Sunday, September 8, 2013

इमरोज़ की नज्में  ……

ज़िंदा पूजा  …
फूल टूटा और फूल मर गया
सब जानते हैं
और नहीं भी जानते
एक दिन
मैंने  को पूछा
टूटे बाजारी फूलों के साथ
किसी ज़िंदा की पूजा हो सकती है ?
भगवान ने हँस कर कहा
तुमने देखा होगा
मंदिर में और कहीं भी
टूटे बाजारी फूलों से
पूजा होती है और हो रही है
वहां मैं पत्थर का हो जाता हूँ
न कुछ सुनता हूँ न कुछ बोलता हूँ
न देखता हूँ
और जो खुद फूल बनकर
मेरी पूजा करता  है
वहां मैं बुत नहीं बनता
वहां मैं महक - महक
पूजा करने वाले को देखता भी हूँ
और सुनता भी हूँ  ….
(२)
खामोश  ….
रंग भी खामोश और कैनवास भी
तो र खामोश पेंटिंग ही बनती है
मोनालिसा की खामोश मुस्कराहट
खूबसूरत है बहुत खूबसूरत
पर शब्द
न ख़ामोशी देख सकते
न ही पढ़ सकते  ….
मुहब्बत भी खामोश और ज़िक्र भी
मुहब्बत सिर्फ ज़िन्दगी बनती है
न लिखत बनती है न बोल  …
पोइट्री भी खामोश और पहचान भी
नज्में बहुत
पर किसी किसी के नज़र में ही
पोइट्री चमकती  है  …
(३)
सात चक्कर  …
 
घर में आती अखबार के
सन्डे एडिशन में लेखकों का कालम पढ़ा
मुझे अपनी नज्मों की किताब के लिए
नई तरह का कवर डिजाइन चाहिए था
अपने एक वाकिफ आर्टिस्ट को पूछा
कोई नई तरह का है आर्टिस्ट पोइट्री जैसा
कहने लगा - 'है '
और फोन करके वह नई तरह का आर्टिस्ट आ गया
सचमुच नई तरह का था देखने में  भी बोलने में  भी
न मैं उसे देख फार्मल हुई न वह मुझे देख
नई तरह का कवर डिजाइन मेरी पसंद का बन गया
और नई तरह का आर्टिस्ट भी मेरी पसंद बन गया
मिलने लगा फोन करने लगे
इक दिन उसने आकर कहा अब बस पर नहीं
आज से स्कूटर पर रेडिओ स्टेशन जाया करेंगे
मैं सुनकर बोली इतनी देर से क्यों मिले हो ?
क्या करता जवानी भी देर से आई और पैसे भी
जब से तुम्हें बस पर जाते देखा है
स्कूटर के लिए पैसे जोड़ता रहा
मैं बोली अब तुम मेरी शाम का फूल हो
शाम भी खिलती रहेगी और रात भी महकती
वह रोज़ शाम को मुझे रेडिओ स्टेशन ले भी जाता और ले भी आता
मैं उसके पीछे बैठ कर
उसकी पीठ पर जो जी चाहता लिखती रहती
कभी कोई नया ख्याल कभी कोई नया शेर  ….
वह मुझसे छोटा था
पर मुझसे पहले ही मेरे साथ सीरियस
होता जा रहा था
एक दिन जब हम दोनों ही कमरे में थे
मैंने उससे कहा तू पहले दुनिया देख आ
दुनिया देखकर अगर फिर भी तुम्हें मेरी जरुरत हुई
फिर ठीक है जो कहोगे करूंगी  …
वह उठा उसने सात चक्कर लगाये और बोला
मैं दुनिया देख आया हूँ
यह सुनकर मैं उसे देखती रह गई
मेरे ही सात चक्कर लगा
वह मेरे बराबर का भी हो गया था
और ज़िन्दगी के बराबर का भी  …
यह कालम पढ़ के
मैं कितनी देर अपने आप को सोचता ही रहा
और देखता भी रहा
मेरे रंगों में मेरी औरत भी
मेरी न बन पाई
और आर्टिस्ट के रंगों में
वह मेरी औरत आर्टिस्ट की
मनचाही हो गई
मैं ही मिसमैच हूँ और अपने आप में गैर हाजिर भी
मैच सिर्फ आर्टिस्ट है
आर्टिस्ट जैसा कोई कम ही होगा इतना खूबसूरत
लेखकों को और आर्टिस्टों को भी हाजिरी देख देख
दोनों की खूबसूरती देख देख
मैं मिसमैच भी खूबसूरत होकर
जा रहा हूँ अपने आपको साथ लेकर भी
अलविदा  ….
- इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

Tuesday, September 3, 2013

इमरोज़ की कुछ नज्मों का अनुवाद  ….

(१)

हाजिर हो कर  …

जब भी मेरा दिल करता है
भगवान से मिलने का
भगवान मुझे धरती पर
हाजिर दिखने लगता है
और मैं हाजिर हो कर
हाजिर से मिल लेता हूँ
हाजिर को हाजिर हो कर
सब मिल जाता है
जो बताया नहीं जा सकता
हाजिर हो कर
जाना जा सकता है  …
(२)
आज जीने के लिए  …
पेंटेड मास्टरपीस
मियुजियम के लिए  होते हैं
कल को देखने के लिए जानने के लिए
मुहब्बत ही सिर्फ
ज़िंदा मास्टरपीस ज़िन्दगी के लिए होती है
आज को जीने के लिए हर रोज़  …
(३)
ज़िन्दगी के बराबर   ….
कुछ दिनों की मैं उस को
देख - देख सोच रही हूँ
वह छोटा - छोटा लग रहा था , वैसे ही
उस ने ज़िन्दगी में  मुझ जैसा
कुछ देखा नहीं था
इक दिन मैं घर में भी और कमरे में भी
अकेली थी
उसे पास बिठा कर कहा
तुम भी दुनिया देख आओ
अगर फिर भी तुझे मेरी जरुरत हुई
तो फिर ठीक है तुम जो भी कहोगे
मुझे देख कर मेरे बोल सुन कर कर
वह उठा
उस ने मेरे सात चक्कर लगाये
और आकर हँसता - हँसता
मेरे पास बैठ गया , बोला -
देख ले मैं दुनिया देख आया हूँ
यही दुनिया थी मेरे देखने लायक
मैं उसे देख - देख उसके हँसते- हँसते
बोलों को देख सुन  हैरान रह गई
वह  छोटा नहीं था
वह तो मेरे ही सात चक्कर लगा कर
मेरे बराबर का भी हो गया है
और ज़िन्दगी के बराबर का भी  …

(४)
खामोश मुहब्बत  …
मैंने जब अपने आपको
फूल सोचा था उसे खुशबू सोच लिया था
पर  …
किसी के साथ चल कर भी देखा
किसी के साथ फूल बनकर भी देखा
किसी के साथ शायरी करके भी देखी
किसी को न अपने साथ
जागना आता है न औरत के साथ  …
मैं तो कब की खामोश
फूल बनी खुशबू को उडीक रही हूँ
आज मेरी उडीक ने
इक नज़र पढ़ ली है
उसकी जो है
जो हवाओं को पूछता है
मैं भी तुम्हारी तरह आज़ाद और अदृश्य
रहना चाहता हूँ
हवाओं ने कहा
खामोश मुहब्बत कर ले
किसके साथ
जो भी अच्छा लगे
अभी तो अपना आप ही मुझे अच्छा लगता है
जब कोई अच्छी लगी
फिर खामोश मुहब्बत भी कर लूंगा
मैं आज उसे मिलने जा रही हूँ  …
( ५ )
हर रोज़  …
 फूल हो के
उगते सूरज के साथ जागता हूँ
खिलता हूँ
और कितनी ही देर महक कर
खुशबू हवाओं के हवाले कर
अपने रंगों के साथ हँसता हूँ खेलता हूँ
और शाम को सूरज के साथ
रंगों के साथ मिलकर
अपना फूल होना
पूरा कर लेता हूँ  …
(६)
जो दिल करे  …
कोई भी मजहब
जो भी दिल करे करने की छूट नहीं देता
पर लोग जो भी दिल करे
करना चाहते हैं कर रहे हैं
और मजहब जो भी करे करने वालों को
रोक नहीं पा रहे रोक भी नहीं रहे
लोग जब भी दिल करता है
झूठ बोल लेते हैं
किसी को लूटने का दिल करे
लूट लेते हैं
किसी को रेप करने का दिल करे
गैंग रेप कर लेते हैं
और मिलकर क़त्ल भी कर लेते हैं
आसमान से रब्ब क्या देख सकता है
मजहब तो जमीन से भी न देख रहा है
न रोक रहा है
अपने लोगों को अपना निरादर
कर रहे लोगों को
कुछ समझ नहीं आ रहा किसी को
क्या लोग अभी मजहब
के काबिल नहीं या  मजहब अभी लोगों के
काबिल नहीं   …

इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

Saturday, August 17, 2013

इमरोज़ की कुछ और कविताओं का अनुवाद ….
(१)
अधिकार …

सिर्फ
आज़ादी ही
हमारा जन्म-सिद्ध
अधिकार नहीं
मनचाही ज़िन्दगी भी
हमारा जन्म- सिद्ध
अधिकार है …. !!

-इमरोज़ ,
अनुवाद - हरकीरत हीर
(२)
 बोलती आँखें ….
कुछ दिनों से
जब भी मैं उससे मिलता
वह मुझे सोचती - सोचती
देखती रहती
कभी हैरानी से भी देखती
कभी मुस्कुरा कर भी
इक दिन मुझे सामने बैठा कर
कहने लगी …
पहले तुम दुनिया देख आओ
फिर जो भी तुम कहोगे
मंज़ूर ….
मैं इन्तजार करुँगी
जितने दिन भी करना पड़ा
उसके सामने से उठ कर
मैंने उसके सात चक्कर लगाये
और हँसते - हँसते  उसे कहा
देख ! मैं दुनिया देख आया हूँ
वैसे जिसे देखने की कोई जरुरत नहीं थी
अपनी तरह दुनिया देख आये को हँसते  को
मुस्कुराती हैरानी से देखती
वह भी हँस पड़ी
और उसकी बोलती चमकती आँखों में अब
इन्तजार की जरुरत भी खत्म हो गई थी ….

-इमरोज़ ,
अनुवाद - हरकीरत हीर
(३)
एक बार फिर …. 
सवेरे सवेरे
तुम्हारे साथ सवेर कर रहा था
कि मोबाइल से इशारा हुआ
कि पैसे खत्म हो गए हैं
कैसे इत्तिफ़ाक हैं कि संस्कार भी
कभी मोबाईल से पैसे खत्म हो जाते हैं
तो कभी रिश्तों में से रिश्ते
इक दो ईदों से
ईद नहीं होगी
जितने वक़्त मनचाही ज़िन्दगी
हमारा जन्म सिद्ध अधिकार नहीं बनता
ईदें मनचाही नहीं होंगी
मनचाहे रिश्तों के रोज़े
क्या पता कब खत्म हों या न हों
ख्यालों के चाँद
और नज्मों की ईदें ही अब तो
अपनी मनचाही ईदें हैं …
चल आ
बच्चों की तरह मासूम बन
इक बार फिर
फूलों में दौड़ - दौड़ कर खिल - खिल कर
और खुशबूओं संग उड़ -उड़ कर हँसे
सभी अनचाहे रिश्तों से अनचाहे संस्कारों से
और अनचाहे रोजों से बेफिक्र होकर
तितलियों की तरह बेफिक्रों की तरह ….

-इमरोज़ ,
अनुवाद - हरकीरत हीर

(४)
रूह जिस्म में
नहीं होती
रूह प्यार में होती है


----------------------------
रब्ब कहीं न कहीं है
पर समाज कहीं भी नहीं ….

---------------------------------
पाप जिस्म नहीं करता
सोच करती है
गंगा जिस्म धोती है
सोच नहीं …

……………………….
पटरियों पर
मज़हब चलते हैं
दरिया नहीं ….

------------------------
मनचाहे ही
अपने आप को
जानते हैं
संस्कार नहीं ….

------------------
(५)
मर्जी … 
कोई नज़र में है
अभी तो अपना आप ही
नज़र में है
और अपना आप
अपनी मर्जी का बन रहा है
कितना नया ख्याल है
और कितना जरुरी भी
किस तरह मिलोगी
जैसे आज मिल रही हूँ
तेरा नाम
मर्जी ….
----------------

ख्याल ….

तुम क्या कर रही हो
ख्यालों को रंग दे रही हूँ
और ख्यालों से रंग
ले भी रही हूँ
क्या खूब देना - लेना है
कब मिलोगी
जिस दिन नया ख्याल मिल जाएगा
 तुम्हारा नाम … ?
ख्याल ….

-इमरोज़ ,
अनुवाद - हरकीरत हीर

Wednesday, July 31, 2013

इमरोज़ जी की कुछ और नज्में … 



जी रहे फूलों के संग …

फूल तोड़ा फूल मर गया
घरों में मदिरों में टूटे फूलों संग
पूजा होती आ रही है और आज भी हो रही है
किसी को भी कभी जीते फूलों संग पूजा करने की
न कभी सोच आई है न ख्याल
राम कृष्ण एक बार एक मंदिर का पुजारी बना था
उस मंदिर में भी टूटे फूलों संग पूजा होती आ रही थी
पर राम कृष्ण ने टूटे फूलों संग पूजा नहीं की
कितने ही दिन मंदिर में कोई पूजा न हुई
लोगों ने मंदिर के मालिक को शिकायत की
मंदिर के मालिक ने राम कृष्ण से कारण पूछा
राम कृष्ण ने कहा टूटे हुए फूलों से कोई पूजा नहीं हो सकती
मंदिर के मालिक को राम कृष्ण समझ आ गया
एक दिन राम कृष्ण मंदिर के बाहर बैठा मंदिर के अहाते
में लगे फूलों के पौधे देख रहा था , देखते हुए लगा
कि पौधे भी उसे देख रहे हैं ,फूलों का देखना देख
राम कृष्ण को अपनी मर्ज़ी की पूजा दिख गई
राम कृष्ण की मनचाही पूजा शुरू हो गई
जब देवता  को फूल चढाने का वक़्त आया
मंदिर की खिड़की से दिखते फूलों के पौधों को देखकर
पौधों के फूल पौधों समेत राम कृष्ण ने हाथ जोड़कर
देवता से कहकर देवता को चढा दिए
पौधों समेत पौधों के फूल देवता को चढ़े , देवता ने भी पहली बार
बंद आँखों संग भी देखे
पूजा ने भी पहली बार जी रहे फूलों संग पूजा करके देखी
और जी कर भी …
अब यह अपनी तरह की पहली पूजा
हर रोज़ हो रही है पौधों के फूलों की हाजिरी में
और राम कृष्ण की हाजिरी में भी ….


इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

(२ )

आसमान मैला नहीं ….

एक विद्द्वान को किसी ने पूछा
अच्छे -अच्छे लेखक एक दुसरे के बारे
बुरा लिखते रहते हैं बुरा सोचते रहते हैं
विद्द्वान ने कहा - इन
लिखने वालों को
अभी लिखना ही आया है
जीना नहीं आया
जिस दिन जीना आ जाएगा
कोई भी बुरा जीना नहीं चाहेगा
न बुरा लिखकर न बुरा बोलकर
अभी सोच साफ़ नहीं
जब सोच साफ़ हो जाएगी
सोच आसमान हो जाएगी
और आसमान कभी भी मैला नहीं होता ….



इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

(३ )

कुछ बोल …

आज उसे मिल रही थी
कई सालों बाद
सैर करते चुपचाप
देख -देख चलते जा रहे थे
इक  जगह रूककर
मैंने कहा - कुछ बोल
कहने लगा मैं रौशनी में नहीं बोल सकता
यह फिकरा सुनते मुझे उम्र
हो चली है
गुस्से में मेरा दिल किया
सूरज को पकड़कर बुझा दूँ …
न वह कभी कुछ बोला
न मैं सूरज बुझा पाई  ….
अब अँधेरा हो चुका है
पर बोलने वाला ही न रहा ….


इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

(४ )


देखा नहीं …
कल मैं आया था
तू कहीं भी नहीं मिली
न राह में
न गली में
न दरवाजे पर
न माँ के कमरे में
न अपने कमरे में
न रसोई में
न आँगन में .
न कुएँ पर
न ही दरिया पर
 तुम कहाँ थी ?
जहाँ तूने देखा नहीं
अपने आप में देखता
तो मैं दिख जाती  ….


इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर


Tuesday, July 30, 2013

मोनालिसा की जगह …

आर्ट स्कूल में
एक दिन हमारी सारी  क्लास
 नैशनल मियुजियम में
पेंटिंग के मास्टर पीस
स्डीज कर रही थी
मोनालिसा की मुस्कराहट देखकर
एक स्टूडेंट ने टीचर को  लिया
सर यह मुस्कराहट कभी हँसती नहीं ?
यह पेंटिड मुस्कराहट है
यह जवाब सुनकर मोनालिसा की जगह
साड़ी क्लास हँस पड़ी …

(२)

पेंटिंग …

ज़िन्दगी की पेंटिग
पता नहीं कब की बनती
आ रही है
पर अभी तक पूरी नहीं हुई
नए - नए हाथों के साथ
नए रंगों के साथ
यह पेंटिंग बन रही है
बनती जा रही है
न कभी ज़िन्दगी ने पूरा होना है
 और न ही ज़िन्दगी की पेंटिंग ने
पूरा होना है
बनती रहना ही
इसका पूरा होना है - जीते रहना है
मुहब्बत की तरह …

इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

(3)

फूल बन ….

फूल तोड़ा
फूल मर गया
तोड़ने वाला नहीं मरा
पर बचा भी नहीं
वह कभी फूल नहीं बनेगा  ….

(४)

मुहब्बत की हीर …
मुहब्बत से कोई रांझा हो सकता है
कला से कोई शायर
पर कला से कोई रांझा नहीं हो सकता
शायर की नज्में
शायर की शायरी क्यों नहीं बनती
शायर की ज़िन्दगी
ज़िन्दगी की खूबसूरती
शायर की कला ही है शायरी लिखने की
सोचता रहता हूँ कि किसी तरह
शायरी की कला भी
जीने की कला खूबसूरत जीने की कला हो जाये
सोच सच भी तो हो जाती है …
इक बार अपनी इस सोच को
सच होते मैंने भी देखा है और सब ने भी
इक खूबसूरत शायरा को जब मुहब्बत हुई
उस की शायरी और खूबसूरत हो गई
और उसकी ज़िन्दगी उसकी शायरी से भी खूबसूरत ….
मुहब्बत  के साथ कोई हीर भी हो सकती है
और शायरा भी …

इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर 

(५)

लाइल्टी ….

किसी भी क्रिमनल वकील को
पूछकर देख लो
कि तुम्हारी लाइल्टी किसके साथ होती है ?
हमारी लाइल्टी  हमारे क्लाइंट के साथ होती है
सभी तरह के कातिल
उनके क्लाइंट होते हैं
सब तरह के कातिल ही
इन वकीलों को करोड़पति बना रहे हैं …
हैं कुछ वकील
जिनकी लाइल्टी आम लोगों के साथ भी है
और इन्साफ के साथ भी …

(६ )

बीबा - 'खामोश चीखां ' को अब हिंदी में छाप लेना
पंजाबी में फिर छापने की जरूरत नहीं
कुछ मात्राएँ ठीक नहीं यह ख़ास बात नहीं
नज्में ठीक हैं यही ख़ास है
जिसने सबसे पहले तेरी किताब पढ़कर
तुझे लिखा था वह पंजाबी पढ़ाती है
टीचर है उसे पहले स्पेलिंग दिखे
कविता बाद में …
जिसने कविता पढ़ी उसे बहुत अच्छी लगी
जिसने स्पेलिंग पढ़े टीचर हैं
टीचरों को मत सोच
तू कविता है कविता को सोच
कविता को जी …
कहीं 'चीखां' बोलते हैं तो कहीं 'चीकां '
तेरे ख़त में 'चीखां' ही थीं -
क्योंकि चीखां वाले इलाके में ही तू
जन्मी पली है - टीचर ही
गलतियों पर शोर मचा रहे हैं
कविता पढ़ने वाले नहीं
कम पैसे लेकर छापने वाले अच्छा नहीं छाप सकेंगे
किसी की बातों में आकर पैसे न गवा लेना
खराब छप गई किसी ने जिम्मेवारी नहीं लेनी
किताब भी और ड्राइंग भी तुझे रजिस्ट्री कर दी हैं
हिंदी में छापने के लिए ….
मैं अमृता को 'है ' लिखता हूँ टीचर 'थी' लिखते हैं
टीचरों को कभी मुहब्बत समझ नहीं आई
न कभी कविता ….
.
इमरोज़ ….

Wednesday, July 10, 2013

इमरोज़ जी की कुछ और कविताओं का अनुवाद .......!

इक जरा सी समझ ...


हीर को जब मुहब्बत हुई
घर के लोगों को समझ नहीं आई
और चाचे को तो कबूल ही नहीं हुई
मुहब्बत में और खूबसूरत हो जाते हैं
हीर भी और खुबसूरत हो गई थी
मुहब्बत की खूबसूरती देख-देख कर
कइयों की खूबसूरती जाग जाती है
वे भी खूबसूरत होने लग पड़ते हैं ...
पर कई ...
मुहब्बत की खूबसूरती देख बुझ जाते हैं
जैसे हीर का चाचा बुझ कर चाचा ही न रहा
कैदो हो गया ...
वैसे हीर का चाचा ही हीर की मुहब्बत देख
बुझ कर कैदो नहीं हुआ ...
जिस घर में भी हीर जन्म लेती है अनचाहे
माँ - बाप को मुहब्बत कबूल नहीं होती
उस के माँ- बाप भी हीर के चाचे की तरह
बुझ कर कैदो हो जाते हैं .....
आँखों को देखना आता है
देख कर समझना नहीं
आम लोगों को जो दिखता है
वह समझ नहीं आता
यह लोग ही हमारा समाज हैं
जिस दिन भी लोगों को यह सब जागना बुझना
समझ आ गया
दुनिया बदल जाएगी
यह समाज बदल जाएगा
सब के चाचे सब के माँ - बाप अपने आप को भी समझ लेंगे
और अपनी हीरों को भी ...
अपने आप से गैर हाजिर ही
अपने आप संग अनचाहे हैं
और अपने आप संग हाजिर मनचाहे
इक जरा सा समझ का फर्क है इक अनगोली समझ का .....



इमरोज़ -
अनुवाद - हरकीरत  हीर

(2)

सोच जैसा ....

कई चीजे ढूंढते नहीं मिलतीं
वे अपने आप मिल जाती हैं मिलती रहती हैं
वह भी आज अपने आप ही मिल गई
उसने मिल कर
न कोई संकोच किया न शरमाई बस मुझे ही देखती रही
जैसे सुबह की शाम की  कल की
मुझे ही उडीकती रही हो सोचती रही हो
तुम मुझे कब की सोच रही हो ...?
जब मैंने अपने आपको सोच लिया
तुझे भी सोच लिया
जितनी देर तुम नहीं मिले मैं सोचती रही
मैंने जहां भी लिखा जा सकता था
तेरी गैर हाजिरी लिखती आ रही हूँ
आज कल दफ्तर जाते भी और आते भी
तेरे स्कूटर के पीछे बैठ कर भी
तेरी पीठ पर तेरी गैर हाजिरी लिखती जा रही हूँ
अभी-अभी मुझे होश आई है
कि यह मैं क्या कर रही हूँ
हाजिर की पीठ पर ही गैर हाजिर लिखती आ रही हूँ
अब पहले मुझे तेरी पीठ चूम-चूम कर
सब लिखा अनलिखा कर लेने दे
देख मेरे जैसे गैर हाजिर कोई नहीं
और तेरे जैसी सोच जैसा हाजिर भी
कोई नहीं होगा ......


- इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर


(३)
फ्रेम मुक्त ....

रात सपने में इक सपना देखा
मोनालिसा जैसी खुबसूरत लड़की
इक फ्रेम में लगी दीवार पर टंगी
मेरी और देख -देख कर मुस्कुरा रही थी
जब मैंने उसे देखती को देखा वह भरी आँखों से
मुस्कुरा कर देखती हुई बोली
मैंने देख कर तुझे देख लिया हैं
तेरा ही इन्तजार था
अपना हाथ पकड़ा मैं फ्रेम मुक्त होना चाहती हूँ
तेरे हाथों में आकर फ़िक्र मुक्त भी
हमें फ्रेम मुक्त देख देखकर फ्रेम मुस्कुरा रहा था ..
और हम हँसते जा रहे थे ..
फ्रेम पेटेंड तस्वीरों के लिए होते हैं
म्यूजियम में टांगने के लिए
और संस्कार चलती फिरती तस्वीरों के लिए होते हैं
समाज की दीवारों में टांगने के लिए ...
मैं सुबह की चाय पी रहा था
कि उसका बड़ा खुश मैसेज मिला
कि वह फ्रेम मुक्त होकर आ रही है .....



- इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

(४)

उडीक ...

तूने मुझ में ख़ास क्या देखा है
तुझे ही उडीक कर देखा है
तुम अपनी तरह की खूबसूरत हो
तेरी हर चीज तेरे जैसी खूबसूरत है
तुझे मैं तब से सोच रहा हूँ उडीक रहा हूँ
जब से मैंने अपने आप को सोच लिया था
हर मर्जी उडीक कर ही मिलती है
इस टी सैट को ही देख ले
इसे पिछले साल ही पसंद करके आया था
और इस साल लेकर आ सका हूँ
तेरे कमरे को सजाने की जरुरत नहीं
सजावट की जरुरत भी है और सजावट भी है
मेरी मौजूदगी मेरे कमरे की सजावट है
अपनी मौजूदगी से ज्यादा खूबसूरत कोई सजावट नहीं
तुम खूबसूरत किसे समझते हो
जिसे देखकर देखने वाला भी खूबसूरत होता रहे
अच्छा लगा यह जानकार
जिसे मैं उडीकता रहा हूँ
वह भी मुझे उडीकती रही है
चल आ अब नए टी सैट में चाय बना
और दोनों उडीकों को मिलकर चाय पीते देखें
लगता है
ज़िन्दगी उडीकते प्यालों में
चाय पीते रहना ही है ......

- इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

Saturday, June 15, 2013

 इमरोज़ की कुछ और नज्मों का अनुवाद ......

खुशबू की फ़िक्र ....
पेटेंड फूलों में खुशबू नहीं होती
पेटेंड कैनवास की भी लाइफ़ नहीं होती

सभी आर्ट स्कूलों में
आज भी फूल पेंट कर रहे हैं
खुशबू की न कोई फ़िक्र है न कोई जिक्र

इक खुशबू की फ़िक्र करने वाली
मुझे याद आ रही है -
२० साल पहले मैं भी आर्ट स्कूल में था
मेरी क्लास में इक बड़ी प्यारी सी सयानी सी लड़की थी
जो मुझे अच्छी लगती और मैं भी उसे अच्छा लगता
वह जब भी फूल बनाती
सारी क्लास से खूबसूरत बनाती मुझ से भी
उसे मेरे साथ बोलना अच्छा लगता था
कभी पूछती तेरे रंग बड़े नए-नए से होते हैं
कहाँ से लेकर आये हो ..?
मैं हंस कर कहता अपने पिंड (गाँव) से
वह फिर कहती मुझे अपना पिंड कब दिखलाओगे ..?
मैं फिर हंसकर कहता जब तुझे उड़ना आ जाएगा

वह अपना लंच हर रोज
मुझ से शेयर करती
और मैं अपने ख्याल उस संग
शेयर कर लेता ....
तीसरे साल आर्ट स्कूल में
फूल पेंट करने का मुकाबला हुआ
उसमें भी उसके फूल सबसे खूबसूरत रहे
बड़ी खुश भी हुई और उदास भी
बोली मैं सैंकड़ों खूबसूरत फूल पेंट कर चुकी हूँ
पर किसी भी फूल में कभी खुशबू नहीं आई
जानती है कि पेटेंड फूलों में कभी खुशबू नहीं होती
पर वो अपने फूलों से खुशबू की उम्मीद बना बैठी है
और हर बार उडीकती भी है
जो कभी नहीं हुआ मैं करके देख रहा हूँ
मैं तुम्हारे फूलों की खुशबू बन सकता हूँ
पेटेंड फूलों की नहीं
तू खुद फूल बने तो मैं उस फूल की खुशबू बन जाऊंगा
मंजूर , वह जोर से बोली
मैं और कुछ बनूँ न बनूँ
पर मैं तेरी खुशबू के लिए फूल जरुर बनूँगी
तुम पता नहीं क्या हो अपनी उम्र से कहीं ज्यादा
न समझ आने वाला भी और समझ आने वाला भी ....

(२)
प्यार ....

कल रात
सपने में मैंने रब्ब से पूछा
सुना है
आप लोगों को हर रोज़
बहुत कुछ देते हो
फिर प्यार क्यों नहीं देते ..?
प्यार न दिया जा सकता है
न लिया जा सकता है
प्यार हर किसी को
खुद बनना होता है .....

इमरोज़ -
अनुवाद - हरकीरत हीर

(३)
इक याद ...

आर्ट स्कूल में
इक दिन  हमारी सारी क्लास
नैशनल मियुजियाम में
पेंटिंग के मास्टर पीस
स्डिज़ कर रही थी
मोनालिसा की मुस्कराहट देख कर
एक स्टूडेंट ने टीचर को पूछ लिया
सर , यह मुस्कराहट कभी हंसती नहीं ..?
यह पेटेंड मुस्कराहट है
यह जवाब सुनकर
साड़ी क्लास हँस पड़ीं ....

(४ )

खुले दरवाजे ...
लोग फूल पालते
और प्यार महक पाले
बुरे बोलों का क़र्ज़
नज्में उतारती हैं
समाज है ही नहीं
जब भी सुनो दिल की सुनो
अगर तुम न होते हुए भी होती हो
फिर रब्ब है
और कोई समझे या न समझे
प्यार समझ लेता है
कोई मानता नहीं
मैं रोटी चूम के खाता हूँ
(माँ चूम कर खाती थी )
देर सवेर जब भी आओ
 दरवाजे खुले हैं .....

(५)

मैंने पूछा ....
कल क्या करती रही ...?
उड़ना सीखती रही ...
किससे ...?
उड़कर आई
अपनी माँ से ....

मूल - इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर