Friday, November 22, 2013

रेयर कौम  ....

अगर कभी किसी कौम के लोग ही
हमलावर सिकंदर की
नंगी तलवारों के आगे खड़े होकर
गुलाम होने से इंकार कर देते
तो पागल सिकंदर सारी कौम को कत्ल करके भी
उस रेयर इंकार को कभी भी
 पार न कर सकता  …
काश !
ऐसी रेयर निडर और आज़ाद
एक कौम पैदा हो गई होती अपनी ज़मीन पर
फिर तो अपनी ज़रखेज़ ज़मीन ने
पूरा देश बना देना था
हमेशा के लिए एक निडर देश -रेयर देश
हमलावर मुक्त सिकंदर मुक्त  …
(२)

प्यार  ....
अगर
प्यार ही मज़हब होता
न कोई पूजा होती न पाठ
और न ही किसी को माथा टेकना पड़ता
मज़हब भी आज़ाद होता
और बंदा भी  ....
(३)
दो मुहब्ब्तें  ....
इक औरत ने मुहब्बत से
मुझे ज़िन्दगी दी थी
और इक औरत ने मुहब्बत से
मुझसे ज़िन्दगी ले ली है  ....
(४)
रिश्ते  …
मर्जी रिश्ते बनती
पर मर्जी दखल नहीं बनती
रिश्ते दखल मुक्ति हो सकते हैं
अगर आदर रिश्ते जिए  ....
(५)
मुहब्बत  ....
शुक्र है
ज़िन्दगी में मुहब्बत है
चाहे स्वप्न जितनी ही सही
ज़िन्दगी जितनी तो सिर्फ
हीरों को मिलती है
रांझों को मिलती है  ....
(६)
दीदार  …

मुहब्बत
रब्ब का दीदार है
जितनी बार दिल करे
जब भी दिल करे
न पूजा की जरुरत है न पाठ की  …
मुहब्बत
रब्ब का भी दीदार है
और अपना भी  …

इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

Monday, November 4, 2013

आज पढ़ें इमरोज़ जी की लिखी कुछ उक्तियाँ  ……
(१)
आज़ाद  …
आज़ाद वह है
जो गुलाम होने से
इंकार कर सकता है …
(२)
धर्म  …
जो तुम सब के साथ चलता है
वह धर्म है
और जिसके पीछे चलना पड़े
वह धर्म नहीं होता ……
(३)
सच  …
किसी का सच
अपना सच नहीं बन सकता
अपना सच
खुद जी कर बनता है  ....
(४)
मज़हब  …
आज़ाद का आज़ाद होना ही
उसका मज़हब है
वैसे कोई भी मज़हब
आज़ाद नहीं  …
(५)
 ज्ञान  .... 
तेरा मेरा प्यार ही
ज्ञान है ज़िन्दगी का  …
(६)
आदर  .... 
न तरस करो
न रहम करो
इनमें आदर नहीं  …
(७)
स्कूल  .... 
आम स्कूल
सिर्फ जुबान सिखाते हैं
पर जीना सिखाते हैं
ज़िन्दगी के स्कूल  ....
(८)
अपना  .... 
जितनी देर मैं अपना हूँ
सब अपने हैं …।
(९)
दान  ....
 
पैसे बाँटना दान नहीं
अपना आप बाँटना दान है  …
(१० )
ख़ूबसूरती  … 
घर में तेरी-मेरी मौजूदगी
रेयर ख़ूबसूरती है
और रेयर घर की सजावट भी  …
(११)
किसी को  .... 
किसी को जानने से पहले
अपने आप को जान लो  …
(१२ )
तलवार  .... 
तलवार से
हकूमत हो सकती है
मुहब्बत नहीं  ....
(१३)
जरुरत  .... 
मैंने भगवान को
कभी नाराज नहीं किया
खुश करने की जरुरत ही नहीं  ....
(१४ )
ग्रेट  … 
हमलावर को
ग्रेट कहते जाना , लिखते जाना
इतिहास नहीं
ग्रेट गलत बयानी है  …
(१५)
भगवान  ....
इक नया ख्याल
पूज लो
चाहे जी लो  …
(१६)
मर्द  ....
मर्द अभी तक नहीं जागा
न अपना आदर करता है
न औरत का  ……
(१७)
जाल  ....
जाल को भूल जाओ
जब मछली पकड़ी गई
ग्रन्थ को भूल जाओ
जब समझ आ गई  ....
(१८)
अर्थ  .... 
यूँ ही ग्रन्थ न पढ़ो
अगर अर्थ नहीं बनता  …
(१९)
न - शब्द  .... 
प्यार सिर्फ एक
न - शब्द जुबान है
कल की हीर भी जानती थी
और आज की हीर भी जानती है   ....
(२०)
बटन पर कोट  ....

इक दीवाने ने
इक घर का दरवाज़ा खटखटाया
औरत ने दरवाज़ा खोला
तो दीवाना बोला
जी बड़ी मेहरबानी होगी
अगर आप मेरे कोट पर बटन टांक दें
औरत ने दीवाने को अंदर बुला लिया
दीवाने ने औरत को बटन पकड़ा दिया
बटन पकड़ कर औरत ने पूछा कोट किधर है ?
मेरे पास तो बटन ही है और सोच लिया था
आप इस बटन पर कोट सी देगीं
औरत सुनकर हैरान
कि बटन पर कोट कैसे सीए  …
अगर मुहब्बत औरत होती
दीवाने को देख - देख
उस के बटन पर भी कोट सी देना था
दीवाने ही रांझे होते हैं  …

इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

Wednesday, October 16, 2013

अपने आप की हीरे ….

कोई बुरी सोच आई होगी
जो सपना बनकर खत्म हो गई
तुम भी अच्छी भली और मैं भी अच्छा भला
एक हीर वारिश ने लिखकर जी ली
एक हीर हरकीरत लिखकर जी रही है
हीर होकर भी हरकीरत क्यों उदास है ?
उदासी की वजह देख कर
मैसेज भी किया सकता है स्पीड पोस्ट भी
बहुत हुआ तो किसी खाली कश्ती में
नज़्म लिखकर बहा दिया कर …
पर उदासी को ठहरने न दिया कर
जो मैं लिख रहा हूँ
तू इससेकहीं ज्यादा सयानी भी है
और प्यारी भी ….
मैंने भगवान को कभी नाराज़ नहीं किया
खुश करने की जरुरत भी नहीं पड़ी
पर तुझे खुश करने की जरुरत है
बता तू किस तरह खुश हो सकती है ?
खुश हो जाना
और बिल मुझे भेज देना….

इमरोज़ -
अनुवाद - हीर

(2)पूजा  ….



इक दिन

भगवान को पूछा

टूटे बाजारी फूलों से

किसी की पूजा हो सकती है ?

भगवान ने हँस कर कहा

तूने देखा होगा

मंदिरों में घरों में

जहाँ कहीं भी टूटे फूलों से

पूजा होती है या हो रही है

वहाँ मैं पत्थर हो जाता हूँ

न सुनता हूँ न बोलता हूँ न देखता हूँ

पर जो खुद फूल बनकर

मेरी पूजा करता है

वहाँ मैं बुत नहीं बनता

उसे देख -देख

मैं भी फूल हो जाता हूँ

प्यार हो जाता हूँ  …।

इमरोज़ -
अनुवाद - हीर


(४)
फूल …. 
 
मैं फूल देख - देख
फूल होता रहता हूँ
पूजा के रूप में
भगवान होने के लिए  … 
(5)
रब्ब  … 

रब्ब पाठ नहीं बनता
अरदास भी नहीं बनता
सिर्फ आने वाला ख्याल बनता है  …. 
(6)
भगवान  …. 

भगवान को मैंने
कभी नाराज़ नहीं किया
खुश करने की जरुरत भी नहीं हुई  …. 
(7)
पूरा अच्छा  …

पूरा अच्छा लेखक
किसी अच्छे लेखक को
कभी बुरा नहीं कहता  … 
(8)
शर्म  …. 

आदमी  रेप करता है
हमें शर्म आ जाती है
सिकंदर
मुल्कों के मुल्क
रेप करता रहा
उसे ग्रेट कहने वालों को
आज तक शर्म नहीं आई  …. 
(9)
जरुरत  … 
रांझे तख़्त हजारे के जन्म पल
जिन्हें औरत हीर दिखती है
ज़िन्दगी की खूबसूरती
बाकी के मर्द
हैरम की पैदावार
जिन्हें औरत जिस्म दिखती है
सिर्फ जिस्म की जरुरत  …. 
(10)
नया पानी  …. 
दरिया हर रोज़
नए पानी संग दरिया होता है
मज़हब भी एक दरिया था
नया पानी न मिलने के कारण
खड़ा पानी बनकर रह गया  ….
 (11)
ख्याल …
उसका ख्याल आया
बिजली सी चमकी
जंगल में भी राह दिख गया
मुझे भी और डर को भी  …. 
(12)
अपना मज़हब  …. 
मज़हब अब मज़हब नहीं रहा
ताकत बन गया है, सियासत बन गया है
अब वक़्त आ गया है
खुद
अपना मज़हब बनने का ….

इमरोज़ -
अनुवाद - हीर

Friday, October 4, 2013

 imroz ki kuchh nazmein .....
हीर भी शायरा भी  …
सोचता रहता हूँ
शायरी की कला भी
जीने की कला भी
खूबसूरत जीने की कला हो जाये
सोचें
सोच भी हो जाती हैं
 अपनी इस सोच को
सच होते मैंने भी देख लिया है
और सबने भी
इक खूबसूरत शायरा को जब मुहब्बत हुई
उसकी शायरी और खूबसूरत हो गई
और उसकी ज़िन्दगी
उसकी शायरी से भी खूबसूरत ….
मुहब्बत संग
कोई भी हीर हो सकती है
कोई भी शायरी भी  …।
(२)
मानता ……………
समझ, समझ के बनती है
पर मानता बगैर समझे ही बन जाती है मानता
लोग मानता के साथ ही
काम चला रहे हैं
मज़हब चला रहे हैं
ज़िन्दगी चला रहे हैं
और अपना आप भी  …
………………
(३)
दरिया ….
रोज नए पानी से
दरिया होता है
मज़हब भी दरिया था
नया पानी न मिलने के कारण
खड़ा पानी ही रह गया  ….
……………….
(४)
………………
मर्जी की मर्जी  ……
मैं सोहनी हूँ
सोहनी से सोहनी
मुझे मनचाहे की तलाश है
मास्टरपीस बनने की तलाश नहीं
 दुनिया के सारे मास्टरपीस
दीवारों से टंगे हुए हैं सब स्टिललाइज
मैंने खिला फूल बनना है
हमेशा रहने वाला पेटिंड फूल नहीं
मैं सोहनी हूँ
सोहनी से सोहनी
हर दरिया हर रोक
पार करूँ अपने आप संग
कच्चे घड़े के संग भी और पक्के घड़े के संग भी  …

(५)
पेंटिंग के बीच की लड़की……
इक दिन
पेंटिंग के बीच की लड़की
रंगों से बाहर आकर
एक नज़्म के ख्यालों को
देखने लगी
देख देख उसे
अच्छा लगा ख्यालों को रंग देना भी
और ख्यालों से रंग लेना भी
ख्यालों ने देखती हुई लड़की से पूछा
तू बता पेंटिंग के रंगों में
क्या - क्या बनकर देखा
मैंने मुस्कराहट बनकर देखा
पर हँस कर नहीं
मैंने  खड़े होकर देखा है रंगों में
पर चलकर नहीं ….

……………………
मज़हब और ईश्वरवाद
कोई जरुरी नहीं  …
अपना सच
और अपनी मर्ज़ी जरुरी है  …
……………….
मुहब्बत ही तो
ज़िन्दगी भी महबूबा है  …
………………
रब्ब को सोचा
नया ख्याल आ गया  …
……………
लोग पुराने नहीं होते
ख्याल पुराने होते हैं  …
…………
हर रात कल हो जाती है
हर सबेर आज भी
और कल भी  ….
…………
उसका ख्याल आया
बिजली चमकी
जंगल में भी राह दिख गई
मुझे भी और डर  को भी  ….
…………….
कहते हैं
मानता जड़ हो गई
पर न कभी कोई नया पत्ता लगा
न फूल  …
…………
भगवान रोज़
आज हो जाता है
पर लोग पता नहीं
कल को ही
क्यों दोहराते रहते हैं …….
…………
मज़हब अब मज़हब नहीं रहा
ताकत बन गया है
सियासत बन गया है
अब वक़्त आ गया है
खुद
अपना मज़हब बनने का  ….
……………….
मेरा दिल करता है
फूल- फूल होकर
खुशबू बन जाऊं
खुशबू होकर अक्षर
अक्षर-अक्षर होकर
नज़्म
नज़्म-नज़्म होकर
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी-ज़िन्दगी होकर
प्यार
और प्यार-प्यार होकर
जीना आ जाये
जैसा मेरा जी करता है …
…………….
कभी-कभी
खाली सोच की तरह
जिधर भी दिल करे
चलता-फिरता रहता हूँ
हालांकि
जिसे मिलना था वह तो मैं खुद ही हूँ ……
……………….
हीर बने बिना
हीर समझ नहीं आती ……
जितनी देर लोग
अर्थ नहीं बनते
शब्दों का काम खत्म नहीं होगा  ….

………………….
रंग भी नहीं होते
कैनवास धरती नहीं होती
लाइफ धरती है
और कैनवास सिर्फ स्टिल लाइफ ….
……………

इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत 'हीर'

Sunday, September 8, 2013

इमरोज़ की नज्में  ……

ज़िंदा पूजा  …
फूल टूटा और फूल मर गया
सब जानते हैं
और नहीं भी जानते
एक दिन
मैंने  को पूछा
टूटे बाजारी फूलों के साथ
किसी ज़िंदा की पूजा हो सकती है ?
भगवान ने हँस कर कहा
तुमने देखा होगा
मंदिर में और कहीं भी
टूटे बाजारी फूलों से
पूजा होती है और हो रही है
वहां मैं पत्थर का हो जाता हूँ
न कुछ सुनता हूँ न कुछ बोलता हूँ
न देखता हूँ
और जो खुद फूल बनकर
मेरी पूजा करता  है
वहां मैं बुत नहीं बनता
वहां मैं महक - महक
पूजा करने वाले को देखता भी हूँ
और सुनता भी हूँ  ….
(२)
खामोश  ….
रंग भी खामोश और कैनवास भी
तो र खामोश पेंटिंग ही बनती है
मोनालिसा की खामोश मुस्कराहट
खूबसूरत है बहुत खूबसूरत
पर शब्द
न ख़ामोशी देख सकते
न ही पढ़ सकते  ….
मुहब्बत भी खामोश और ज़िक्र भी
मुहब्बत सिर्फ ज़िन्दगी बनती है
न लिखत बनती है न बोल  …
पोइट्री भी खामोश और पहचान भी
नज्में बहुत
पर किसी किसी के नज़र में ही
पोइट्री चमकती  है  …
(३)
सात चक्कर  …
 
घर में आती अखबार के
सन्डे एडिशन में लेखकों का कालम पढ़ा
मुझे अपनी नज्मों की किताब के लिए
नई तरह का कवर डिजाइन चाहिए था
अपने एक वाकिफ आर्टिस्ट को पूछा
कोई नई तरह का है आर्टिस्ट पोइट्री जैसा
कहने लगा - 'है '
और फोन करके वह नई तरह का आर्टिस्ट आ गया
सचमुच नई तरह का था देखने में  भी बोलने में  भी
न मैं उसे देख फार्मल हुई न वह मुझे देख
नई तरह का कवर डिजाइन मेरी पसंद का बन गया
और नई तरह का आर्टिस्ट भी मेरी पसंद बन गया
मिलने लगा फोन करने लगे
इक दिन उसने आकर कहा अब बस पर नहीं
आज से स्कूटर पर रेडिओ स्टेशन जाया करेंगे
मैं सुनकर बोली इतनी देर से क्यों मिले हो ?
क्या करता जवानी भी देर से आई और पैसे भी
जब से तुम्हें बस पर जाते देखा है
स्कूटर के लिए पैसे जोड़ता रहा
मैं बोली अब तुम मेरी शाम का फूल हो
शाम भी खिलती रहेगी और रात भी महकती
वह रोज़ शाम को मुझे रेडिओ स्टेशन ले भी जाता और ले भी आता
मैं उसके पीछे बैठ कर
उसकी पीठ पर जो जी चाहता लिखती रहती
कभी कोई नया ख्याल कभी कोई नया शेर  ….
वह मुझसे छोटा था
पर मुझसे पहले ही मेरे साथ सीरियस
होता जा रहा था
एक दिन जब हम दोनों ही कमरे में थे
मैंने उससे कहा तू पहले दुनिया देख आ
दुनिया देखकर अगर फिर भी तुम्हें मेरी जरुरत हुई
फिर ठीक है जो कहोगे करूंगी  …
वह उठा उसने सात चक्कर लगाये और बोला
मैं दुनिया देख आया हूँ
यह सुनकर मैं उसे देखती रह गई
मेरे ही सात चक्कर लगा
वह मेरे बराबर का भी हो गया था
और ज़िन्दगी के बराबर का भी  …
यह कालम पढ़ के
मैं कितनी देर अपने आप को सोचता ही रहा
और देखता भी रहा
मेरे रंगों में मेरी औरत भी
मेरी न बन पाई
और आर्टिस्ट के रंगों में
वह मेरी औरत आर्टिस्ट की
मनचाही हो गई
मैं ही मिसमैच हूँ और अपने आप में गैर हाजिर भी
मैच सिर्फ आर्टिस्ट है
आर्टिस्ट जैसा कोई कम ही होगा इतना खूबसूरत
लेखकों को और आर्टिस्टों को भी हाजिरी देख देख
दोनों की खूबसूरती देख देख
मैं मिसमैच भी खूबसूरत होकर
जा रहा हूँ अपने आपको साथ लेकर भी
अलविदा  ….
- इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

Tuesday, September 3, 2013

इमरोज़ की कुछ नज्मों का अनुवाद  ….

(१)

हाजिर हो कर  …

जब भी मेरा दिल करता है
भगवान से मिलने का
भगवान मुझे धरती पर
हाजिर दिखने लगता है
और मैं हाजिर हो कर
हाजिर से मिल लेता हूँ
हाजिर को हाजिर हो कर
सब मिल जाता है
जो बताया नहीं जा सकता
हाजिर हो कर
जाना जा सकता है  …
(२)
आज जीने के लिए  …
पेंटेड मास्टरपीस
मियुजियम के लिए  होते हैं
कल को देखने के लिए जानने के लिए
मुहब्बत ही सिर्फ
ज़िंदा मास्टरपीस ज़िन्दगी के लिए होती है
आज को जीने के लिए हर रोज़  …
(३)
ज़िन्दगी के बराबर   ….
कुछ दिनों की मैं उस को
देख - देख सोच रही हूँ
वह छोटा - छोटा लग रहा था , वैसे ही
उस ने ज़िन्दगी में  मुझ जैसा
कुछ देखा नहीं था
इक दिन मैं घर में भी और कमरे में भी
अकेली थी
उसे पास बिठा कर कहा
तुम भी दुनिया देख आओ
अगर फिर भी तुझे मेरी जरुरत हुई
तो फिर ठीक है तुम जो भी कहोगे
मुझे देख कर मेरे बोल सुन कर कर
वह उठा
उस ने मेरे सात चक्कर लगाये
और आकर हँसता - हँसता
मेरे पास बैठ गया , बोला -
देख ले मैं दुनिया देख आया हूँ
यही दुनिया थी मेरे देखने लायक
मैं उसे देख - देख उसके हँसते- हँसते
बोलों को देख सुन  हैरान रह गई
वह  छोटा नहीं था
वह तो मेरे ही सात चक्कर लगा कर
मेरे बराबर का भी हो गया है
और ज़िन्दगी के बराबर का भी  …

(४)
खामोश मुहब्बत  …
मैंने जब अपने आपको
फूल सोचा था उसे खुशबू सोच लिया था
पर  …
किसी के साथ चल कर भी देखा
किसी के साथ फूल बनकर भी देखा
किसी के साथ शायरी करके भी देखी
किसी को न अपने साथ
जागना आता है न औरत के साथ  …
मैं तो कब की खामोश
फूल बनी खुशबू को उडीक रही हूँ
आज मेरी उडीक ने
इक नज़र पढ़ ली है
उसकी जो है
जो हवाओं को पूछता है
मैं भी तुम्हारी तरह आज़ाद और अदृश्य
रहना चाहता हूँ
हवाओं ने कहा
खामोश मुहब्बत कर ले
किसके साथ
जो भी अच्छा लगे
अभी तो अपना आप ही मुझे अच्छा लगता है
जब कोई अच्छी लगी
फिर खामोश मुहब्बत भी कर लूंगा
मैं आज उसे मिलने जा रही हूँ  …
( ५ )
हर रोज़  …
 फूल हो के
उगते सूरज के साथ जागता हूँ
खिलता हूँ
और कितनी ही देर महक कर
खुशबू हवाओं के हवाले कर
अपने रंगों के साथ हँसता हूँ खेलता हूँ
और शाम को सूरज के साथ
रंगों के साथ मिलकर
अपना फूल होना
पूरा कर लेता हूँ  …
(६)
जो दिल करे  …
कोई भी मजहब
जो भी दिल करे करने की छूट नहीं देता
पर लोग जो भी दिल करे
करना चाहते हैं कर रहे हैं
और मजहब जो भी करे करने वालों को
रोक नहीं पा रहे रोक भी नहीं रहे
लोग जब भी दिल करता है
झूठ बोल लेते हैं
किसी को लूटने का दिल करे
लूट लेते हैं
किसी को रेप करने का दिल करे
गैंग रेप कर लेते हैं
और मिलकर क़त्ल भी कर लेते हैं
आसमान से रब्ब क्या देख सकता है
मजहब तो जमीन से भी न देख रहा है
न रोक रहा है
अपने लोगों को अपना निरादर
कर रहे लोगों को
कुछ समझ नहीं आ रहा किसी को
क्या लोग अभी मजहब
के काबिल नहीं या  मजहब अभी लोगों के
काबिल नहीं   …

इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

Saturday, August 17, 2013

इमरोज़ की कुछ और कविताओं का अनुवाद ….
(१)
अधिकार …

सिर्फ
आज़ादी ही
हमारा जन्म-सिद्ध
अधिकार नहीं
मनचाही ज़िन्दगी भी
हमारा जन्म- सिद्ध
अधिकार है …. !!

-इमरोज़ ,
अनुवाद - हरकीरत हीर
(२)
 बोलती आँखें ….
कुछ दिनों से
जब भी मैं उससे मिलता
वह मुझे सोचती - सोचती
देखती रहती
कभी हैरानी से भी देखती
कभी मुस्कुरा कर भी
इक दिन मुझे सामने बैठा कर
कहने लगी …
पहले तुम दुनिया देख आओ
फिर जो भी तुम कहोगे
मंज़ूर ….
मैं इन्तजार करुँगी
जितने दिन भी करना पड़ा
उसके सामने से उठ कर
मैंने उसके सात चक्कर लगाये
और हँसते - हँसते  उसे कहा
देख ! मैं दुनिया देख आया हूँ
वैसे जिसे देखने की कोई जरुरत नहीं थी
अपनी तरह दुनिया देख आये को हँसते  को
मुस्कुराती हैरानी से देखती
वह भी हँस पड़ी
और उसकी बोलती चमकती आँखों में अब
इन्तजार की जरुरत भी खत्म हो गई थी ….

-इमरोज़ ,
अनुवाद - हरकीरत हीर
(३)
एक बार फिर …. 
सवेरे सवेरे
तुम्हारे साथ सवेर कर रहा था
कि मोबाइल से इशारा हुआ
कि पैसे खत्म हो गए हैं
कैसे इत्तिफ़ाक हैं कि संस्कार भी
कभी मोबाईल से पैसे खत्म हो जाते हैं
तो कभी रिश्तों में से रिश्ते
इक दो ईदों से
ईद नहीं होगी
जितने वक़्त मनचाही ज़िन्दगी
हमारा जन्म सिद्ध अधिकार नहीं बनता
ईदें मनचाही नहीं होंगी
मनचाहे रिश्तों के रोज़े
क्या पता कब खत्म हों या न हों
ख्यालों के चाँद
और नज्मों की ईदें ही अब तो
अपनी मनचाही ईदें हैं …
चल आ
बच्चों की तरह मासूम बन
इक बार फिर
फूलों में दौड़ - दौड़ कर खिल - खिल कर
और खुशबूओं संग उड़ -उड़ कर हँसे
सभी अनचाहे रिश्तों से अनचाहे संस्कारों से
और अनचाहे रोजों से बेफिक्र होकर
तितलियों की तरह बेफिक्रों की तरह ….

-इमरोज़ ,
अनुवाद - हरकीरत हीर

(४)
रूह जिस्म में
नहीं होती
रूह प्यार में होती है


----------------------------
रब्ब कहीं न कहीं है
पर समाज कहीं भी नहीं ….

---------------------------------
पाप जिस्म नहीं करता
सोच करती है
गंगा जिस्म धोती है
सोच नहीं …

……………………….
पटरियों पर
मज़हब चलते हैं
दरिया नहीं ….

------------------------
मनचाहे ही
अपने आप को
जानते हैं
संस्कार नहीं ….

------------------
(५)
मर्जी … 
कोई नज़र में है
अभी तो अपना आप ही
नज़र में है
और अपना आप
अपनी मर्जी का बन रहा है
कितना नया ख्याल है
और कितना जरुरी भी
किस तरह मिलोगी
जैसे आज मिल रही हूँ
तेरा नाम
मर्जी ….
----------------

ख्याल ….

तुम क्या कर रही हो
ख्यालों को रंग दे रही हूँ
और ख्यालों से रंग
ले भी रही हूँ
क्या खूब देना - लेना है
कब मिलोगी
जिस दिन नया ख्याल मिल जाएगा
 तुम्हारा नाम … ?
ख्याल ….

-इमरोज़ ,
अनुवाद - हरकीरत हीर