Thursday, November 29, 2012

इमरोज़ जी की कुछ और नज्में .....
नया जन्मदिन ....


वह किसी की बीवी थी
या किसी की माँ
या किसी की दोस्त
मुझे मिली
मेरा सब कुछ हो के मिली
इक नया जन्म हुआ
उसका भी और मेरा भी .....

इमरोज़ -
अनु . हरकीरत 'हीर'

(2)
हाजिर ही  ...

तुम बनी रही
अपने आप संग  हाजिर
भले मुश्किलें भी बनी रहें 
अपने आप संग चलने वालों के
 साथ  ही सब कुछ चलता है
मुश्किलें भी मुहब्बतें भी ...
सोहणियों और हीरों संग
दरिया चलते रहते हैं
और मुश्किलें डूबती ....
तुम बनी रहो अपने आप संग हाजिर
हाजिर ही दरिया होते हैं
सब रुकावटें तैरने वाले
पार करने वाले .....

इमरोज़ -
अनु . हरकीरत 'हीर'

(3)

खुशबू  चारो ओर की ...

इक कब्र का फूल
तेरा भी मेरा भी
पर खुशबू चोरों ओर  की
वैसे ..
धरती का फूल तेरे जैसा मेरे जैसा
धरती से जन्म लेता
धरती पर खिलता
पर खुशबू चारो ओर की
फ़ैल जाती तुझ तक
जहां भी तू हो
जहां भी मैं होऊँ ....
अपनी झोली देख
मैं भी देखता हूँ
झोली से झोली भरी .....

इमरोज़ -
अनु . हरकीरत 'हीर'

(4)

समझ जी कर बनती है .....

ग्रन्थ भी और अपना आप भी
लिखा हुआ पढ़ कर समझ नहीं बनती
सब लिखा हुआ, जी कर समझ बनती है ...
बगीचे में
फूलों से खेलता हूँ
घर में माँ  संग
और ख्यालों में
अपने आप से खेलता हूँ ....
इक दिन फूलों संग खेल कर
इक फूल से पूछा -
वीराने में भी
फूल कैसे खिल पड़ता है ?
मैं बता नहीं सकता
कभी फूल बनकर देखना
खुद ब खुद जान जाओगे .....

इमरोज़ -
अनु . हरकीरत 'हीर'

Thursday, November 8, 2012

(पंजाबी कहानी ) बूचड़खाना -- लेखक - फ़क़ीरचंद शुक्ला
                                                            (अनु. हरकीरत 'हीर' )


अस्पताल के जनरल वार्ड में लेटा हुआ एस.पी. सोच रहा था कि अगर वह मीट  न खाता तो शायद इस दुर्घटना से बच  सकता था  . एक तो मनोवैज्ञानिक प्रभाव, दुसरे अधिक शराब पीने का असर उसे काफी कुंठित किये जा रहा था . किन्तु एस. पी. का मन अनेकों बार यही दोहरा रहा था कि यह सब मीट खाने का ही परिणाम है . मगर तभी उसका मन विरोध कर उठा . कोई ऐसी बात तो है नहीं कि उसने पहली बार मीट खाया हो ? मगर एक बात से तो चाहकर भी एस.पी. विमुख  न हो सका कि कसाई से लाये गए कच्चे मांस का सम्बन्ध इस हादसे से अवश्य है .

अमृतसर से एस . पी का जिगरी दोस्त रांणा आया था . एस.पी. का नाम भी राणा की ही देन है जो कालेज के दिनों में उसे सुरेन्द्रपाल कहकर बुलाने की अपेक्षा  एस .पी. कहा करता था  और अब 'एस.पी. ' शब्द उसके लिए जैसे पेटेंट हो गया था .

राणा के आने की खुशी में उसने मीट बनाने का फैसला किया था . राणा को साथ लेकर जब वह कसाई की दूकान पर पहुंचा तो शायद रविवार होने के कारण या किसी अन्य कारणवश , पहले का झटकाया हुआ बकरा खत्म हो गया था . उसके आने पर कसाई उन्हें जानवरों के बाड़े में ले गया ताकि अपना मन पसंद बकरा चुन सके , बाड़े में बकरे, बकरियाँ , मेमने , यूँ चिल्ला रहे थे मानों बम गिरने वाला हो . उसकी चिल्लाहट कानों के परदे फाड़ रही थी .

कसाई जब किसी बकरे अथवा मेमने के पास  पलभर के लिए रुक जाता तो उस अबोध जीव की तो जैसे सांस  ही घुट जाती . भयभीत  हो वह कसाई  की ओर देखने लगता . उन्हें जरा भी गौर से देखने से साफ पता चल जाता कि मौत से साक्षात्कार का भयंकर नजारा भोग पाना उनके लिए भी कष्टमय है .
और तभी उनकी आँखों के सामने उसने एक मेमने को झटक दिया . राणा की मन की तो राणा जाने लेकिन एस.पी. के दिल में जैसे खून की सप्लाई कम हो गई थी . वैसे तो उसने भी आज तक न जाने कितनी बार मीट खाया  था लेकिल आज यह पहला अवसर था जब उसने अपनी आँखों के सामने बकरे को झटके जाते देखा था . मीट खाने की सारी इच्छा जैसे अवसादमई हो गई थी . परन्तु राणा की 'खातिरदारी' के सामने उसने अपनी भावनाएं दबाकर ही रखीं .

भोजन के पश्चात शीघ्र ही वह खर्राटे भरने लगा था . अब पता नहीं फ़ूड प्वाज्निंग   हो गई थी या की साइकिक तौर पर असर था . रात के आधी बजे के करीब एस.पी. के पेट में बहुत जोरों से दर्द होने लगा था . और उसके तुरंत बाद ही उसे निरंतर इस कद्र उल्टियां आने लगीं थीं की वह कुछ घंटों में निढाल होकर पसर गया था .

राणा ने जब यह सब देखा तो उसे कोई चारा नज़र न आया सिवाए इसके कि वह उसे अस्पताल के एमरजेंसी  वार्ड में ले जाये . मारे दर्द के एस. पी. के प्राण गले में अटके हुए थे और अस्पताल वालों ने भर्ती करते-करते ही आधा घंटा लगा दिया था .
एमरजेंसी में न तो डियूटी वाले डाक्टर का कहीं पता था और न ही नर्स  का . बाहर बरामदे में वार्ड ब्वाय इम्तिनान से सो रहा था . एस. पी. की चीखें सुनकर उसकी आँख खुल गई लेकिन उसे इतनी रात गए उठना गवारा न हुआ . अत: वह दम साधे पड़ा रहा. आखिरकार राणा को उसे झिंझोड़कर उठाना पड़ा . वार्ड ब्वाय के निर्देश पर राणा ने प्राइवेट वार्ड के एक दो कमरों के दरवाजे खटखटाए तो कुछ समय पश्चात एक डाक्टर और नर्स प्रकट हुए . उनके चेहरों पर बेहद खीज स्पष्ट दिखाई दे रही थी .

'' क्या हुआ ?'' डाक्टर ने , जो देखने में किसी मार्डन रोमियों से कम नहीं लगता था , जरा तल्ख़ लहजे में पूछा .

'' जी डाक्टर साहब .....उसे उल्टियां आ रही हैं . पेट में भी ..." राणा ने मरीज की स्थिति का अभी पूरा  विवरण भी न दिया था कि डाक्टर बीच में ही उबल पड़ा - '' मामूली सी बात के लिए इतनी रात गए आसमान सर पर उठाने की क्या जरुरत थी . सुबह भी आ सकते थे .''


डाक्टर का चौखटा  यूँ लग रहा था जैसे उसे ततैयों ने काट खाया हो . एक दो पल रूककर उसने नर्स  से कहा - '' इसे स्टेमिटिल  और फोर्टविन का इंजेक्शन लगा दो . बाकी सुबह देखेंगे . और हाँ ....'' उसने राणा की ओर इशारा किया-'' पहले इसकी फाइल बना लाओ. ''

नर्स का मुड  भी जैसे पूरी तरह ऑफ हो गया था . मुंह में ही बुदबुदाती चली गई . कुछ देर बाद आई तो हाथ में एक पर्ची थी  . उसने राणा की ओर  पर्ची बढ़ाते  हुए कहा - '' ये दो टीके ले आओ ''

'' लेकिन इतनी रात में मैं कहाँ से ले आऊँ ..?'' राणा ने अपनी मज़बूरी जतलाने की भरपूर कोशिश की .
'' यह तुम जानो...नीचे स्टोर में देख आओ अगर खुला हो तो ....''

''आप ही कोई कृपा करें बहन जी ...''
'' बहन जी कोई जेब में तो डाले नहीं घुमती . टीका  मिल जाये तो बता देना '' वह बुदबुदाती हुई चली गई .

यह कैसा अस्पताल है ?एमरजेंसी में इतनी लापरवाही है ..तो जनरल वार्ड का तो भगवान ही मालिक है ...राणा और एस.पी. दोनों यही सोच रहे थे .

राणा नीचे भागा  स्टोर बंद था . उसने जोर  से दरवाजा पीटा..मिन्न्नते कीं ...खुशामदें कीं , तब जाकर मेडिकल स्टोर वाले ने दरवाज़ा खोला .

''मालूम नहीं आपको कि  स्टोर बारह बजे बंद हो जाता है ...?''

''भइया  एक एमरजेंसी केस है , नहीं तो आपको क्यों कष्ट देता '' राणा  जैसे उससे भीख मांग रहा हो  .


'' इनको भी इसी समय इमरजेंसी आनी थी ...'' स्टोर वाला बुदबुदाता रहा - लाओ क्या लेना है ...?

राणा ने पर्ची उसकी और बढ़ा दी . स्टोर वाले को तो जैसे सांप सूंघ गया ....

''बस दो टीके ही चाहिए ..? शोर तो ऐसे मचा रखा था जैसे .....नींद का सत्यानाश कर दिया ..."

राणा के मन में आया था की 'बाऊ' को गर्दन से पकड़ कर दो चार झापड़ लगा दे ... ! अगर नींद इतनी ही प्यारी है तो क्या जरुरत पड़ी थी अस्पताल में दूकान खोलने की . घर में टंगे पसार कर पड़ा रहता . मगर उसने चुप रहना ही उचित समझा .

स्टोर वाले का शुक्रिया अदा करने के बाद राणा को फ़ाइल बनाने वाले की भी मिन्नतें करनी पड़ीं . वह भी गहरी नींद सोया हुआ था .

खैर राणा वार्ड में लौट आया . टीका लगाने के लिए वह दो बार नर्स को बुलाने गया पर एक ही जवाब था - ''अभी आई''

और फिर राणा ने दो-तीन बार वार्ड ब्वाय को नर्स को बुलाने के लिए भेजा , तब कहीं जाकर नर्स ने दर्शन दिए .
सिरिंज उबालने में भी वक़्त लगता है न ...? वह बडबड़ाई .....

और उसने इंजेक्शन को सिरिंज में भरकर जब एस;पी; के लगाया तो एस;पी; की तो जैसे chikh ही निकल गई . नर्स ने इंजेक्शन कुछ इस प्रकार लगाया था जैसे छुरा घोंप रही हो . थोड़ी देर बाद दुसरा इंजेक्शन भी लगा गई .

'' इसे नींद का टीका लगा दिया है और उल्टियां रोकने का भी . सुबह बड़े डाक्टर आयेंगे फिर जैसा वह कहें .....''
और वह ठुमक-ठुमक करती चली गई .
थोड़ी देर बाद वह फिर आई तो उसके  हाथ में एक और पर्ची थी - '' ये दवाइयां और ग्लूकोज की चार बोतलें ले आओ ..इसे कहीं डीहाईड्रेशन  न हो जाये ..''

'' ये भी अभी चाहिए क्या ...?''
'' नहीं मेरा मतलब था कि आप यदि उसी समय बता देतीं तो मैं सभी दवाइयां एक साथ ले आ ....''
'' मेरे साथ बहस करने की जरुरत नहीं . आपका मन हो तो ले आइये नहीं तो रहने दीजिये . अगर मरीज को कुछ हो गया तो हमें दोष मत दीजिएगा .''
और वह लेफ्ट-राईट करती वहाँ  से चली गई .
राणा के पास मेडिकल स्टोर का दरवाज़ा पीटने के सिवाए और कोई चारा नहीं था . राणा सोच रहा था - किसी महापुरुष के नाम पर बने इस अस्पताल में ऐसी दुर्दशा ..! शायद उस महापुरुष की आत्मा भी बिलख रही होगी ...!
शायद एस.पी.  की किस्मत अच्छी थी . सुबह दिन निकलते ही डाक्टरों की टीम  अस्पताल में दनदनाने लगी . एस.पी. और राणा को बहुत हैरानी हुई कि इतनी सुबह डाक्टर कैसे आ गए . लेकिन कुछ समय  बाद ही जैसे उनकी शंका का समाधान हो गया था . शहर की एक मोटी 'आसामी' को जो कि अस्पताल की  मैनेजमेंट कमेटी में में भी है , को थोड़ी सी तकलीफ हो गई थी .

बस ..! फोन की घंटियों ने डाक्टरों की कोठियों की जड़ें हिला दी थीं और 'असामी' के अस्पताल में पहुँचने से पूर्व ही डाक्टरों ,नर्सों की पलटन वहाँ मार्च करने लगी थी . मानो बिल्ली के भाग से छींका टूटा . डाक्टर ने एस.पी. का भी निरीक्षण किया .
'' इसे अपेंडिसाईटिस का दर्द था . मगर अटैक पूरा नहीं था , इसलिए इतना टाइम निकल गया . लेकिन अभी आपरेशन करना पडेगा , नहीं तो फिर किसी भी समय खतरा बढ़ सकता है ..!''

राणा बेचारा फिर भाग-दौड़ में लग गया . दवाइयां खरीद कर लाने के लिए एक और लिस्ट उसे पकड़ा दी  गई . वह एक पर्ची की दवाइयां लेकर आता तभी उसे एक और पर्ची मिल जाती . राणा को खीज भी बहुत आ रही थी . एक ही बार क्यों नहीं सारी दवाइयां लिख देते ये लोग ...दवाइयाँ लाते-लाते यही ख्याल उसके दिमाग में बार-बार आता . इतनी सारी दवाइयाँ क्या एक ही बार में सारी काम आ जायेंगी ....? दवाई की शीशियों , गोलियों  आदि ने एस.पी. के बैड के साथ रखी डोली में काफी स्थान घेर लिया था .

खैर एस.पी. का आपरेशन हो गया और उसे रिकवरी रुम में लिटा दिया गया . राणा शहर चला गया था . एस.पी. के घरवालों को तार देने और साथ ही एस.पी. के आफिस में फोन द्वारा सुचना देने के लिए .
रिकवरी रुम में भी जैसे एस.पी. के लिए चैन नहीं था . वहाँ थी तीन नर्सें और दो वार्ड ब्वाय . लगता था जैसे किसी ' ह्यूमरस प्ले' की रिहर्सल कर रहे हों . हा..हा..हा...ही..ही...ही...पता नहीं कौन सी ऐसी बात थी जो खत्म होने में नहीं आ रही थी . रिकवरी रुम में लेटे हुए दुसरे मरीज़ भी दुखी होकर उनकी ओर अजीब निगाहों से देख रहे थे .
एस.पी. को नींद का इंजेक्शन लगा दिया गया था परन्तु जैसे हो हल्ले में नींद का इंजेक्शन भी असरहीन हो गया था . एस.पी. की सहन -शक्ति जैसे समाप्त हुई जा रही थी . आखिर उसने हाथ के इशारे से एक नर्स को पास बुलाया  ...
'' क्या बात है ..?''उसके बैड के पास आते हुए नर्स ने पूछा .
''सिस्टर ! जहां मैं लेता हूँ , यह कौन सी जगह है ...?'' बिना कोई भूमिका बांधे एस.पी. ने पूछा !
''क्यों ..?''
''मैं किसी को सूचित करना चाहता हूँ कि मैं फलां रुम में हूँ .''
''यह रिकवरी रुम है ..''
'' लेकिन सिस्टर , '' एस.पी. जैसे अपने मन की बात छुपा न सका - ''मुझे तो यह रिक्रियेशन रुम लग रहा है .''
''व्वाट ..?'' नर्स की भवें तन गईं . लेकिन एस.पी. के मुंह के शब्द खुद-ब-खुद निकलते रहे - ''कृपया अपना नाटक बंद कर दें ताकि मैं कुछ देर सो सकूँ .''
''स्टुपिड !'' बुदबुदाती हुई वह अपनी चंडाल -चौकड़ी की तरफ मुड़ गई . शायद अन्य सब ने एस.पी. की बात सुन ली थी .
कुछ ही क्षणों में कमरे का भारीपन जैसे कम हो गया . दुसरे दिन एस.पी. को रिकवरी रुम से जनरल वार्ड में भेज दिया गया .
सुबह-सुबह डाक्टर 'राउंड' लगाने आये तो एस.पी. के 'ट्रीटमेंट चार्ट ' पर कुछ लिख गए . डाक्टरों की टीम के जाने के पश्चात वहाँ की डयूटी-नर्स ने आकर एस.पी. को एक पर्ची थमा दी -'' ये दवाइयां ओर टीके मंगवा लीजिये .''

जब राणा आया तो एस.पी. ने पर्ची उसे थमा दी  .

''ये टीके हमारे पास हैं शायद ,'' राणा ने पर्ची पढ़ते हुए कहा . अभी कल ही तो मैं दस लाया था ओर इन गोलियों के तीन स्ट्रिप ...!''

राणा ने डोली का दरवाज़ा खोला , वहाँ इस्तेमाल किये हुए टीकों के दो चार खोल ओर कुछ गोलियां पड़ी थीं . '' सभी दवाइयां कहाँ गई एस.पी. ...? मैं तो कल काफी सारी लाया था ...?''

'' मुझे क्या पता लग गईं होंगीं .''
'' लगती कहाँ हैं बाबु साहब रात में सफाचट हो जाती हैं .'' साथ वाले बैड के मरीज ने व्यंगात्मक स्वर में कहा ... !
''सफाचट ..?'' एस.पी' ने हैरान होते हुए कहा .
'' हाँ जी ये डाक्टर लोग जान बुझ कर ज्यादा दवाइयाँ मंगवा लेते हैं और रात को मरीज़ को टीका लगा कर सुला देते हैं . तब  दवाइयाँ एक बार फिर वहीँ चली जाती हैं जहाँ से आती हैं . ''
''आपका मतलब है मेडिकल स्टोर वालों को बेच देते हैं .''
'' हाँ जी  , तभी तो ये बार-बार इस बात पर जोर देते हैं की अस्पताल के मेडिकल स्टोर से ही दवाइयाँ लायें , बाहर से अच्छी नहीं मिलतीं . ''
एस.पी. तो जैसे यह सब सुनकर स्तब्ध रह गया . अपने कानों पर जैसे विशवास ही नहीं हुआ ...लेकिन डोली का खालीपन जैसे इस बात का साक्षी था . और भला क्या प्रमाण चाहिए था उसे ...!
और अस्पताल में लेटा हुआ एस.पी. सोच रहा था कि अगर वह वह मीट न खाता तो शायद इस दुर्घटना से बच जाता लेकिन वह खुद ही अपने उत्तर प्रश्नों में और प्रश्न उत्तरों में गड़बड़ किये जा रहा था .
****
आज काफी सुबह ही एस.पी. की आँख खुल गई . एक नया मरीज़ आया था . चिल्ला-चिल्ला कर उसने वार्ड के सभी मरीजों को जगा दिया था . दो चक्कर लगाने के बाद नर्स नहीं आई थी . डाक्टर तो एक बार भी नहीं आया . वार्ड के बाकी मरीज़ भी बिलबिला रहे थे लेकिन नए आये मरीज़ की चीखें अभी भी पहले की तरह ऊंची थीं जबकि डाक्टरों के  राऊंड लगाने का समय हो गया था .
अचानक नए आये मरीज़ की चीखें बंद हो गईं .
एस.पी. के आस-पास लेटे मरीजों ने भी जैसे सांस खींच ली हो ....और सभी की आँखें वार्ड के दरवाजे की तरफ  थीं . हैं ....s ..s ....यह सन्नाटा क्यों ...? एस.पी. जैसे  हैरान हो गया .
और फिर अगले ही क्षण एस.पी. की नज़र भी उस ओर घूम गई जिस ओर बाकी मरीज देख रहे थे . एक डाक्टर भीतर आ रहा था . लेकिन यह क्या ...?एस.पी. की आँखों को यह क्या हो गया ..? उसे यह क्या दिखाई देने लगा है . वार्ड की जगह बकरियां का बाड़ा ...डाक्टर की जगह कसाई ...? नहीं...नहीं....यह कैसे हो सकता है ...? एस. पी. ने आँखें मलीं ...लेकिन नहीं ...सब कुछ पहले की तरह दिखाई दे रहा था .
और शायद इसलिए बकरियों ने मिमियाना बंद कर दिया था और सहमी हुई उस तरफ देख रही थीं ...!!

संपर्क - डॉ फकीरचंद  शुक्ला
२३०-सी,
भाई रंधीर सिंह नगर
लुधियाना - १४१०१२ (पंजाब )
फोन- १६१-२४५९०३० , ४६१२२३०
मो. ९८१५३५९२२२
****************************
अनुवादक- हरकीरत 'हीर'
१८ ईस्ट लेन. आर.जी. बरुआ रोड ,
पोस्ट-दिसपुर , हॉउस न. ५
गुवाहाटी-७८१००५ (असाम )




Tuesday, October 30, 2012

 पूरा....

कल मैंने हवा से पूछा -
मैं भी तुझ सा
आज़ाद और अदृश्य होना  चाहता हूँ
कहने लगी ...
खामोश मुहब्बत कर ले
किसके साथ ...?
जो तुम्हें अच्छी लगे ....
खामोश मुहब्बत और अदृश्य
अपने आप से ..
कई बार उदास रहने लगा
आज हवा से मिलकर पूछा ...
तुम  कभी उदास हुई हो ..?
''पूरा आज़ाद कभी उदास नहीं होता ''
यह सुन ...
यह भी समझ  आ गया कि
पूरा कभी निराश भी नहीं होता ......

---इमरोज़
अनु. हरकीरत हीर

Monday, October 22, 2012

ਭੁਖ - ਜਿਤੇੰਦਰ 'ਜੌਹਰ '

ਕੁੱਤੇ ਨੂੰ ਰੋਟੀ ਖਵਾਂਦਾ  ਵੇਖ
ਏਕ ਬੁਡ੍ਦੇ  ਭਿਖਾਰੀ ਨੇ
ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਅੱਗੇ ਹੱਥ ਫੈਲਾਇਆ
ਯਾਚਨਾ ਪੂਰਵਕ ਗਿੜਗੀੜਾਇਆ
ਤਦੇ ਸਾਹਿਬ ਨੇ ਮੁੰਹ  ਖੋਲਿਆ
ਅਤੇ ਭਿਖਾਰੀ  ਨੂੰ ਟਰਕਾਂਦੇ ਹੋਏ ਬੋਲਿਆ -
ਜਾਣਦਾ ਵਾਂ... ਦੇਸੀ ਘਿਓ ਵਿਚ ਸਣੀ  ਹੈ
ਇਹ ਰੋਟੀ ਤੇ ਸਿਰਫ ਕੁੱਤੇ ਲੈ ਬਣੀ ਹੈ ...

ਇੰਨਾ ਸੁਣ ..
ਉਹ ਭੁਖਾ ਭਿਖਾਰੀ
ਅਪਣੇ ਦੋਨੋਂ ਗੋੱਡੇ ਤੇ ਹੱਥ
ਜਮੀਨ ਤੇ ਟੇਕ ਤਣ  ਗਿਆ
ਅਤੇ ਅਗਲੇ ਹੀ ਪੱਲ
ਕਰੁਣ ਸੁਰ 'ਚ ਬੋਲਿਆ 
''ਲਓ...ਬਾਬੂ ਜੀ ,
ਹੁਣ ਮੈਂ ਵੀ 'ਕੁੱਤਾ' ਬਣ ਗਿਆਂ !''

ਇਸ ਘਟਨਾ ਵਿਚ
ਭੁਖ ਜਿਤਦੀ ਹੈ
ਅਤੇ ਇਨ੍ਸਾਨਿਯਤ ਹਾਰਦੀ ਹੈ
ਹੇ ਅੰਨਦਾਤਿਆ...!
ਤੇਰੀ ਪਜਾਹ 'ਗ੍ਰਾਮ' ਦੀ ਰੋਟੀ
ਪਜਾਹ 'ਕਿਲੋ' ਦੇ ਆਦਮੀ ਤੇ ਭਾਰੀ ਹੈ ..!!

(ਹਿੰਦੀ ਤੋਂ ਅਨੁਵਾਦ)

ਅਨੁਵਾਦ -ਹਰਕੀਰਤ 'ਹੀਰ'
੧੮ ਇਸਟ ਲੇਨ , ਸੁੰਦਰਪੁਰ , ਹਾਉਸ ਨ. ੫
ਗੁਵਾਹਾਟੀ-੭੮੧੦੦੫
ਮੋ.੯੮੬੪੧੭੧੩੦੦


(2)


ਉਜਾਲੇ ਦੀ ਜਿੱਤ - ਜਿਤੇੰਦਰ 'ਜੌਹਰ '

ਮੁਖ਼ਾਲਿਫ਼ ਹਵਾਵਾਂ ਦੇ ਵਿਚ
ਸੌਖਾ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ
ਹਨੇਰੇ ਦੀ ਮਹਫ਼ਿਲ'ਚ
ਉਜਾਲਾ ਲਿਖਣਾ ....

ਪਰ ਉਹ ਛੋਟਾ ਜਿਹਾ ਦੀਵਾ
ਰਾਤਭਰ ਲਿਖਦਾ ਰਿਹਾ
ਪੁਰਹੌਸ ..
ਰੌਸ਼ਨੀ ਦੀ ਇਬਾਦਤ
ਹਨੇਰੇ ਦੀ ਛਾਤੀ ਉੱਤੇ ....

ਹਵਾਵਾਂ ..
ਝਪਟਦਿਆਂ ਰਹਿਆਂ
ਉਜਾਲਾ ਉਗਲਦੀ ਲੇਖਣੀ ਉੱਤੇ

ਲੇਖਣੀ ਡਗਮਗਾਈ
ਫਿਰ ਸਭ੍ਲੀ ..
ਹੋਰ ਜਗਮਗਾਈ

ਦੀਵੇ ਦਾ ਸੰਘਰਸ਼ ਵੇਖਦੇ-ਵੇਖਦੇ
ਮੈਂ ਨੀਂਦ ਦੇ ਆਗੋਸ਼'ਚ
ਗੁਮ  ਗਿਆਂ
ਅਤੇ ਚਾਦਰ ਤਾਣ
 ਸੋਂ ਗਿਆਂ ..

ਸਵੇਰੇ ,
ਜਦੋਂ ਅੱਖ ਖੁੱਲੀ
ਤਾਂ ਦੀਵੇ ਦੀ ਰੌਸ਼ਨ ' ਪਾੰਡੁਲਿਪੀ  '
ਸੂਰਜ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿਚ
 ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਿਤ ਮਿਲੀ !

ਉਸਦਾ ਸੰਦੇਸ਼
ਕਿੰਨਾ ਪ੍ਰਖਰ ਸੀ
ਮੌਨ ਹੋ ਕੇ ਵੀ
ਮੁਖਰ ਸੀ
ਕਿ ਸਾਨੂੰ ....
ਹਨੇਰੇ ਦੇ ਖਿਲਾਫ਼ ਸੰਘਰਸ਼'ਚ
ਹਿਮ੍ਮਤ ਨਹੀਂ ਹਾਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ
ਕਿਓੰਕੇ ....
ਜੀਤ ਤਾਂ ਆਖ਼ਿਰ
ਉਜਾਲੇ ਦੀ ਹੀ ਹੋਣੀ ਹੈ ..!!

(ਹਿੰਦੀ ਤੋਂ ਅਨੁਵਾਦ)

ਅਨੁਵਾਦ -ਹਰਕੀਰਤ 'ਹੀਰ'
੧੮ ਇਸਟ ਲੇਨ , ਸੁੰਦਰਪੁਰ , ਹਾਉਸ ਨ. ੫
ਗੁਵਾਹਾਟੀ-੭੮੧੦੦੫
ਮੋ.੯੮੬੪੧੭੧੩੦੦


(3)

ਪਹਿਲਾਂ ਤੇ ਹੁਣ ..... ਜਿਤੇੰਦਰ 'ਜੌਹਰ '

ਹਰੀ, ਹਰਜਿੰਦਰ ,
ਹੈਰੀ ਤੇ ਹਬੀਬ
ਰਹਿੰਦੇ ਸੀ ਇਕ-ਦੂਜੇ ਦੇ
ਬਹੁਤ ਕਰੀਬ !

ਬੜੀ ਜਮਦੀ ਸੀ ਉਹਨਾ ਦੀ
ਗੰਗਾ-ਜਮੁਨੀ ਟੋਲੀ
ਇਕ ਨਾਲ ਮਨਾਦੇ ਸੀ
ਈਦ -ਬੈਸਾਖੀ -ਕ੍ਰਿਸਮਸ-ਹੋਲੀ !

ਪਰ ਅੱਜ
ਉਹਨਾਦੇ ਅੰਦਾਜ
ਬਿਲਕੁਲ ਬਦਲ ਗਏ ਨੇ
ਉਹ ਜਾਤ ਤੇ ਮਜਹਬਾਂ ਦੇ
ਸਂਕਰੇ ਸਾਂਚਿਆਂ'ਚ ਢਲ ਗਏ ਨੇ !

ਹੁਣ ਨਹੀਂ ਨਜ਼ਰ ਆਂਦੀ
ਉਹਨਾ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਵਿੱਚ
ਪਹਿਲਾਂ ਜੇਹੀ ਗਰ੍ਮਾਹਟ
ਦੀਲਾਂ  ਵਿੱਚ ਘੁਲ ਗਈ ਹੈ
ਇਕ ਅਨਚਾਹੀ ਕੜਵਾਹਟ ...
ਅਤੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਮਿਠਾਸ ਹੋ ਗਈ ਹੈ ਖ਼ਤਮ!
ਇਸ ਕਰਕੇ ਲੋਕੀਂ ਗਾਣ ਲੱਗੇ ਨੇ
'' ਮੁਹੱਬਤ ਹੈ ਮਿਰਚੀ.... ਸਨਮ !''

(4)

ਸ਼ੁਕਰੀਆ .....

ਏ ਹਵਾ ...!
ਹੁਣ ਤੇਰੇ ਤੇ ਵੀ ਕਿਵੇਂ ਕਰਾਂ ਵਿਸ਼ਵਾਸ

ਤੂੰ ਸਿਰਫ ਮਹਿਕ ਪਹੁੰਚਾਈ ਉਸ ਕੋਲ
ਮੇਰੀਆਂ ਅੱਖਾਂ  ਦੀ ਸਾਰੀ ਨਮੀ
ਰਾਹਿ ਵਿਚਕਾਰ ਹੀ ਸੋਖ ਲਈ ਤੂੰ
ਚੱਲ ਕੋਈ ਗੱਲ ਨਹੀਂ
ਇਹ ਏਹਸਾਨ ਕੀ ਘਟ ਹੈ
ਕਿ ਨਮੀ ਦੀ ਲੈ
'ਫ਼ੀਸ'
ਮਹਕ ਤਾਂ ਰੱਖੀ ਤੂੰ ਮਹ੍ਫ਼ੁਜ਼...!
ਏ ਹਵਾ ....
ਸ਼ੁਕਰੀਆ ਤੇਰਾ ...!!
 
(5) 
 
ਸੌਦਾ ...
ਮੈਂ ਮਿਠਾਸ ਚੁਕਾਈ ਸੀ
ਤੱਦ ਜਾਕੇ ਮਿਲਿਆ ਸੀ ਮੈਂਨੂੰ
ਤੇਰਾ ਖਾਰਾਪਨ ....!
ਬਹੁਤ ਮਹਿੰਗਾ ਸੌਦਾ ਸੀ ਇਹ
ਮੈਂ ਪਿਆਰ ਦੇ ਕੇ ਪਾ ਸਕਿਆ ਸੀ ਤੈਨੂੰ
ਪਿਆਰ ਦੇ ਕੇ .....!
ਏ ਹੰਜੁਓ ,
ਤੁਹਾਨੂੰ ਇੰਜ ਕਿਵੇਂ ਜਾਣ ਦਿਆਂ
ਅੱਖਾਂ ਦੀ ਦਹਲੀਜ਼ ਛੱਡ .....
 
 
 ਮੂਲ  -ਜਿਤੇੰਦਰ 'ਜੌਹਰ '
ਆਈ ਆਰ -੧੩/੩, ਰੇਨੁਸਾਰ
ਸੋਨਭਦ੍ਰ (ਉੱਤਰ-ਪ੍ਰਦੇਸ਼) ੨੩੧੨੧੮
ਮੋਬ. ੯੧ ੯੪੫੦੩੨੦੪੭੨
ਇ ਮੇਲ  : jjauharpoet@gmail.com

ਹਿੰਦੀ ਤੋਂ ਅਨੁਵਾਦ)

ਅਨੁਵਾਦ -ਹਰਕੀਰਤ 'ਹੀਰ'
੧੮ ਇਸਟ ਲੇਨ , ਸੁੰਦਰਪੁਰ , ਹਾਉਸ ਨ. ੫
ਗੁਵਾਹਾਟੀ-੭੮੧੦੦੫
ਮੋ.੯੮੬੪੧੭੧੩੦੦
 

Sunday, October 14, 2012

इक शब्द की कहानी ....इमरोज़ ....(पंजाबी से अनुदित )

इक सपने में
इक खूबसूरत लड़की कह रही थी
कोई कहानी लिखूं
इक शब्द की,  इक ज़िंदा शब्द की ....
जागा तो देखा ...
इक अनलिखी कहानी सामने खड़ी थी
और इक शब्द खुशबू भी कागज़ पर लिखा पड़ा था ....
इक खामोश सुंदर लड़की रहती तो बहुत दूर है
पर उसके मनचाहे जवान को बिलकुल दूर नहीं लगती
जवान को वह सुंदर लड़की बहुत अच्छी  लगती है
वह लड़की भी मनचाहे जवान को उडीकती रहती है
इस उडीकती लड़की के लिए जवान कुछ भी कर सकता है
कागज़  भी बन सकता है , शब्द भी और खुद ही ले जाने वाला कबूतर भी
कबूतर बनकर सब फासले उड़कर वह लड़की की मुंडेर पर जा बैठता है
सूरज की पहली धूप   आकर बताती है सूरज का हाजर  होना
और जवान का हाजर  होना भी ....
उडीकती लड़की आकर कबूतर से अपना कागज़ ले लेती है
जब कागज पढ़ती है
लिखा हुआ शब्द खुशबू  सा हो जाता  है
ज़िंदा शब्द की महक से सुन्दर लड़की और सुंदर हो जाती है ...
यह इक शब्द की कहानी
अपने आप हर बार इक नए शब्द को ज़िंदा कर देती है
सुंदर लड़की कब से देखती आ रही है पता नहीं
मुहब्बत का यह भी एक रंग है
लिखे शब्द को पढ़ के ज़िंदा शब्द करते रहना
और अपने आप को भी और सुंदर देखते रहना ....

इमरोज़ .....

अनु . हरकीरत 'हीर

Thursday, September 13, 2012

इमरोज़ की नज्में .....(पंजाबी से अनुदित )  ....

(1)
कई फैसले  फैसले नहीं होते .....

कत्ल करते वक़्त कोई देख सकता है
पर कत्ल करने की सोच को
कोई नहीं देख सकता
इसलिए कत्ल का कोई भी फैसला
सच  नहीं हो सकता
गुनाह सोच करती है
ज़िस्म नहीं करता
और सोच को न कोई देख सकता है न जान .....

........................
(२)
गुनाह सोच करती है
ज़िस्म  नहीं करता
गंगा ज़िस्म धोती है
सोच नहीं .....
  
  (३)

फिक्रमंद .....

माँ ने इक अनचाहे के साथ मेरा विवाह कर दिया था
मैंने उस अनचाहे का बच्चा जन्मने से इनकार कर दिया
और उस अनचाहे ने मुझे घर से बेघर कर दिया
माँ को मेरा इनकार समझ न आया
माँ मनचाही होती तो समझ लेती
माँ ने कहा मनचाहा कोई नहीं होता
मैं मनचाही हो रही हूँ
तू मनचाही हो रही है न ...
मर्द तो मनचाहे नहीं हो रहे
इक मर्द तो मनचाहा हो सकता है
नहीं तो हीर हीर कैसे होती
जिस दिन मैं हीर हो जाऊंगी  मनचाही भी हो जाऊंगी
कहीं न कहीं उस दिन इक मर्द भी मनचाहा हो जाएगा
माँ ने मेरी बात न सुनी
उठ कर रसोई में जा डाल चुनने लगी
बोलती जा रही थी ..
डाल में से कंकड़ तो मैं भी चुन सकती हूँ
पर मर्दों में से कंकड़ किसी से नहीं चुने जाने
फिक्रमंद माँ ....
बड़-बड़ करती यही सोचे जा रही थी ...यही बोले जा रही थी ....

इमरोज़ ....
अनुवाद : हरकीरत हीर

Wednesday, September 12, 2012

हर सप्ताह इमरोज़ जी के 4,5 ख़त आते रहे हैं पर इस बार सात ख़त एक साथ .....
उनका हिंदी तर्जुमा ..... 

दर्द की ईद  .....

तुम्हारी नज्मों ने हैरान सा  कर दिया है
इतना दर्द ...?
तुमने किस तरह सहारा था ..ज़रा था ..इस नाजुक वजूद संग ..
इतनी दर्द भरी नज्में बन ....?
किसने यह दर्द दिया है ....
जन्म ने ...
परवरिश ने ...
घर ने ...
घरवालों ने ...
किसी अनचाही यातना ने ..
किसी गैर ने ...
किसी रिश्ते ने ....
किसी के प्यार ने ..
या ...
अपने मनचाहे की गैर हाजरी ने ...?

पर दरियाओं की धरती तक
तुम्हारी नज्में पहुँच गयीं हैं
तुम्हारे दर्द की नज्मों  ने ...
 इक चाक की ज़िन्दगी को भी
और उसकी बांसुरी को भी
दर्द के रोजे बना दिया है ....

हर ईद रोजों से कुछ दूर
खड़ी उडीक रही है ईदी
अपनी ईद को ...इस दर्द की ईद को भी
और अपने चाँद को भी
मुहब्बत के चाँद को ...हर वक़्त हाज़िर को ....

  इमरोज़-  ५/९/१२
अनुवाद- हरकीरत 'हीर'

 

(२)

चूरी बनाई  है
अपनी नई नज्मों की
यह कैसी हीर है ...
यह आज की हीर है ..
चूरी भी खुद चाक भी खुद
और नज़्म भी .....

मूल-इमरोज़......
अनुवाद- हरकीरत 'हीर'


(३)
फूल खिले तो खुशबू जागे ...
तुझे सोच कर नज़्म जागे ...
तू न मिले कुछ न मिले ...
मिल कर देख मिला हुआ देख ....

इमरोज़....२/९/१२
अनुवाद- हरकीरत 'हीर'

(४)

किताब का नाम बदल लिया है
''हीर की महक ''   
पर नज्मों ने जो दर्द जीया  है
उसका क्या करूँ ....?

इमरोज़....५/९/१२
अनुवाद- हरकीरत 'हीर'

(५)

श्राप ...

दुश्मनों को मारने के लिए   
दुश्मनों से भी  बड़ा दुश्मन
 बनना पड़ता है   ..
स्टालन  जैसा ..हिटलर जैसा, माओ जैसा ...

इमरोज़....४/९/१२
अनुवाद- हरकीरत 'हीर'

(६)

वर ...

मुहब्बत करने के लिए
मुहब्बत से भी ज्यादा मुहब्बत
होना पड़ता है   ...
हीर जैसी  ...राधा जैसी ....
सोहणी जैसी ...मीरा जैसी ....

इमरोज़....४/९/१२
अनुवाद- हरकीरत 'हीर'

(७)

ज़िन्दगी जितना सुख ....
नज्मों की  किताब
''हीर की  महक ''
मेरे आस-पास ही होती है
नज़्म पढ़  कर
तुझे सोचने लगा  हूँ
इक दिन तूने हक़ीर होना छोड़
हीर होना कबूल कर लिया था
ऐसे ही ..
आज कब्र जितना सुख छोड़
ज़िन्दगी जितना सुख कबूल  कर ले
यूँ भी सुख ज़िन्दगी से कम
सुख ही नहीं होता .....

इमरोज़ ....४/९/१२
अनुवाद- हरकीरत 'हीर'