Wednesday, April 3, 2013

इमरोज़ की कुछ नज्में ...... 
आज़ाद मुहब्बत ....

मनुष्य  आज़ाद  नहीं
हवाएं आज़ाद हैं
हवाओं को मुहब्बत का भी पता है
और खामोश मुहब्बत का भी

शब्द नज़्म बनता है
वारिश बनता है
पर हीर नहीं बनता
हीर मुहब्बत का नाम है
किस्से कहानियाँ सोच लिखती है
पर सोच मुहब्बत नहीं बनती
ना सोच मुहब्बत की गवाह बनती है
गवाह सिर्फ हवाएं बनती हैं
हवाओं में मुहब्बतों ने मुहब्बत की सांस ली
खामोश मुहब्बत की साँस .......
हीर को मुहब्बत को वारिश की जरुरत नहीं
वारिश को हीर की जरुरत है किस्से  लिखने के लिए
हीर कोई नज़्म बने ना बने
हीर मुहब्बत का एक इलाही गीत है
मुहब्बत के साथ जाग कर गाने वाला .....

पता नहीं कब
पर जब कोई औरत पहली  हीर हुई होगी
मुहब्बत  हुई होगी
तभी इस मुहब्बत का इलाही गीत बना होगा
मुहब्बतें  गा रही हैं यह इलाही गीत
हवाएं गा रही हैं यह इलाही गीत
हवाएं सुना  रही हैं यह इलाही गीत
इस मुहब्बत का हीर का गीत
हवाओं में से
कोई भी सुन सकता है
यह इलाही गीत ,यह मुहब्बत का गीत
मुहब्बत के साथ जागकर .....

(2)
खाली कागज़ ....

वह खाली कागज़ पढ़ रही है
पता नहीं कब से
आकर मैं उसे देख रहा हूँ
पर उसने मुझे नहीं देखा
जब उसने मुझे देखा
उठकर बोली
कमाल है
प्यार के आने की भी
कोई आवाज़ नहीं आई
जैसे खाली कागज़ पढ़ते वक़्त
किसी अर्थ की आवाज़ नहीं आती .....
तुम कितने अच्छे हो
हर वक़्त मेरी उडीक बने रहते हो
आ पहले  मिलकर चाय बनाते हैं
चाय पिटे हैं
खाली कागज़ पढ़ -पढ़कर
आज कुछ लिखा है
चाय पीकर तुझे
सुनाती हूँ
तुझे भी और अपने आप को भी .....

(३)

ख़ुशी ....

हालात कुछ भी हों
अब अपने आपसे
 खुश होना आ गया है
सादगी भी, स्पष्टता भी मिलकर
ज़िन्दगी के साथ- साथ चलती हैं
अपने आप जैसा होकर
आज़ाद होकर
अपना सच आप बन रहा हूँ
सोच ....
दिन की ख़ूबसूरती देख -देख
खूबसूरत होती रहती है
और रात की ख़ूबसूरती देख -देख
 खूबसूरत भी होती रहती है और जागती भी रहती है ...
ख़ुशी .....
खुद ही अपना मजहब भी होती रहती है
और खुद ही अपनी पूजा भी ......


(४)
मनचाही नस्ल ....

किसान भी
फसल बीजते वक़्त
मनचाहा बीज सोचता है
पर पता नहीं क्यों
न औरत
बच्चा जन्मते वक़्त
मनचाहा मर्द सोचती है
और न ही मर्द
नस्ल जन्मते वक़्त
मनचाही औरत सोचता है
किसी के साथ भी
कहीं  भी सोकर
जागती नस्ल पैदा नहीं हो सकती .....


 इमरोज़
अनु - हरकीरत हीर

Thursday, March 28, 2013

संक्षिप्त परिचय -
नाम- परगट सिंह सतौज
जन्म- १९८१ , संगरूर , पंजाब
शिक्षा - स्नातकोत्तर
कृतियाँ - तेरा पिंड ( काव्य संग्रह ), भागू  (उपन्यास ) , तीवीयाँ (उपन्यास )
सम्मान - , कर्नल नारायण सिंह भट्टल कहानी सम्मान , नंगे हर्फ़ साहित्य पुरस्कार , प्रकाश कौर सोढ़ी कहानी पुरस्कार, साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार
सम्प्रति - शिक्षक 
संपर्क -गाँव - सतौज , -  धरमगढ़ , जिला- संगरूर- 148028 (पंजाब)
मोब - 09417241787, 09592274200

पंजाबी कहानी - गलत-मलत  ज़िन्दगी          

          लेखक - परगट सिंह सतौज (अनु : हरकीरत हीर )

         मौसम हुमस भरा है, पूरी तरह तूफ़ान आने के पहले की सी शान्ति। पर मैंने उसके घर आज तूफ़ान जरुर ला देना है। उसने मुझे समझा क्या है ..? मैं इतना भी गया -गुजरा नहीं कि अपना हक़ गवांकर यूँ चुप बैठा रहूँ। मैंने भी उसे आज दिखा देना है , अगर तू मेरे साथ ऐसा कर सकता है तो बनिये के मैं भी नहीं जन्मा। ध्या ले आज जिस भगवान को ध्याना है ... मांग ले जौन सी मनौतियाँ मांगनी हैं ....!

         ''मैंने कहा सुनो जी  ! मैं कब की आवाजें देती जा रही हूँ ''  मेरी पत्नी रसोई में रोटियाँ सेंकती मेरे सर पर आ खड़ी हुई। मैं तबक कर उसकी तरफ देखता हूँ जैसे काफी सालों से बिछड़ी को बड़ी मुश्किल से पहचान रहा होऊँ।
         ''बाहर मुंडा (लड़का ) कब से रोये जा रहा है उसे देख लो जरा मैं रोटियाँ सेंक रही हूँ। '' पत्नी मुझे घूरती सी मुड़  रसोई में जा घुसी है। मैं बाहर से अपने तीन साल के बेटे को गोदी में उठा कमरे में आ गया हूँ। थोड़ी देर बाद पत्नी गीले हाथ तौलिये से पोंछती अन्दर आ जाती है।  
''तुम्हारी नज़रें आज कैसी उखड़ी - उखड़ी  सी लग रही है ..?  '' पत्नी मेरी आँखों में देखती,  मेरी अन्दर की उथल-पुथल को पकड़ने की कोशिश करती है।
          '' नहीं तो !  यूँ ही वहम हो रहा है तुम्हें   '' मैं अपने आस-पास झूठ की दीवार चिनता हूँ ताकि वह मेरे अन्दर प्रवेश न कर सके। 
        ÒÒ रोटी लाऊँ ..? ÓÓ पत्नी पूछती है।
        ÒÒ हैं ..! हाँ ....! ÓÓ मैं अपने भीतर के समुंदर में फिसलता- फिसलता मुड़ परत के उसे Òहाँ Ó कर देता हूँ और मुड़ उसी समुंदर में डुबकी लगा जाता हूँ।

           'कभी माँ भी इतनी निर्मोही बन जायेगी?' मैंने यह कभी सपने में भी नहीं सोचा था पर यदि कभी यह सच हो जाए तो ...? तो बन्दे के अन्दर ऐसे झक्खड़ झूलते हैं कि जहां से भी ये पार हो जाएँ सबकुछ पलों में तहस-नहस हो जाए  ।
            माँ को तो मैं दुसरा नहीं पहला  दर्जा देता था रब्ब का । फिर उसे क्या मज़बूरी आन पड़ी थी कि उसने मेरा मांस काटकर किसी दुसरे को खिला दिया ? जब मुझे पता चला तो मैं तो जीता जी ही  मर गया था। माँ ने मार दिया था। माँ ने अपने हिस्से की सारी  जमीन बड़े के नाम लगवा दी थी। मैंने रिश्तेदारों को भी बुलाया पर उसने किसी की न मानी। उलटे भैया मुझे मारने दौड़ा ।
पत्नी ने तो मुझे पहले ही बहुत समझाया था, '' यह काला नाग है, काला नाग ! इसे दूध मत पिला एक दिन तुझे ही डस लेगा. '' 

           ''अरे भोली ! खून के रिश्ते हैं , यूँ ही नहीं टूटते !'' मुझे उसकी बातें बुरी लगतीं।
''तुम तो सतयुग की बातें करते हो। अब पहले जैसा खून नहीं रहा !'' वह समाज के ऐसे सच का आइना मुझे दिखाने की कोशिश करती पर मैं आँखें  मूंद लेता।  
पर जब जमीन बड़े के नाम हो गई तो मेरी आँखें , मुंह , कान सब खुल गए और फिर बंद नहीं हुए।

           मुझे पिछले समय के दौरान उनकी ओर से मेरे साथ की गई ज्यादती इस अनहोनी के लिए अभ्यास   लगी। अगर मैं पहले ही सचेत हो जाता तो .....!
           पहली बार बड़े ने मेरे साथ तब की,  जब मैं किसी दोस्त के पास तीन - चार दिन बाहर गया हुआ था। मुझे पीछे से मामा जी का फोन आया , '' मक्खन अलग होना चाहता है। कहता है बना हुआ घर मैंने लेना है। अब कैसे करें ..?''
'' मामा जी अभी उसे अलग होने की क्या आन पड़ी थी ...? अभी तीन महीने ही तो हुए हैं  उसकी शादी को  ...?''

          '' हमने तो बहुत समझा के देख लिया पुत्तर , मानता ही नहीं किसी की ! ''

           '' चलो यूँ करो फिर जो घर माँगा है दे दो उसे। '' मैं ज्यादा बखेड़े में नहीं पड़ना चाहता था । 
जब मैं वापस गाँव आया तो माँ-बाप के साथ मेरा समान तुड़ी (भूसे ) वाले कमरे में पड़ा था। फिर कितने ही समय में मैं उसे धीरे- धीरे बैठने योग्य बना पाया था। 

          ''लो जी रोटी !''

          ''........! ''

          '' रोटी ...!  कहाँ खो गए ...?'' पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा। उसकी मुस्कराहट के पीछे छुपा व्यंग मुझे प्रत्यक्ष दिख रहा था। 

           मैं रोटी खाने लग पड़ा।  वह पता नहीं क्या बोलती  गई। मुझे उसकी बात समझ नहीं आई। मैं बस ऊपरी सी  ' हाँ -हूँ' करता रहा।  मेरे मन में तो उसकी एक ही बात कील की सी गडी थी,  '' तुझे मर्द कौन कहता है  ? तू तो नामर्द  है नामर्द।  दुसरा  चाहे तो तुम्हारे सर पर हग जाए तुझे फिर भी सुरति नहीं आएगी।  अब तो अपने हिस्से की जमीन भी ले उड़ा वह  अब इससे ऊपर क्या होगा ? अब खुद तो मरे ही पड़े हैं कहीं वह सर पर ही न चढ़ बैठे  , पर तुम जैसे मिटटी के ढेर पर कोई असर हो इन बातों का तब  न ...? '' 

           जब से पत्नी ने यह बात कही हैं  मेरे अन्दर कोहराम सा मच गया है।  क्रोध का गोला मेरे सर की तरफ चढ़ने लगा है। जी करता है बम सा फट जाऊं। खुद भी तबाह हो जाऊं और अपने आस -पास का सबकुछ तहस - नहस कर दूँ।  मैं अपनी पत्नी के सामने नीचा नहीं होना चाहता था । मैं तो हर बार दूर की  सोचकर चुप  रह जाता था। पर मेरी इसी सोच ने मुझे मेरी पत्नी के आगे नामर्द बना दिया था। डरपोक और कमजोर। पर अब मैंने उसे दिखा देना है, तेरा सुक्खा कमजोर नहीं। मैं अपनी मर्दानगी के गिर रहे मीनार को मुड़ उसकी आँखों के आगे उसारूंगा। आज के बाद वह मुझे कभी नहीं कहेगी तुझ में तो जरा भी अनख नहीं है। '' 

           '' मुझमें अनख है राजी।  कल का सूरज तेरे सुक्खे की अनख  की गवाही लेकर चढ़ेगा, तुम देखती रहना !'' मेरा अंतर बोलता है। 

           पत्नी बर्तन मांजकर बिस्तर पर आ बैठी है। मैं आने वाले समय को देखते हुए उसका मन पढ़ने की खातिर बात चलाता हूँ , '' अगर मैं मर जाऊं तो तुम क्या करोगी ...?''
            '' लो जी ..! ऐसी बातें क्यों करते हो जी , मरें तुम्हारे दुश्मन !'' पत्नी के इस जवाब पर मुझे लगा मैंने बात कुछ ज्यादा करड़ी पूछ ली है। मैंने बात को जरा नरम करते हुए दोहराया, '' अगर मैं कई सालों के लिए बाहर चला जाऊं , घर को तुम अकेली संभाल लोगी  न ...?'' मेरी आँखों के आगे जेल दिखाई दे रही थी। 

             '' बाहर कहाँ ..?'' वह मेरी बिना सर -पैर की बातों पर हैरान होती है।
             '' ना, मान लो अगर मैं चला जाऊं तो ...? ''
             '' मुझे नहीं तुम्हारी कोई भी बात समझ आती।'' वह नराजगी सी दिखाती पासा पलट लेती है जैसे मुझे देख कर अपने मन का दरवाजा बंद कर लिया हो। उसने अपना मन पढ़ने देने से पहले ही मुझे दर से वापस मोड़ दिया था।
          अब मैं उसके सो जाने का इन्तजार करता हूँ। वह मेरे साथ कुछ देर बातें करती है और फिर बेटे को दूध पिलाकर सो जाती है। मुझे उस समय की इतनी बेसब्री हो रही है कि मैं  बीत रहे एक - एक मिनट को गिन रहा हूँ। समय चींटी की चाल चलता १२ तक पहुँच गया है। मैं धीरे से उठकर चप्पलें पहनता हूँ और अन्दर आ जाता हूँ फिर अलमारी की ओट से  किरच (दाव जैसा हथियार ) उठा लेता हूँ । उसे उलट-पुलटकर किसी कीमती  शय की तरह निहारता हूँ  और फिर कमर में खोंस लेता हूँ। अलमारी के पास से गुजरने लगता हूँ तो मुझे आदमकद शीशे में से अपना चेहरा नज़र आता है। एक पल रूककर मैं शीशे में अपना चेहरा निहारता हूँ , '' मुझे अपना चेहरा ही अपना नहीं लगता। मैं और नजदीक होता हूँ तो माथे पर पड़ा काट का पक्का निशान मुझे यकीन दिला देता है कि यह मैं सुक्खा ही हूँ। मैं निशान के ऊपर हाथ फेरता हूँ जैसे वह दुबारा ताजा हो गया हो और उसमें से लहू रिस -रिस कर चेहरे पर लकीरें बना  गया हो।

             उस दिन भी इसी तरह खून की धारें चलीं थीं  जब दीवार  की लड़ाई के पीछे बड़ा मुझे सोते वक़्त गंडासा मार गया था। वह आया तो मुझे मारने के इरादे से ही था पर निशाना  गलत लगने के कारण मैं जल्दी से उठकर पीछे हो गया था। वह उलटे पैर वापस भाग गया था।
         यह निशान  देखकर मेरा क्रोध और उबाल खा गया। मैं बाहर निकलता हूँ। राजी और जोनी  सोए हुए हैं। मैं उनके सिरहाने जा खड़ा होता  हूँ। जोनी सोया हुआ हँस रहा है। मुझे उसके भोले चेहरे पर तरस आता है। फिर मुझे उसका हँसता चेहरा रोता हुआ जान पड़ता है। उसके फटे मैले-कुचैले कपडे  हैं। राजी का भी यही हाल है। बिखरे बाल,  टूटी चप्पलें , पैरों में मोटी -मोटी  बिवाइयां। चेहरे पर बिवाइयों जैसी क्रूर झुर्रियां; जैसे कोई भिखारन हो। वे दोनों दरवाजे पर खड़े मेरा इन्तजार कर रहे हैं पर मैं नहीं आता। जब मैं वापस आता हूँ तबतक वे खड़े - खड़े वहीँ बुत बन जाते हैं। 

           राजी पासा पलटती है तो मुझे सोच में से बाहर खींच लाती है। मैं जोनी का एक बार मुंह चूमता हूँ और किरच को संभालता बाहर निकल जाता हूँ। 
      
           बाहर गली में आता हूँ तो अमरु बाबे के घर के बाहर का बल्ब जलता हुआ दिखता है। उसके दरवाजे  के आगे पड़ी चौकड़ी सूनी है। मुझे बाबे अमरु की बात याद आती है। वह परसों चौकड़ी पर बैठा मेरी सुनाई किसी घटना पर टिप्पणी करता हुआ जैसे मुझे समझा रहा था ,   ÒÒ अब वो वक़्त नहीं रहा पुत्तरा सतयुग वाला। अब तो सारी  ज़िन्दगी ही गलत -मलत सी हुई पड़ी है। जैसे कई रंग एक साथ गिर कर इकट्ठे हो जायें , तो फिर उनकी कोई पहचान नहीं रहती। आज के जमाने के बन्दे भी बस ऐसे हुए पड़े हैं। हमें पता ही नहीं चलता कौन अपना है और कौन बेगाना ? यह भी नहीं पता कब हमारा भाई ही दुश्मन का सा काम कर जाए या कोई गैर भाई से भी बढ़कर निकल जाए। इस समय तो पुरानी कहावतों के अर्थ ही सारे उलट हो गए हैं ! बस रब्ब भली करे ! ÓÓ बाबे ने किलोमीटर का सा लंबा सांस लिया था जैसे वह सारे रिश्तों की कड़वाहट को अपने अन्दर भरकर खत्म कर देना  चाहता हो।

         ÒÒ हाँ बाबा तेरी बात सोलह आने सच निकली ÓÓ यह बोल मेरे अन्दर से उठे और फिर अन्दर ही जप्त हो गए। 

          मैं बाबे अमरु  के घर की ओर  देखता हुआ आगे की ओर चल पड़ता हूँ। पीछे फ़म्मन के डेरे की ओर से आये दो कुत्ते मुझे देखकर भौंकने लगते हैं। पर मैं उनकी ओर से बेध्याना हुआ चला जा रहा हूँ। आगे जी . टी . रोड पर वाहनों की लाइटें उनकी गूंज के साथ- साथ भागी जा रही हैं।  मैं सड़क पर आ गया हूँ। सामने आ रहे ट्राले की गूंज सुनकर रुक जाता हूँ। वह शोर मचाते  , दैत्य की तरह धरती हिलाता पार हो जाता है।  उसके जाने के बाद धरती फिर शांत हो जाती है जैसे भूचाल झटके देकर लौट गया हो। मैं आस-पास देखता सड़क पार कर जाता हूँ।


         मैंने अपने खेत की ओर जाती पगडण्डी पकड़ ली है। धान के खेतों से गर्माहट भरी इक भड़ास सी आ रही है । खेतों में कोठियों में लगे बल्ब जुगनुओं की तरह चमक रहे हैं। ज्यों -ज्यों मैं आगे बढ़ता जा रहा हूँ सड़क पर चलते वाहनों की आवाज़ भी किसी के मुंह पर हाथ रख देने जैसी गहरी होती जा रही है। मैं समय देखता हूँ: एक बजने वाला है। दो बजे खेतों वाली लाईट भी चली जायेगी । मक्खन एक बजे किसी क्यारे में नक्का करके पड़  जाएगा और फिर सुबह उठकर घर को जाएगा। जाएगा नहीं,  जाता था पर अब नहीं जाएगा।

        मैं कुछ समय और  पार करने के इरादे से पक्के सूए की पुलि पर बैठ जाता हूँ और उसकी मौत की घड़ियाँ गिनने लगता हूँ।

         मक्खन अब तक मेरे ऊपर चढ़ता आया था। पहले घर के बंटवारे के समय मुंह लगा फिर ट्रैक्टर के बंटवारे पर अड़कर खड़ा हो गया। मैंने , ''चलो भाई है समझ कर वह भी छोड़ दिया। फिर जमीन की आध भी करवा ली। बोला मैं बापू को आधे कीले का ठेका दे दिया करूंगा। दो साल दिया फिर ठेका भी बंद। बोला जिधर काम करता है उधर ही रोटी भी खाए। मैंने फिर मन को समझा लिया, Ò वह बेशक कपूत बन जाये पर मैं नहीं बनता  , मैं करूंगा  सारा खर्च माँ -बाप का !Ó
         कोई साइकिल वाला मेरे पास से गुजरने लगता है तो मैं सर झुका लेता हूँ ताकि मुझे पहचान न ले। उसकी मौत के बाद तो मैंने खुद ही प्रत्यक्ष हो जाना है।

            मैं फिर समय देखता हूँ एक से पार हो चुका है। मैं उठकर चल पड़ता हूँ।  बड़ी पगडण्डी से हमारे खेत की और जाती पगडण्डी पर मुड़  जाता हूँ। आगे हमारी जमीन है पूरे छह कीले का टक । मैं फसल पर निगाह मारता हूँ।  मेरे दो कीलों  की फसल मेरे जैसी ही दब्बू हुई खड़ी थी।  उसके चार कीलों में खड़ी फसल मेरी फसल से दुगुनी फैली हुई लगती है जैसे वो भी मक्खन के जैसे हकारी हुई मेरी फसल के ऊपर से फ़ैल जाना चाहती हो। मैं उधर से ध्यान हटाता मुड़कर कोठे की ओर चला जाता हूँ। सामने खाट  पर वह पड़ा है। कभी बापू की लाश भी यहीं पड़ी थी।जब बापू रात जीरी को पाने देने गया सुबह मुड़कर नहीं लौटा ... तो मैं साईकिल लेकर उसे देखने चला गया था। धूप चढ़ी हुई थी पर बापू अभी भी मच्छरदानी में इस तरह पड़ा हुआ था जैसे उसके लिए अभी भी आधी रात हो। मैंने पास जाकर देखा बापू का चेहरा मुझे बड़ा डरावना लगा। एक डर मेरे शरीर में जहर जैसे फ़ैल गया। मैंने मच्छरदानी उतारकर बापू को हिलाया पर वह तो .....!

           मेरी चीख निकल गई।  मुझे जोर -जोर से रोता देखकर बाबे अमरु का बेटा जमेर मेरे पास आया। होनी तो घट चुकी थी। उसने ही मुझसे मोबाईल लेकर मक्खन को फोन लगाया । वह कई लोगों को साथ भी ले आया था । लाश घर ले जाई गई।

            '' अब मिटटी रोलने से क्या मिलेगा ताऊ; हमें सबकुछ दिख तो रहा है !'' जब बापू की लाश को डाक्टर के पास ले जाने की बात चली तो बड़े ने आँखें पोंछते हुए दबी सी आवाज़ में ना नुकर कर दिया था।
बापू की लाश को तो खपा दिया गया था पर लोगों के मनों के अन्दर के सवाल उनके अन्दर न खपे। कुछ ही दिनों के बाद बात की भाप उठने लगी थी। जिसका सारा शक मक्खन की ओर जाता था। लोग बातें करते थे , लाश के गले में नील पड़े हुए थे , आँखें बाहर को निकली हुई थीं . '' किसी ने बापू का गला घोंटा था। सिद्दर मज़बी ने तो उस रात मक्खन को खेत की ओर जाते भी देखा था।

             लोगों की इन बातों ने मुझे सोच में डाल दिया था।


         पहले तो मुझे ऐसा सोचने की होश ही नहीं थी। पर लोगों की अजीब -अजीब बातों ने मेरे अन्दर कई सवाल उठा दिए थे। जिससे  शक की सुई मक्खन के ऊपर ही जा खड़ी होती थी।
            
           उसी रात मैं पेशाब करने उठा था तो मुझे माँ और मक्खन की खुसर - फुसर सुनाई दी और फिर उनका बाहर का बार भी खड़का था। इस सब में माँ भी शामिल थी।
           शराबी बापू से मार खाने के बाद माँ जब भी बापू को गालियाँ देती तो वह अपनी इस भयानक नियत का संकेत जरुर कर दिया करती थी ,ÒÒ टैठिया! मैं तां कहिनी आं तूं पिआ ही रहिजे।जे तूं मरजें , मैं शुकर मनावा! तेरे बिना मेरा कोई देश सूना नहीं हुंदा। जेहडियाँ रंडियां ने वधिया नींद सोंदियाँ ने वधिया नींद उठदिआं नेÓÓ (ÒÒ नीच मैं तो कहती हूँ तुम पड़े ही रह जाओ। अगर तू मर जाये मैं शुक्र मनाऊँ। तेरे बिना मेरा कोई देश सूना नहीं हो जाएगा। जो रंडियां हैं खुद की  नींद सोती हैं और खुद की नींद उठती हैं !ÓÓ)
        
           कभी - कभी लड़ाई के बिना भी माँ के अन्दर की यह ख्वाहिश होंठों पर आ जाती। वह कितनी - कितनी देर गाँव की रंडी औरतों के सुखी जीवन की बातें करती रहती।
         
          अब मुझे लगता है बापू ने भी अपनी मौत की राह आप ही तैयार कर ली थी। बापू बड़ा जिद्दी था। जो बात कह देता , करके दिखाता। वह जब भी मक्खन के साथ लड़ता यह सुनाई जरुर करता, मैं मरने से पहले तुझे मांगने जरुर लगाके जाऊंगा , देखते जाना तुम जो तुझे मांगने न लगवाकर गया तो।  बच्चू ! आँखों में घूंसे दे-दे  रोयेगा !

          मक्खन को डर था बापू जमीन उसे नहीं देगा। उसने मन में यह डर पाल रखा था बापू सारी  ज़मीन  मेरे नाम लिखवा देगा। मैंने  उसके इस डर को कितनी बार निकालने की कोशिश भी की, उसे यकीन दिलाया , कसमें खाईं , मैं बापू को ऐसा नहीं करने  दूंगा पर वह मेरे यकीन दिलाने पर भी विश्वास न कर पाया।

          बापू की मौत से कुछ दिन पहले मैंने माँ और मक्खन को कितनी बार खुसर -फुसर करते सुना था। जैसे वे कोई गहरी साजिशें रच रहे हों। पर उस समय मेरे ध्यान में यह बात बिलकुल नहीं आई थी ।
       अब मुझे बापू का मौत देखता वह चेहरा नज़र आने लगा है।पीला पड़ गया बापू का चेहरा, गिड़गिड़ाती आँखें। मुझे दिख रहा है मक्खन ने बापू की गिड़गिड़ाहटों को पैरों तले रौंदते हुए गले पर पकड़ और मजबूत कर दी है। बापू हाथ-पैर मारता है , देह तोड़ता है और फिर शांत हो जाता है। मक्खन हँस रहा है। उसकी इस हँसी में माँ भी शामिल हो जाती है और फिर उसकी पत्नी भी। हँसते हुए उन्होंने मुझे सामने खड़ा देख लिया है। उनके हँसते चेहरे गंभीर हो गए हैं। वे तीनों आपस में नज़रें मिलाते हुए मेरी ओर बढ़ने लगे है और .....!
           सामने की डाल से कोई पक्षी चिर .....चिर .....करता उड़ जाता है। मेरी सुरति लौट आती है। मैं कोठे के पास खड़ा मक्खन को देख रहा हूँ। वह डरावने खर्राटे मार रहा है जैसे कोई लोक कथाओं  के बीच  का दैत्य मानव खून पीकर डकारें मार रहा  हो ।
           मैं किरच अपने हाथ में कस लेता हूँ। इक ताप मेरे पैरों से निकलकर सर तक फ़ैल गया है। मुझे महसूस होता है जैसे मेरे अंगों में दुगुनी ताकत भरती जा रही है। मैं धीरे - धीरे पैर उठाता उसकी खाट  की ओर बढ़ने लगता हूँ। मैं उसकी खाट के बराबर जा खड़ा हुआ हूँ। वह मेरी रातों की नींद , दिन का चैन छीनकर  खुद बेफिक्र सोया हुआ है। उसे यूँ सोया देख मेरा क्रोध भड़क उठता है। मेरा दिल तेज - तेज धड़कने लगता है। बस ! आज सब हिसाब बराबर करने का मौक़ा है। अगर यह मौक़ा छिन गया तो .....!

           मैं अपने शरीर में इतनी शक्ति भर लेना चाहता हूँ कि उसे जागने का मौक़ा भी न मिले। वह जागने से पहले ही सदा की नींद सो जाए।
                
            मैं खाट के और नजदीक हो गया हूँ। बिजली की सी तेजी जितनी जल्दी से मैं मच्छरदानी का लड़ उठाता हूँ और पलों क्षणों में ही एक , दो , तीन , चार, पांच ...पता नहीं कितने वार मैं उसके ऊपर कर देता हूँ। मैं वार इतनी तेजी से करता हूँ कि  मुझे खुद भी पता नहीं चलता  कि उसने जागकर मेरा विरोध किया था या नहीं। जब मेरी सुरति लौटती  है, वह खाट पर खून से लथपथ पड़ा था।

            मैं जीत  के अंदाज़ में बाहें ऊपर उठाता हूँ। अपने खेत की मिटटी को चूमता हूँ फिर खेत का एक फेरा लगाता हूँ। मुझे लगता है जैसे मेरी फसल उसकी फसल से आज रात भर  में  ही दुगुना कद बढ़ा गई है। मुझे सुनाई देता है जैसे गाँव वाले कह रहे हों ,   ÒÒअच्छा किया,  इस पापी का तो यही अंत होना चाहिए था। जैसे मैं अपनी पत्नी के आगे एक बित्ता ऊंचा हो गया होऊँ। वह मुझे शाबाशी देती कह रही हो, ''वाह रे अनखिया !ÓÓ
             मैं गाँव की ओर तेज कदमों से बढने लगा हूँ। पर ..यह क्या ....?  धीरे -धीरे मेरी चाल कम होती जा रही है। मेरे अन्दर कुछ तिड़कने सा लगा है जैसे मैं अपने आप को कहीं पीछे छोड़ आया होऊँ। अन्दर कहीं सुनामी उठने की सी उथल - पुथल मची है। मुझे आगे कदम बढ़ाना मुश्किल हो रहा है जैसे मेरे पैर चलने से जवाब दे गए हों। मैं कुछ देर खड़ा सोचता रहता हूँ। फिर अचानक घूमकर पीछे की ओर भागने लगता हूँ। कोठे के पास जाते ही मैं भाई की मच्छरदानी उठाकर दूर फेंक देता हूँ। उसकी खून से लथपथ हुई देह से लिपट जाता हूँ। टिकी रात में मेरी दहाड़ें दूर-दूर तक सुनाई दे रही हैं .....

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अनु :   हरकीरत हीर
18 ईस्ट लेन , सुन्दरपुर, पोस्ट - दिसपुर 
हॉउस न -5 , गुवाहाटी -5 ( असाम )
मोब - 9864171300
          
        

Wednesday, February 20, 2013

इमरोज़ की दो  नज्में .... 
 (१)
सच या सोच .... 

तितली के परों  पर
तितली जितना अपना पता
तूने  लिखकर भेजा है या नहीं
मुझे अब याद नहीं
पर इक तितली
मेरे आस-पास उड़ती रहती है
और जब भी मेरा दिल करता है
मैं तेरा पता
उडती तितली के परों  से
देख लेता हूँ,  पढ़ लेता हूँ
कभी फूल बनकर
कभी दौड़ता बाल बनकर ...
यह सच है या मेरी सोच ही है
मैं सच के साथ भी खुश हूँ कि यह मेरा सच है
और सोच के साथ भी खुश हूँ कि यह मेरी सोच है .....

इमरोज़ ....
अनुवाद - हरकीरत 'हीर'

(२)

मासूम खेल .....


इक नज्म जैसी तितली को
इक फूल जैसे बाल के साथ
कभी फूलों के बगीचे में
और कभी ख्यालों के बगीचे में
खेलते हुए मैं अक्सर देखता हूँ ...

तूने जो अपना पता भेजा है
वह डाक का पता है ..
लम्बा सा जो याद नहीं रहता
मुझे तितली के परों पर लिखा
तितली जितना तेरा पता चाहिए
जो तितली के साथ मेरे सामने भी
उड़ता रहे और मेरे ख्यालों में भी
जिसे उडती तितली के परों से
कभी मैं फूल बनकर पढ़ लिया करूं
और कभी दौड़ता बाल बन ....

यह मासूम खूबसूरत खेल
दोनों को रोज़ उडीकती रहती है ....

इमरोज़ ....
अनुवाद - हरकीरत 'हीर'
इमरोज़ की कुछ नज्मों का अनुवाद ......

(1)
तितलिओं संग खेलते -खेलते
उड़ते-उड़ते , हँसते -हँसते
पता ही न चला
कब इक तितली के ख़ास रंगों से रंगे हुए
मैं जवान होता गया
और अपनी मर्ज़ी का भी होता-होता
आर्ट स्कूल पहुँच गया ....

कक्षा की लड़कियों में
एक ख़ास लड़की देखी, देखने वाली
वह ख़ास लड़की जब भी कक्षा में आती
अपनी जगह से उठ के
 अपनेपन से उसे देखता
वह भी देखते को देख
मुस्कुराती भी और देखती भी रहती
मेरे बनाये चित्र वह बड़े चाव से देखती
जब भी चित्र बनाता
वह मेरे पीछे खड़ी निहारती रहती
और सामने आकर मुझे भी .....

इक दिन पास आ
उसने पूछ ही लिया
मुझमें तुम्हें ख़ास क्या दिखता है ...?
हर रोज़ देखने वाला
तुम्हारी ख़ास ख़ूबसूरती
जिसे देख मैं खूबसूरत होता रहता हूँ
तुम कोई ख़ास हो
खूबसूरती को देखकर खुबसूरत हो जाने वाला
मैंने तुझे ही देखा है ...सिर्फ तुझे ....

- इमरोज़

अनुवाद - हरकीरत 'हीर'

(2)

कुछ भी हमेशा के लिए नहीं होता
जो कल में पैदा हुआ था
वह कल में ही पूरा भी हो गया था
आज रोज़ आता है
सच्च ज़िन्दगी का भी
नयेपन का भी
खूबसूरती का भी
और ख्यालों का भी .....

हर युग अपना सच खुद बनता आ रहा है
कल भी अपना सच खुद बना था
और आज भी अपना सच खुद बनेगा ....

सच हमेशा अपने आप जी कर बनता है
सच किसी को भी विरसे में नहीं मिलता
किसी का भी सच अपना सच नहीं हो सकता ....

युग बदलते आ रहे हैं
और नाम भी .....
पता नहीं तुमने कितने नाम जीये
कभी तू राधा कभी तू मीरा
कभी तू सोहणी कभी तू हीर होकर
मेरा सच बनती आ रही हो और आज
मेरा आज भी बन रही हो ......

- इमरोज़

अनुवाद - हरकीरत 'हीर'

Friday, February 15, 2013

लेखक परिचय :
नाम :जसवीर सिंह 'राणा'
जन्म- १८ सितम्बर 1968
शिक्षा : एम.ए,बी.एड।
संप्रति :शिक्षण
प्रकाशित कहानी संग्रह :( १) खितियाँ घूम रहीआं ने ( २) शिखर दुपहिरा 
पुरस्कार : कहानी संग्रह '
शिखर दुपहिरा ' को पंजाब भाषा विभाग द्वारा 'नानक सिंह' पुरस्कार
कहानी 'नस्लाघात ' बी.ए.के पंजाबी सिलेबस में शामिल
कहानी 'चूड़े वाली बांह '२००७ में सर्वश्रेष्ठ कहानी घोषित
कहानी 'पट्ट ते बाही मोरनी ' २००९ की
सर्वश्रेष्ठ कहानी घोषित
 

संपर्क-
ग्राम : अमरगढ़
जिलाः
संगरूर-१४८०२२ (पंजाब)
फोनः०९८१५६५९२२०
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कहानी ....
घुंघरू कथा
.....लेखक- जसवीर 'राणा' ...
(अनु . हरकीरत 'हीर')

''उई अल्लाह..!...मैं मर जाऊं ..!...क्या हुस्न है ...!''आईना  देखकर  मैंने अपना नीचे का होंठ काटा   ....
  नाज़ से नाक सिकोड़ा तो  मेरी नथ-मछली काँप उठी ....
मैंने आईने को आँख मारी ,''क्यों बे मुए ! बता न मैं कौन हूँ ...?''
पर वह कुछ  न बोला।   मरजाणा  मर्दों की तरह चुप रह गया। ...  मैं कितनी ही देर औरतों की तरह उसकी ओर ताकती रही।  जब वह नहीं बोला , मैंने ताली मारी ,'' ओये होए !...अबे जा हट ...तू भी वही निकला ..!''
अपना हुस्न देख मेरी 'आह' निकल गई। 
मैं लाल चूड़ियों की ओर देखने लगी। बालों की लट मेरे माथे पे आ गिरी। मैंने कलाई पे बाँधी घुंघरुओं वाली चूड़ी को चूम लिया। मुई मेरे सूट से बिलकुल  मेल खाती थी। मेरा ध्यान आँखों की तरफ गया , ''उफ्फ ! ये आँसू ...? मेरा काज़ल गालों से बह निकला था। मैंने दोनों हाथों से मुँह ढांप लिया ..

'' मुँह छिपाने से पहचान नहीं छिपा करती  रीना !...इनका सामना कर ..." मुझे मीना महंत का थप्पड़ याद आ गया। 
जब मैंने पहली बार मुँह छिपाया था उसने थप्पड़ जड़  दिया था गालों पे।
मैंने धीरे -धीरे चेहरे से हाथों को हटाया ... तिरछी आँख से आईने की ओर देखा ...
''अरी सुन जरा ...यह आईना भी तो मर्दों का ही बनाया हुआ है ..इसने कुछ  नहीं बताना तुझे ! तू अपने पैरों की ओर देख ...!'' चारपाई पे बैठा हाजी हाथों से मेरे पैरों  में बंधे घुंघरुओं की ओर इशारा करने लगा।
पान चबाता हुआ वह कब का मेरी हरकतों को देखे जा रहा था।
हम अजीब परिस्थितियों से गुजर रहे थे।
बेइमान रब्ब ने भी तो हमारे साथ बुरा किया था। सब-कुछ आधा -अधूरा बनाकर  छोड़ दिया।  हममें से न कोई औरत था न कोई मर्द।  यूँ हमारी देह में औरत भी बसती थी और मर्द भी।
'' नहीं रीना  ! हमारे अन्दर कुछ नहीं बसता..''..पान चबाते-चबाते हाजी दाँत पीसने लगा। 
जब मैं न हटी , उसने पान भरी थूक की पिचकारी दूर दे मारी। 
उसकी हरकत देख मैं तड़प उठी , '' रुक जा हाजी ..! अब और  मत  बोलना ...! मैं कहे  देती हूँ   ...''
मेरी बात सुन वह तैश में आ गया और उठकर भीतर चला गया। 
मैं बाहर की ओर जाते जैले की ही तरह उसकी पीठ देखती रह गई, लेकिन न वह वापस परता न ही जैला ....
यदि मुझे पता होता  तो जैल को कभी न छेड़ती , मैंने तो मजाक किया था , ''अबे चल बे ...! रहा ना वही नचने का नचना ही ...''क्या पता था कि वह भीतर से इतना टूटा हुआ निकलेगा  ..
मुई बात भी कुछ ख़ास न हुई थी ....नहीं बात तो कुछ ख़ास ही हो गई थी।  मैं यहाँ खड़ी थी आईने के पास  जिस वक़्त जैला  आया। आते ही मुझे देव राजमिस्त्री  की बातें  बताने लगा। पहले भी बताया  करता था। मैंने कभी विशेष ध्यान नहीं दिया था  बस अनमनी सी सुनती रही ; पर इस बार उसकी बात बड़ी तीखी थी, सुई की तरह चुभ गई। वह तड़प उठा , मुझे धक्का मार खुद आईने के सामने जा  खड़ा हुआ।  मैं वहीँ खड़ी उसे देखती रही। मुआ अजीब सी हरकतें करता रहा ; कभी सर पर बालों का जुड़ा  सा बना  लेता कभी चोटी  कर  लेता ,  कभी चुनरी बाँधने लगता तो कभी गमछा बाँध लेता।  दो-एक मिनट आईना देखता फिर सुई  बदल जाती।  टोंटी पर से मुँह धोता ,गमछे से साफ करता फिर कभी चोटी  कभी जुड़ा करने लगता।  उसका पागलपन देख कर मैंने उसे धक्का मारा , ''अबे  जा परे ...वही ...!''
'' रीना तू भी  मुझे ...!'' लोगों का धिक्कारा हुआ वह मेरा धक्का न सह सका ...गमछे से आँखें पोंछता वह बाहरी दरवाजे से बाहर निकल गया ....मैं भाग कर गली में  गई , कितनी ही आवाजें भी लगाईं , ''अबे जैले  लौट आ जालिम ...''

'' जा नहीं आना वापिस तो मत आ , पापी कहीं का ..'' मैंने आईने को जीभ दिखाई , नाक सिकोड़ा  ..ताली बजाती हुई बाहर आ गई। 
आँगन में आकर धरती पर एड़ी मारी , घुंघरू छनक उठे।  मैं गाने लगी ,  '' घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं ....''
'' कभी इस पग में कभी उस पग में ...बंधता ही रहा हूँ मैं ....'' भीतर से बाहर आता हाजी भी गाने लगा। 
मेरी एड़ी उसकी ताली ...मेरे घुंघरू , उसके बोल ...हम जैसे पगला गए थे ..
''घुंघरू की तरह ...घुंघरू की तरह....घुंघरू की तरह...'' मैं हाजी के साथ पागलों की तरह नाचने लगी ...मन में जैला-जैला करती पता नहीं कब तक नाचती रही।  जब सुरती लौटी मुई धरती जैसे घूम रही थी।  मुझे चक्कर आने लगे। हांफता हुआ हाजी चारपाई पे जा गिरा। उसे आँख मार मैं दीवार की टेक लगा  खड़ी हो गई।  फिर धीरे-धीरे नीचे बैठ गई। 
बैठते ही आँखें बाहर की ओर देखने लगीं थीं । कोई खुदा का बन्दा दरवाजा खटखटा रहा था। शायद जैला लौट आया हो ....सोचती हुई मैं फिर चुहलबाजी पे उतर आई, '' इस घर का द्वार खटखटाने की जरुरत नहीं प्यारे ...आजा कौन है तू ....''
'' मैं हूँ रीना.... '' कहता हुआ हरामी कोका पंडित चला आ रहा था।
था तो वह मंदिर का पुजारी परन्तु आदत बुरी थी मुए की ..मुआ गली के लड़कों को छुप-छुप सुहागरात मनाने की बातें बताया  करता।. उसके पास कोकशास्त्र  था जिसमें से पढ़कर वह बताया करता।  लड़कों ने तभी इसका  नाम कोका पंडित रख दिया था।
'' बोल पंडित ...क्या कहता है तेरा राम राज्य हमारे विषय में ...." चारपाई से उठते हुए हाजी ने कुर्सी की ओर इशारा किया। 
पंडित मेहमानों की तरह सजकर बैठ गया। 
सफेद बाल...हरामी आँखें ...गले में राम नाम का गमछा ...तिलक ..माला .....!
मेरी तरफ देख मुआ मुँह साफ करने लगा।  उसकी धोती की ओर देख मैंने फब्ती कसी  , ''हाय रे पंडित ...मैं मर जाऊं ..ला फिर खोल धोती ...''
राम...राम...रीना...राम...राम....राम-राम.....'' मेरी इच्छा को जानते हुए मुआ थूक उगलने लगा। 
मुझे मानों आग सी लग गई ... मैंने ताली पीटी  ...उठकर उसके पास जा बैठी ...
पाखंडी की चोटी  पकड़ उसकी आँखों में झाँकने  लगी ...''अबे मुए यदि तेरा धर्म हमें हमारी जगह नहीं दिला सकता ...फिर भला राम की गंगा मैली क्यों करता फिरता है ..? जा दफा हो जा यहाँ से ...नहीं तो यह चोटी  उखाड़कर पीछे दे दूंगी हरामी कहीं के ...!''
मेरा गुस्सा देख वह पापी डर  गया , उसने धोती संभाली और दरवाजे का रुख किया। मैंने उसके सर पर ठोंगा मारा ,वह कच्चा सा हो गया।  जब दरवाजे के पास पहुंचा धरती पर एड़ी मार हाजी ने ताली बजाई , ''आया बड़ा धर्म का ठेकेदार ...बातें तो देखो इसकी ....!''

वह कौन सी गली थी जहाँ रीना नहीं खड़ी हुई।  हमसे भला क्या छिपा  ..जिस बात के लिए वह जैले  के पीछे घूमता था।  वही बात मुझे भी बताने लगा।  उसे मेरी सलोनी सूरत पसंद आ गई थी। एक दिन मैं मंदिर वाली गली से गुजर रही थी वह भाग कर बाहर आ गया , '' तुझे हिजड़ा कौन कह सकता है रीना ...तू तो लड़कियों को भी मात देती है ....''
''तो फिर मुझे घर में बसा ले,  जानी ...'' मेरी बात सुन पाखंडी मंदिर में जा घुसा। 
'' साला पापी कहीं का ....आखिर हमारा भी कोई दीन धर्म है ..''! कोका पंडिताई धर्म को देख मुझे एक राम कथा याद आ गई , यह मुझे मीना महंत ने सुनाई थी।  उसने बताया कि जब राम चन्द्र जी चौदह  वर्ष का वनवास काटने हेतू घर से निकले उनके पीछे लोगों की अथाह भीड़ थी। जब राम जंगल में प्रवेश करने लगे उन्होंने कहा सभी  नर और नारी वापस लौट जायें। यह बात सुन सभी नर-नारी वापस लौट गए।  लेकिन भीड़ में  कुछ हम जैसे लोग भी थे वे न तो नर थे और  न ही नारी ,  वे वहीँ खड़े रहे। जब रामचन्द्र जी चौदह वर्ष का वनवास काट कर वापस लौटे उन्होंने महंत लोगों को वहीँ खड़े देखा।  उनके शरीर पर घास -फूस उग आया था। श्री राम ने उनके शरीर से अपने अंगूठे का स्पर्श किया शरीर घास-फूस से मुक्त हो गया।  प्रभु ने उन्हें वर दिया कि आज के पश्चात् आप लोगों की खुशियाँ मांगोगे।  ख़ुशी के अवसर पर कोई भी तुम्हें बधाई देने से इनकार नहीं करेगा। 

'' अब तो सारी दुनिया ही इनकार किये जा रही है रीना ...'' एक दिन नाच-नाच कर थका हुआ जैला ' राम  नाम सत्य ' करने लगा हुआ था .
मैं उसकी बातें सुन सोच में पड़ गई। रामलीला देखने वाली दुनिया कितनी लुच्ची हो गई है। यह मुई देखने सुनने तो रामलीला आती है पर मन में 'जैले  की लीला ' ही चल रही होती है। 
देखूं तो सही वहाँ  क्या था ..? राम वश हुई मैं एक दिन रामलीला देखने चली गई। थाने के पास खाली पड़ी जगह पर  मंच सजा हुआ था।  मैं लोगों की भीड़ में जा खड़ी हुई। आरती के बाद  जब राम-सीता प्रसंग शुरू हुआ लोगों की भीड़ छंटनी शुरू हो गई।  आधी तो दुकानों के आगे बने चबूतरों पर जा बैठी  आधी सड़कों पर घुमने लगी।
''मंत्री जी ! ...गाने वाली को पेश किया जाये ....'' जैसे ही मंच पर से प्रसंग  बदला , रावण बने हुए दुर्गा हलवाई की बांह हवा में लहराई।  स्पीकर में 'बिजली गिराने मैं हूँ आई ...' गीत बजने लगा। 
छँटती  हुई भीड़ आँधी की तरह इकठ्ठा हो गई।  देखने वालों की धक्का-मुक्की शुरू हो गई। 
कई वर्षों से राम-लीला में नचना बनकर नाचता आ रहा जैला श्री देवी की तरह कमर लचका-लचका कर नाचने लगा था। 
उसका नाच देख मैं तालियाँ बजाने लगी ...''वाह जैले ...!''
''बधाई हो जेठ जी  वाह ...!..वाह तेरी लीला बधाई हो बधाई ....''!!
बधाई  जेठा तुझे  ..अबे तूने बमुश्किल शहद का बर्रा चुआ  ...''हाजी को छेड़ती  हुई मैं दोबारा आईने  के सामने खड़ी हुई मेकअप ठीक करने लगी।  हाजी साजिन्दों  को आवाजें देने लगा , ''ओये राजू...ओये बाबू ..कहाँ मर गए जालिमों ...? निकाल लाओ बाजा ढोलकी बधाई मांगने चलें ...''
मांगना हमारा पेशा था , नाचना हमारी होनी।  अगर न नाचते तो थकावट नहीं होती पर मुआ पैसा भी न बनता। जैले  की तरह पैसा ही नचवाता था।  जो भी कमाई होती सारी गुरु को  ले जाकर   देनी पड़ती
यदि कोई बदकिस्मत न देता , नंगी पीठ पर गर्म चिमटे पड़ते , चमड़ी उधड़ जाती , नील पड़ जाते।  इससे अच्छी तो थकावट होती।  नाच-नाच कर शरीर थक जाता।  गलियों में घूमते-घूमते आत्मा भी तक जाती।  आस-पडोस की कोई खबर न रहती। 
''अबे हाजी ...!..विमला को होश आया  या नहीं ..? उठा मुई को'' , कजरे की धार को तीखा करते हुए मैं हाजी को आवाजें देने लगी। 
''वह तो कब की उठ  गई है ...तेरा ही फैशन पूरा नहीं होता ....'' फैशन की मारी का  ..'' हाजी की बात सुन मैंने सर झटका। 
कंजरी चोटी  घूम कर छाती से आ लगी थी। उसकी डोर ठीक करती हुई  मैंने बिमला की ओर देखा।  वह नकली सा हँसी। मेरी छाती में चीस उठी। खाली आँखों से वह दरवाजे की ओर निहारने लगी। 
''ओये-होए मैं मर जाऊं ...किसकी  उडीक में रहती है  नासपिटी ...? इस घर में किसी ने नहीं आना बिमला ..!...चल चले शिमला ..!'' नागिन सी चोटी  को मैंने पीछे की ओर फेंका और तालियाँ पीटने  लगी। तालियाँ बजाती बिमला साजिंदों की ओर चल पड़ी। 
उई माँ ...!..उसका दर्द मेरी रग-रग में घूम गया .. मेरी तरह वह भी दर्द पीने के लिए ही पैदा हुई थी , घरवालों से बिछड़ने के लिए पैदा हुई थी।  मुई कई दिनों से बीमार थी।  मैं उसका बड़ा ख्याल रखती ,पर वह हर बार मेरी जान निकाल देती , ''देख अपनी खैर -खबर लेने वाला कोई नहीं।  डेरे की ख़ामोशी मुझे खा रही है रीना .''.
हालत तो मेरी भी यही थी जिस वक्त मैं अकेली पड़ी होती, डेरे का सूनापन मेरी देह को खाने लगता। रूह सुन्न हो जाती। मैं पागलों की सी आईने के सामने आ खड़ी होती , उससे बातें करती ,जब बेवफा वह भी नहीं बोलता तो मैं खीझ उठती। 
'' मत खीझ बहन ....चेहरे पर हंसीं ला ...,जरा सा नखरे दिखा चाल में  मरजाणिये ...'' बिमला को खुश करने के लिए मैं कमर मटका-मटका कर चलने लगती , पर उसकी थकी हुई चाल में मस्ती  न आ पाई।  तीसरी बार तीसरी जगह बिकने का दर्द उसकी चाल के लचीलेपन को खा गया था।
कभी -कभी आधी रात को वह बताने लगती ..पहली बार काली  महंत मुझे राजस्थान  ले गया उस वक़्त मेरी उम्र फूल की मानिंद थी। उसने ही मुझे नाचना सिखाया। दस साल मैं उसे कमा कर देती  रही।  बाद  में उसने मुझे सवा लाख में लवली महंत के पास बेच दिया।  वह मुझे मोगा शहर की तरफ ले आया। कई वर्ष मैं उसके साथ बधाई मांगने जाती रही ...एक दिन उसने भी मुझे शीरा ताज़ी के पास बेच दिया ....'

''तेरा कुछ न बने पापी कहीं के ....'' मेरी हुंकार सुन वह रोने लग पड़ती।  जिस दिन हरामी काजी ने कहा बिमला मैं तेरा गुरु हूँ और चेले गुरु का कभी हुक्म नहीं तोड़ते ..अपने कुनबे का असली चेला वही होता है जिसे मूल्य देकर खरीदा हो।  इसलिए अब तू गंगानगर कमला महंत के पास चली जाना , मैंने तुझे उसके पास तीन लाख में बेच  दिया है !... जालिम की बात सुन मैंने  उसके पेट में टक्कर मारी रीना ...वह तैश खा गया।  उसने गर्म किया हुआ चिमटा उठा लिया ...पापी तब तक पिलाता रहा जब तक मैं बेहोश होकर गिर न पड़ी। 
 अपनी व्यथा सुनाते हुए बिमला के अन्दर आग सी दहक उठती।  मैं तो दहकी हुई आग पर भी नाच लेता हूँ रीना ...!'' आग से जले पैरों का दर्द छुपाते हुए जैला ठंडी आह भरता। वह दहकती हुई आग के कोयलों पे नाचने के कारण दूर -दूर तक मशहूर थी। 
जब कोई कहता  , '' नाचता क्या है ससुरा आग लगा देता है ...'
वह कहता ..मैं कहाँ नाचता हूँ पापी ...यह तो मेरा पेट नचवाता  है ...किस्मत नचवाती  है '' और दातों तले जीभ लेकर अल्लाह -अल्लाह करने लगता।
अल्लाह उस पर मुझसे ज्यादा मेहरबां था।  इतना सुन्दर नख-शिख , गोरा रंग , लम्बे काले बाल , तराशा हुआ बदन , नशीली आँखें  जब वह शेव करवाकर आँखों में कजरा डाल कर कमर मटका-मटका कर चलता मुआ लड़की ही लगता।   जिस भी गली से निकलता कोई न कोई छेड़ ही देता , ''कैसी हो भाभी ...!''

'' ठीक हूँ बे मुँहजले ...'' आँख मार वह कमर की तरह ही बाजू हिलाता हुआ आगे बढ़ जाता।
''लक्क हिल्ले मजाजण जांदी दा वे .....'' बिमला को खुश करने की खातिर मैं जैले की चाल  चलने लगती।  मरजाणी  हँस पड़ी  तो मेरी रुलाई फूट पड़ी।  छुपाने की खातिर मैं  बाथरूम में जा घुसी।  जब बाहर आई मुआ हाजी तांगा जोड़े खड़ा था।  पिछली सीट पर राजू और बाबू बाजा ढोलक लिए बैठे थे और  आगे की सीट पर बिमला बैठी थी।  मैं छलाँग  लगा उसके पास जा बैठी । 
'' मर गई ...उई माँ ....!'' बिमला ने चीख  मारी शायद बैठते वक्त मुझसे उसका पैर दब गया था।  मैंने उसे बाहों में लेते हुए कहा , ''पैर बचाकर रखा कर जान ...अपने तो दुनियाँ ही पैर नहीं लगने देती ...''
'' चल बकरी कहीं की ...''बिमला का पैर सँभालते हुए हाजी ने घोड़ी  की पीठ पर चाबुक मारी ....
'' मत मार जालिम ...यह भी अपने ही जैसी  है ...!''घोड़ी  की पीठ पर मारा चाबुक मुझे अपनी पीठ पर पड़े चिमटे जैसा लगा। 
दर्द में मैंने नीचे का होंठ दबा लिया।  मुंह पर हँसी बिखेर ली।  नज़र सड़क की तरफ की और सीधी होकर बैठ गई। 
तांगा बगड़िया गाँव की ओर भागा जा रहा था।  गाँव की हद में घुसते ही हाजी ने लगाम खींच ली।  घोड़ी हौले हो गई।  ताँगा चींटी की चाल चलने लगा। 
''साडे ताँगे ने  मलक नाल जाणा, औखीं एँ ताँ रेल चढ़ जा ...'' मैंने पास से गुजर रहे सरपंच की ओर चुम्मा उछाल  कर फेंका। 
''जानता हूँ ...रीना महंत ..जानता हूँ !'' सरपंच ने मोटर साईकिल पक्की सड़क पर से कच्ची सड़क पर उतार ली। 
''आय-हाय! अबे सरपंच ..जानते हैं ..हम भी सबकुछ जानते हैं ...लेकिन आपने नहीं जाना हमें ..!'' मैंने तांगे पर से नीचे छलांग मारी।  चोटी घुमाते हुए ..कमर मटकाते हुए सड़क के किनारे खड़े सरपंच के पास जाकर खड़ी हो गई।  मुआ मुझे कुर्सी जैसा लगा।  मैंने फब्ती कसी , '' ला फिर सरपंच ...अब हमें भी जगह दिलवा दे ...!''
मेरी बात सुन मुआ सकते में आ गया।  कहने लगा ,''तुम जब भी करोगे ...साली उलटी बात करोगे .!"
'' न रे दुश्मन कहीं के यूँ न बोल ...गुस्से में देख कितना सुंदर लगता है ...! जरा सीधा होकर देख ..यह उलटी नहीं सीधी बात है ..!'' मैंने उसकी गाल को छेड़ते  हुए कहा..!
एक बार जैला बताता था , यह सरपंच जिसकी भी बारात में जाता है ..वहाँ पैसे देने के बहाने मेरी गालों को हाथ लगा- लगा कर छेड़ता रहता ...!'' 
मेरी बात सुन हरामी भड़क उठा ,'' चल जैला तो फिर भी कुछ है ..तुम लोग तो न मर्द हो न ही औरतें ...न तीन में न तेरह में ...घर संसार तुम्हारा नहीं ...मांग कर खाते हो तुम ..अब नई बात शुरू कर दी ..जगह दिलवा दो ...कल को कहोगे तुम्हारे साथ हम अपने लड़के-लड़कियाँ ब्याह दें  ...!''

ला ब्याह दे फिर ....तुमसे तो अच्छे हैं ..किसी को जन्म से पहले तो नहीं मार देते हम ..!'' मैं तैश में आ गई ..
बिमला ने मेरा बाजू पकड़ लिया।  हाजी भी पास आ गया।
सरपंच कुत्ते का काटा हुआ था। मुआ  एम . एल .ए .का ख़ास बन्दा था।  हमें आँखें दिखाने लगा  ,  '' देख बे महंत जो काम करने आये हो उसे करके चलते बनो ..बिना वजह समाजिक कामों में टांग न अड़ाओ ...कहीं और ही ....!''

कहीं और ही क्या बे ...? ...हमारा भी जी करता है जीने का ... ? हमें भी उसी कुम्हार ने बनाया  है ...यह क्या बात हुई कि हमारे लिए थोड़ी सी भी जगह  नहीं ..'' मैंने सरपंच की आँखों में आँखें डालकर   मुए को चार-पांच बार आँख मार दी ।
वह दांत पीसता रह गया . मोटर साईकिल को किक मारी ...और चलता बना। ''कहता है सारी  जगह पर हमारा कब्जा है ...बातें तो सुनो इसकी ...'' हाजी मुझे बधाई वाले घर की ओर  खींचने लगा।

चुटिया घुमाती हुई मैं आस-पडोस को देखने लगी . घरों के आगे खड़ी औरतें बेगानों की तरह झाँक रही थीं।  बच्चों ने खेलना बीच  में ही छोड़ दिया , हमारे इर्दगिर्द इकठ्ठा हो गए।  मैं सबको जीभ दिखाती हुई आगे निकल गई।  हाजी बिमला, राजू और बाबू मेरे पीछे-पीछे चल पड़े। 

मैं तालियाँ बजाती उड़ी जा रही थी तभी एक घर के आगे खड़ी औरतों में से किसी ने आवाज़ दी ,'' अरी ! देख तो कितना सुंदर हिजड़ा।  लड़कियों को भी मात देता है मुआ। न जाने ईश्वर ने किस बात की सजा दी है ...!''

सजा किस बात की बहन ...यह तो कर्मों का खेल है ...भाग्य की कमाई '' गुलाबी चुन्नी वाली औरत जैले की तरह बोल रही थी। 

जैला  औरतों की तरह बोलता था। जिस दिन वह किसी विवाह में नाच कर आता , वैसे ही सजा-धजा मेरे पास आ टपकता। 
मैं उसकी चिथड़ों से उभार कर बनाई गई अंगिया देख हंसने लग जाती।  वह अंगिये  में से नोट निकाल-निकाल कर दिखलाने लगता ,.'' देख रीना ! यह है अपने कर्मों की कमाई ...!''

जिस समय  बेकर्मा  सौ-पचास का नोट निकालता मैं उस पर झपट पड़ती।  वह टपुसी मार दूर जा खड़ा  होता।  मैं उसकी चुन्नी  खींच लेती। वह हंसने लगता , ''उतार ले चुन्नी   ...!.क्या करेगी उतारकर ..! .चुन्नी  उतारकर मेरी इज्ज़त उतर नहीं जाएगी और न  तेरी बन जाएगी ...''

अबे ! पकड़ अपनी चुन्नी मुझे भला  क्या करना है  इसका ..? बदमाश  कहीं का ....मैं तो बस ये शगुन का नोट मांगती हूँ ..! कहीं कोई  शगुन ही पड़ जाये। मेरी बात सुन वह कुछ नजदीक आ जाता।

एक हाथ से चुन्नी पकड़ता दूसरे हाथ से अंगी में से सौ का नोट निकालकर  बाजू  ऊँची कर लेता , '' देख इस तरह मिलते हैं नोट ! ....साले दो कौड़ी के बन्दे नहीं होते ...नोट दिखलाकर मुझे लुच्चे इशारे करेंगे ...! कोई मेरे साथ से सटकर  गुजरेगा  तो कोई टांग में टांग अड़ा भांगड़ा डालेगा ...! जब मैं नोट पकड़ने लगता हूँ साल्ला नोट वाली बाजू ऊंची कर लेगा ..मैं झपट्ता  हूँ तो बाजू और ऊपर हो  जाती है ..कहीं  आसान है ये काम ? बीस बार झपटो फिर कहीं जाकर नोट मिलता है। ले पकड़ तू भी ले ले ....!''

नोट दिखला वह बाहर की ओर भागता ..मैं उसके पीछे -पीछे भागती ...'' आ जाओ भई पीछे-पीछे चलते हैं ..मास्टर के घर नाचेंगे ...वहीँ देखेंगे ! '' हमारे पीछे चली आ रही बच्चों की सेना मुझे अच्छी लग रही थी।

''ओये ! यह पहले  नम्बर वाला हिजड़ा देख कितना सुंदर है ...!'' एक छोटा सा बालक बोला।

'' खड़ा हो जा यहीं ...तेरी माँ को चोर ले जायें ...इधर आ जरा बताऊँ तुझे ..'' मैंने भागकर पकड़ लिया उसे।

बच्चों का दल पीछे की तरफ भागा। वह रोने लगा।

मैंने उसे गोदी में उठा लिया . '' रो मत राजे ...तुम्हारा कोई कसूर नहीं ...पर यदि फिर से बोला न ....तो यह तोतो उखाड़ कर हाथ में पकड़ा दूंगी !''एक चुम्बन लेते हुए मैंने उस बच्चे की चड्डी नीचे  कर दी ...और फिर ऊपर कर दी।

दरवाजों पर खड़ी औरतें खुश हो  गईं। बच्चे हंसने लगे।

मेरी गोदी से उतर बच्चा गोली की तरह भागा।

जोर-जोर से हंसती हुई मैं आगे बढ़ गई।

जिस घर के दरवाजे पे बंदनवार बंधी थी हमारी टोली वहीँ रुक गई। तालियाँ पीटी जाने लगीं।

दहलीज़ लांघकर  आवाज़ लगाई , '' बधाई हो बधाई ...बीबी ...! कहाँ है पुत्रवधू ....? कहाँ है मेरा बेटा ..? अरी बिमला ...अरे हाजी ...राजू ...बाबू ..बैठो साज शुरू करो !''

रसोई की पास खूब भीड़ थी। चारपाइयों  पर औरतें बैठी थीं। कुर्सियों पर मर्द। बच्चे इर्द-गिर्द खड़े थे। उनमें वह भी खड़ा था जिसकी मैंने चड्डी उतारी थी।

उसकी ओर देख मैंने रब्ब  का नाम लिया।

राजू ने ढोलक पर हाथ मारा। बाबू ने बाजा खोल लिया। हाजी और  बिमला तालियाँ बजाने लगे।

एड़ी  से घुंघरू छनछनाती हुई मैं तालियाँ बजाने लगी , '' हो ...! तूने मुझे बुलाया शेरां  वालिये .....''
'हो ...तूने मुझे बुलाया शेरां ....''जैसे ही साथ वालों ने गाना शुरू किया मैंने भागकर पुत्रवधू की गोदी से बच्चे को उठा लिया। बिमला और हाजी ने लोरी छेड़ दी . '' मोरियाँ ...मोरियाँ ...मोरियाँ नी ...मुंडा लैंदा पिया मांवां दिआं  लोरियां नी ....काका लैंदा पिया दादी दिआं .....'' मेरा बोल पूरा होने से पहले ही बिमला उठ खड़ी हुई।
मुझसे बालक को पकड़ उसने नोट वाली बांह उसके सर के इर्द-गिर्द घुमा दी। '' वेल  ...मुंडे  दी दादी वेल  ...! सौ  रुपये की वेल  ...! भाग लग्गे रहण ...! दर खुल्ले रहण ..! रब्ब मेहरां करे भागां वालओ ...!''

''ला रे मास्टर ...तू क्या जोड़ घटाव किये जा रहा है ..? ख़ुशी का अवसर है ! ला तुझे एक जलवा दिखलाऊँ ...! सुनाऊँ कुछ तीखा -तीखा ..! हाँ जी ...सुन्ना जरा ...! इकठ्ठे हुए लोगों की ओर बाजू घुमाकर मैंने राजू और बाबू को आँख मारी।

ढोलकी तेज हो गई। बाजा ऊंची आवाज़ में बजने लगा। हाजी के साथ बिमला उठकर खड़ी हो गई। वे घूम-घूम कर नाचने लगे। मैं गाने लगी , '' हाय ! तीमियाँ वाले  लैन नजारे , दो-दो व्याह करवाके ...!''
'' हाय ! गुरु ...एक भी नहीं मिलती ....!'' चादर ऊपर उठा हाजी ने छलांग लगाई।
उसकी पीठ पर लात जमा मैंने फिर गीत छेड़ा , ;; हाय तीमियाँ वाले लैण  नजारे .......!''
रुलदू ने चित्त पर्चा लैणा  खोती  ते चुन्नी पा के ....! ...रुलदू ने चित्त परचा  लैणा  ... बाजे  ढोलकी की आवाज़ ऊंची हो गई।
राजू और बाबू गाने लगे। बिमला तालियाँ बजाने लगी।
मैं दोनों हाथों से सर की चुन्नी  लहरा लहरा के नाचने लगी। हाजी मेरी चुन्नी  के नीचे  नाच रहा था।

हम पर नोटों की वर्षा होने लगी। औरतें बिछी हुई चादर पे गेहूं डालने लगीं।
जब ढोलकी बंद हुई नवजात शिशु की दादी सूट और इक्यावन सौ रुपये और एक थैला गेहूं का बतौर बधाई ले आई।
बधाइयां देता हुआ हुजूम खिसकने लगा।
बाबू ताँगे  में थैला रखने चला गया। बाक़ी  साथी बचा हुआ सामान सँभालने लगे।

मैं दुआएं देने लगी ... तुम्हारी सात खैरें  हों , लम्बी आयु हो ... जड़ लगी रहे  ...बेल बढती रहे ....आते वर्ष भगवान इक और लड़का दे दे ...!''
हमारे दुआएं देते हाथ दहलीज़ से बाहर  आ गए।

'' आ गए ...ओये भाग लो ...!'' दीवार के पीछे खड़े बच्चों की टोली हमें देख भाग खड़ी होती।
बाबू वापस आ गया। सामान उठाया और हमारी टोली तांगे की ओर  चल पड़ी। मैं जल्दी- जल्दी चलने लगी। पाँव के नीचे  जैसे आग मच गई  थी। जिस दिन हम बधाई लेकर लौटते जैला मुझसे चिपक जाता । डरा हुआ सा जैसे मेरी रूह में धँस रोये जाने को मन करता हो ।  मैं उसे चुप करवाती पर वह मुआ एक ही बात पूछता जाता  , '' वह कौन है रीना ...?''
'' कौन बे ..!' किसी मुई का नाम तो ले ...!'' उसके बार-बार एक ही सवाल पूछने पर मुझे खीझ आ जाती।
वह और भी डर जाता। मैं उसकी ठोडी  ऊपर उठा आँख मारती हुई पूछती ,'' अबे बता न कौन है वो ...?''
वह बताने लगता ,'' वह जो मेरी बैठक में नाचती रहती  है। उसका जिस्म तो मर्दों जैसा है पर कपड़े औरतों जैसे। पहले वह खिड़की  पे खड़ी होती है फिर मेरी छाती पर चढ़ जाती है .... नाचती रहती है ...नाचती रहती है ....उसका नाच देख मैं उसे बाहों  में लेना चाहता  हूँ ...वह हँसने लगती है ....!!''

'' अच्छा ! फिर ...?'' मैं उसकी गाल पे चिकोटी काट लेती हूँ। वह दर्द से तड़प उठता।
 '' बस फिर क्या  ...! वह मेरे अन्दर घुस जाती ...  जब होश आती तो मैं अपने आप को ही बाहों  में लिए हुए होता ...!!''

उसकी बात सुन मैं उसे आलिंगन में ले लेती। वह डर से कांपने लगता , '' मेरे अन्दर घुसकर पता है वह क्या पूछती है ...?''
''क्या ...?'' मैं उसके खुले बाल बंधने लगती।
वह मुआ रोने लग पड़ता .... पता वह क्या  पूछती है ...? वह पूछती है , 'अबे ! तेरे भीतर का मर्द कहाँ गया जैले ...?'' मैंने तो तुझे चारो ओर  से परख लिया तू तो नचना है नचना ...!!''

मुए की बात सुन मैं भी डर जाती। वह मेरे साथ चिपट जाता ... मैं नचार नहीं हूँ रीना ....मैं ...!!''
'' अबे ..! बता मैं क्या बताऊँ   ..! यह मुई मैं ही तो 'तू' नहीं बनती ..!;; हाजी और बिमला की आँखों में झाँक  मुझे कुछ होने लगता था।
जाते ही मैं चारपाई में धंस जाती। जैले की तरह कोई मेरी भी छाती पर आकर लोटने लगता। छाती में दूध उतर आता। बाहों में बालक खेलने लगता। मैं रात भर उससे बातें करती रहती, ''बस एक बार माँ कह दे मुझे ...'' ..

.यदि बुरा न माने तो मैंने आपसे  कुछ बातें करनी थीं। ...? !''
आवाज़ सुन मेरा ध्यान टूट गया। मैंने झटके से पीछे की ओर देखा। मुई चोटी  फिर छाती  से आन लगी। 
या अल्लाह ! कितना सुंदर लडका था ! हरी टी-शर्ट  , नीली जींस , सर मुंडाया हुआ ..मुआ पूरा सलमान खान लग  रहा था। मुझे अच्छा लगा। मुआ दिल आ उतरा। यूँ हमें तो कोई सीधे मुंह बुलाता तक न था फिर इसने इतने प्यार से बुलाया , बैठक में सोफे पर बिठाया , खुद चाय लेने चला गया। मैं इर्द -गिर्द देखने लगी। बैठक में कितनी ही अलमारियां थीं। सभी किताबों से भरी हुई।  हाजी ने मुझे कुहनी  मार कर पूछा, '' इसने हमसे क्या पूछना भला ...? कहीं हरामी कोका पंडित के जैसा तो नहीं ...!''

नहीं मैं एक लेखक हूँ ...! तुम्हारी जिंदगी के बारे में जानना चाहता हूँ ...!'' मेज पर चाय की तश्तरी रखते हुए उसने भेद खोला।
क्या बात है मैंने मन ही मन कहा   ..! वह हीरो वापस अन्दर चला गया इस बार उसके हाथ में नमकीन बिस्कुटों की प्लेट थी।
मुझसे रहा न गया मैंने उसका हाथ चूम लिया। मुआ शर्मा गया। मुंह लाल हो गया उसका। झुके हुए ही चाय पकडाने लगा , जब बिस्कुटों वाली प्लेट आगे की मेरी आँखें भर आईं। इतनी इज्ज़त मत कर हमारी ...सही नहीं जाती रे ....! तू पूछ क्या पूछना है ...?''

'' अच्छा यह बताओ कि आपको  रब्ब से क्या उलाहना है ... अगर उसने हिसाब माँगा तो ...?''

मरजाणे का पहला सवाल ही दिल चीर  गया था।
मैंने ताली पीटी  और फर्श पर एड़ी मरते हुए बोली ,'' उलाहना  ...? हुंह ....रब्ब ने हमारे साथ अच्छा किया ही क्या है ..? जिस दिन मरी उसी  खसम के पास जाऊंगी ..मुए ने दिया ही क्या है जो हिसाब मांगेगा ....? मैं दूंगी हिसाब उसे ..यह,  मेरा ठेंगा ....!''
मेरा अंगूठा देख वह हंसने लगा, फिर बोला , ''मैंने सुना है यदि कोई आपको मुंह मांगी बधाई न दे  तो आप अड़ जाते हो ...बददुआ देते हो ...यदि कोई फिर भी न माने तो आप नंगे होकर नाचने लगते हो .....?''
हे राम ..! मैं यह क्या सुन रही हूँ ....! इतना कुफ्र ...? मैंने बिमला की ओर  देखा वह बैठी सर पीट रही थी। मैंने ताली पीटी  ...उसने लानत दी ... दुनिया चाहे हमें बेशर्म कहे परन्तु शर्म  वाली बात है। पता मुझे भी था। कुछ बेशर्म लोगों के कारण  हमारा कुनबा ही बदनाम हो चुका था लेकिन मैंने फख्र से कहा ,'' तूने ठीक सुना  है लड़के ...हममें से कुछ ऐसे भी हैं ..वह सब से नीच जात है।  परन्तु हम तो वजीर बाबे ( महंतों ) में से हैं। यह सबसे ऊंची जात होती है। जब हमारे कुनबे में कोई जश्न होता है तो वजीर बाबेयों का इन्तजार किया जाता है। जब तक वे नहीं पहुँचते रोटी पर से कपड़ा नहीं उठाया जाता। हमारे पहुँचने से ही रोटी शुरू की जाती है। यदि हम न पहुंचें बेशक पंगत में लाखों लगे हों रोटी शुरू नहीं की जाती , मंदिर गुरुद्वारों में चढा आते हैं। अब तू ही बता हम बददूआ कैसे दे सकते हैं ..? निर्वस्त्र नाचना तो वैसे ही बेयकीनी होती है ...!''
'' तो फिर  आपका यकीन किस बात पे हैं '...? '' वह बोला ...
यह मुआ तो यूँ ही जड़ उखाड़ने लगा हुआ है , '' हाय हाय ! बे मैं तुझे क्या बताऊँ किस बात पे यकीन है ..हम तो सबकी जडें आगे बढें इसी की दुआ करते हैं ...हम तो इन्सान को इन्सान से जोड़ने में विश्वास रखते हैं ...!'' नीचे  का होंठ  दबाते हुए मैंने हाजी और बिमला का हाथ  पकड़ लिया।

लड़का डर गया। मैंने उसकी पीठ थपथपाई , '' डर  मत बच्चे ! और पूछ क्या पूछना है ...?''

'' जब आप किसी के घर में से हिजड़ा बच्चा उठा कर लाते  हो तो उसके साथ क्या किया जाता है मतलब उसके पलने-बढने की  कैसी व्यवस्था की जाती है ...? क्या उसकी पढाई  -लिखाई की व्यवस्था भी की जाती है या नहीं ...? वह फिर बोला  ...
सवाल सुन मुझे गश सा आने लगा ..वह दिन याद आ गया जिस दिन मैं रानी को उठा लाई थी। उस वक़्त मेरी क्या हालत हुई थी यह मैं ही जानती थी। मेरे रब्ब यह क्या पूछ लिया था जालिम ने ...? वह मेरे मुंह की ओर ताके जा रहा था पर मैं क्या बताती उसे और क्या छोडती .? ...मैंने कुछ बात तो अन्दर ही दबा ली आधी-अधूरी  बात बताने लगी , '' अबे जा बे बड़ा आया  पढ़ाई-लिखाई वाला   ...हमारा भी दिल करता है बच्चों को पढ़ा-लिखा कर तुम्हारी तरह अफसर बनाएं पर नाशपिटों को स्कूल कैसे भेजें तू ही  बता ..? स्कूल के फार्मों में तो सिर्फ लड़के-लड़की का खाना होता है हिजड़ों के लिए कौन सा खाना होता है  ...बता उन्हें किस खाने में डालें ...? ...तूने  तो हमारा खाना ही खराब कर डाला  ....पर ऐसी बात नहीं है पढने वाले पढ़ भी जाते हैं ...हमारी ही बिरादरी की एक मोना अहमद है उसने अपनी आत्मकथा लिखी है ' मैं मोना अहमद'.!
 साथ बैठी बिमला को कोफ़्त होने लगी थी। मुई उठ कर चलने का इशारा किये जा रही थी। जब मैं उसकी ओर देखती उसकी बायीं आँख के ऊपर वाले बालों की तीखी की हुई  धारी  ऊपर को उठती हुई बाहर  की ओर इशारा करती। वह उस लड़के से और मैं उससे तंग आ गई थी। मेरा दिल कर रहा था वह और बातें पूछे, सबब से ही तो कोई पूछने आया है नहीं तो हमारी कौन सुनता है भला ...?

लड़के ने मेरी नब्ज़ पहचान ली । हरामी हौसला कर गया,  बोला  , '' यह सब करते -जरते  तुम्हारी आत्मा में क्या कुछ चलते रहता है ....वह धिक्कारती तो होगी  तुम्हें ...?''
उफ्फ ..! नाशपिटे ने क्या कह दिया था ..दिल चीर गई उसकी बात ...तड़प उठी ..मैंने तीन-चार तालियाँ पीटीं , राजू ने ढोलकी पर हाथ मारा , हाजी ने एड़ी   बजाई  , बिमला ने  ताली ..पूरी बैठक गूँज उठी।
मैं एक ही झटके में उठ खड़ी हुई , ''बस कर लड़के ! महंतों से ऐसी बातें  करता है  ...?
कागज - कलम उठाये लड़का देखता ही रह गया।
मैं हवा की तरह बैठक से बाहर  निकल आई ...!
हाजी , बिमला, बाबू और राजू सारी  टोली मेरे पीछे चलने लगी।
हमें देखने के लिए खड़ी हुई औरतें चोर आँखों से झाँक रही थी।

उन्हें  देख मुझे जैले की कही बात याद आ गई। वह बताता  था , ''ये लुच्चियाँ हैं सभी ...इन्होंने  मेरा इधर से गुजरना दूभर कर रखा है। ''
जिन्होंने तुझे तंग कर रखा है उन्हें कह ...सभी को क्यों कहता है बैरी ...!'' मैंने उसे छेड़ा था।
लेकिन वह औरतों की तरह बिलखने लगा ...' ये मेरा विवाह नहीं होने देती रीना ...! नचना- नचना कह कर इन्होंने मेरी मर्दानगी खत्म कर दी है। यह लुच्च्पना नहीं तो और क्या है ...?''
औरत के बिना औरतों से कितना तंग था बेचारा !
उसके मन में सभी औरतों के खिलाफ ज़हर भरा था।
वह जिधर से भी गुजरता एक ही आवाज़ आती , '' अरी देख वह जाता है नचना ...!''
जिसके बच्चा होने वाला होता औरतें उसे कहतीं , '' अरी जैले के माथे से न लग जाना कहीं  ...नहीं तो नचना ही जन्मेगा ...!''
'' रुक  जाओ कमबख्तो  तुम्हारी माँ को जैला ले जाये ब्याह के  ...!'' मेरी ताली पीटने की आवाज़ सुन बच्चे चड्डियाँ सँभालते दूर भाग खड़े हुए

दूर मोड़ वाली नीम के नीचे तांगा खड़ा था। जैसे-तैसे गली पार कर मैं सबसे पहले तांगे  में जा बैठी। बिमला मेरे साथ बैठ गई राजू और बाबू पीछे।
 '' चल छन्नो ....यहाँ तेरे  लिए कोई जगह नहीं ...!''  इधर मैंने होंठ काटते हुए ताली पीटी उधर हाजी ने घोड़ी की पीठ पर चाबुक दे मारा।
मैं दर्द से छटपटाई, '' धीरे मार जालिम ...तू भी लोगों जैसा ही हो गया . ''
'' लोगों जैसी होती है मेरी जूती ...बात तो देखो इसकी ...!'' मुझे जूती दिखाते हुए हाजी ने घोड़ी की पूंछ को हिलाया।
तांगा हवा से बातें करने लगा। मैं राहगीरों की शक्लें पढने लगी।

शक्लें पहचानते हुए उम्र बीत गई थी।  पर अब तक किसी से कोई रिश्ता न बना पाई  थी  ।  मुए रिश्तों की तड़प क्या होती है , कोई मुझसे पूछता  ..मेरा दिल भी करता था किसी की पत्नी बनू ...कोई मेरी प्रतीक्षा करे ..किसी का मैं इन्तजार करूँ ...आटा  गुथूं   ...रोटियाँ पकाऊँ ...किसी को राखी बांधू ..कोई मुझे आशीर्वाद दे ...! पर मुझ अभागिन के भाग्य में घर कहाँ ? घर का ख्याल मेरी जान निकाल लेता था। जब भी ये ख्याल आता मैं खूब गहरे रंगों से मेकअप करती। महंगे से महंगा सूट  पहनती ...सोने के गहने  ..सबसे बढिया इत्र  लगाती परन्तु कोई भी नीच मुझसे रिश्ता जोड़ने न आता ...मैं अपनी लाचारी पर खुद ही हँस पडती ...!

'' इतना क्यों हँस रही हो ....? देखना कहीं ...'' हाजी की फब्ती सुनकर मैं और जोर से हँसने लगती ...''देख तो रही हूँ खसमा ..तू ही नहीं देख पा रहा ...जरा राहगीरों के मुंह की ओर  देख ...!''

देख जरा वह साईकिल वाला आदमी मेरे बाप जैसा नहीं है  ..?'' पीछे की ओर देखती बिमला का मुंह उतर गया।

मुआ हाजी हंसने लगा '' जिस घर में हम बधाई लेने गए थे वहां बैठी औरतों में से एक मेरी बहन  जैसी थी और खड़े लोगों में एक मेरे भाई जैसा था  ...''
'' रोक ...रोक ....रोक ..! यही तांगा रोक ले बैरी ...देख इस घर में तो मेरी माँ जैसी इक औरत रहती थी .. ये भीड़ सी कैसी है यहाँ ...सड़क के किनारे  घर की ओर इशारा करते हुए मैंने तांगा रुकवा लिया।
हाय रब्बा ! मैं मर जाऊं ......यह क्या हो गया ...? घर में यह इकटठ  सा कैसा ? बाहर भी लोग खड़े हैं ....अल्लाह खैर करे ..जब इधर से गुजरे थे तब तो सब ठीक था ...मैं घबरा गई ...तेज कदमों से आगे बढ़ी जब अन्दर गई तो माँ जैसी को बिस्तर से उतार लिया गया था। चीखें माहौल को गमगीन बना रहीं थीं ....मैं मृतक की देह से लिपट गई ...हाय माँ ..! एक माँ तो पहले ही छोड़ गई थी आज तू भी छोड़ गई ...! हाय ये साले रिश्ते भी भी खून पी जाते हैं ...!''

मृत रिश्ते का मुंह देख मैं दीवार  से सटकर बैठ गई।
पता नहीं किस हरामी का मुंह देखा था सुबह से ही कुछ न कुछ होते जा रहा था।
हमारी ओर किसी का ध्यान न था ...प्रत्येक  रिश्ता रोये जा रहा था। जो नहीं रो रहे थे उन्हें अर्थी उठाने की जल्दी थी। चंद घड़ी का मेला था। मृत देह को आग दी और रिश्ता खत्म। ओह रब्बा ये कैसी दुनिया है।

मैं जन्मी तो इसी दुनिया में थी पर मेरी दुनिया कुछ और थी। उसका दस्तूर भी कुछ और था। जिस वक़्त दुआरका  मौसी मरी थी 'जीवन चारा' की रस्म हुई थी। दो महंतों को तैयार किया गया, मेंहदी लगाई गई , चूड़ा  पहनाया गया , शोख रंगो से मेकअप किया गया, एक को दुल्हा दुसरे को दुल्हन बनाया गया , विवाह वाला जोड़ा पहनाया गया , दोनों को पालकी में बैठाया गया , खूब जश्न हुआ , नाच-गाना हुआ , शिकवे शिकायतें दूर हुईं , कोई मातम नहीं जैसे बरात गई हो ...!

एक ओर मौत का शोक दूजी ओर शोक में भी जश्न जारी रखने का ऐलान.

किस दुनिया का सच्च सही था नामुराद ये समझ न आया।
मैं जैले की तरह दरी पर जा बैठी।
लोग एक-दुसरे को कुहनियाँ मार इशारा कर रहे थे , '' देखो साला नचना कैसे सज-धज कर बैठा है। ''

जिस दिन जैले  की माँ  मरी वह विवाह कर लौटा था। मुआ मनमौजी था। दिल करता तो कपडे बदल लेता मन की मौज होती तो सजा संवरा ही गाँव आ  घुसता।
मुआ उस दिन मेरी तरह ही सजा-धजा माँ की अफ़सोस में दरी पर आ बैठा था। न रोया , न कुछ बोला , बेगानों की तरह चुपचाप बैठा रहा।
लोगों ने ही अंतिम स्नान करवा दिया, कफ़न ओढाया, अर्थी सजाई ..
.''चल जैले उठ कर कंधा लगा भाई ..'' जब बड़े बूढों ने अर्थी  को कंधा लगाने के लिए कहा तो जैले ने तो जैसे सारी हदें ही पार कर दीं। वह उठा मुंह पर चुन्नी ओढ़ी  और अर्थी के पास जाकर लगा नाचने  उसके भीतर का नाच जाग उठा था।
शोक पर आई दुनिया डर गई। बातें होने लगीं ..'' पागल हो गया है ..बुढ़िया  की जगह यह मर जाता ...''

मुए तूने यह क्या किया था रस्म क्रिया के बाद मैंने उससे पूछा तो  जैला रोने लगा , '' वह भी मुझे  नचना ही कहा करती थी। ''
उसकी बात सुन जैसे मेरी चीख निकल गई , मैंने हाजी की ओर देखा  उनके चेहरे भी उदास थे।

पर एक बन्दा खुश था। मैंने हरामी  की आँख पहचान ली. वह हमारा जमाई था।राजू से पहले इस मृत माँ  का लडका हमारे साथ ढोलकी  बजाता था पर बाद में किसी दूसरे  डेरे से जा जुड़ा। उसकी माँ में मुझे अपनी माँ दिखाई दी। मैंने उसे धर्म की माँ बना लिया। उसकी एक लडकी थी। मैंने उसे गोद ले लिया। बड़े नाजों से पाला - पोसा। रिश्तों की अहमियत सिखाई। जब बड़ी हुई ब्याह दी। हैसियत से बढ़कर दहेज दिया। मेरे लाखों लग गए। परन्तु पहले दिन ही मेरी आँख फरकी थी। जिस दिन लड़की वापसी की गाडी आई। जमाई उलटी-सीधी बातें करने लगा।

हरामी शगुन वाले दिन तो बड़ा शरीफ बन रहा था।
मेरा दिल किया कि उसके और अपने सर पर जूते  दे मारूं . परन्तु कुछ न कर सकी। बेटी की खातिर सब कुछ जर गई।  आखिर एक दिन सच्च सामने आ ही गया . शादी के करीब दो साल बाद इक दिन लड़की डरी हुई सी डेरे आई और मुझ से लिपटकर रोने लगी , '' माँ अब मैं आप लोगों से मिलने नहीं आ सकती ...''
 '' पर क्यों पगली ...? ''मेरी देह काँप गई ..!
वह फूट - फूट कर रोने लगी ,'' मेरा पति कहता है अब तू   मिलने मत जाया कर ....मेरी बेज्जती होती है। ''
जा परे  बैरी ने यूँ कहा ...? कमीने को मैं तो अपना समझती रही। बेटी को तसल्ली देती हुई मैं कितनी ही देर तालियाँ पीटती रही .

उस रात मैं कई मौतें मरी थी। आँखों में खून तैरता रहा। मैं सारी  रात रिश्तों के बीच  का फर्क ढूंढती रही। सुबह तक फर्क न मिला। जो कुछ मिला वह बड़ा डरावना था।

'' यह दुनिया कितनी डरावनी है माँ ...!'' दरी पर सहमी बैठी हुई मैंने हाजी की ओर देखा,  मुआ वह भी डरा हुआ सा लगा।
 मुझसे और न जरा गया। मैं जल्दी से उठी।  मृतक की देह के पास गई। माँ का मुँह देखा। और लोगों की ओर देख नाक सिकोड़ दी और चुपचाप तांगे की ओर चल पड़ी।
तांगा डेरे की ओर चल पड़ा। कोई कुछ न बोला। आखिर तक श्मशान की सी चुप्पी छाई रही . डेरे के पास पहुँच कर मैंने ताली पीटी , हाजी ने घोड़ी की लगाम खींच  ली। तांगा रुक गया। घोड़ी की तरह फलांगने वाली मैं धीरे -धीरे नीचे उतरी। मेरा मुँह पश्चिम की ओर था और मुआ सूरज उसी वक़्त डूब रहा था। उसकी लाली देख मुझे शर्म आ गई। कार के पास तांगा खड़ा करके हाजी दूर घोड़ी बाँधने चला गया। बाबू ने बधाई वाला समान उठा लिया। राजू बाजा ढोलकी सँभालने लगा। अरे ...अरे ...अरे ....इस मुई बिमला को क्या हो गया , वह एकटक मेरी ओर देखे जा रही थी।
'' अरी क्या देखे जा रही है ...? '' मैंने उसकी पीठ पर हाथ जमाते हुए पूछा था।
लुच्ची डूबते सूर्य की ओर देखने लगी,  बोली  , '' बस अब और नहीं बिका जाता ....''

'' बिकने को अब रह ही क्या गया है ...?'' अन्दर आते हुए जैला भी बिमला की ही तरह बोला था। उसकी आवाज़ फटी हुई थी। वह कल की दिहाड़ी लगा कर लौटा था। जिन दिनों विवाहों का सीजन नहीं होता वह देव मिस्त्री के साथ दिहाड़ी लगाने चला जाता। मैं उसे रोकती भी , ''अरे हमारे साथ ही चला जाया कर मुए ! ''
'' तुझे नहीं पता रीना , देव के साथ दिहाड़ी जाने का आनंद ही कुछ और है, वह मुस्कुरा कर बोलता।
'' क्यों बे देव के साथ कैसा आनंद लुच्चे ...?'' मैंने उसे चिकोटी काटी।
वह डेरे की दीवारों की ओर देखने लगा , '' देव मुझे पुत्त (पुत्र) कहकर बुलाता है ...लिया  पुत्त  ईट दे दे ...लिया पुत्त गारा दे दे ...लिया पुत्त ....''
पर कल उसने कुछ और ही कहा , उसकी बात जैले को ईंट की तरह लगी। वह दीवार की तरह ढह गया ...सारी रात यूँ ही पड़ा रहा . दिन चढ़े उठा और डेरे में आ गिया। आईना तो बाद में देखने लगा पहले देव मिस्त्री से हुई बात बताता रहा। कल शाम की बात है मैं देव मिस्त्री के साथ दिहाड़ी पर था। पैड़ काफी ऊंची थी , मैं उस पर खड़ा ईंटें पकड़ा रहा था। मेरी फूटी किस्मत , कल पुलिस वालों की लड़की का विवाह था , बरात आई हुई थी , भोजन के वक़्त जब बाजा बजा मेरे हाथ पैर भी थिरकने लगे। हाथ में पकड़ी ईंट और पैरों के पास पड़ा हुआ तसला नीचे गिर गया। देव ने मेरे पैरों में कांडी मारी, बोला , '' अबे रहा न नचने का नचना ..''

बात तो सुन उसकी ..! साला मिस्त्री क्या बन गया इंसान को पहचानना ही भूल गया। '' घोड़ी बाँध कर आता हाजी मिस्त्री को गालियाँ बकने लगा। मैंने उसे घूर कर देखा और कमर मटकाती  हुई अन्दर चली आई।
अन्दर चारपाई पड़ी हुई थी उस पर जा लेटी। हार - श्रृंगार अब मुझे काटने सा लगा था , मन उतावला होने लगा , दिल किया कि  कहीं भाग जाऊं। लेकिन कहाँ ...? गुरुद्वारे वाला पाठी कहता था , '' रहन कि थाओं नाहीं '' ( इस संसार में रहने लायक कुछ नहीं )

'' नहीं, क्यों री  ...?  आजा तू भी रोटी खा ले दो कौर '' पास खड़ी औरत मुझे कहीं देखी  हुई सी  लगी।
उई अल्लाह ! यह तो बिमला है . लुच्ची रोटी खाने के लिये कह रही थी।
'' आज सुबह से बहुत कुछ खा  लिया ...बस अब भूख  नहीं रही। बिमला की ओर  देखकर मुझे जानकी महंत की याद आ गई।

जैला भूल गया। कमीना सुबह से जैसे रूह में घुसा बैठा हो।
''  यह सब करते -जरते  तुम्हारी आत्मा में क्या कुछ चलते रहता है ....?'' मेरे दिमाग में लिखारी लड़के का सवाल घूमने लगा। मैंने तो उसे आधा ही जवाब दिया था, कमीने को क्या बताती कि  मेरी आत्मा में कैसी कब्रें बनी हुई हैं और उन कब्रों में कैसे हौके गूंजते रहते हैं , यदि उस चंदरी को उठाकर न लाती ...पर कैसे न लाती , गुरु का हुक्म था, ''  अरी  मरजानियो जाओ कुड़ी को उठाकर लाओ और हाँ तांगे में मत जाना कार लेकर जाना ...!''

तांगा मेरी पसंदीदा सवारी थी लेकिन मैंने गुरु का आदेश माना। तांगा छोड़ कार निकाली। उस गाँव में जा पहुंचे जहां से खबर मिली थी। मुए किसी जासूस ने बताया था गाँव में हमारी जात की कोई लडकी पैदा हुई है।
हमने घर के आगे जाकर ताली पीटी  ...आय ...हाय ....! लड़की की माँ कहाँ है तू ...? ''
हमें देख कर घर का द्वार बंद हो गया। लोगों के खिड़कियाँ-दरवाज़े खुल गए। बच्चे गली में आ गये। मर्दों -औरतों की आँखें तमाशा देखने लगीं। मैंने हरामियों  को आँख मारी फिर ताली पीटती हुई ने जोर से आवाज़ लगाई , '' री यह तो औरतों , मर्दों की मंडी है तू इसका क्या करेगी ....? ले आ इसे हमें दे दे , यह हमारी अमानत है ,इसकी यहाँ कोई जगह नहीं .
मेरी बात सुन तालियाँ बजने लग गईं  गली में नाच का धमचड़ शुरू हो गया।

आखिर दरवाज़ा खुला ...घुंघरुओं वाले पैर अन्दर गए ..मैं सबसे आगे थी। जन्म देने वाला मर्द उदास खड़ा था। दीवार से सटी औरतें रो रही थीं। पर बच्ची की माँ वहां नहीं थी ...
मैंने चारपाई पे बैठी बुढ़िया से कहा , '' ला मई ! बता कहाँ छिपा रखी है ...?''
उसने अक्ल से काम लिया और सामने वाली बैठक की ओर  इशारा किया।
तालियाँ और जोर से बजने लगीं ..मैं अन्दर जा घुसी . दीवार के पास पेटी पड़ी थी। उसकी ओर  देख मैंने ताली पीटी  , '' ओ री मैं मर जाऊं ...! कहाँ छुपी बैठी है जिऊँण जोगिए ...?''

'' मत लेकर जाओ जालिमों ...पूरे दस साल बाद औलाद का मुँह देखा है ...रब्ब के नाम से हाथ जोडती हूँ ...''
लड़की की माँ विलाप करने लगी। अभागिन की आँखों को देख मैं डर गई। मन डोल गया। एक दिल करे कि छोड़ जाऊं , पर कैसे छोड़ जाती , कुनबे की मर्यादा याद आ गई। मैं तैश में आ गई . मन कड़ा  किया . माँ को आशीष दी लड़की को गोद से छीन लिया .
'' चलो री अब ....कैसे खड़ी हैं लुच्ची ..!'' लड़की को छाती  से लगा मैं बाहर की ओर भागी।

अभी दहलीज भी न लांघ पाई थी कि पेटी के पीछे छुपी  माँ की  निकली आह मेरा दिल चीर गई , रूह काँप गई . मैंने पीछे मुड़ कर देखा लड़की की माँ मरी पड़ी थी। मेरी आह निकल गई। घर को रोता छोड़ मैं मुश्किल से डेरे पहुंची . जब  लड़की को पालने में डाला तालियाँ पीटी  जाने लगीं। सबने दाजी दी , पाँव में घुंघरू बांधे , अन्धेरा होने तक मुई खेलने लग गई।
सारा डेरा सो गया . मैं लड़की के साथ लेट गई। मुई रोने लगी। इसे कैसे चुप कराऊँ ...? मैंने उसे उठा बदन से लगा लिया। या अल्लाह ! यह तो भूखी थी. वह छोटे-छोटे हाथों से मेरी छाती ढूँढने लगी। मेरी तो जैसे जान निकल गई । वह रोए जा रही थी। मैं तड़प उठी। गिलास में दूध ले आई। चम्मच उसके मुंह से लगाया , लेकिन उसने मुंह घुमा लिया। मैं छातियों में दूध कहाँ से लाती ..? वह पल दो पल बाद मेरे सीने पर हाथ मरती। मैं रेत  की तरह झरने लगी । वह और जोर से रोने लगी ।

देर रात गए वह मुश्किल से चुप हुई। मैंने छाती से लगा ली। अभागिन धीरे-धीरे सो गई। मुई सोई क्या विधि माता से बातें करने लगी। कभी होंठ हिलाती, कभी मुस्कुराने लगती, कभी डर  जाती।मुई अपनी पूर्व सहेलियों और कर्मों से खेल रही थी। उसके मन में क्या था मैं सारी रात यही सोचती रही। बमुश्किल सुबह हुई । गुरुद्वारे से पाठी की आवाज़ आई। शिव मंदिर की घंटिया खड़की।

जिस दिन ढोलकी बजी , बाजा बजा , लड़की के पैरों में बंधे घुंघरू बजने लगे। मुई  दिनों में ही जवान हो गई. कुछ तो ऐसी मिटटी चढ़ी थी लुच्ची में ,कुछ हुस्न ऐसा चढ़ा तौबा मेरी तौबा ...! हर कोई देख दंग रह जाता।  उसका नाम रानी रखा ग्या.

'' इस रानी की जगह अब बदल गई है , जिसने इसका चार लाख अदा किया अब यह उस डेरे की रानी बनेगी '' जिस दिन गुरु ने उसे जानकी महंत के पास बेचने की बात बताई मेरी चीख  निकल गई। मैंने दिवार से सर पीट  लिया और बेहोश हो गई।

जब होश आया मेरी जान को जानकी महंत ले जा चूका था।
''जिद लै  गया दिलां दा  जानी , इह बुत्त बेजान रहि गिया ..''रानी को यादकर मन आहें भरने लगता।

'' एक बार जिसकी रूह में उतर जाए यह हौका (आह) नहीं निकलता रीना ...लेट जा अब ...''  मैंने साथ लेटी  बिमला की ओर देखा, वह मुझे ही कह रही थी।

डेरे के अन्दर-बाहर गहरा अन्धेरा उतर आया था। सब कुछ धुंधला सा दिख रहा था . हाजी सोया हुआ था। परे दीवार की ओर राजू और बाबू सोये हुए थे। मैं चारपाई से उठ खड़ी हुई . कलाई  पर बंधा  घुंघरुओं वाली चूड़ी  को चूमकर मैं आईने के सामने जा खड़ी हुई। मुआ आईना भी जैसे मुझे घूरने लगा हो . मैं चुन्नी से उसे साफ़ करने लगी ....'' क्यों बे गूंगे ...! अब तो कुछ बोल ...! हमें भी जगह चाहिए ....!!''
मुआ कुछ न बोला , अगर बोलता होता मुआ मुझपर आशिक न हो जाता।
'' यह आइना तुम्हारा नहीं ...हमारी मुख्य धारा का आइना है। ''
'यह कौन बोला ...? मैं डर गई। हरामी सरपंच के साथ कोका पंडित था।
कुर्सी पर बैठा सरपंच फूलों का गजरा सूंघ रहा था। घुंघरू बाँध पंडित नाच रहा था।

हाय मैं मर जाऊं ...! आईने में मुझे यह क्या दिखने लगा था।

'' बे मैंने तो तुम्हें मर्द समझा था ...!'' नीचे का होठ मैंने दांतों से काट आँख मारी। आईना तिड़क गया।

'' लुच्चा , साला ...'' उसे मुंह चिढ़ा मैं बाहर आ गई.
कोई बाहर का गेट खड़का रहा था .''...री ....ना ....!! ''
'' इस वक़्त कौन हो सकता है ...?'' कमर मटकाती हुई मैं गेट की तरफ चली आई।
ज्यों ही कुण्डी खोली ...उई अल्लाह ...! मरजाणा  जैला खड़ा था।
'' क्यों बे मुए ...! तब मैंने तुझे इतनी आवाजें मारीं  ...बता अब क्या लेने आया है  ....?'' मैंने उसके मुंह की ओर देख ताली पीटी।
वह कुछ न बोला। गली में अन्धेरा था ।
अँधेरे में खड़ा वह कुछ नीचे रखने लगा।
मेरी जान निकल गई। वह लम्बी गली की ओर चला गया।
मैंने गाँव की ओर देख ताली पीटी ...
उफ्फ ..! ताली की आवाज़ वापस क्यों परत आई ....!
शायद मेरी ताली में दम नहीं रहा या फिर धरती ही बहरी  हो गई है ....?
सोच में पड़ी मैं पागलों की तरह तालियाँ पीटने लगी।
ठीक उसी वक़्त जब डेरे के अन्दर की बत्ती जली , हाजी , बिमला, राजू और बाबू के घुंघरुओं वाले पैर देहरी की ओर चले आ रहे थे।
डेरे के अन्दर की रौशनी की एक किरण गली की ओर जा रही थी।
गली के बिलकुल बीचोबीच चुन्नी और घुंघरू पड़े थे।



अनु . हरकीरत 'हीर '
4 काव्य संग्रह , अतिथि संपादन  , अनुवादन
संपर्क- 18 ईस्ट लेन , सुन्दरपुर
हॉउस न -5 , गुवाहाटी- 781005
मोब-9864171300











Thursday, November 29, 2012

इमरोज़ जी की कुछ और नज्में .....
नया जन्मदिन ....


वह किसी की बीवी थी
या किसी की माँ
या किसी की दोस्त
मुझे मिली
मेरा सब कुछ हो के मिली
इक नया जन्म हुआ
उसका भी और मेरा भी .....

इमरोज़ -
अनु . हरकीरत 'हीर'

(2)
हाजिर ही  ...

तुम बनी रही
अपने आप संग  हाजिर
भले मुश्किलें भी बनी रहें 
अपने आप संग चलने वालों के
 साथ  ही सब कुछ चलता है
मुश्किलें भी मुहब्बतें भी ...
सोहणियों और हीरों संग
दरिया चलते रहते हैं
और मुश्किलें डूबती ....
तुम बनी रहो अपने आप संग हाजिर
हाजिर ही दरिया होते हैं
सब रुकावटें तैरने वाले
पार करने वाले .....

इमरोज़ -
अनु . हरकीरत 'हीर'

(3)

खुशबू  चारो ओर की ...

इक कब्र का फूल
तेरा भी मेरा भी
पर खुशबू चोरों ओर  की
वैसे ..
धरती का फूल तेरे जैसा मेरे जैसा
धरती से जन्म लेता
धरती पर खिलता
पर खुशबू चारो ओर की
फ़ैल जाती तुझ तक
जहां भी तू हो
जहां भी मैं होऊँ ....
अपनी झोली देख
मैं भी देखता हूँ
झोली से झोली भरी .....

इमरोज़ -
अनु . हरकीरत 'हीर'

(4)

समझ जी कर बनती है .....

ग्रन्थ भी और अपना आप भी
लिखा हुआ पढ़ कर समझ नहीं बनती
सब लिखा हुआ, जी कर समझ बनती है ...
बगीचे में
फूलों से खेलता हूँ
घर में माँ  संग
और ख्यालों में
अपने आप से खेलता हूँ ....
इक दिन फूलों संग खेल कर
इक फूल से पूछा -
वीराने में भी
फूल कैसे खिल पड़ता है ?
मैं बता नहीं सकता
कभी फूल बनकर देखना
खुद ब खुद जान जाओगे .....

इमरोज़ -
अनु . हरकीरत 'हीर'

Thursday, November 8, 2012

(पंजाबी कहानी ) बूचड़खाना -- लेखक - फ़क़ीरचंद शुक्ला
                                                            (अनु. हरकीरत 'हीर' )


अस्पताल के जनरल वार्ड में लेटा हुआ एस.पी. सोच रहा था कि अगर वह मीट  न खाता तो शायद इस दुर्घटना से बच  सकता था  . एक तो मनोवैज्ञानिक प्रभाव, दुसरे अधिक शराब पीने का असर उसे काफी कुंठित किये जा रहा था . किन्तु एस. पी. का मन अनेकों बार यही दोहरा रहा था कि यह सब मीट खाने का ही परिणाम है . मगर तभी उसका मन विरोध कर उठा . कोई ऐसी बात तो है नहीं कि उसने पहली बार मीट खाया हो ? मगर एक बात से तो चाहकर भी एस.पी. विमुख  न हो सका कि कसाई से लाये गए कच्चे मांस का सम्बन्ध इस हादसे से अवश्य है .

अमृतसर से एस . पी का जिगरी दोस्त रांणा आया था . एस.पी. का नाम भी राणा की ही देन है जो कालेज के दिनों में उसे सुरेन्द्रपाल कहकर बुलाने की अपेक्षा  एस .पी. कहा करता था  और अब 'एस.पी. ' शब्द उसके लिए जैसे पेटेंट हो गया था .

राणा के आने की खुशी में उसने मीट बनाने का फैसला किया था . राणा को साथ लेकर जब वह कसाई की दूकान पर पहुंचा तो शायद रविवार होने के कारण या किसी अन्य कारणवश , पहले का झटकाया हुआ बकरा खत्म हो गया था . उसके आने पर कसाई उन्हें जानवरों के बाड़े में ले गया ताकि अपना मन पसंद बकरा चुन सके , बाड़े में बकरे, बकरियाँ , मेमने , यूँ चिल्ला रहे थे मानों बम गिरने वाला हो . उसकी चिल्लाहट कानों के परदे फाड़ रही थी .

कसाई जब किसी बकरे अथवा मेमने के पास  पलभर के लिए रुक जाता तो उस अबोध जीव की तो जैसे सांस  ही घुट जाती . भयभीत  हो वह कसाई  की ओर देखने लगता . उन्हें जरा भी गौर से देखने से साफ पता चल जाता कि मौत से साक्षात्कार का भयंकर नजारा भोग पाना उनके लिए भी कष्टमय है .
और तभी उनकी आँखों के सामने उसने एक मेमने को झटक दिया . राणा की मन की तो राणा जाने लेकिन एस.पी. के दिल में जैसे खून की सप्लाई कम हो गई थी . वैसे तो उसने भी आज तक न जाने कितनी बार मीट खाया  था लेकिल आज यह पहला अवसर था जब उसने अपनी आँखों के सामने बकरे को झटके जाते देखा था . मीट खाने की सारी इच्छा जैसे अवसादमई हो गई थी . परन्तु राणा की 'खातिरदारी' के सामने उसने अपनी भावनाएं दबाकर ही रखीं .

भोजन के पश्चात शीघ्र ही वह खर्राटे भरने लगा था . अब पता नहीं फ़ूड प्वाज्निंग   हो गई थी या की साइकिक तौर पर असर था . रात के आधी बजे के करीब एस.पी. के पेट में बहुत जोरों से दर्द होने लगा था . और उसके तुरंत बाद ही उसे निरंतर इस कद्र उल्टियां आने लगीं थीं की वह कुछ घंटों में निढाल होकर पसर गया था .

राणा ने जब यह सब देखा तो उसे कोई चारा नज़र न आया सिवाए इसके कि वह उसे अस्पताल के एमरजेंसी  वार्ड में ले जाये . मारे दर्द के एस. पी. के प्राण गले में अटके हुए थे और अस्पताल वालों ने भर्ती करते-करते ही आधा घंटा लगा दिया था .
एमरजेंसी में न तो डियूटी वाले डाक्टर का कहीं पता था और न ही नर्स  का . बाहर बरामदे में वार्ड ब्वाय इम्तिनान से सो रहा था . एस. पी. की चीखें सुनकर उसकी आँख खुल गई लेकिन उसे इतनी रात गए उठना गवारा न हुआ . अत: वह दम साधे पड़ा रहा. आखिरकार राणा को उसे झिंझोड़कर उठाना पड़ा . वार्ड ब्वाय के निर्देश पर राणा ने प्राइवेट वार्ड के एक दो कमरों के दरवाजे खटखटाए तो कुछ समय पश्चात एक डाक्टर और नर्स प्रकट हुए . उनके चेहरों पर बेहद खीज स्पष्ट दिखाई दे रही थी .

'' क्या हुआ ?'' डाक्टर ने , जो देखने में किसी मार्डन रोमियों से कम नहीं लगता था , जरा तल्ख़ लहजे में पूछा .

'' जी डाक्टर साहब .....उसे उल्टियां आ रही हैं . पेट में भी ..." राणा ने मरीज की स्थिति का अभी पूरा  विवरण भी न दिया था कि डाक्टर बीच में ही उबल पड़ा - '' मामूली सी बात के लिए इतनी रात गए आसमान सर पर उठाने की क्या जरुरत थी . सुबह भी आ सकते थे .''


डाक्टर का चौखटा  यूँ लग रहा था जैसे उसे ततैयों ने काट खाया हो . एक दो पल रूककर उसने नर्स  से कहा - '' इसे स्टेमिटिल  और फोर्टविन का इंजेक्शन लगा दो . बाकी सुबह देखेंगे . और हाँ ....'' उसने राणा की ओर इशारा किया-'' पहले इसकी फाइल बना लाओ. ''

नर्स का मुड  भी जैसे पूरी तरह ऑफ हो गया था . मुंह में ही बुदबुदाती चली गई . कुछ देर बाद आई तो हाथ में एक पर्ची थी  . उसने राणा की ओर  पर्ची बढ़ाते  हुए कहा - '' ये दो टीके ले आओ ''

'' लेकिन इतनी रात में मैं कहाँ से ले आऊँ ..?'' राणा ने अपनी मज़बूरी जतलाने की भरपूर कोशिश की .
'' यह तुम जानो...नीचे स्टोर में देख आओ अगर खुला हो तो ....''

''आप ही कोई कृपा करें बहन जी ...''
'' बहन जी कोई जेब में तो डाले नहीं घुमती . टीका  मिल जाये तो बता देना '' वह बुदबुदाती हुई चली गई .

यह कैसा अस्पताल है ?एमरजेंसी में इतनी लापरवाही है ..तो जनरल वार्ड का तो भगवान ही मालिक है ...राणा और एस.पी. दोनों यही सोच रहे थे .

राणा नीचे भागा  स्टोर बंद था . उसने जोर  से दरवाजा पीटा..मिन्न्नते कीं ...खुशामदें कीं , तब जाकर मेडिकल स्टोर वाले ने दरवाज़ा खोला .

''मालूम नहीं आपको कि  स्टोर बारह बजे बंद हो जाता है ...?''

''भइया  एक एमरजेंसी केस है , नहीं तो आपको क्यों कष्ट देता '' राणा  जैसे उससे भीख मांग रहा हो  .


'' इनको भी इसी समय इमरजेंसी आनी थी ...'' स्टोर वाला बुदबुदाता रहा - लाओ क्या लेना है ...?

राणा ने पर्ची उसकी और बढ़ा दी . स्टोर वाले को तो जैसे सांप सूंघ गया ....

''बस दो टीके ही चाहिए ..? शोर तो ऐसे मचा रखा था जैसे .....नींद का सत्यानाश कर दिया ..."

राणा के मन में आया था की 'बाऊ' को गर्दन से पकड़ कर दो चार झापड़ लगा दे ... ! अगर नींद इतनी ही प्यारी है तो क्या जरुरत पड़ी थी अस्पताल में दूकान खोलने की . घर में टंगे पसार कर पड़ा रहता . मगर उसने चुप रहना ही उचित समझा .

स्टोर वाले का शुक्रिया अदा करने के बाद राणा को फ़ाइल बनाने वाले की भी मिन्नतें करनी पड़ीं . वह भी गहरी नींद सोया हुआ था .

खैर राणा वार्ड में लौट आया . टीका लगाने के लिए वह दो बार नर्स को बुलाने गया पर एक ही जवाब था - ''अभी आई''

और फिर राणा ने दो-तीन बार वार्ड ब्वाय को नर्स को बुलाने के लिए भेजा , तब कहीं जाकर नर्स ने दर्शन दिए .
सिरिंज उबालने में भी वक़्त लगता है न ...? वह बडबड़ाई .....

और उसने इंजेक्शन को सिरिंज में भरकर जब एस;पी; के लगाया तो एस;पी; की तो जैसे chikh ही निकल गई . नर्स ने इंजेक्शन कुछ इस प्रकार लगाया था जैसे छुरा घोंप रही हो . थोड़ी देर बाद दुसरा इंजेक्शन भी लगा गई .

'' इसे नींद का टीका लगा दिया है और उल्टियां रोकने का भी . सुबह बड़े डाक्टर आयेंगे फिर जैसा वह कहें .....''
और वह ठुमक-ठुमक करती चली गई .
थोड़ी देर बाद वह फिर आई तो उसके  हाथ में एक और पर्ची थी - '' ये दवाइयां और ग्लूकोज की चार बोतलें ले आओ ..इसे कहीं डीहाईड्रेशन  न हो जाये ..''

'' ये भी अभी चाहिए क्या ...?''
'' नहीं मेरा मतलब था कि आप यदि उसी समय बता देतीं तो मैं सभी दवाइयां एक साथ ले आ ....''
'' मेरे साथ बहस करने की जरुरत नहीं . आपका मन हो तो ले आइये नहीं तो रहने दीजिये . अगर मरीज को कुछ हो गया तो हमें दोष मत दीजिएगा .''
और वह लेफ्ट-राईट करती वहाँ  से चली गई .
राणा के पास मेडिकल स्टोर का दरवाज़ा पीटने के सिवाए और कोई चारा नहीं था . राणा सोच रहा था - किसी महापुरुष के नाम पर बने इस अस्पताल में ऐसी दुर्दशा ..! शायद उस महापुरुष की आत्मा भी बिलख रही होगी ...!
शायद एस.पी.  की किस्मत अच्छी थी . सुबह दिन निकलते ही डाक्टरों की टीम  अस्पताल में दनदनाने लगी . एस.पी. और राणा को बहुत हैरानी हुई कि इतनी सुबह डाक्टर कैसे आ गए . लेकिन कुछ समय  बाद ही जैसे उनकी शंका का समाधान हो गया था . शहर की एक मोटी 'आसामी' को जो कि अस्पताल की  मैनेजमेंट कमेटी में में भी है , को थोड़ी सी तकलीफ हो गई थी .

बस ..! फोन की घंटियों ने डाक्टरों की कोठियों की जड़ें हिला दी थीं और 'असामी' के अस्पताल में पहुँचने से पूर्व ही डाक्टरों ,नर्सों की पलटन वहाँ मार्च करने लगी थी . मानो बिल्ली के भाग से छींका टूटा . डाक्टर ने एस.पी. का भी निरीक्षण किया .
'' इसे अपेंडिसाईटिस का दर्द था . मगर अटैक पूरा नहीं था , इसलिए इतना टाइम निकल गया . लेकिन अभी आपरेशन करना पडेगा , नहीं तो फिर किसी भी समय खतरा बढ़ सकता है ..!''

राणा बेचारा फिर भाग-दौड़ में लग गया . दवाइयां खरीद कर लाने के लिए एक और लिस्ट उसे पकड़ा दी  गई . वह एक पर्ची की दवाइयां लेकर आता तभी उसे एक और पर्ची मिल जाती . राणा को खीज भी बहुत आ रही थी . एक ही बार क्यों नहीं सारी दवाइयां लिख देते ये लोग ...दवाइयाँ लाते-लाते यही ख्याल उसके दिमाग में बार-बार आता . इतनी सारी दवाइयाँ क्या एक ही बार में सारी काम आ जायेंगी ....? दवाई की शीशियों , गोलियों  आदि ने एस.पी. के बैड के साथ रखी डोली में काफी स्थान घेर लिया था .

खैर एस.पी. का आपरेशन हो गया और उसे रिकवरी रुम में लिटा दिया गया . राणा शहर चला गया था . एस.पी. के घरवालों को तार देने और साथ ही एस.पी. के आफिस में फोन द्वारा सुचना देने के लिए .
रिकवरी रुम में भी जैसे एस.पी. के लिए चैन नहीं था . वहाँ थी तीन नर्सें और दो वार्ड ब्वाय . लगता था जैसे किसी ' ह्यूमरस प्ले' की रिहर्सल कर रहे हों . हा..हा..हा...ही..ही...ही...पता नहीं कौन सी ऐसी बात थी जो खत्म होने में नहीं आ रही थी . रिकवरी रुम में लेटे हुए दुसरे मरीज़ भी दुखी होकर उनकी ओर अजीब निगाहों से देख रहे थे .
एस.पी. को नींद का इंजेक्शन लगा दिया गया था परन्तु जैसे हो हल्ले में नींद का इंजेक्शन भी असरहीन हो गया था . एस.पी. की सहन -शक्ति जैसे समाप्त हुई जा रही थी . आखिर उसने हाथ के इशारे से एक नर्स को पास बुलाया  ...
'' क्या बात है ..?''उसके बैड के पास आते हुए नर्स ने पूछा .
''सिस्टर ! जहां मैं लेता हूँ , यह कौन सी जगह है ...?'' बिना कोई भूमिका बांधे एस.पी. ने पूछा !
''क्यों ..?''
''मैं किसी को सूचित करना चाहता हूँ कि मैं फलां रुम में हूँ .''
''यह रिकवरी रुम है ..''
'' लेकिन सिस्टर , '' एस.पी. जैसे अपने मन की बात छुपा न सका - ''मुझे तो यह रिक्रियेशन रुम लग रहा है .''
''व्वाट ..?'' नर्स की भवें तन गईं . लेकिन एस.पी. के मुंह के शब्द खुद-ब-खुद निकलते रहे - ''कृपया अपना नाटक बंद कर दें ताकि मैं कुछ देर सो सकूँ .''
''स्टुपिड !'' बुदबुदाती हुई वह अपनी चंडाल -चौकड़ी की तरफ मुड़ गई . शायद अन्य सब ने एस.पी. की बात सुन ली थी .
कुछ ही क्षणों में कमरे का भारीपन जैसे कम हो गया . दुसरे दिन एस.पी. को रिकवरी रुम से जनरल वार्ड में भेज दिया गया .
सुबह-सुबह डाक्टर 'राउंड' लगाने आये तो एस.पी. के 'ट्रीटमेंट चार्ट ' पर कुछ लिख गए . डाक्टरों की टीम के जाने के पश्चात वहाँ की डयूटी-नर्स ने आकर एस.पी. को एक पर्ची थमा दी -'' ये दवाइयां ओर टीके मंगवा लीजिये .''

जब राणा आया तो एस.पी. ने पर्ची उसे थमा दी  .

''ये टीके हमारे पास हैं शायद ,'' राणा ने पर्ची पढ़ते हुए कहा . अभी कल ही तो मैं दस लाया था ओर इन गोलियों के तीन स्ट्रिप ...!''

राणा ने डोली का दरवाज़ा खोला , वहाँ इस्तेमाल किये हुए टीकों के दो चार खोल ओर कुछ गोलियां पड़ी थीं . '' सभी दवाइयां कहाँ गई एस.पी. ...? मैं तो कल काफी सारी लाया था ...?''

'' मुझे क्या पता लग गईं होंगीं .''
'' लगती कहाँ हैं बाबु साहब रात में सफाचट हो जाती हैं .'' साथ वाले बैड के मरीज ने व्यंगात्मक स्वर में कहा ... !
''सफाचट ..?'' एस.पी' ने हैरान होते हुए कहा .
'' हाँ जी ये डाक्टर लोग जान बुझ कर ज्यादा दवाइयाँ मंगवा लेते हैं और रात को मरीज़ को टीका लगा कर सुला देते हैं . तब  दवाइयाँ एक बार फिर वहीँ चली जाती हैं जहाँ से आती हैं . ''
''आपका मतलब है मेडिकल स्टोर वालों को बेच देते हैं .''
'' हाँ जी  , तभी तो ये बार-बार इस बात पर जोर देते हैं की अस्पताल के मेडिकल स्टोर से ही दवाइयाँ लायें , बाहर से अच्छी नहीं मिलतीं . ''
एस.पी. तो जैसे यह सब सुनकर स्तब्ध रह गया . अपने कानों पर जैसे विशवास ही नहीं हुआ ...लेकिन डोली का खालीपन जैसे इस बात का साक्षी था . और भला क्या प्रमाण चाहिए था उसे ...!
और अस्पताल में लेटा हुआ एस.पी. सोच रहा था कि अगर वह वह मीट न खाता तो शायद इस दुर्घटना से बच जाता लेकिन वह खुद ही अपने उत्तर प्रश्नों में और प्रश्न उत्तरों में गड़बड़ किये जा रहा था .
****
आज काफी सुबह ही एस.पी. की आँख खुल गई . एक नया मरीज़ आया था . चिल्ला-चिल्ला कर उसने वार्ड के सभी मरीजों को जगा दिया था . दो चक्कर लगाने के बाद नर्स नहीं आई थी . डाक्टर तो एक बार भी नहीं आया . वार्ड के बाकी मरीज़ भी बिलबिला रहे थे लेकिन नए आये मरीज़ की चीखें अभी भी पहले की तरह ऊंची थीं जबकि डाक्टरों के  राऊंड लगाने का समय हो गया था .
अचानक नए आये मरीज़ की चीखें बंद हो गईं .
एस.पी. के आस-पास लेटे मरीजों ने भी जैसे सांस खींच ली हो ....और सभी की आँखें वार्ड के दरवाजे की तरफ  थीं . हैं ....s ..s ....यह सन्नाटा क्यों ...? एस.पी. जैसे  हैरान हो गया .
और फिर अगले ही क्षण एस.पी. की नज़र भी उस ओर घूम गई जिस ओर बाकी मरीज देख रहे थे . एक डाक्टर भीतर आ रहा था . लेकिन यह क्या ...?एस.पी. की आँखों को यह क्या हो गया ..? उसे यह क्या दिखाई देने लगा है . वार्ड की जगह बकरियां का बाड़ा ...डाक्टर की जगह कसाई ...? नहीं...नहीं....यह कैसे हो सकता है ...? एस. पी. ने आँखें मलीं ...लेकिन नहीं ...सब कुछ पहले की तरह दिखाई दे रहा था .
और शायद इसलिए बकरियों ने मिमियाना बंद कर दिया था और सहमी हुई उस तरफ देख रही थीं ...!!

संपर्क - डॉ फकीरचंद  शुक्ला
२३०-सी,
भाई रंधीर सिंह नगर
लुधियाना - १४१०१२ (पंजाब )
फोन- १६१-२४५९०३० , ४६१२२३०
मो. ९८१५३५९२२२
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अनुवादक- हरकीरत 'हीर'
१८ ईस्ट लेन. आर.जी. बरुआ रोड ,
पोस्ट-दिसपुर , हॉउस न. ५
गुवाहाटी-७८१००५ (असाम )