Saturday, June 15, 2013

 इमरोज़ की कुछ और नज्मों का अनुवाद ......

खुशबू की फ़िक्र ....
पेटेंड फूलों में खुशबू नहीं होती
पेटेंड कैनवास की भी लाइफ़ नहीं होती

सभी आर्ट स्कूलों में
आज भी फूल पेंट कर रहे हैं
खुशबू की न कोई फ़िक्र है न कोई जिक्र

इक खुशबू की फ़िक्र करने वाली
मुझे याद आ रही है -
२० साल पहले मैं भी आर्ट स्कूल में था
मेरी क्लास में इक बड़ी प्यारी सी सयानी सी लड़की थी
जो मुझे अच्छी लगती और मैं भी उसे अच्छा लगता
वह जब भी फूल बनाती
सारी क्लास से खूबसूरत बनाती मुझ से भी
उसे मेरे साथ बोलना अच्छा लगता था
कभी पूछती तेरे रंग बड़े नए-नए से होते हैं
कहाँ से लेकर आये हो ..?
मैं हंस कर कहता अपने पिंड (गाँव) से
वह फिर कहती मुझे अपना पिंड कब दिखलाओगे ..?
मैं फिर हंसकर कहता जब तुझे उड़ना आ जाएगा

वह अपना लंच हर रोज
मुझ से शेयर करती
और मैं अपने ख्याल उस संग
शेयर कर लेता ....
तीसरे साल आर्ट स्कूल में
फूल पेंट करने का मुकाबला हुआ
उसमें भी उसके फूल सबसे खूबसूरत रहे
बड़ी खुश भी हुई और उदास भी
बोली मैं सैंकड़ों खूबसूरत फूल पेंट कर चुकी हूँ
पर किसी भी फूल में कभी खुशबू नहीं आई
जानती है कि पेटेंड फूलों में कभी खुशबू नहीं होती
पर वो अपने फूलों से खुशबू की उम्मीद बना बैठी है
और हर बार उडीकती भी है
जो कभी नहीं हुआ मैं करके देख रहा हूँ
मैं तुम्हारे फूलों की खुशबू बन सकता हूँ
पेटेंड फूलों की नहीं
तू खुद फूल बने तो मैं उस फूल की खुशबू बन जाऊंगा
मंजूर , वह जोर से बोली
मैं और कुछ बनूँ न बनूँ
पर मैं तेरी खुशबू के लिए फूल जरुर बनूँगी
तुम पता नहीं क्या हो अपनी उम्र से कहीं ज्यादा
न समझ आने वाला भी और समझ आने वाला भी ....

(२)
प्यार ....

कल रात
सपने में मैंने रब्ब से पूछा
सुना है
आप लोगों को हर रोज़
बहुत कुछ देते हो
फिर प्यार क्यों नहीं देते ..?
प्यार न दिया जा सकता है
न लिया जा सकता है
प्यार हर किसी को
खुद बनना होता है .....

इमरोज़ -
अनुवाद - हरकीरत हीर

(३)
इक याद ...

आर्ट स्कूल में
इक दिन  हमारी सारी क्लास
नैशनल मियुजियाम में
पेंटिंग के मास्टर पीस
स्डिज़ कर रही थी
मोनालिसा की मुस्कराहट देख कर
एक स्टूडेंट ने टीचर को पूछ लिया
सर , यह मुस्कराहट कभी हंसती नहीं ..?
यह पेटेंड मुस्कराहट है
यह जवाब सुनकर
साड़ी क्लास हँस पड़ीं ....

(४ )

खुले दरवाजे ...
लोग फूल पालते
और प्यार महक पाले
बुरे बोलों का क़र्ज़
नज्में उतारती हैं
समाज है ही नहीं
जब भी सुनो दिल की सुनो
अगर तुम न होते हुए भी होती हो
फिर रब्ब है
और कोई समझे या न समझे
प्यार समझ लेता है
कोई मानता नहीं
मैं रोटी चूम के खाता हूँ
(माँ चूम कर खाती थी )
देर सवेर जब भी आओ
 दरवाजे खुले हैं .....

(५)

मैंने पूछा ....
कल क्या करती रही ...?
उड़ना सीखती रही ...
किससे ...?
उड़कर आई
अपनी माँ से ....

मूल - इमरोज़
अनुवाद - हरकीरत हीर

Friday, June 7, 2013

(1)

धूप लड़की .....

इक लड़की है
जो उदासी की छाँव में बैठी भी
फूल बीज लेती
और फूल खिल पड़ते
अक्षर बीजती
तो कविता खिल पड़ती
वह प्यारी सी लड़की
उदासी की छाँव-छाँव चलती भी
अपने आप की धूप जी लेती है ....

इमरोज़ .....
अनुवाद - हरकीरत हीर


(२)

किस दिन ...

जितने वक़्त भीग कर न भीगना याद है
जितने वक़्त बरस के न बरसना याद है
जितने वक़्त खाली हो कर खाली न होना याद है
और जितने वक़्त अपना आप भी तुझे याद है
मुझे भी याद है
उतने वक़्त कोई भी और कुछ भी याद रह जाता है
वह भी भूल कर भीगें
कि भीगना भी याद न रहे
अन्दर की बाहर की आँखें बंद करके
और दिल खोल कर आसमां की तरह हद भूल कर
छुए अनछुए का कोई ख्याल न आये न रहे ...
बता देना वह दिन
मेरे दिल के मोबाईल पर ...

इमरोज़ .....
अनुवाद - हरकीरत हीर


(३)

जब तक ...

इक दरिया
खामोश मुहब्बत का दरिया और
सब नज्में
अनलिखी हो जायें
धरती पढ़े
या आसमां
लोग नहीं
जब तक
पढने योग्य नहीं हो जाते ....

इमरोज़ .....
अनुवाद - हरकीरत हीर


(४)

अपने आप संग ...

सड़क के किनारे बैठे एक फकीर से
इक मुसाफिर ने पूछा
बाबा यह सड़क कहाँ जाती है ..?
फकीर ने कहा
मैंने इस सड़क को कभी भी
कहीं भी जाते नहीं देखा
हाँ लोग आते -जाते रहते हैं
फकीर का जवाब सुना  अनसुना कर
मुसाफिर चल पड़ा अपने आप संग
अपने आप संग चले जा रहे मुसाफिर को
सड़क दूर तक देखती रही
ऐसा राही सड़क ने पहले
कभी न देखा था .....

इमरोज़ .....
अनुवाद - हरकीरत हीर


(५)

क़र्ज़ ....

बार - बार
कर्ज़दार होकर
क्यों कर्ज़दार करती हो
खामोश मुहब्बत  भी
हँसेगी .....

इमरोज़ .....
अनुवाद - हरकीरत हीर


(६ )

मर्जी की मर्जी ...

मैं सोहणी हूँ
सोहणी से सोहणी
मुझे मनचाहे की तलाश है
मास्टरपीस बनने की तलाश नहीं
दुनिया के सारे मास्टरपीस
दीवारों पर टंगे हुए हैं सब स्टिललाइज
मैं खिला फूल बनना चाहती हूँ
हमेशा रहने वाला पेटिंड फूल नहीं
मैं सोहणी हूँ
सोहणी से सोहणी
हर दरिया हर रुकावट
पार करुँगी
कच्चे घड़े संग भी और पक्के घड़े संग भी ....

इमरोज़ .....
अनुवाद - हरकीरत हीर


(७)
सच जीने के लिए ...

ज़िन्दगी सच है सच जीने के लिए
यह वाक् किसी न किसी  अर्थ में
हर ग्रन्थ में शामिल है
लोग रोज़ पढ़ते हैं पढ़ छोड़ते हैं
सुनते हैं सुन छोड़ते हैं
और वाक् किसी की भी ज़िन्दगी नहीं बनता
किसी भी वाक् का सच जिए बगैर
अपना सच नहीं बनता ज़िन्दगी का सच नहीं बनता ...

प्यार भी इक वाक् है सच का वाक्
अपने आप में से पढने -सुनने वाला
जिसने यह वाक् अपने आप में से पढ़ लिया
वह कोई हीर हो गया कोई रांझा हो गया
प्यार भी सच है सच जीने के लिए ....

इमरोज़ .....
अनुवाद - हरकीरत हीर


(८)
तेरे रंग मेरे रंग ...

उसका जब भी दिल करता
मेरे मन के खाली कैनवास पर
अपनी अनलिखी कविता
अक्षर - अक्षर करती
मैं उसे भी देख - देख पढ़ता
और अपने आपको भी पढ़ता
जब कभी मैं भी अपनी रौ में होता
उसके मन के खाली कागजों पर
फूलों के खाके बनाकर
उनमें मनचाहे रंग भरता
वह मेरे रंग भी देखती
और रंग भरने वाले को भी देख -देख
चहकती  रहती
और कहती तेरे हाथों में रंग आकर
और भी खूबसूरत हो जाते हैं
तुम  इतना खूबसूरत पेंट कर लेते हो
कभी खूबसूरत सोच भी पेंट की
सोच पेंट नहीं होती
खूबसूरत से खूबसूरत सोच जी जा सकती है
यह सुनकर वह और खूबसूरत हो गई
मेरे और पास आकर बोली
चल आ
अपनी -अपनी सोचें जी कर
पेंट करते हैं
तुम मेरे रंग बन जाओ
और मैं तेरे रंग बन जाऊं .....

इमरोज़ .....
अनुवाद - हरकीरत हीर


Wednesday, June 5, 2013

इमरोज़ की कुछ और नज्मों का अनुवाद .....

समझ न आने वाला ....

यह एक उसकी बात है
जो उम्र में मुझसे छोटा था
पर और किसी तरह से बिलकुल छोटा न था
इक दिन वह मिलने आया
उस दिन मैं उसे ही सोच रही थी
वह मेरे साथ संजीदा होता जा रहा था
बार - बार उसे देख कर
मैंने उससे कहा
जा पहले दुनिया देख आ
फिर भी अगर मैं तेरी जरुरत हुई
तो ठीक है ...
हम दोनों ही कमरे में थे
उसने उठकर कमरे के सात चक्कर लगाये
और बोला - ''मैं दुनिया देख आया हूँ ''
तुझ जैसा सिर्फ तू ही है
अपने आप से कहीं ज्यादा
न समझ आने वाला .....

इमरोज़ ......
अनुवाद - हरकीरत हीर

(२)

न समझ आने वाला ....

आर्ट स्कुल में
इक ख़ूबसूरती मेरी हमजमात थी
वह जब भी क्लास में आती
मैं सीट से उठकर उसे देखता
वह भी कभी-कभी देखते को देख लेती
मुस्कुरा भी लेती
इक दिन लंच के वक़्त जब क्लास
लंच के लिए गई हुई थी
वह मेरे पास आई और बैठ कर पूछा
तुम मेरी खूबसूरती में ख़ास क्या देखते हो हर रोज ..?
तेरी खूबसूरती में इक ख़ास खूबसूरती है
जिसे देख कर मैं खूबसूरत होता रहता हूँ
तुम कोई ख़ास हो
स्टूडेंट होते हुए भी तुम कहीं ज्यादा हो अपने आप से
न समझ आने वाला .....

(३)
सच जीने के लिए ....

किसी ग्रन्थ का इक वाक् है
ज़िन्दगी सच है सच जीने के लिए
किसी न किसी अर्थ  में यह वाक्
हर ग्रन्थ में शामिल है
लोग हर रोज इस वाक् को सुनते हैं
इस वाक् को पढ़ते हैं
और सुन- सुनकर सुन छोड़ते हैं
और पढ़ - पढ़कर पढ़ छोड़ते हैं
यह वाक् वाक् ही रह जाता है
किसी की ज़िन्दगी नहीं बनता ...
कभी -कभी ...
किसी की ज़िन्दगी प्यार-प्यार
हो जाती है सच हो जाती है
जैसे हीर की ज़िन्दगी
रांझे की ज़िन्दगी
अपने आप सच हो गई
प्यार भी सच होता है सच जीने के लिए ....

(४)
दरिया ...

तुम बनी रहो
अपने आप संग हाजिर
भले मुश्किलें भी बनी रहें
अपने आप संग चलने वालों के साथ
सबकुछ चलता है
मुश्किलें भी मुहब्बतें भी
सोहणीयों और हीरों संग
दरिया भी चलते रहे हैं
और मुश्किलें डूबती ....
तुम बनी रहो अपने आप संग हाजिर
हाजिर ही दरिया होते हैं
इक - दुसरे में बहते दरिया ....

(५)

इक युवती  .....

दरिया के उस पार से
किसी की बांसुरी इस पार को
मस्त कर रही थी ...
दरख्त से सटकर खड़ी एक युवती
अपना आप भूल कर बांसुरी सुन रही थी
पास खड़ा वक़्त
बांसुरी के साथ भी मस्त हो रहा था
और युवती को देख -देखकर भी
अच्छी लगती युवती को
वक़्त ने पूछ ही लिया
बीबी तुम हीर हो या सोहणी ..?
घर से चली तो मैं हीर थी
यह दरिया पार करके मैं
सोहणी हो जाऊंगी ....

(६ )
इक और सुब्ह ...

तेरे ख्यालों संग रात भर जागती रही
और सुब्ह होने से पहले इक और सुब्ह देखती रही
मिलूंगी उससे और जाग कर देखूंगी उसे
उसके ख्यालों को भी .
जब मिली ...
देखते ही कहने लगा
तुझे उडीक-उडीक कर
देख मैं क्या से  क्या हो गया हूँ
तुम मुझे कब के जानते हो ?
जब से मैं अपने आपको जानता हूँ
ठीक है फिर नहीं जाऊँगी कहीं
इक बार माँ जनती है
और दूसरी बार मुहब्बत
देख आज मेरा जन्मदिन है
सिर्फ तेरे साथ मनाने वाला
फिर तो आज मेरा भी जन्मदिन हो गया ..
चल मिलकर मनाएं
यह दो जनों का एक ही जन्मदिन
तेरे ख्यालों संग भी
मेरे ख्यालों संग भी
सारी  रात इक -दूजे संग जागकर
देखेंगे सुब्ह होने से पहले
हो रही इक और सुब्ह तेरी मेरी सुब्ह ...

(७)
हाज़री ...

खुला दरवाजा मत खड़काओ
कब से खोल कर रखा है ...?
जब तुम चली थी
मैं ही रूकती - रूकती
आ रही हूँ
राहों संग रुकावटों संग
तेरी देरी
मेरी गैर हाज़री
पर मेरी पहुँच
तेरी हाज़री भी है ....


इमरोज़ .....
अनुवाद - हरकीरत हीर .

Wednesday, May 29, 2013

 असमिया कवि 'अनुभव तुलसी' की  कविताओं का हिंदी अनुवाद .....

हमारी शारदीय की माँ ... (असमिया कविता )
हमारी बेटी शारदीय का जन्म
अस्पताल के एक गलियारे में हुआ था
क्योंकि उस दिन अस्पताल की
सेवाएं बंद थीं ...
शारदीय की माँ के लिए
जमीन पर ही बिछा दिया गया था
 प्रसूति बिस्तर
वहीँ से किया शारदीय ने प्रथम बार
भूमि रूपी माँ को
साष्टांग प्रणाम ...

हमारी बेटी शारदीय का जन्म
हुआ था मेंड़ पर
जहां से बहा ले गया था
मदमाता पानी शारदीय की माँ को
लगा दिया गया था फिर पानी में ही
शारदीय की माँ का प्रसूति बिस्तर
पानी के बिस्तर से ही शारदीय ने किया था
 पानी रूपी पिता को
साष्टांग प्रणाम ....

एक दिन
प्रात: भ्रमण के समय
कचरे के ढेर से उठा लाई थी माँ
हमारी शारदीय को ...

हमारी बेटी शारदीय के जन्म के दिन
हँस पड़े थे लाल-नीली हँसी में
कुमुद के फूल ...
हमारी बेटी शारदीय के जन्म के दिन
हर सिंगार रो पड़ा था फूट-फूट कर
क्यों रोया कोई नहीं जानता ....

हमारी बेटी शारदीय की
 दो आँखें हैं जैसे शबनम की दो बूंदें
देव और असुर दोनों तारे वहीँ
स्नान किया करते हैं ...

जन्म के दिन ही माँ ने
खिलाई थी शारदीय को शपथ
रणभूमि में जब धर ही चुकी हो पैर
साँसे रहने तक लड़ना ..

शारदीय के ....
स्वप्न धारण करने के दिन से लेकर
माँ का था अपविश्वास के विरुद्ध युद्ध
एसिड ,किरासिन ,दांत,नाख़ून के विरुद्ध युद्ध
बार  -बार दु:शासन द्वारा
नग्न किये जाने के विरुद्ध युद्ध
कभी इस युद्ध से  कभी उस युद्ध से
लड़ते-लड़ते शारदीय की माँ के
दोनों  हाथों की जगह उग आये थे
दस - दस हाथ .....

मूल - अनुभव तुलसी
अनुवाद - हरकीरत हीर

(२)

रोग ग्रस्त ...(असमिया कविता )

एक ऐसा शुष्क सा परिवेश फैला दिया है
कि पत्नी की आँखों का जल सूख गया है

एक ऐसी आग निशदिन जला रखी है
कि उसके के चेहरे की हँसी जल गई है

एक ऐसा मानसिक दबाव बना रखा  है
कि पत्नी की रक्त-प्रवाह गति थम सी गई है

उसे ऐसी कड़वाहट के बाद कड़वाहट दी है
कि उसे मीठे और नमकीन से हो गई है अरुचि

मुसलसल शब्दों से मेरा विस्फोटन जारी है
अब उसकी वाकशक्ति भी खत्म हो गई है

अति आधुनिक माइक्रोवेब में उसे यूँ तला है
कि अब वह जरा सी चोट से ही बिखर जाती है

विलायती बनियों के कड़कड़ाते डालरों की तरह
पत्नी बदलने का यही उचित समय है ....!!

मूल - अनुभव तुलसी
अनुवाद - हरकीरत हीर

(३)

पानी ....

पानी जा घुसा  है
उस मनुष्य के घर

वो मनुष्य
बिलकुल अकेला है

घर के चारो ओर
पड़ी वस्तुओं में
लगे उसके स्पर्श को
छूना चाहता है पानी


 गर्भ शून्य हवा
बेड़े की दरारों से
देखती है पानी को

पानी आने की खबर सुन
जमीनी बिस्तर पर लेटा
फर्श भी सर उठाता है

 अतिथि पानी को
अकेला मनुष्य करता है
स्नेह से स्वागत

पानी को आती है
उसकी शारीरिक गंध

दोनों गंधों के
मिलन के पश्चात

वह निकल पड़ता है
अपने काम के लिए

उसके बिना उस घर में
पानी भी नहीं ठहरता
ज्यादा देर

आ गए पानी से
एक बार मिल चुकने के बाद
वह नहीं भूलता जल्द उसे

सूख जाने के बाद भी
पानी की स्मृति में
रहता है वह

जब तक कि
जीवन में पानी है ...!!

मूल - अनुभव तुलसी
अनुवाद - हरकीरत हीर

(४)

मोहतरमा की आँखें ....

घी के दीये की सी दो गहरी नीली आँखें
आम्र मंजरी सी वो तुम्हारी ही हैं मुदर्रिस मोहतरमा
ख़त के गर्भ से मुड़े -तुड़े अक्षरों से
झड़े हुए सूखे फूलों की पंखुड़ियों के साथ
अमलतास के पत्तों  की तरह
इस छोर से उस छोर तक खिंची
काजल की स्याह असंभव रेखा
समेट लेता हूँ हौले से
भीग जाती हैं अंगुलियाँ छूते ही

पर घर में पहले ही हैं एक जोड़ी आँखें
फिर इन दो आँखों की और कैसे लूँ मुसीबत ...?
कहाँ रखूँ छुपाकर  ...कहाँ रखूँ ....?
तकिये के नीचे रख नहीं सकता
रखते ही भिगो देगीं ये बिस्तर
फेंक दो इन्हें  , कौन देखता है , दूर फेंक दो
बात- बात में सिसकना
मानो आँखें न होकर कोई मोल ली आफत हो
फिर भी मैं चाहता हूँ वो यहीं रहे
मुसीबत के बीच भी मेरे साथ
साथ न रहने पर भी गर तुम्हारा बोझिल ह्रदय
हो जाता है हल्का ....!!

मूल - अनुभव तुलसी
अनुवाद - हरकीरत हीर

(५)
बरसात ....

बरसात में भी है कुछ काँटों जैसी चुभन
जो बेंध जाती है मेरा तन-मन आते ही

तकिये के सहारे बैठ मेरे बिस्तर पर
जला जाती है सपनो की शमा ....

और मैं रख देता हूँ धीरे से शमादान में
भविष्य  के कुछ सुनहरी गुलाब

बरसात मुझे बनाती है उपजाऊ और मैं
रोप देता हूँ उसकी छाती में उम्मीदों के पौधे

कभी पतंग उडाता हूँ बारिश के संग ,और
कभी दोनों खेलते हैं डोर काटने का खेल ...

मूल - अनुभव तुलसी
अनुवाद - हरकीरत हीर

(६ )

गहरे नील तारे के चारो ओर ..

कल तक जो नहीं थी चिड़िया
थी कुछ और ही .....

आज सुबह भी पैदल चलकर
किया था उसने  पुल को पार

 अकस्मात् ही कुछ और से
वह बन गई थी चिड़िया

बड़ी अनहोनी सी बात थी
न पहले कभी सुनी न देखी

हमारे बीच कईयों ने देखा है उसे
और कइयों  की है बातचीत भी ....

जिसकी चोंच से चोंच मिलाकर
कईयों ने  चूमा है आकाश

उस चिड़िया के गहरे नील पंखो का
एक मैं भी हूँ  प्रशंसक ....!!

मूल - अनुभव तुलसी
अनुवाद - हरकीरत हीर

Saturday, May 11, 2013

इमरोज़ की कुछ और नज्मों का अनुवाद ..... 
खूबसूरत मर्द ......

खेतों में ..
तितलियों संग खेलते खेलते
उड़ते- उड़ते , हँसते -हँसते
पता ही न चला
कब इक तितली के खास रंगों से
रंगा मैं जवान भी होता गया
और अपनी मर्ज़ी का भी होता-होता
आर्ट स्कूल पहुँच गया ....

क्लास की लड़कियों में
इक लड़कीअपनी -अपनी सी लगी
 वह लड़की जब भी क्लास में आती
अपनी सीट से उठकर मैं उसे देखता
वह भी मुझे देखता देख
मुस्कुराती भी रहती और देखती भी ....
पता नहीं उस तितली के रंगों से
या वक़्त के रंगों से या सोच के रंगों से
या उस ख़ास की खूबसूरती के रंगों से
मेरी पेंटिंग भी
और खूबसूरत होती जा रही थी
और मैं भी उसे रोज -रोज देखकर ...

इक दिन
लंच के वक़्त जब सभी लंच को चले गए
वह मेरे पास आकर बैठ गई और बोली
तुम रोज -रोज मुझमें क्या खास देखते हो ...?
तुम्हारी खूबसूरती में मुझे
इक खास खूबसूरती दिखती है
जिस देख -देख मैं खूबसूरत होता रहता हूँ
 और हो भी रहा हूँ
क्या तुम कोई ख़ास हो ...?

इक खूबसूरती को देख - देख
खूबसूरत होने वाला
तेरे जैसा और कोई न होगा
खूबसूरती से भी खूबसूरत मर्द .....



*******************************************

हर  में टेस्ट में
रब्ब का टेस्ट है

तुम्हारा नाम .....
(१)

कोई नज़र में है
अभी तो अपना आप ही नज़र में है
और अपना आप
अपनी मर्ज़ी का बन रहा है
कितना नया ख्याल है
और कितना जरुरी भी
फिर किस तरह मिलोगी
जैसे आज मिली हूँ
तेरा नाम
मर्जी ....

************************
(२)
तुम क्या कर रही हो
ख्यालों को रंग दे रही हूँ
और ख्यालों से रंग ले भी रही हूँ
क्या खूब देना -लेना है
अब मिलोगी
जिस दिन कोई नया ख्याल मिल गया
तुम्हारा नाम
ख्याल .....
********************************

रब्ब का कोई भी नाम हो सकता है
प्यार का भी हीर का भी .......

इमरोज़ .....
अनुवाद - हरकीरत हीर ....

Saturday, May 4, 2013

इमरोज़ की कुछ नज्में ....

अर्थ ....


अगर बिजली की मौजूदगी में
दो गैसें आक्सीजन और हाइट्रोजन 
आपस में मिलकर
पानी बन सकती हैं
फिर तो ...
मुहब्बत की हाजिरी में
हम भी अपने अपने इनकार और इकरार को
मिलाकर बादल बना  सकते  हैं ...
क्या कर रही हो ..?
नींद आ गई थी  ...?
दिल की लगी वालों को कभी नींद नहीं आती
तुझे कैसे आ गई ?
तुम कोई बलोच हो
नहीं मैं बादल हूँ
तेरी मर्जी पूछने आया हूँ
चाहने वाले मर्जी नहीं पूछते मर्जी करते हैं ....
तुम तो सचमुच सारे के सारे बरस गए हो
भीगना नहीं चाहते हुए भी आज मैं
सारी की सारी भीग गई हूँ
तुम्हारे साथ भी और अपने साथ भी ...
सच बताना ...
तुम इनकार के बादल हो या इकरार के ..?
मैं दोनों का अर्थ हूँ ..
जैसे तुम और मैं इक दूजे के अर्थ
मुहब्बत के अर्थ .....

(२)
इलाही गीत ....


इंसान आज़ाद नहीं
अपने आप से
हवाएं आज़ाद हैं
अपने आप से ...
शब्द नज़्म बनते हैं
पर हीर नहीं बनते
हीर मुहब्बत बनती है ....
किस्से , कहानियाँ सोच बनाती है
पर सोच मुहब्बत नहीं बनाती
हीर किसी की कोई नज़्म बने न बने
पर हीर मुहब्बत का
एक इलाही गीत बन गई है
जिसे खामोश सदियाँ
गाती आ रही हैं जाग- जाग कर  ....
इस इलाही गीत को
जो भी मुहब्बत संग जागकर
गाता है वह रांझा-रांझा हो जाता है
और मुहब्बत के संग जागकर
जो भी इस इलाही गीत को सुनती है
वह हीर हीर हो जाती है ...
इस गीत को गाते -गाते भी
और सुनते -सुनते भी
मैं भी कई बार वारिस वारिस हुआ हूँ ....

(३)

कर्ज़दार ...

बार -बार कर्ज़दार हो -होकर
क्यों कर्ज़दार बना रही हो
देख ...
खामोश मुहब्बत भी
हँस रही है .....

अनुवाद - हरकीरत हीर

Wednesday, April 3, 2013

इमरोज़ की कुछ नज्में ...... 
आज़ाद मुहब्बत ....

मनुष्य  आज़ाद  नहीं
हवाएं आज़ाद हैं
हवाओं को मुहब्बत का भी पता है
और खामोश मुहब्बत का भी

शब्द नज़्म बनता है
वारिश बनता है
पर हीर नहीं बनता
हीर मुहब्बत का नाम है
किस्से कहानियाँ सोच लिखती है
पर सोच मुहब्बत नहीं बनती
ना सोच मुहब्बत की गवाह बनती है
गवाह सिर्फ हवाएं बनती हैं
हवाओं में मुहब्बतों ने मुहब्बत की सांस ली
खामोश मुहब्बत की साँस .......
हीर को मुहब्बत को वारिश की जरुरत नहीं
वारिश को हीर की जरुरत है किस्से  लिखने के लिए
हीर कोई नज़्म बने ना बने
हीर मुहब्बत का एक इलाही गीत है
मुहब्बत के साथ जाग कर गाने वाला .....

पता नहीं कब
पर जब कोई औरत पहली  हीर हुई होगी
मुहब्बत  हुई होगी
तभी इस मुहब्बत का इलाही गीत बना होगा
मुहब्बतें  गा रही हैं यह इलाही गीत
हवाएं गा रही हैं यह इलाही गीत
हवाएं सुना  रही हैं यह इलाही गीत
इस मुहब्बत का हीर का गीत
हवाओं में से
कोई भी सुन सकता है
यह इलाही गीत ,यह मुहब्बत का गीत
मुहब्बत के साथ जागकर .....

(2)
खाली कागज़ ....

वह खाली कागज़ पढ़ रही है
पता नहीं कब से
आकर मैं उसे देख रहा हूँ
पर उसने मुझे नहीं देखा
जब उसने मुझे देखा
उठकर बोली
कमाल है
प्यार के आने की भी
कोई आवाज़ नहीं आई
जैसे खाली कागज़ पढ़ते वक़्त
किसी अर्थ की आवाज़ नहीं आती .....
तुम कितने अच्छे हो
हर वक़्त मेरी उडीक बने रहते हो
आ पहले  मिलकर चाय बनाते हैं
चाय पिटे हैं
खाली कागज़ पढ़ -पढ़कर
आज कुछ लिखा है
चाय पीकर तुझे
सुनाती हूँ
तुझे भी और अपने आप को भी .....

(३)

ख़ुशी ....

हालात कुछ भी हों
अब अपने आपसे
 खुश होना आ गया है
सादगी भी, स्पष्टता भी मिलकर
ज़िन्दगी के साथ- साथ चलती हैं
अपने आप जैसा होकर
आज़ाद होकर
अपना सच आप बन रहा हूँ
सोच ....
दिन की ख़ूबसूरती देख -देख
खूबसूरत होती रहती है
और रात की ख़ूबसूरती देख -देख
 खूबसूरत भी होती रहती है और जागती भी रहती है ...
ख़ुशी .....
खुद ही अपना मजहब भी होती रहती है
और खुद ही अपनी पूजा भी ......


(४)
मनचाही नस्ल ....

किसान भी
फसल बीजते वक़्त
मनचाहा बीज सोचता है
पर पता नहीं क्यों
न औरत
बच्चा जन्मते वक़्त
मनचाहा मर्द सोचती है
और न ही मर्द
नस्ल जन्मते वक़्त
मनचाही औरत सोचता है
किसी के साथ भी
कहीं  भी सोकर
जागती नस्ल पैदा नहीं हो सकती .....


 इमरोज़
अनु - हरकीरत हीर