग भी और पक्के घड़े के संग भी  …

(५)
पेंटिंग के बीच की लड़की……
इक दिन
पेंटिंग के बीच की लड़की
रंगों से बाहर आकर
एक नज़्म के ख्यालों को
देखने लगी
देख देख उसे
अच्छा लगा ख्यालों को रंग देना भी
और ख्यालों से रंग लेना भी
ख्यालों ने देखती हुई लड़की से पूछा
तू बता पेंटिंग के रंगों में
क्या - क्या बनकर देखा
मैंने मुस्कराहट बनकर देखा
पर हँस कर नहीं
मैंने  खड़े होकर देखा है रंगों में
पर चलकर नहीं ….

……………………
मज़हब और ईश्वरवाद
कोई जरुरी नहीं  …
अपना सच
और अपनी मर्ज़ी जरुरी है  …
……………….
मुहब्बत ही तो
ज़िन्दगी भी महबूबा है  …
………………
रब्ब को सोचा
नया ख्याल आ गया  …
……………
लोग पुराने नहीं होते
ख्याल पुराने होते हैं  …
…………
हर रात कल हो जाती है
हर सबेर आज भी
और कल भी  ….
…………
उसका ख्याल आया
बिजली चमकी
जंगल में भी राह दिख गई
मुझे भी और डर  को भी  ….
…………….
कहते हैं
मानता जड़ हो गई
पर न कभी कोई नया पत्ता लगा
न फूल  …
…………
भगवान रोज़
आज हो जाता है
पर लोग पता नहीं
कल को ही
क्यों दोहराते रहते हैं …….
…………
मज़हब अब मज़हब नहीं रहा
ताकत बन गया है
सियासत बन गया है
अब वक़्त आ गया है
खुद
अपना मज़हब बनने का  ….
……………….
मेरा दिल करता है
फूल- फूल होकर
खुशबू बन जाऊं
खुशबू होकर अक्षर
अक्षर-अक्षर होकर
नज़्म
नज़्म-नज़्म होकर
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी-ज़िन्दगी होकर
प्यार
और प्यार-प्यार होकर
जीना आ जाये
जैसा मेरा जी करता है …
…………….
कभी-कभी
खाली सोच की तरह
जिधर भी दिल करे
चलता-फिरता रहता हूँ
हालांकि
जिसे मिलना था वह तो मैं खुद ही हूँ ……
……………….
हीर बने बिना
हीर समझ नहीं आती ……
जितनी देर लोग
अर्थ नहीं बनते
शब्दों का काम खत्म नहीं होगा  ….

………………….
रंग भी नहीं होते
कैनवास धरती नहीं होती
लाइफ धरती है
और कैनवास सिर्फ स्टिल लाइफ ….
……………

इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत 'हीर'

Sunday, September 8, 2013

इमरोज़ की नज्में  ……

ज़िंदा पूजा  …
फूल टूटा और फूल मर गया
सब जानते हैं
और नहीं भी जानते
एक दिन
मैंने  को पूछा
टूटे बाजारी फूलों के साथ
किसी ज़िंदा की पूजा हो सकती है ?
भगवान ने हँस कर कहा
तुमने देखा होगा
मंदिर में और कहीं भी
टूटे बाजारी फूलों से
पूजा होती है और हो रही है
वहां मैं पत्थर का हो जाता हूँ
न कुछ सुनता हूँ न कुछ बोलता हूँ
न देखता हूँ
और जो खुद फूल बनकर
मेरी पूजा करता  है
वहां मैं बुत नहीं बनता
वहां मैं महक - महक
पूजा करने वाले को देखता भी हूँ
और सुनता भी हूँ  ….
(२)
खामोश  ….
रंग भी खामोश और कैनवास भी
तो र खामोश पेंटिंग ही बनती है
मोनालिसा की खामोश मुस्कराहट
खूबसूरत है बहुत खूबसूरत
पर शब्द
न ख़ामोशी देख सकते
न ही पढ़ सकते  ….
मुहब्बत भी खामोश और ज़िक्र भी
मुहब्बत सिर्फ ज़िन्दगी बनती है
न लिखत बनती है न बोल  …
पोइट्री भी खामोश और पहचान भी
नज्में बहुत
पर किसी किसी के नज़र में ही
पोइट्री चमकती  है  …
(३)
सात चक्कर  …
 
घर में आती अखबार के
सन्डे एडिशन में लेखकों का कालम पढ़ा
मुझे अपनी नज्मों की किताब के लिए
नई तरह का कवर डिजाइन चाहिए था
अपने एक वाकिफ आर्टिस्ट को पूछा
कोई नई तरह का है आर्टिस्ट पोइट्री जैसा
कहने लगा - 'है '
और फोन करके वह नई तरह का आर्टिस्ट आ गया
सचमुच नई तरह का था देखने में  भी बोलने में  भी
न मैं उसे देख फार्मल हुई न वह मुझे देख
नई तरह का कवर डिजाइन मेरी पसंद का बन गया
और नई तरह का आर्टिस्ट भी मेरी पसंद बन गया
मिलने लगा फोन करने लगे
इक दिन उसने आकर कहा अब बस पर नहीं
आज से स्कूटर पर रेडिओ स्टेशन जाया करेंगे
मैं सुनकर बोली इतनी देर से क्यों मिले हो ?
क्या करता जवानी भी देर से आई और पैसे भी
जब से तुम्हें बस पर जाते देखा है
स्कूटर के लिए पैसे जोड़ता रहा
मैं बोली अब तुम मेरी शाम का फूल हो
शाम भी खिलती रहेगी और रात भी महकती
वह रोज़ शाम को मुझे रेडिओ स्टेशन ले भी जाता और ले भी आता
मैं उसके पीछे बैठ कर
उसकी पीठ पर जो जी चाहता लिखती रहती
कभी कोई नया ख्याल कभी कोई नया शेर  ….
वह मुझसे छोटा था
पर मुझसे पहले ही मेरे साथ सीरियस
होता जा रहा था
एक दिन जब हम दोनों ही कमरे में थे
मैंने उससे कहा तू पहले दुनिया देख आ
दुनिया देखकर अगर फिर भी तुम्हें मेरी जरुरत हुई
फिर ठीक है जो कहोगे करूंगी  …
वह उठा उसने सात चक्कर लगाये और बोला
मैं दुनिया देख आया हूँ
यह सुनकर मैं उसे देखती रह गई
मेरे ही सात चक्कर लगा
वह मेरे बराबर का भी हो गया था
और ज़िन्दगी के बराबर का भी  …
यह कालम पढ़ के
मैं कितनी देर अपने आप को सोचता ही रहा
और देखता भी रहा
मेरे रंगों में मेरी औरत भी
मेरी न बन पाई
और आर्टिस्ट के रंगों में
वह मेरी औरत आर्टिस्ट की
मनचाही हो गई
मैं ही मिसमैच हूँ और अपने आप में गैर हाजिर भी
मैच सिर्फ आर्टिस्ट है
आर्टिस्ट जैसा कोई कम ही होगा इतना खूबसूरत
लेखकों को और आर्टिस्टों को भी हाजिरी देख देख
दोनों की खूबसूरती देख देख
मैं मिसमैच भी खूबसूरत होकर
जा रहा हूँ अपने आपको साथ लेकर भी
अलविदा  ….
- इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

Tuesday, September 3, 2013

इमरोज़ की कुछ नज्मों का अनुवाद  ….

(१)

हाजिर हो कर  …

जब भी मेरा दिल करता है
भगवान से मिलने का
भगवान मुझे धरती पर
हाजिर दिखने लगता है
और मैं हाजिर हो कर
हाजिर से मिल लेता हूँ
हाजिर को हाजिर हो कर
सब मिल जाता है
जो बताया नहीं जा सकता
हाजिर हो कर
जाना जा सकता है  …
(२)
आज जीने के लिए  …
पेंटेड मास्टरपीस
मियुजियम के लिए  होते हैं
कल को देखने के लिए जानने के लिए
मुहब्बत ही सिर्फ
ज़िंदा मास्टरपीस ज़िन्दगी के लिए होती है
आज को जीने के लिए हर रोज़  …
(३)
ज़िन्दगी के बराबर   ….
कुछ दिनों की मैं उस को
देख - देख सोच रही हूँ
वह छोटा - छोटा लग रहा था , वैसे ही
उस ने ज़िन्दगी में  मुझ जैसा
कुछ देखा नहीं था
इक दिन मैं घर में भी और कमरे में भी
अकेली थी
उसे पास बिठा कर कहा
तुम भी दुनिया देख आओ
अगर फिर भी तुझे मेरी जरुरत हुई
तो फिर ठीक है तुम जो भी कहोगे
मुझे देख कर मेरे बोल सुन कर कर
वह उठा
उस ने मेरे सात चक्कर लगाये
और आकर हँसता - हँसता
मेरे पास बैठ गया , बोला -
देख ले मैं दुनिया देख आया हूँ
यही दुनिया थी मेरे देखने लायक
मैं उसे देख - देख उसके हँसते- हँसते
बोलों को देख सुन  हैरान रह गई
वह  छोटा नहीं था
वह तो मेरे ही सात चक्कर लगा कर
मेरे बराबर का भी हो गया है
और ज़िन्दगी के बराबर का भी  …

(४)
खामोश मुहब्बत  …
मैंने जब अपने आपको
फूल सोचा था उसे खुशबू सोच लिया था
पर  …
किसी के साथ चल कर भी देखा
किसी के साथ फूल बनकर भी देखा
किसी के साथ शायरी करके भी देखी
किसी को न अपने साथ
जागना आता है न औरत के साथ  …
मैं तो कब की खामोश
फूल बनी खुशबू को उडीक रही हूँ
आज मेरी उडीक ने
इक नज़र पढ़ ली है
उसकी जो है
जो हवाओं को पूछता है
मैं भी तुम्हारी तरह आज़ाद और अदृश्य
रहना चाहता हूँ
हवाओं ने कहा
खामोश मुहब्बत कर ले
किसके साथ
जो भी अच्छा लगे
अभी तो अपना आप ही मुझे अच्छा लगता है
जब कोई अच्छी लगी
फिर खामोश मुहब्बत भी कर लूंगा
मैं आज उसे मिलने जा रही हूँ  …
( ५ )
हर रोज़  …
 फूल हो के
उगते सूरज के साथ जागता हूँ
खिलता हूँ
और कितनी ही देर महक कर
खुशबू हवाओं के हवाले कर
अपने रंगों के साथ हँसता हूँ खेलता हूँ
और शाम को सूरज के साथ
रंगों के साथ मिलकर
अपना फूल होना
पूरा कर लेता हूँ  …
(६)
जो दिल करे  …
कोई भी मजहब
जो भी दिल करे करने की छूट नहीं देता
पर लोग जो भी दिल करे
करना चाहते हैं कर रहे हैं
और मजहब जो भी करे करने वालों को
रोक नहीं पा रहे रोक भी नहीं रहे
लोग जब भी दिल करता है
झूठ बोल लेते हैं
किसी को लूटने का दिल करे
लूट लेते हैं
किसी को रेप करने का दिल करे
गैंग रेप कर लेते हैं
और मिलकर क़त्ल भी कर लेते हैं
आसमान से रब्ब क्या देख सकता है
मजहब तो जमीन से भी न देख रहा है
न रोक रहा है
अपने लोगों को अपना निरादर
कर रहे लोगों को
कुछ समझ नहीं आ रहा किसी को
क्या लोग अभी मजहब
के काबिल नहीं या  मजहब अभी लोगों के
काबिल नहीं   …

इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर