Saturday, February 19, 2011

दो साँसों के बीच का ठहराव ......

मुझे याद है जसवीर राणा जी की जब मैंने पहली कहानी ''चुडे वाली बाँह'' पढ़ी थी ज्ञानोदय में (सुभाष नीरव जी द्वारा अनुदित ) तो हतप्रद रह गई थी ....बिलकुल अलग लेखन शैली ...और कथा शिल्प ऐसा के पर्दों में ढके नग्न किस्से ...कई बार तो मस्तिष्क संज्ञा-शून्य हो जाता है इनकी कहानियाँ पढ़ .....तभी तो मैं इन्हें उलटी खोपड़ी बुलाने लगी थी .....जहाँ हम कल्पना भी नहीं कर सकते वहां इनकी कलम चलती है ....मैंने उसी दिन इन्हें फोन किया ....जसवीर जी आपकी कुछ कहानियाँ अनुवाद करना चाहती हूँ ....उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दी ...तीन कहानियाँ अनुवाद हो चुकी हैं जिसमें से दो छप चुकी हैं ....'डार्क- ज़ोन' (जन.11 पुष्प-गंधा )और 'तारामंडल घूम रहा है ' जन ११, समकालीन भारतीय साहित्य में ....ये चौथी कहानी है ''दो साँसों के बीच का ठहराव ......''

लेखक परिचय :
नाम :जसवीर सिंह 'राणा'
जन्म- १८ सितम्बर 1968
शिक्षा : एम.ए,बी.एड।
संप्रति :
शिक्षण
प्रकाशित कहानी संग्रह :( १) खितियाँ घूम रहीआं ने ( २) शिखर दुपहिरा 
पुरस्कार : कहानी संग्रह '
शिखर दुपहिरा ' को पंजाब भाषा विभाग द्वारा 'नानक सिंह' पुरस्कार
कहानी 'नस्लाघात ' बी.ए.के पंजाबी सिलेबस में शामिल
कहानी 'चूड़े वाली बांह '२००७ में सर्वश्रेष्ठ कहानी घोषित
कहानी 'पट्ट ते बाही मोरनी ' २००९ की
सर्वश्रेष्ठ कहानी घोषित
 

संपर्क-
ग्र।मः अमरगढ़
जिलाः
संगरूर-१४८०२२ (पंजाब)
फोनः०९८१५६५९२२०
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कहानी ... दो साँसों के बीच का ठहराव ......लेखक - जसवीर राणा (अनु. हरकीरत 'हीर' )



मैं एक मुद्दत से यात्रा पर हूँ , पर पहुँचा कहीं नहीं । कहाँ पहुँचना चाहता हूँ ? क्यों पहुँचना चाहता हूँ ...? कहाँ से आया हूँ ..? क्यों आया हूँ ...? मेरा नाडू कहाँ है ? मेरी जेर कहाँ है ...कुछ समझ नहीं आता । अजीब प्रश्न - लीला है । अजीब भटकन है । यह भटकन मैंने त्रिकाल देव के अन्दर भी महसूस की है । जिस दिन से वह अस्पताल से कुटिया वापस परता है ...वह, वह नहीं रहा और मैं , मैं नहीं रहा । सुरति उन्हीं क्षणों में भटकती रहती है ...जिन पलों में त्रिकाल देव ने आँखें खोली थीं । पहाड़ से भी भारी पल थे वो .... मुझे अपने पैरों पर हैरानी होती उसकी बातें सुनने के बाद मैं खड़ा कैसे रहा । मेरी जगह कोई और होता तो कब का स्वर्ग लोक पहुँच गया होता ..... वैसे मैं भी यहाँ कहाँ हूँ , बस मेरी देह ही है । प्राण तो वही बात निकाल कर ले गई  । हर पल मस्तिष्क में सुदर्शन चक्र की तरह घुमती रहती है । मेरी देह दो हिस्सों में बँट गई है । आधी धरती में गड़ गई है आधी त्रिशंकू की तरह हवा में लटक रही है । मैं सोलह वर्ष पहले उठी तरंगें महसूस करने लगा हूँ ..... ज्यों -ज्यों दिमाग में तिरंगों का जाल फैलने लगता है बाहें आकाश की ओर उठने लगतीं हैं । शून्य में गुरुदेव की आवाज़ गूंजती है ...., '' शान्ति भव !...सूरज देव ....शान्ति भव ...!''

'' ओम ...शान्ति ...ओम ...!! '' त्रिकाल देव की आवाज़ सुन मेरी चेतना लौट आई है।

हवा में कदमों की आहट उभरी है ।

मैं पदम् आसन में बैठा हूँ । त्रिकाल देव फिर 'ओम' का जाप करने लगे हैं । मेरे कान उसी की तरफ लगे हैं , पर ध्यान कहीं और है । त्रिकाल देव ज्योत रखने में ध्यानमग्न है । शुरू से ही नियम है ऊपर मंदिर में आरती करने के बाद नीचे गुफ़ा में ज्योत रखी जाती है । मंदिर में शिव - महिमा होती है और तहखाने में उत्तम देव महाराज की मन्नत होती है । गुरुदेव से महाराज की अपार महिमा सुनी है । उनकी शक्ति की अनेक कथाएँ सुनी हैं । ज्योत वाली कथा में भी असीम शक्ति है । जब गुरु जी ये कथा सुनाते मुझे उनके मस्तिष्क में कुछ जगमगाता सा दिखाई देता । मैं प्रकाश से भर जाता । पर आज घोर अन्धकार में बैठा हूँ । जी में आता है कि त्रिकाल देव को सामने बैठा लूँ और खुद उनके सामने बैठ जाऊं फिर सारी रात उनसे चर्चा करूँ । लेकिन गुरुदेव की सीख-मत मुझे रोक रही है , '' ज्योत जगाने वाले हाथों को पकड़ा नहीं जाता सूरज देव .....!''
मैं दोनों हाथों को घुटनों के ऊपर रख ज्योत की तरफ देखने देखने लगता हूँ । पर कुछ भी नज़र नहीं आता । शायद मेरे और ज्योत के बीच त्रिकाल देव खड़े हैं ।

''मैं खड़ा नहीं आपके आगे बैठा हूँ बाबा ...!'' मेरा ज़िस्म काँप
उठता है । पता नहीं कब त्रिकाल देव मेरे सामने आ बैठे थे । उनकी आँखें दिखाई दे रही हैं । वो मेरा माथा पढ़ रहे हैं । मैं उत्तम देव महाराज का ध्यान करने लगा हूँ । चेतना अचेत में बजती ताली से एकसार होने लगी है । कोई मस्त चाल चला जा रहा है । हाथों से आग के अंगारे गिर रहे हैं । गाँव से आवाजे आ रही हैं , '' एक अंगारा इधर भी फेंक जाओ महाराज ...! "

हर आवाज़ के साथ ताली बजती है । किसी का हुक्का गर्म होता है , किसी की भट्ठी सुलग उठती है ,  किसी का चूल्हा जल उठता है । गले में रुद्राक्ष की माला डाले देव रूह आगे बढ़ रही है । सामने नहर का पुल दिखाई दे रहा है । पुल के पास एक कुटिया है । देव रूह उसमें प्रवेश कर गई है । देह विश्राम कर रही है । नहर का पानी सूखता जा रहा है । उत्तम देव को आवाजें मार रहा है । चीं-चीं की आवाज़ हुई है । कुटिया का दरवाज़ा खुला है । फिर ताली बजी है । हथेली के ऊपर ज्योत जगा नंगे पैर नहर के बीच चल पड़े हैं । किनारों पर की ख़ामोशी और गहरी हो गई है । महाराज ने पालथी मारी हुई है । वो पानी के ऊपर बैठे हैं । ज़िस्म तैरने लगा है । सामने भुल्लारां गाँव की पुलि दिखाई दे रही है । महाराज की आँख खुली है । पानी के ऊपर चलते पाँव कुटिया की ओर बढ़ रहे हैं । मंदिर में घंटियां बज रही है । शंख बज रहा है.....

'' मेरे अन्दर शंखनाद क्यों बज रहा है अन्तर्यामी ...? '' त्रिकाल देव की आवाज़ सुन मैं त्रिशूल पे टंग गया हूँ ।

क्या जवाब दूँ ? जटाधारी के सर में उलझी गंगा की तरह उलझ गया हूँ । मेरी उलझन देख वह टहलने लग पड़े है । कदमों की पदचाप कभी मेरी तरफ आती है तो कभी ज्योत की तरफ चली जाती है ....और कभी .....

'' और कभी अपनी आँखों से देखा सच भी सच नहीं होता ...और कभी पराई आँखों से भी मनुष्य सच के आर-पार हो जाता है ...!" प्रश्न कर जवाब लेने की जगह , प्रश्न को मारने की कला में त्रिकाल देव मुझसे भी आगे निकल गए  हैं ।

उसे आगे निकालने के चक्कर में अक्सर मैं पीछे रह जाता हूँ । पर उसकी पीछे चलने की आदत मेरे पदचिन्हों को कसने लगती है । मैं भूल-भुलैया में पड़ जाता हूँ । खुद को अपना शत्रु समझ खुद से लड़ने लगता हूँ । जब हार जाता हूँ फिर धनुष- बाण उठाता हूँ । अगली हार-जीत के लिए फिर लड़ने लगता हूँ । स्वै को जीतने-हारने का सिलसिला ही मेरी होंद है । इस होंद को पकड़ने का सूत्र पकड़ से बाहर हो गया है । मेरी ज़िन्दगी का सूत्रधार कौन है ...? पर त्रिकाल देव की ज़िन्दगी का सूत्रधार ......

'' कोई किसी का सूत्रधार नहीं सूर्यदेव ...! सबका सूत्रधार तो वो भोला शंकर है । हम तो बस नमित मात्र हैं ...! '' शुरू में गुरुदेव का ज्ञान मुझे शांत कर देता था । पर जिस रात मुझे स्वै ज्ञान की प्राप्ति हुई , एक आक्रोश पैदा हुआ था ... एक नफरत पैदा हुई थी ...मैं अंधा,बहरा और गूंगा हो गया था । जड़मत हुआ कितनी देर गुरुदेव की आँखों का तेज देखता रहा । उस वक़्त शक समाप्त हो गया  , जिस वक़्त आँखें बंद कर उन्होंने कहा , '' माना कि कोई सच आखिरी नहीं होता ...पर कोई सच तो मानना ही पड़ता है सूरज .....!''

मेरी आँखों में सहमति और असहमति के भाव तैर गए थे । सारी रात मैं गुरु चरणों में पड़ा रोता रहा । जब संध्या हुई मैंने सूर्य नमस्कार भी न किया । संध्या पूजा के लिए भी मन न माना । हाथों में पूजा सामग्री लिए संदला बहुत देर मनाती रही ।वेदों शास्त्रों के हवाले दे समझाती रही । पर मैं उसे क्या समझाता ...मैं उससे ज्यादा ज्ञान रखता था फिर भी कोई रहस्य था जो समझ से पार था । उसे समझ पाने की क्रिया में ही मैं गुरुदेव के पास गया था,  वे तहखाने में आसन जमाए विश्राम कर रहे थे ।

मैंने गुरु चरणों में नत-मस्तक हो अर्ज किया , ''मैं भटक रहा हूँ गुरुदेव ...! मेरा मार्ग दर्शन करें ...!''

'' सही मार्ग पर चलने वालों को मार्ग दर्शन की जरुरत नहीं होती ...तू तो सबको रौशनी देने वाला है ...! खुद अपनी  रौशनी बन....! '' मेरी बात सुन उनके नूरानी चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई थी ।

पता नहीं गुरुदेव का ध्यान कहाँ था । मेरी बात सुनने की जगह उन्होंने अपनी बात कहनी शुरू कर दी । मैं चाहता तो अपनी बात कर सकता था पर नहीं की । गुरुदेव मेरे लिए प्रथम पुरुष थे । मैं मन-ही मन उपजे भेद को काबू करने लग पड़ा । रहस्य का सूत्रपात करते हुए चाहे मेरा शक्तिपात हो रहा था पर मैंने अपना ध्यान एकाग्र रखा । गुरुदेव की आँखें ऊपर चढ़ रहीं थीं । माथा प्रकाशमान हो रहा था । मैंने भी आँखें बंद कर लीं । अंतर्मन में रौशनी भरने लगी । रूह रौशन हो उठी । ज़िस्म फूल सा हल्का हो गया । मैं हवा में तैरने लगा । एक रौशनी मुझे अपनी ओर खीँच रही थी । नजदीक गया तो गुरु जी का माथा था । नहीं...गुरुदेव का हाथ था । माथा तो मेरा था । उसके ऊपर रखा हाथ ज्यों-ज्यों पलकों के ऊपर आता गया , गुरुदेव की आवाज़ ऊंची होती गई , '' नहीं सूरज देव नहीं ....! तेरे अंतर्मन की ज्योत जग चुकी है....! तू उत्तमदेव महाराज की ज्योत का अगला वारिश है ....!''

मैं गुरु चरणों में गिर पड़ा । मेरी भक्ति परवान हो गई थी । मेरा जन्म सफल हो गया । पर अगला क्षण कुछ ऐसा था कि मैं चौपट गिर पड़ा । गुरु जी की जुबाँ तीरों की बौछार बन गई । मेरा रोम-रोम बिंध गया । क्या मेरी भी कोई जन्म कथा है ? जन्म कथाएँ तो देवी-देवताओं की सुनी थी । गुरु जी से मैंने ये क्या सुन लिया है , '' आ सूर्यदेव ! आज मै तुझे तेरी ही जन्मकथा सुनाता हूँ । ''

'' तू किसकी नाजायज औलाद है ...!!'' जन्म कथा का मूल तत्व कानों में कांटें सा उग आया था ।

हर जायज बात नाजायज बन गई थी । मुझसे कुदरत की अनमोल देन नींद छिन गई थी । सालों से मैं कभी पूरी तरह सोया नहीं । दिन चढ़ता,  रात उतरती  पर मेरी अनिंद्रा दूर नहीं होती । मुद्दतों से एक ही दृश्य देख रहा हूँ । दृश्य में वो झाड़ी हिल रही है । नहर में कश्ती तैर रही है । उसमें गुरुदेव बैठे जा रहे हैं । चप्पुओं की आवाज़ ऊंची होती जा रही है । आवाज़ सुन कर सफेदों के बीच में से एक गिद्ध उड़ी है । नहर की पटरी पर काली बिल्ली घूम रही है । दूर खाइयों में बोलता तीतर सुन गेरुआ चोला काँप गया है । नज़र हिलती हुई झाड़ी पर जा टिकी है । झाड़ी में पड़ा नवजात शिशु रो रहा है । गुरुदेव के चेहरे पे मुस्कान फैल गई है । कश्ती किनारे पे जा लगी है । खडाऊं वाले पैर नहर की पटरी पे आ गए हैं । झाड़ी में से बच्चा उठा वापस कश्ती में जा बैठे हैं । चप्पू रुक गए हैं । कुटिया में बच्चा रख गुरुदेव ने ताली बजाई है । ज्योत रौशन की है । कश्ती वापस गाँव वाली कुटिया की तरफ बह चली है ।

'' हे शिव शंकर ...! इनको माफ़ करना । ये नहीं जानते , ये क्या कर रहे हैं ....!'' हवा से बातें करता हुआ त्रिकालदेव तहखाने में आंधी की तरह घुमने लगा है ।

मेरे अन्दर की आंधी भी तेज हो गई है । मैं उखड़ी हुई आवाज़ में बोल रहा हूँ , '' गुरु से बातें करते हुए उसकी तरफ पीठ नहीं करनी चाहिए वत्स.....!''

'' पीठ मैं नहीं मेरी तरफ आप करके बैठे हो बाबा ...! लगता है आज आपका मन ठिकाने  नहीं ...! '' मेरे इर्द-गिर्द घूमता त्रिकाल्देव किसी ठिकाने की तरफ बढ़ रहा है ।

क्या वह मेरे अतीत के बारे जान गया है ? वो किसको माफ़ करने की बात कर रहा है ? कौन नहीं जानते कि वह क्या कर रहे हैं ? शायद मैं इन प्रश्नों की ओर पीठ करके बैठा हूँ । पर इनकी तरफ पीठ करने से क्या होता । मैं तो खुद एक प्रश्न हूँ । जिन पलों ध्यान में उतरता हूँ, माँ भी साथ ही उतर जाती है । कुंती की तरह उसके क़दमों की मिट्टी भी गायब हो जाती है । मैं उससे पिता का नाम पूछने लगता हूँ । वो मौन धारण कर लेती है । मैं समाज की पत्थर हुई रीतों के बारे पूछता हूँ , वह डर जाती है । मैं उसकी छातियाँ पकड़ने लगता हूँ , वह रोने लगती है । बच्चे की चीखें ...हांफती हुई माँ ...और वक्षस्थल से टपकता दूध ....! कितना ही कुछ समुन्द्र में जा गिरता है । कुछ मथने की आवाज़ आती है ... सांप फुंफकारने लगते हैं ... हवा में ज़हर का प्याला उछलता है ... किसी मर्द के भागने की आवाज़ आती है ... मैं अपना नील हुआ कंठ पकड़ लेता हूँ ।

'' ला तेरा गला दबा दूँ ...! नहीं ...नहीं...मैं नहीं दबा सकती ...!'' मुझे झाड़ियों में फेककर भागती जा रही माँ की पदचाप मुझे रातों को नहर की पटरी पर ले जाती है ।

कितनी ही देर मैं झाड़ियों में पड़ा रहता हूँ । टाँगे, बाजू छोटे -छोटे हो जाते हैं । ज़िस्म बच्चों की तरह हिलने लगता है । मैं किलकारियाँ मारने लगता हूँ । आसमां में चमकता चाँद हँसने लगता है । वो मेरी ओर शक्कर की डलियाँ फेंकने लगता है । मैं मामा-मामा पुकारने लगता हूँ । झाड़ियों में चुभन होने लगती है । मैं हाथों - पैरों के सहारे घसीटने लगता हूँ । नज़र दूर गाँव में जलती रौशनी पर जा टिकी है । भुल्लारां गाँव की पुलि पर मेला लगा दिखाई देता है । गाँव में  लोग इकट्ठे होने लगते हैं । कोई मेरे लिए मिठाई खरीदता है ...कोई मेरे लिए खिलौने खरीदता है ....कोई कपडे खरीदता है ...और कोई मेले में मेरी माँ के साथ बापू को ढूंढता फिरता है । देख कर मैं किलकारियाँ मारने लगता हूँ । ठीक वही वक़्त होता है जब भुल्लारां गाँव की पुलि टूट जाती है । सारा मेला नहर में डूब जाता है.....

'' जिसको तैरना आता है सूरज वो कभी डूबता नहीं ....! मुझे शिक्षा देने में गुरु जी ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी ।

मैंने कुटिया के तहखाने में आँख खोली थी । गेरूआ चोला मेरा लिबास था । रुद्राक्ष की माला , खडाऊं ,लोटा घंटाल, शंख और मूर्तियाँ मेरे खिलौने थे । ज्योत मेरी माता और शिवलिंग मेरे पिता थे । गुरुदेव तो नमित मात्र थे । अगर गुरुदेव और गोविन्द में से चुनाव करने का प्रश्न पैदा होता तो मैं गुरु को पहल देता । गुरु से मैंने पढ़ना, लिखना बोलना सीखा । वेद , पुराण और ग्रन्थ शास्त्रों का पठन -पठान किया । प्राणायाम और योगा सीखा । संध्या पूजा के साथ सूर्य नमस्कार करना , सूर्य ग्रहण के वक़्त गंगा स्नान और दान पुण्य करना , गाँव की सुख़ शान्ति के लिए हवन करना ..गुरु ने मुझे क्या नहीं सिखाया । अगर किसी को कोई मामूली सा भी रोग होता , दुःख-सुख़ होता , पूरा का पूरा इलाका आस्था के साथ आता । मेरे गुरु की बख्शीश है ऐसे मौके मैं हाथ-हल्का कर देता हूँ । दवा-बूटी के साथ भोले शंकर का आशीर्वाद दे देता हूँ । दिसंबर के महीने कुटिया में भंडारा होता है । लड्डू, जलेबियों का यज्ञ चलता है । इलाके की संगत पहुँचती है । दूर दूर से साधों की टोलियाँ आती हैं । सिद्ध-गोष्ठी होती है । भांग घोटी जाती है । चिलम सुलगती है । चारों ओर जय-जयकार हो जाती है ।

सिर्फ मैं ही नहीं इस रस्म में संदला भी शामिल रही है । वह भी गुरुदेव से सारा ज्ञान ग्रहण करती रही है । पर उसकी संदली आँखों में सृजा रहस्य मुझसे आज तक न खुला । अगर उस रात गुरु कृपा हो जाती । गुरुदेव की जान भी बच जाती । रहस्य से पर्दा उठ जाता । शायद मैं अपनी जन्म कथा सुनने से भी बच जाता । लेकिन नहीं ...अपनी जन्म कथा सुनने से तो संदला भी नहीं बच पाई । हम दोनों के साथ ही बड़ा नजायज हुआ था । अगर मेरी पहली चीख से समाज को कंपकपी आई थी तो संदेला के गर्भ आगमन पर भी रीति-रिवाजों का सिंहासन डोला था । वह मर्दों की दुनियाँ पर बोझ थी । माँ की कोख का कलंक थी । उसकी खता थी कि   जब वह जन्मी उससे पहले से ही उसकी दो बहने थीं । जब वह जन्मी उसका बाप माँ को पीटने लगा । उसके लिए घर का दरवाज़ा बंद हो गया । संदला को सीने से लगा वह कुटिया आ गई । हम दोनों का पोतड़ा (लंगोटी ) गेरुआ चोला बना था । संदला मुझसे चार महीने बड़ी है । गुरुदेव ने मुझे भी उसकी माँ की झोली डाल दिया था । हम दोनों ने एक ही माँ का दूध पिया । एक वर्ष बाद वह माँ ऐसी कहीं गई कि फिर वापस ही नहीं आई । वो किस गाँव से आई थी ...? कहाँ चली गई ...? न तो गुरुदेव ने उससे कभी पूछा न हमने कभी गुरुदेव से ....! गुरु ही हम दोनों की माँ थे । जिस रात उनके प्राण बंधन टूटे हमारी आँखों का पानी नहर सा बह रहा था ।

'' ये क्या बाबा ...! आप रो रहे हैं ? ये कैसा मोह है ...? ये कैसा दुःख है ...? आप खुद ही कहते हो कि आंसुओं को अपनी शक्ति बनाना चाहिए ...!'' त्रिकाल देव का तीर निशाने पे लगा है ।

वो अर्जुन जैसा पक्का निशानेबाज है । जब परखने की बारी आती है वह एकसुर हो जाता । वृक्ष के पत्ते , टहनियां अदृश्य हो जाते हैं । उसका निशाना चिड़िया की आँख पर जम जाता है । जब तीरों की बौछार होती है मैं चिड़िया की आँख बन जाता हूँ । सुरति जड़ों तक हिल जाती है ।

'' हमारी जडें कहाँ हैं ...?'' तीरों की तड़प से मैं दबे हुए संस्कारों की तरह बोलने लगा हूँ , हम किस वंश के चिराग़ हैं ....? हमारी जाति और गोत्र क्या है ...?''

वंश और जाति - गोत्र तो कायरों के  आभूषण होते हैं शक्तिवर ...! वली -फकीरों की जाति-गोत्र उनका कर्म होता है ....!'' मेरी पलकें पोछता हुआ त्रिकाल देव गुरुदेव की तरह बोल रहा है ।

ये मैं क्या बोलने लग पड़ा था ? शिव का शुक्र है कि बचाव हो गया वर्ना पर्दाफास हो ही जाना था । ये पर्दा मेरा कवच- कुंडल है , मेरी रक्षा करने वाला । पर कई बार कुछ अजीब घटना घटती है ।

मैं खुद ही कवच-कुंडल दान करने चल पड़ा हूँ । उन पलों में कर्ण मुझे अपना कोई सगा - सम्बन्धी जान पड़ता है । कुंती माँ लगती है । और सूरज ....? सूरज तो देवता है । अगर वो देवता है तो मनुष्य की तरह चौकोर क्यों हो गया था ? वो तो चार युगों से गोल है । उसकी औलाद नाजायज कैसे हो गई ? मैं कथा सुनने आई संगत को प्रश्न करने लगता हूँ , पर लोग चुप्पी धारे यूँ ही बैठे रहते हैं । मेरा रूप बदलने लगता है , मुझे सामने बैठी औरतें माँ दिखाई देतीहैं । उनकी गोदियों में बैठे बच्चों से जलन होने लगती है । जब मर्दों की तरफ देखता हूँ , ज्यादातर आँखें औरतों को घूरती दिखाई देती हैं । मेरे अन्दर की ज्वाला भड़क उठती है । मैं चीख कर पूछता हूँ , '' कुंती ने अनैतिक सम्भोग को स्वीकार क्यों किया...? उसने अपनी कोख में नाजायज गर्भ को स्थान क्यों दिया ...? संसार में किस-किस के पास प्रमाणित  पिता की औलाद होने का प्रमाण है ...? किसने अपनी माँ का मिलन देखा है ...? हम सब दृष्टिदोष का शिकार क्यों हैं ...? क्यूँ हम एक अंधा युद्ध लड़ रहे हैं ....? ''

बोलता-बोलता मैं किसी भाव में बह जाता हूँ । अपने ही अन्दर कहीं बहुत गहरा । कई बार तो इतनी गहराई फैल जाती है कि वापस लौटना कठिन हो जाता है । मैं माँओं की तरफ देख थूकने लगता हूँ । बच्चों को घूर-घूर कर देखने लगता हूँ । क्रोध पारे का सा उबलने लगता है । चेहरा भयानक हो जाता है । माँएं सहम जाती है । बच्चे मुझे देख दूर भाग जाते हैं । उन्हें पकड़ने मैं उनके पीछे दौड़ता हूँ । संदली आँखों की जोड़ी मेरा पीछा करती है । एक अजीब कौतुक होता है । मैं भागते जाते बच्चों को हँसाने की कोशिश करता हूँ , माँओं के चरणों में गिर पड़ता हूँ ..पर जब होश आता है तो सामने सिर्फ संदला होती है ।

'' संदला !....मुझे सपने में अपनी माँ की सेज क्यों दिखाई देती है ...? मेरे प्रश्न सुन वो आलोप क्यों हो जाती है ....?

शायद उसके पास भी कोई जवाब नहीं था , या वह कोई जवाब देना नहीं चाहती थी । उसके इस मौन की जब भी याद आती मैं 'ओम' का जाप करता हुआ गहरी साँसे लेने लगता हूँ। दो साँसों के बीच का ठहराव ज्योत की तरह जलने लगता है ।

'' आपकी साँसों से ज्योत बुझ गई है सूर्यदेव ...!'' त्रिकालदेव की जुबाँ से अपना नाम सुन कर मैं हाँफती आवाज़ में बोला , '' तेरी या मेरी ....?''

''ज्योत किसी की नहीं होती अन्तर्यामी....! ज्योत उसी की होती है जो उसे जलाना जानता है ...! '' त्रिकाल देव किसी अडोल पहाड़ की तरह मेरे सामने आ खड़ा हुआ है ।

जैसे ही कोई सूत्र हाथ आता है वो पहाड़ बन मेरे सामने आ खड़ा होता है । पहाड़ से माथा मारने वालों का क्या हश्र होता है ये जानते हुए भी मैं पहाड़ से माथा टकराने लगता हूँ । जर्रा-जर्रा हो दूर बिखर जाता हूँ । कुछ पलों के लिए चुप्पी फैलती है फिर एक हाथ कुछ तलाशने लगता है । कभी लगता है जैसे वो किसी के पीछे है ...कभी लगता है जैसे कोई चीज उसके पीछे है । कौन किसका पीछा कर रहा है , ये रहस्य त्रिकाल देव अपने पैरों से बांधे फिरते हैं....

'' पैरों को बाँधने से सफ़र नहीं रुकता ...! पर ध्यान रहे कि सफ़र वहाँ से शुरू करो, जहाँ से संसार सफ़र करना बंद करता है !'' पहाड़ की चोटि पर खड़ी संदला मुझे आज भी नीचे की तरह इशारा करती दिखाई देती है ।

मैं जब भी नीचे देखता हूँ , त्रिकाल देव ऊपर की ओर देखने को इशारा करता है । जब ऊपर देखता हूँ , पहाड़ की चोटि पर बैठी संदला दिखाई देती है । वह कहाँ की कहाँ पहुँच गई है । सोच में पड़ा मैं उस तक मुश्किल से पहुंचा था । अमरनाथ की यात्रा से वापसी के वक़्त रास्ते में रात पड़ गई थी । मैं बाकी साधुओं के साथ एक धर्मशाला में रुका । वहाँ दिल्ली-दक्षिण के साधुओं का जमघट था । जलपान  के बाद सिद्ध गोष्ठी शुरू हो गई थी। चल रही गोष्ठी में जब संदला का जिक्र आया , मैं चौकन्ना हो गया । जिस साधू ने जिक्र किया था  मैंने उसके साथ नजदीकियां बढा लीं । काफी देर चली चर्चा के बाद वो काफी हद तक खुल गया । जब मैंने संदला देवी के दर्शनों के लिए विशेष रूचि दिखाई , वो सामने पहाड़ की तरफ इशारा करता हुआ बोला , ''बड़ी चंडाल देवी है भक्त ....! किसी को पैर तक छूने नहीं देती ... अगर तेरी रूह दर्शनों से शांत होती है तो जा .....!''

साधुओं का जमघट छोड़ मैं अकेला ही पहाड़ की ओर चल पड़ा । मेरे पैरों में सफ़र था या भटकन पता नहीं । ये भी ध्यान नहीं कितना समय चलता रहा । पहाड़ गगन चुम्बी था । चढाई चढ़ते-चढ़ते मेरी पादुकाएं टूट गईं । जब ऊपर पहुंचा , प्रभात होने वाली थी । चिड़ियाँ चहक रही थीं । संदला देवी का मंदिर मेरे सामने था । मंदिर में घंटाल बजने की आवाज़ आ रही थी । शंख बज रहा था । गेरुए चोले पहने साधवियाँ घूम रही थीं । मेरी नज़र उनके चहरों पर फिसल रही थी ...पर कोई भी चहरा मुझे खीँच नहीं पाया । जो खीँच सकता था वो तो अन्दर था ....

'' अन्दर आ जाओ सूरज ! ..सूर्य उदय होने से पहले ही पहुँच गए हो ....!'' मुझे खींचने वाली आवाज़ संदला की थी ।

वही आवाज़ ! वही रंग- रूप ! वही सुगंध और वो ही आकर्षण । कितनी मुद्दत बाद दर्शन-दीदार हुआ था । मैं उसके सामने मन्त्र - मुग्ध सा बैठ गया । इस संसार से उस संसार की बातें करती वो कब मंदिर से बाहर ले गई ...कब आकाश में सूरज चमक उठा ..और कब वो मुझे पहाड़ के किनारे ले जाकर खड़ी हो गई कोई सुध-बुध नहीं थी । मैं उस वक़्त अपने आप में आया  जब संदला ने आकाश की तरफ देख कर नीचे बहती नदी की तरफ इशारा किया ,'' नीचे देखो सूरज ! आपकी जगह आकाश में नहीं , नीचे नदी में है ...और याद रखो रौशनी, आकाश का सूरज देता है ...नदी का सूरज नहीं ...!''

उस का इशारा समझ मैं रीढ़ की हड्डी तक ठंडा पड़ गया था । अभी संभल भी नहीं पाया था कि वो फिर बोली , '' मैं धरती से बहुत ऊपर उठ आई हूँ ...! अब आप जाओ , जाकर धरती नमस्कार करो ....!''

उसकी बातें सुन मैं धरती से पहाड़ की ऊँचाई नापने लगा था । मेरे सर पर हाथ रख वो आलोप हो गई । नीचे उतरते वक़्त मैं कुछ ज्यादा ही गहरे उतर गया था । वहाँ जहाँ दूध पीती संदला के साथ मैं बैठा हूँ ...जहाँ हम तोतली जुबाँ में लड़ रहे हैं ...एक दुसरे को छेड़ रहे हैं ....मिट्टी में खेल रहे हैं । ....गुरुदेव की लम्बी दाढ़ी हँस रही है । हमारी जोड़ी उनके पीछे जा रही है । वैदिक - शास्त्रों के नियमों की बारिश हो रही है .... हमारी काया भीग रही है....जवानी उतर रही है .... चरित्र का निर्माण हो रहा है .... हमारा ध्यान समाधि में जा टिका है ।

'' बैठे हुए बड़ी देर हो गई है ,, रोशनीवर ! ..रात भी आधे से ज्यादा गुजर चुकी है । अब जरा विश्राम कर लें !'' त्रिकाल देव मुझे सुलाना क्यों चाहते हैं ...?

कहीं इसमें उनकी कोई मंशा तो नहीं ...?
वो जो चीज तलाश रहे हैं , कहीं मैं उसमें अड़चन तो नहीं ? इसके पीछे राज़ क्या है ? कुछ समझ में नहीं आ रहा । क्यों न उससे ही पूछ लूँ , '' मैं तो मुद्दतों से बैठा हूँ त्रिकाल देव ! विश्राम की जरुरत तुझे है ....!''

'' नहीं बाबा मैं तो शुरू से ही विश्राम में हूँ । अब थोड़ा खेलना चाहता हूँ .. जब बच्चा ठाकुर के द्वारे में से बाहर निकल कर मिट्टी में खेलता है ...उसको खेलता देख शिव-शंकर अपने उपासक पुजारी को भी भूल जाते हैं ...!'' यानी कुएँ में गिरे त्रिकाल देव के अन्दर मैं बोल रहा हूँ ।
वो सृष्टि का कौन सा खेल खेलने जा रहा है ..? प्रभु की लीला बड़ी बेअंत है . उस का कोई आर -पार नहीं . मुझे पूरा ज्ञान है कि झुला झुलाने वाले हाथ ' स्वै' को जीत लेते हैं , पर झुला तोड़ने  वाले हाथ क्या करते हैं ? शायद  वही  कुछ  जो मैंने किया . दरअसल जो मैंने किया है वो मैंने किया ही नहीं है . करने करवाने वाला तो कोई और है .  मैं तो एक नमित मात्र हूँ . लेकिन सिर्फ नमित कहने से भी मन शांत नहीं होता . चेतना बार-बार उन पलों को पकड़ने लगती है जिन पलों में मैं पहली बार वो सुगंध है . उस का कोई आर -पार नहीं . मुझे पूरा ज्ञान है कि झुला झुलाने वाले हाथ ' स्वै' को जीत लेते हैं , पर झुला तोड़ने  वाले हाथ क्या करते हैं ? शायद  वही  कुछ  जो मैंने किया . दरअसल जो मैंने किया है वो मैंने किया ही नहीं है . करने करवाने वाला तो कोई और है .  मैं तो एक नमित मात्र हूँ . लेकिन सिर्फ नमित कहने से भी मन शांत नहीं होता . चेतना बार-बार उन पलों को पकड़ने लगती है जिन पलों में मैं पहली बार वो सुगंध महसूस की  थी . उसमें कोई ऐसी खीँच थी कि मेरा आसन  हिल गया ..ध्यान टूट गया . ख्यालों में अजीब लालसाओं की नदी बहने लगी . मैं वृन्दावन की ओर चल पड़ा . ज्यों ही बांसुरी बजी गोपियों का इक समूह  प्रकट हुआ  . मैं नृत्य करने लगा , गोपियाँ नहाने लगीं . मैं उनके वस्त्र चुराने लगा , वो शोर मचाने लगीं , मेरा ध्यान टूट गया . सामने संध्या की पूजा समाप्त कर संदला तहखाने की ओर  जा रही थी , पर मेरा ध्यान अभी भी स्थिर नहीं हो रहा था . इच्छा हो रही  थी कि गर्भ गृह में स्थापित शिवलिंग को दूध से धोऊँ , घंटाल  बजाऊँ    , पूरी शक्ति से शंख नाद करूँ  और शिव की मूर्ति के आगे डमरू बजा  तांडव करने लग पडूँ ....

'' शिवों का नाच पैर बाँध कर नाचने जैसा काम होता है सूरज...!'' एक बार सवाई-बंधन के बारे में बताते  हुए गुरुदेव ने मेरी तरफ ध्यान से देख था . ....

पर मैं जितना अपने आप को बाँधने की कोशिश करता मेरा वजूद उतना ही बिखरता जाता . बिखराव की अवस्था में एक शाम मैं संदला से चर्चा छेड़ बैठा था , '' संदला ...! ये खजुराहो की मूर्तियों  वाला मंदिर कितना असभ्य है ..! कितना अश्लील ... देखते ही लज्जा आती है ...!''

'' सांसारिक दृष्टियों से देखोगे तो खजुराहो में काम वासना ही नज़र आएगी ...उनको देखने के लिए अंतर्दृष्टि की जरुरत है सूरज ....!'' अंतरध्यान  हुई संदला मुझे हिला कर रख गई थी , '' और ये भी देखने की जरुरत है कि वो मूर्तियाँ सिर्फ बाहर हैं , मंदिर के अन्दर कोई मूर्ति नहीं . अन्दर साक्षात् परमात्मा विराजमान हैं ...!''

संदला की बातें सुन उस वक़्त बड़ी लज्जा आई थी जब उसने मेरे माथे के बीच ऊँगली रख कहा था , '' तूने उन मूर्तियों के आसन ही देखे हैं , तूने कभी उनके चेहरे नहीं देखे . उनके चेहरों पर समाधि लगी हुई है सूरज . यत्न करो मूर्तियों वाले मंदिर  के अन्दर प्रवेश करने का ...यत्न करो ....!"

उसके बाद मैं यातना की हद तक यत्न करने लगा था . तपती रातों में धूनी लगाता , अग्नि मन्त्रों का जाप करता . सर्द रातों में एक सौ एक घड़े भर कर रखता , सुबह जल प्रवाह करता . पर मन में ठहराव  फिर भी न आता . जल प्रवाह करते वक़्त संदला  स्नान करती दिखाई  देती  . धूनी की आग में से उसकी  सुगंध उठने लगती . मेरा माथा तपने लगता , देह किरणे छोड़ती . धरती मुझे खींचने लगती . उसे हटाने के लिए मैं तपिश  छोड़ता . जब आँखें लाल सुर्ख हो जातीं मेरी रूह में जंगल उग आता , पत्तों की खड़-खड़ सुनाई देती . खड़ाऊओं की ध्वनि सुनाई देने लगती ...कोई ऋषि सा आता दिखाई देता , जैसे ही मैं उनके चरण छूने लगता वह अपना चोला उतार कर दूर फेंक देता . उसकी नंगी देह देख मैं भाग उठता , पर ज्यादा दूर भाग भी न पाता कि एक वृक्ष से टकरा कर गिर जाता  . वो वृक्ष मुझे किसी सुंदरी की देह सा लगता  . मैं पहचान लेता हूँ वो चन्दन का वृक्ष  था . मैं उसके पत्ते तोड़ता , शाखाएं तोड़ता , उसके साथ लिपटी बेलों के फूल तोड़ता और फिर उस पर संदली जल का छींटा  देता . ठीक वही वक़्त होता जब वृक्ष में से संदला प्रगट हो जाती . मैं आँखें बंद कर लेता , वो आलोप हो जाती . पर उसकी सुगंध में से उठती खीँच मुझे द्वन्द में डाल देती . मैं सोचने लगता कि गुरुदेव के साथ मन की हालात सांझी करूँ या न करूँ ..? अंतरयुद्ध मेरे बस से बाहर होता जा रहा था . पर गुरुदेव के साथ मन की व्यथा सांझी करने से पहले ही .......


'' पहले तो आपको कभी इतना कमजोर नहीं देखा शक्तिवर .....! फिर आज क्यों ...?'' त्रिकाल  देव को कैसे समझाऊँ कि पहले तो .......

'' पहले क्या था ...?'' नहीं , ये त्रिकाल देव नहीं बोला था...

उसका मौन बोला था . वो मौन की भाषा अनुवाद करने वाला पंतजलि है . उसकी रूह कुंडली जागरण से बातें करती है . जिस वक़्त वह मौन धारण करता है मैं उसके मौन में डुबकियां लगाने लगता हूँ . लेकिन समझ नहीं पाता कि उसकी ख़ामोशी का अर्थ क्या है ? शायद उस अनर्थ जैसा कोई अर्थ जो उस दिन नहर में डूबा हुआ था . मैं और संदला बेडी  में सवार थे . उत्तम देव महाराज के बाद गद्दी -दर- गद्दी बहुत कुछ बदल गया था . ज्योत बेडी में लाई जाती . हम बचपन से ही गुरुदेव के साथ जाने लगे थे . ज्योत कभी मेरी हथेली पे तो कभी संदला की  हथेली पर होती . गुरुदेव चप्पू  चलाते . पर उस दिन संदला चप्पू चला  रही थी . हम ज्योत लेकर वापस आ रहे थे कि अचानक ही ..... हाँ अचानक ही हवा में वो सुगंध तैरने लगी . मुझे कोई खींचने लगा . मेरा माथा तपने लगा , देह किरणे  छोड़ने लगी . मेरी हथेली काँप  गई . नहर के पानी  में से एक  लहर  उठी , कोई बेड़ी  में आ चढ़ा . मैंने आँखें  फाड़ -फाड़  कर  देखने  की कोशिश की , साक्षात्  पराशर  ऋषि थे . मैंने  आँखें  झपकी वो मेरे अन्दर समा गए . मैंने संदला की बाजु पकड़ ली उसके हाथ से चप्पू छूट गया . ''ये क्या कर रहे हो सूरज  ...? देखो हमें आँखें देख  रही हैं  ...!''

कोई नहीं देख सकता संदला ...!'' संदली बदन सूँघता हुआ पराशर ऋषि मन्त्र पढने लगे .

नहर के पानी के ऊपर दूर-दूर तक घनी धुंध फैल  गई थी . बेडी हिलने लगी . जब होश आया मेरा गेरुआ चोला संदला के वस्त्रों में उलझा हुआ था . अपनी देह को ढकती  हुई वो बेडी में बुझी हुई ज्योत को देखे जा रही थी. चोला पहनते हुए मैं नहर के किनारों  की तरफ देख रहा था . उत्तम देव महाराज की कुटिया से वापस आते हुए जलती हुई ज्योत संदला की हथेली के ऊपर थी . मैं  तेज गति से चप्पू चला रहा था.  लम्बे समय से तहखाने में बीमार गुरुदेव आखिरी सांसें गिन रहे थे . संदला  पता नहीं कौन सी गिनती में उलझी हुई थी . मैंने ही मंदिर में आरती की , संदला तो गर्भ गृह तक भी नहीं आई थी . जब मैंने गुरुदेव की हालात बता विनती की ,वो ज्योत उठा मेरे आगे-आगे चल पड़ी . जैसे ही हमने तहखाने में प्रवेश किया गुरुदेव की आवाज़ ने समुन्द्र की तरह हमारा मंथन कर  डाला , '' आज रास्ते में ज्योत बुझ गई थी ...?''

हमारी नज़रें झुक गईं . प्राण बंधन टूट गए . जैसे ही पलकें ऊपर उठाईं गुरुदेव शरीर त्यागकर  जा चुके थे . उनके शव का बोझ मैं आज तक उठाये फिर रहा हूँ . इससे मुक्त होने के लिए मैंने क्या-क्या उपाय न किये  होंगे ....

'' चुपचाप लड़ते रहो सूरज ...! कहने से अंतर युद्ध नहीं जीता जा सकता !'' गुप्तवास होने से पहले वो एक बार बोली थी ....

बारह महीने का गुप्तवास उसकी कायाकल्प कर गया था . जलपान व नित्यक्रम की  क्रिया के बाद वह समाधि लीन हो जाती या शवाशन में पड़ी रहती . दिन में सूर्य की रौशनी उसके लिए श्राप थी बाकी वक़्त तहखाना  ही उसका निवास होता . कुटिया में आई संगत अक्सर उसके दर्शनों की इच्छा प्रकट करती पर मैं संदला की इच्छानुसार हाथ जोड़ देता , ''संदला देवी भक्ति रत है ..भक्त जनों..!  एक दिन वो जरुर प्रकट होगी ...!''

आई हुई संगत को तो मैं टाल देता पर खुद किधर जाता.... ? मेरे अन्दर  जैसे  कुछ चिपक सा गया था . संदला को जलपान कराने का शमां सबसे ज्यादा परलोककारी होता. उसके माथे के बीच लगा चन्दन का टीका मुझे चीर कर रख देता . मुझसे उसकी तरफ देखा न जाता . मैं बर्तन उठा जल्द से जल्द तहखाने से बाहर आ जाता , लेकिन बाहर कौन सी शांति थी ? सारा -सारा दिन भटकन  सी लगी रहती . जब शरीर जवाब दे जाता मैं मंदिर के पास लगे बरगद की जड़ों पर सर रख देता . उन जड़ों में भी नग्न देह घुमने लगती , धड संदला का होता , चेहरा माँ का . उस देह के ऊपर एक और देह आ गिरती . उसका धड मेरा पर चेहरा मेरे पिता का होता . बेडी फिर डूबने लगती .  धुंध उतरने लगती . मैं साक्षी बन माता-पिता का समागम देखने लगता ....

'' यह साक्षी भाव नहीं पशु भाव है ...!'' गुरुदेव का शव मेरी अंतरआत्मा झिंझोड़ गया ..
मैं उस पशु का पीछा करने लगा  पर वो मेरी पकड़ से बाहर होता गया ....
. मैंने यज्ञ  की व्यवस्था की . पशु काबू में आता गया . मैंने उसके माथे पे हल्दी , सिंदूर मल दिया . मन्त्रों का जाप करने लगा . मैं तलवार उठा अंतर्ध्यान हो  गया . पूरी शक्ति से दोनों हाथों को हवा में लहरा एक ही वार में पशु का सर धड से अलग कर दिया . मेरा दामन खून के छींटों से भर गया  . रूह बेदाग हो गई . कुछ दिन शांति रही फिर वही आहट सुनाई देने  लगी . अन्दर का पशु फिर दौड़ने  लगा . मैं सोच में पड़ गया कि मैंने आहुति किसकी दी थी ....?

'' आहुति तो मैंने दी है ...!'' गुप्तवास  में  नौवें महीने संदला के गर्भ से त्रिकाल देव की चीख निकली थी . ...

उसकी चीख  सुन मैं माँ की गोद में जा गिरा . आँखें खुलते ही मैंने सबसे पहले जन्मदात्री का चेहरा देखना चाहा था  पर जिस वक़्त आँखें खुलीं उनमें रौशनी नहीं थी . त्रिकाल देव की आँखों की तरफ देखते हुए संदला बोली थी , '' इनमें मैं अपने हिस्से की ज्योत जगा चली हूँ ...!''

उसे तीन महीने दूध पिलाने के बाद एक रात अचानक ही वह कहीं चली गई थी .

'' न कोई जाता है न कोई आता है ....! यह तो चक्र मात्र है बाबा ...!'' त्रिकाल देव ने खड़ाऊ  उतार मेरे चरणों पर रख दिए हैं ...

' ओम ' का जाप करता हुआ वह मेरी परिक्रमा करने लग पड़ा है . पशु की आहुति देने से पहले मैंने भी उसकी परिक्रमा की थी . पर मेरे हाथों में तो हथियार था . क्या त्रिकाल देव के पास भी हथियार है ...? मैं भय से जकड गया हूँ . यह तो वही भय है जो संदला पीछे छोड़ गई थी .वह तो माँ की तरह मुक्त हो गई पर मैं चौरासी के चक्कर में पड़ गया था . किस तरह काटूं यह चौरासी ....? किस तरह त्रिकाल देव का जन्म नश्र करूँ ..? मैं धर्म संकट में पड़ गया था . दिन-रात सोच में पड़ा रहता . दुनिया को क्या जवाब दूंगा ..? किस तरह इतना बड़ा रहस्योदघाटन करूँ ...? क्या बतलाऊँगा संदला कहाँ गई ..? कोई जवाब न था . लाजवाब हुआ मैं किसी सूत्र की तलाश में था . रात 'ओम' शब्द की लोरी देते वक़्त जब त्रिकाल देव का चेहरा देखता वह मुझे अपना पुनर्जन्म लगता .

''पुनर्जन्म  का कोई अर्थ नहीं . मनुष्य की औलाद  ही उसका पुनर्जन्म होती है ...!'' एक रात गुरुदेव की कही बात मेरा संकट मोचन बन गई थी .

त्रिकाल देव, गुरु जी का पुनर्जन्म बन गया था . लोक-स्वीकृति लेने के सिवा अब  और कोई चारा  न  था . मैंने  अच्छा किया या बुरा ? पता नहीं, पर लोगों में जय-जयकार होने लगी . मेरी सुनाई कथा लोगों के लिए पवित्र कथा बन गई , पूरा इलाका नत-मस्तक हो गया . बच्चे-बच्चे की जुबां पर था कि , गुरु जी ने फिर जन्म ले लिया है . इस जन्म में उनका नाम त्रिकाल देव है  . उत्तम देव महाराज की कुटिया में अद्भुत शक्ति है . दो साल का त्रिकाल देव आँखों से अँधा है पर फिर भी माता-पिता को अंगुली से कुटिया तक लाया और कहता है कि मैं ही गुरुदेव हूँ . मेरा घर गज्जण माजरा गाँव में नहीं मेरी जड़ें कुटिया में हैं . पर माता-पिता की दुनियावी समझ कुछ समझ नहीं पा रही थी . परमात्मा का रूप समझ वे उसे कुटिया में ही छोड़ गए थे ...

फिर मुझे कुछ भी कहने की जरुरत न पड़ी थी लोगों की जुबां ही लोगों का सच बन गई . सच की कसौटी पर खरा उतरने के लिए मैंने त्रिकाल देव का नामकरण किया . उसकी आत्मा शुद्धि के लिए यज्ञ हवन किया . 'ओम' शब्द की घुट्टी दी . वेद शास्त्रों  का ज्ञाता बनाया . ज्यों-ज्यों वह वक़्त की रफ़्तार  पार करता गया उसके ज्ञान की सीमा असीम होती गई . लोगों के मन में उसने गहरी जगह बना ली . लोगों को उस पर अंध विश्वास हो गया था . . अपने प्रवचनों में  वह अक्सर कहता , ''मनुष्य को जीवन में अंध विश्वास जरुर करना चाहिए लेकिन शर्त यह है कि जिस पर आप अंध-विश्वास कर रहे हों वह अँधा न हो ...''

उसकी बात सुन पंडाल में सन्नाटा छा जाता . मेरी आँखों की ज्योति  मद्धम पड़ने लगती . मैं सूरज में पड़े दाग को देखने लगता . वह भी मेरी ओर देखने लगता . मैं उसे धोने के उपाय ढूँढने लगता ...

और फिर एक दिन मैंने उपाय ढूंढ भी लिया था ....

अपनी खोज को अंजाम देने के लिए मैंने एक खास दिन निश्चित किया . वो सूर्य ग्रहण का दिन था . पहले इसी दिन कई बार मैं हरिद्वार भी गया था , गंगा स्नान कर वापस आ जाता . पर एक वर्ष ऐसा लौटा कि फिर वापस न जा सका , अगर जाने का ख्याल भी आता तो लोगों की बातें याद आ जातीं . गंगा में स्नान करते हुए वे बातें कर रहे थे , '' कहते हैं सूरज ने भी किसी का कर्जा देना है ....!''

मैंने त्रिकाल देव का कर्जा देना था . उसका ऋण चुकाने के लिए मैंने 'कवच-कुंडल' दान करने की प्रतिज्ञा कर ली .

प्रतिज्ञा पूर्ति वाले दिन कुटिया में विशेष व्यवस्था की गई . शिव महिमा के बाद खुला भंडार चलाया गया . दीन-दुखियों का कष्ट दूर करने के लिए ' मेडिकल-शिविर' का आयोजन किया गया . शहर में से डाक्टरों की टीम बुलाई गई . एक-एक दुखिया उसके पास जाता , मशवरा व दवाई लेकर पंडाल में आ बैठता . जिस वक़्त पंडाल में तिल धरने की भी जगह न थी मैंने चल रहा प्रवचन शिखर की ओर मोड़ लिया . पहले तो आकाश में लगे सूर्य-ग्रहण की ओर देखा फिर मैंने पास बैठे त्रिकाल देव के सर ऊपर हाथ धर दिया , ''आज मैं ग्रहण से मुक्त होता हूँ ...मैं त्रिकाल देव को अपनी आँखें दान करता हूँ ....!''

'' हे दानवीर!....मेरा वक़्त अब समाप्त हो गया !...मैं अब चलता हूँ ...!'' मेरी परिक्रमा छोड़ त्रिकाल देव धरती पर गिर पड़ा . ...

मैं उसके हाथ पकड़ने लगा हूँ , वह मेरे चरण छू रहा है . उसकी छुअन में हजारों स्पर्शहैं . एक को पकड़ना चाहता हूँ दूसरा छूट जाता है पर वह बात नहीं छूटती जो उसने अस्पताल में कही थी .

आँखें दान कर जिस दिन मैं वापस कुटिया लौटा  मेरा वनवास समाप्त हो गया था . मैंने कोई युद्ध जीत लिया था . उस जीत में कोई गहरा असर था ,  मुझे  हर शै  में इक नया अर्थ नज़र आने लगा . हाथों की काया कल्प गई . मैंने दीयों की कतार जला दी . धरती-आकाश जगमगा उठा . रौशनी में घूँघट निकाले माँ जाती हुई दिखाई दी . मैंने उसका पल्ला पकड़ना चाहा वह गायब हो गई . मैंने पिता का पीछा करना चाहा वो सर के बल उल्टा चलने लग पड़े ....मैं  चित्त गिर पड़ा ....आँखों की  जगह से पट्टी खुल गई .भीतरी मन  की इच्छा दरिया की तरह बह चली . मैं अस्पताल की ओर भागा  .  डाक्टर से  अपनी इच्छा जाहिर  की . मैं चाहता था कि जब त्रिकाल देव की आँखों से पट्टी खुले उसे सबसे पहले मैं नज़र आऊँ .

  मेरी इच्छा पूर्ति करते हुए ज्यों ही डाक्टर ने पट्टी खोलनी शुरू की अस्पताल में सन्नाटा छा गया . सिर्फ साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी . 'अपनी आवाज़' सुनने के लिए मैं साँस रोके खड़ा था . उस वक़्त मेरा इम्तिहान था जब डाक्टर ने कहा , '' हाँ त्रिकाल देव !...धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलो !...फिर सामने देख कर बताओ कि तुम्हें क्या नज़र आ रहा है ...?''

''कुछ नहीं डाक्टर !...मुझे तो दूर-दूर तक धुंध नज़र आ रही है . जैसे त्रिकाल देव नहीं  शिव का बोला डमरू  हो ...

नजदीक ही कहीं पराशर ऋषि की खड़ाऊ बजी थीं ..

पहाड़ पर खड़ी संदला नीचे नदी में दिख रहे सूरज की ओर इशारा कर रही थी ...

उस रात मैं शिवलिंग पर सर रख खूब रोया था ...

'' सफ़र से जाने वालों को रोकर विदा नहीं किया जाता बाबा ...!''मेरी पलकों पर हाथ  फेरता हुआ त्रिकाल देव उठ कर दूर जा खड़ा हुआ था .......

'' सफ़र !...कौन सा सफ़र ..? यह तुझे अचानक ही क्या हो गया त्रिकाल ...?'' मैं उसे पकड़ना चाहता हूँ ...

''अचानक नहीं  मुनिवर !....संसार में कुछ भी अचानक नहीं होता !.... तहखाने में उसकी आवाज़ शंख की तरह गूंज रही थी .

पर यह तो बता तू जा किधर रहा है ....? मेरी आवाज़  बैठने लगी थी .....

पता नहीं बाबा !...एक सुगंध सी मुझे अपनी ओर खींचे चली जा रही है ......माथे पर चन्दन का टीका लगाये त्रिकाल देव तहखाने से बाहर की ओर चल पड़ा है .....

मैं उसकी कदम-दिशा देखना चाहता हूँ ...पर कैसे देखूं ....?
मेरी आँखें तो वह ले गया है ..........

                                          समाप्त .....
लेखकः जसबीर 'राणा '
ग्र।मः अमरगढ़
जिलाः संगरूर-१४८०२२ (पंजाब)
फोनः९८१५६५९२२०
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अनुवाद :हरकीरत 'हीर' १८ ईस्ट लेन , सुन्दरपुरहॉउस न -५ , गुवाहाटी-७८१००१ (असम) फोन- ९८६४१७१३००



Friday, July 30, 2010

डा कुञ्ज मेधी की एक असमियाँ कविता ''मैं बड़ी हुई '' का हिंदी अनुवाद .....

डा मेधी का संक्षिप्त परिचय: अब तक इनकी २५ किताबें आ चुकी हें ....६ काव्य - संग्रह ,५ अनुदित पुस्तकें , २ सम्पादित संकलन , कुछ राजनीति ,प्रकृति और अध्यात्म पर लिखी पुस्तकें , एक आत्मकथा ....वर्तमान में ये गुवाहाटी यूनिवर्सिटी से पोलिटिकल साइंस में प्रधान प्रवक्ता के पद से रिटायर हो चुकी हें ....

मैं बड़ी हुई .....


मैं बड़ी हुई दादीमाँ
पर उस तरह नहीं
जैसा तुन चाहती थी
सीने में ...
इक धधकती ज्वाला लिए
अश्रुपूरित आहत मन से .....

बहुत ही असहनीय है
यह पशुपूर्ण आचरण
प्रतिक्षण प्रहृत ,रक्ताक्त ,
विध्वंश होता प्रतिपल ......

पता भी न चला
कब और कैसे इन अनुभवों ने
आकर ले लिया ...
मिट्टी गारे से खेलते-खेलते ,
गुड्डे-गुड्डियों का ब्याह रचाते ,
बेर-जामुन चुनते- खाते
धान माड़ते-माड्ते शीत गोधुली के
धीरे-धीरे खिसकते वक़्त के साथ .....

किसी गहरी खाई में
उतर जाते हें मन के वृक्ष
तब इक लम्बी वार्तालाप चलती है
तुम्हारी स्मृतियों के साथ ...

गिला इस बात का न था
कि उठाती रही हूँ बोझ
यंत्नाहत अनुभूतियों की
ताड़ना परिक्रमा प्राय :
अचल कर जाती है मुझे ...

आग से जन्मी हूँ
तो क्या इसीलिए दहन होना पड़ेगा
मुझे ताउम्र आग में ?
सुना है ....
अग्नि ही प्रज्वल्लित करती है अग्नि को
फिर भी राख़ हो रहा है
मेरे जीवन का स्निग्ध-स्निग्ध
हरित द्वीप ......

दादी माँ ....!
क्या तुम भी जली थी मेरी ही तरह ?
क्या तुम्हारा ह्रदय भी राख़ हो गया था
मेरी ही तरह ....?

काश....!
ऐसे वक़्त तुम्हें एक बार मिल पाती -
नए धान के भात की सुवास में .....
सतियाना दरख्तों के बीच से
झांकते चाँद की चाँदनी में .....
अर्द्ध रात्रि में किसी परिंदे के
अनवरत विलाप में ....
गमजदा गीतों के सुरों में
जिन्हें कई -कई बार सुन
ह्रदय भर उठता है
निर्जनता के स्वरों से .....

दादी माँ .....!
मैं बड़ी हुई .......
चूर-चूर होते उन स्वप्नों के साथ
रिक्त पात्र और मर्मबोधहीन
शहर के अन्धकार के बीच
चारों ओर है असंख्य वेदनाओं के
बारूदों का ढेर ....
जहाँ पल-पल शेष होती
अब मृत्य-प्राय हो चुकी हूँ मैं
जानती हूँ तुम हो कहीं आस -पास
सांसें अब गहरी होकर
ढूंढ रही हें ...
आश्रय का महीरूप
आकाश-कुसुम .....!!

Saturday, July 10, 2010

लेखक परिचय :
नाम :जसवीर सिंह 'राणा'
शिक्षा : एम.ए,बी.एड।
संप्रति :
शिक्षण
प्रकाशित कहानी संग्रह : १) खितियाँ घूम रहीआं ने २) शिखर दुपहरा
पुरस्कार : कहानी संग्रह '
शिखर दुपहरा ' को पंजाब भाषा विभाग द्वारा 'नानक सिंह' पुरस्कार
कहानी 'नस्लाघात ' बी.ए.के पंजाबी सिलेबस में शामिल
कहानी 'चूड़े वाली बांह '२००७ में सर्वश्रेष्ठ कहानी घोषित
कहानी 'पट ते बही मोरनी ' २००९ की
सर्वश्रेष्ठ कहानी घोषित

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कहानी
नस्लघात -लेखक: जसवीर राणा
अनु : हरकीरत 'हीर '

मैंने पीछे की ओर मुड़कर देखा , बस अड्डे वाले पीपल के नीचे खड़ा तोती बाबा अभी भी मेरी ही ओर देख रहा था । उसका सवाल भी बड़ा विचित्र सा था , बोला , '' क्यों भाई तुम प्यारू के बलकारी नहीं हो ...?"

''नहीं -नहीं बाबा ......मैं तो .....'' उसका सवाल सुनकर मुझे .....गश सा आ गया । मेरे कानों के पास छंकार सी गूंजने लगी ......अगर मैं प्यारू का लड़का बलकारी नहीं तो कौन था ....?
'' कौन हूँ मैं .....?'' जवाब देते वक़्त मेरी जुबान थथला जाती । दिमाग में फिर वही झंकार गूंजने लगती ।

गूंज डालती रोडवेज की बस कबकी आगे बढ़ चुकी थी । अड्डे पर पहुँच कर ही सुकून की साँस आई । बस में सारे रस्ते मुझे बेचैनी सी लगी रही । टूटी सड़क और बस के शीशे दरवाजों का खड़का मेरे कानों के पास छंकार बन गूंजता रहा । पता नहीं मैं कितनी देर सड़क के किनारे खड़ा रहा । तोती बाबा के सवाल ने मेरी तन्द्रा तोड़ी थी । वह लगातार मुझे ताड़ता रहा .....!

उसकी ओर से ध्यान हटा मैंने अपनी चाल तेज कर ली । मैंने लोई ओढ़कर मैंने नाक तक मुंह अच्छी तरह ढक लिया था । ठण्ड बढती जा रही थी । खेतों की ओर धुंध भी उतरने लगी थी । शाम घिर आई थी , लोग घरों की ओर परतने लगे थे । मेरे पैर भी मुझे घर की ओर खींचे लिए जा रहे थे । हमारे घर की ओर... या ....पता नहीं बल्ली के घर की ओर .....?

हमारा घर तो अब कौन सा घर रहा था ....।

गाँव के बाहर वाली सड़क तो बल्ली के घर के सामने से गुजरती थी । आखिरी मोड़ पर उसका घर था । कई बार वह मुझसे कहती , '' बलकारी ! यह सूना घर मुझ अकेली को खाने सा आता है ...''

'' खाने तो मुझे भी आता है बल्ली '', कहकर मैं उसे गले से लगा लेता ।

बल्ली का ख्याल आते ही मेरे पैर जल्दी-जल्दी उठने लगे ...मैं और तेज चलने लगा । कुछ देर में ही मैं बल्ली के घर होता । रंगीन ख्याल मेरी पीई हुई दारू को काट रहा था । सरूर में आ मैंने गला खंगारा। खंगाराने के साथ ही जैसे मेरे अन्दर जैसे घोड़ा सा हिनहिनाया हो , जांचने के लिए मैंने फिर गला खंगारा ....पर इस बार आवाज़ तो घोड़े की ही थी पर वह हिनहिना नहीं बिलख रहा था।

बौखलाए हुए ने मैंने सामने देखा सड़क पर रेहड़ी में जुते घोड़े को शे'रु कुम्हार चाबुक से पीटता चला आ रहा था । डरकर मैं सड़क से कच्ची तरफ हो लिया । मुझे अपना नशा उतरता सा लगा । लगा जैसे शे'रु की गाड़ी के आगे मैं जुता हुआ हूँ । चाबुक जैसे घोड़े पर नहीं मेरी पीठ पर पड़ रही हो । इक पल में ही ख्याल आया कि मैं सरपट भाग लूं । इतना तेज भागूं कि शे'रु की रेहड़ी को भी पीछे छोड़ दूँ । बस भागता जाऊं और भागता जाऊं ..... ।
सड़क किनारे खड़े -खड़े मुझे साँस सी चढने लगी । मैंने सड़क छोड़ दी , पाल की आटा चक्की के पास से मुडती निचली गली उतर गया ... ..

गली में पैर धरते ही मेरे पैर जल से उठे ,ईंटें तप रहीं थी ...जैसे अभी किसी ने भट्टी से निकाल कर रखी हों । कोई शय मुझे अपनी ओर खींचे लिए जा रही थी । प्राइमरी स्कूल के सामने से गुजरते वक़्त मेरी टांगे जैसे जुड़ सी गयीं । स्कूल के सामने भीड़ सी जुटी हुई थी , मैं भी भीड़ में शामिल हो गया .....

स्कूल ग्राउंड की ओर नज़र पड़ते ही मेरे माथे पर कुछ ठक सा लगा । दीवार से लगा इक बड़ा बल्ब जल रहा था । हमारे गाँव के दस-बारह कालेजियट लड़के ग्राउंड में भांगड़ा सीख रहे थे । पास ही खड़ा ढोली ढोल बजा रहा था । ढोल पर निगाह पड़ते ही मेरे अन्दर कुछ दरकने सा लगा । मैं भीड़ से पीछे हटता गया ......
भीड़ से निकल कर मैं चलने ही लगा था कि .....

' ओ .....आ .....!! तोड़ देकर ढोली ने चाल बदल ली ।बैठक मार कर लड़के फिर नाचने लगे ।

ढोल और जोर से बजने लगा । जब ढोली ने बोली डाली मेरे अन्दर फिर छंकार उठने लगी । मेरा कदम भंगड़ा ड़ाल रहे लड़कों की तरह तो नहीं उठ रहा था पर पैर धीरे धीरे हिल रहे थे । मैंने ध्यान से देखा , मैं तो सारा ही हिल रहा था । नशे का असर था या पता नहीं क्या था । मैंने जेब से बण्डल निकाल बीड़ी सुलगा ली ..... ।
''देखो- देखो खब्बू कैसे नाच रहा ...!'' दीवार पर बैठे लड़कों के समूह की आवाज़ थी ।
सुनकर मेरा हाथ सर पर बंधी पगड़ी की ओर चला गया । मैंने पगड़ी टेढ़ी बांधी हुई थी । क्या लड़के मुझे ही छेड़ रहे हैं ....? लम्बा कश खीँच मैंने भीड़ की ओर धुआँ छोड़ा ...पर मेरी ओर किसी का ध्यान नहीं था । मैंने पूरी गली को गौर से देखा । सब कुछ पराया सा लगा ...... ।

हमारा गाँव ही मेरे लिए पराया हो गया था सिर्फ इक बल्ली को छोड़ । उसी की खातिर तो मैं आया था । कई बार कोशिश की उसे दिल से निकाल दूँ पर नहीं निकाल पाया । जितना मैं बल्ली को निकालने की कोशिश करता वह उतना ही और समाती जाती । करीब दो महीने से तो वह मुसलसल मेरे सर पे सवार थी । दिल चारो पहर उसे मिलने के बहाने गढ़ता रहता । दिन -रात उसकी मोहनी मूरत आँखों के सामने घुमती रहती ..... पर कई बार कालू की जुबाँ काली बात कह देती .....'' छोड़ दे बलकारी ! भला क्या करेगा बल्ली से मिल के ....!''
कालू की बात सुन मुझे क्रोध चढ़ आता ,गुस्से से सर चकराने लगता , मैं गर्मो-गर्मी हो जाता । मेरी लाल आँखें देख कालू डर जाता । बस वही पल होता जब मैं उसे गिराकर चाबुक चला रहा होता .... । पहले पहल तो मन में होता कि उसका क़त्ल ही कर डालूं । कई बार मैं आधी रात को उठ खड़ा होता , दोनों हाथ सोये हुए कालू की गर्दन तक ले जाता पर गर्दन तक पहुँचने से पहले ही मेरे हाथ कांपने लगते । मैं पसीने से भीग जाता ,साँस धौकनी सी चलने लगती । हाँफते-हाँफते मैं निढाल सा हो जाता । रात लेटे लेटे कई बार ख़ुदकुशी का ख्याल भी आता । एक बार तो मैं गेहूँ में रखने वाली गोलियां ले भी आया था । सबकी नज़रों से बचा जब खाने लगा तो हाथों ने काम करना ही बंद कर दिया । पानी का गिलास और गोलियाँ नीचे गिर पड़ीं जैसे उस दिन सोये हुए कालू को मारने के लिए उठाया चाकू गिर पड़ा था । धीरे धीरे ख़ुदकुशी और कालू को मारने का ख्याल ही मर गया । ऐसे काम करा कर भी हम जीते- जागते हैं ....!

पर कालू की बल्ली को मिलने से रोकने की कही बात मुझे जीते को ही मार गई ।
' हाँ भई...! कड़वी बात मनुष्य को जीते जी मार देती है ....!' कम्बल ओढ़े दो जन भीड़ से निकल परे की ओर निकल गए । चलने की सोचता हुआ मैं भी गली के बीच खड़ा था । लड़के वैसे ही नाच रहे थे .... ।
ओ ....आ. ....!!तोड़ देकर अचानक ही ढोली तेज-तेज ढोल बजाने लगा था .... ।
''यह तो बिलकुल प्यारु जैसा तोड़ देता है ....'' भीड़ में से कोई बुजुर्ग बोला ।
सुनकर मैंने एड़ियाँ उठाकर स्कूल की ओर देखा ,ग्राउंड में खड़ा ढोली ढोल बजा रहा था ...बिलकुल मेरे बापू की तरह.....

बापू का ख्याल आते ही मैं जल्दी -जल्दी घर की ओर चल पड़ा .....चलते-चलते मेरा दिमाग चरखी की तरह घूम रहा था । मैं बार-बार पीछे मुड़कर देखता ,मुझे लगता जैसे बापू ढोल बजाता हुआ मेरे पीछे चला आ रहा है । चरण का घर आते आते तो वह बिलकुल मेरे कंधे से कन्धा मिला कर चलने लगा । चलते चलते मैं छोटा और बापू बड़ा हो जाता । ढोल बजाता हुआ वह मेरे आगे -आगे और मैं उसके पीछे-पीछे चलते जा रहे थे । चलते चलते मैंने टेढ़ी नज़र से देखा मेरे बराबर तो कोई नहीं चल रहा था और फिर बापू मरे को तो कई साल हो गए हैं । वह कैसे चल सकता है ...?

' ओये ! मरा बंदा भी साथ चला है कभी पगले ...!' बल्ली भी यूँ मजाक उड़ाती .... ।
कई बार रात को खेतों से लौटते वक़्त जब मैं बल्ली के घर आता मुझे ऐसा ही लगता रहा ....जब मैं बल्ली को बताता बल्ली हंसने लगती .....क्या बच्चों जैसी बातें करते हो बलकारी ....कोई सयानी बात करा कर .... '
बल्ली के घर के बदले ये मैं अपने घर की ओर क्यों चल पड़ा था समझ नहीं पाया .....? मैं तो बल्ली के पास आया था । उसे छोड़ यह मैं क्या ऊट-पटांग बातें सोचने लग पड़ा भला ?मैं अभी हिसाब लगा ही रहा था कि सामने कालू का घर आ गया ....।

उसके घर के पास से गुजरते वक़्त पता नहीं मुझे क्यों भय सा लगा । मैंने अपनी चाल तेज कर दी । अगला मोड़ मुड़कर आगे हमारा घर था । मैं जल्दी-जल्दी घर की ओर चल पड़ा । छोटी अंगुली की हुज्जत भी महसूस हुई ....!

दीवार की ओट में मैं हल्का हो दीवार पर चढ़ आँगन में छलांग लगा अन्दर आ गया । अन्दर का दरवाज़ा चौपट खुला पड़ा था । अन्दर घुसते ही मैंने जेब से निकाल बीड़ी सुलगा ली । जलती तीली की लौ में मेरी आँखें चारो ओर घुमने लगीं बुझती तीली की लौ में मेरी निगाह सामने की दीवार पर चिपक गयी । दीवार पर की कील पर बापू का फटा हुआ ढोल लटक रहा था। ढोल देख मैं जल्दी-जल्दी बीड़ी के कश खींचने लगा ।

बापू भी यूँ ही बीड़ी पीता था । इलाके में उसका ढोल मशहूर था । जहाँ कहीं भी पहलवानों की कुश्ती होती वहीँ बापू का ढोल खड़कता । चौंदे वाले मोड़ पर तो हर दस दिनों कुश्ती हुआ करती और शौकीन लोग झंडी पहलवान के साथ- साथ बापू के ढोल की भी तारीफ करते न थकते । गुग्गा नौमी के मेले में भी बापू की खूब उगाही होती .... ।
पर उसका यह काम ज्यादा दिन टिक न पाया था । बापू को साँस की बिमारी थी ....दारू,बीड़ीयों से उसके फेफड़े छलनी हो गए थे । ढोल बजाते वक़्त जोर बहुत लगता । जो अब बापू के बस की बात न थी । बीमारी उसके अन्दर का जोर और सारी कमाई खाती जा रही थी । धीरे-धीरे बापू का ढोल चुप करके बैठ गया । पर माँ उसके साथ नित लड़ती रहती । घर में हर चीज खत्म हुई रहती और बापू दारू पी माँ को पीटने लगता । लोगों के घर काम कर-कर वह भी रोगी सी हो गई थी । कभी- कभी वह मुझसे कहती , 'बलकारी जरा मेरे पेट पर हाथ लगाकर देखना .....देख कितने गोले से हैं अन्दर ...

माँ बहुत दिन उन गोलों के साथ नहीं जी पाई थी । जिस दिन वह मरी बापू उसी दिन से पागल सा हो गया था । सारा दिन उट-पटांग बातें करता रहता , 'ये खड़ा है प्यारु ढोल वाला .....! आ जाओ किसने भिड़ना है आज ....!'

अक्सर लोग उसकी बातें सुन हंसने लग पड़ते । कभी वह किसी के घर रोटी खा आता कभी मैं किसी के घर । रात दोनों जने बैठक में पड़े रहते । इक दिन पाठी बौलदे के साथ वह पूरा ही पागल हो गया ..गली में खड़ा वह ढोल बजा रहा था । फिर तो रोज़ का ही काम हो गया अगर कोई रोकता वह ईंट उठा पीछे दौड़ पड़ता ।

उस दिन तो उसने हद ही कर दी । तीखी दोपहर थी । मैं घर बैठा रोटी के बारे सोच ही रहा था , जब बापू आ गया । आते ही कील से ढोल उतार लिया , मुझे थप्पड़ मार अपने आगे लगा लिया । मैं डर गया । आगे - आगे मैं, ढोल बजाता बापू मेरे पीछे । हम पाल की आटा चक्की के सामने जा पहुंचे । चक्की के सामने शैड के नीचे इक मण्डली ताश लिए बैठी थी । बापू जोर जोर से ढोल पीट रहा था । सारा शरीर तर-ब तर । साँस धौंकनी की तरह चल रही थी । उसके मुँह से लगी बीडी से भट्टे की तरह धुआं निकल रहा था । मैं डरा सा खड़ा था । शैड के नीचे से ताश छोड़ और भी कई लोग उठ खड़े हुए । बापू उनकी ओर बिना आँख झपकाए सीधे देखे जा रहा था । जब बात असहनीय हो गई तो बचना निहंग कड़क कर बोला , '' क्या चाहिए तुझे ओये पगले ....?''

उसकी बात सुन ढोल बजना यकदम से बंद हो गया । साथ ही बापू ने मेरी बांह पकड़ अपना छड़ी वाला हाथ ऊपर कर लिया , मैं कहता हूँ मैंने ये लड़का बेचना है ....है कोई खरीददार ...ओये ...है कोई .....?

मेरी बांह छोड़ वह फिर ढोल बजाने लग पड़ा ..... लोग अब खामोश थे ।

ढोल की आवाज़ ऊंची हो गई । मैं रोने लगा । बापू मेरे चारों ओर बैठकें निकाल रहा था ...

'फडाक...!!' अचनचेत ही एक जोरदार खड़का हुआ ।

इधर ढोल की खाल फट गई , उधर लाश बन बापू सड़क पर गिर पड़ा ।

मेरी आँखों से पानी बह रहा था । फटा हुआ ढोल कील से उतार मैं गले में डाले बैठा था । ढोल देख मेरे शरीर से जान सी निकल गई । जी कर रहा था आँगन में बैठ जोर-जोर से रो पडूँ । पर यहाँ मैं रोने नहीं बल्ली से मिलने आया था ।

यहाँ अब मेरा क्या रह गया है सोचते हुए मैंने लोई ठीक की । गले से फटा ढोल उतार नीचे फेंक दिया । ईंटों के बीच पैर फंसा दीवार पर चढ़ गया । पर दूसरी ओर छलांग न लगा सका ।

दीवार पे ही हवा में लटक गया ....।

खेतों से पार होती पटरी पर से रेल गाड़ी छुक-छुक करती आ रही थी । फाटक के पास जा उसने कूक मारनी थी । सोचकर ही मुझे गश सी आने लगी । दाढ़ी के कांटे चुभने लगे । कानों के पास वही छंकार गूंजने लगी ।

वही बात हुई । शोर मचाती गाड़ी ने फाटक के पास आ कूक मारी । कूक मारता मैं गाड़ी के आगे -आगे भाग रहा था , हाथ में चाकू पकड़े कोई मेरी ओर भागा चला आ रहा था । शेरू कुम्हार का घोड़ा पटरी पर गिरा पड़ा था । किसी ने मेरी पीठ पर चाकू मारा । घोड़े के टुकड़े करती रेल-गाड़ी आगे बढ़ गई । लहू के छीटों से मेरा मुँह-सर लिबड़ गया था ।

दीवार पर मैं उलटे-मुँह पड़ा था । रेल-गाड़ी फाटक पार कर चुकी थी । सर उठा मैंने ऊपर की ओर झाँका । आज सुब्ह से ही मुझे जाने क्या हुआ जा रहा था । अच्छी भली बात में से मुझे बे-सर पैर की चीजें नज़र आने लगतीं । नशे का असर था या पता नहीं बल्ली का ।

बल्ली मेरे दिमाग में चढने लगी । अपने उजड़े घर को देख मैं बल्ली के घर की ओर चल पड़ा । कालू की कही बात मेरे बराबर चल रही थी ।
अगर कालू से मेरी दोस्ती न होती ...न मुझे वह रोकता और न यह डर चिपकता । पता नहीं कौन सा बुरा वक़्त था जब उसने मेरे पास आना शुरू कर दिया । बापू के मरने के बाद बचने निहंग लोगों ने मुझे सज्जन मास्टर के साथ भेज दिया था । मास्टर ने मुझे भैसों को घास -चारा डालने के लिए रख लिया । मास्टरी के साथ वह खेती भी करता था । माँ तो मुझे पढ़ाने के हक़ में थी । लोगों के घर काम कर वह मुझे बीच से खर्च भी देती रहती । पर बापू के मरने के बाद मैं आठवीं के पेपर देने से रह गया । पहले सज्जन मास्टर मुझसे कहता था , 'तू फिकर न कर बलकारी ....! बस खेत में रहा कर ...तेरी आठवी तो मैं चुटकियों में पास करवा दूंगा ....!'

पर कुछ न हुआ था । पता नहीं उसकी क्या स्कीम थी । मैं चार साल मास्टर के साथ रहा । जो पढाई आती थी वो भी भूल गया । आठवी तो क्या करनी थी मैं मास्टर का सीरी ( खेतों में काम करने वाला नौकर ) बन हर गया । अपने घर मैं कम ही जाता । पहले -पहल जाता था पर रात मुझे डर सा लगने लगता । घर से भय सा आता । आधी रात में मुझे मरे हुए बापू और माँ नज़र आते ।

' अगर घर में डर लगता है तो खेतों में अपनी मोटर वाली कोठरी में पड़ा रहा कर ....!' मेरी बात सुन एक दिन मास्टर ने कहा ।

उस दिन से मैं उनके खेतों में ही सोने लगा था ।

डर तो मुझे वहाँ भी लगता था । पर कालू के आने से कम हो जाता । साथ के शहर में राम लीला होती थी । कालू मुझे भी साथ ले जाने लगा । मास्टर से चोरी मैं खेतों से ही उसके साथ चला जाता । जब हम रामलीला देख लौटते आधी रात हो चुकी होती । जिस दिन कालू ने पहली बार वह हरकत की मैं दंग रह गया था । ऊंची गली से चलकर आते वक़्त वह एक घर के सामने खड़ा हो गया था । बोला , 'रुकजा आज तुम्हें मैं इक चीज दिखता हूँ ...। '

मेरा जवाब सुने बगैर ही वह खिड़की के सरिये पकड़ ऊपर चढ़ गया । रोशनदान से अन्दर झाँकने लगा। काफी देर देखता रहा । मुझे डर लग रहा था । पर कालू ने एकबारी मुझे ऊपर खीच लिया । मैंने रोशनदान से अन्दर झाँका । अन्दर जीरो वाट के बल्ब की रौशनी थी । और पलंग पर स्त्री-पुरुष..... ।

'सारा काम खराब कर गया साला ...!' मेरे मुँह से कालू के लिए गाली निकली ।

मेरे अन्दर का चोर जोर-जोर से हँस रहा था । किसकी चोरी करने जा रहा था मैं ...? मैं चोर कहाँ था ? चोरी करनी तो मैंने कालू से सीखी थी । या फिर सज्जन मास्टर से । मास्टर जिस चीज की चोरी करता उसके पीछे वो खासा बदनाम था । बारहवीं में पढ़ती इक लड़की को छेड़ने की वजह से इक बार तो वह काफी सुर्ख़ियों में रहा । गाँव में भी कई औरतों के साथ उसका नाम जुड़ा रहा ।

'तेरा मास्टर चरित्रहीन है ओये .... । ' कालू की बात सुन मुझे कोई जवाब न मिलता ।

चार साल मैं चुपचाप मास्टर की चाकरी करता रहा । पता नहीं और कितनी करता अगर कालू मेरी ज़िन्दगी में न आता । इससे तो अच्छा था वह न ही आता। उसके आने से ही तो सारा काम ही बिगड़ गया था ।

'काम कोई नहीं बिगड़ा ...तू चल तो सही ... रात किसे पता चलेगा । 'कालू के पीछे लग उस दिन मैंने पहली बारी चोरी की थी ।

रात को हम तारी सरदार के बाग़ में चले गए । कीनुओं का बाग़ था । हम झोला भरकर ले आये । किसी को कानो-कान खबर तक न हुई ।

पर सज्जन मास्टर को पता नहीं कैसे शक हो गया । उसके खेतों में भी अमरूदों के पेड़ थे । वह मुझे रोज़ कहा करता ,'अच्छी तरह ख्याल रखा कर बलकारी ...अमरूदों वाले खेमे में नहीं घुसने देना किसी को भी .... । '

' ऐसे क्यूँ हो मुए ! ....पहली बार तो तुझसे कोई चीज मांगी है ... !
मैं फसल नहीं रौंदूंगी ...सच्च बचा-बचा कर तोडूंगी ....!' .
बल्ली को मैं कोई जवाब न दे पाता ....!

अमरुद तोड़ वह मेरी चारपाई पर बैठ गई थी । बहुत सुंदर थी वह । मेरी निगाह उसके चेहरे से हटती ही नहीं थी । वह मुझसे पता नहीं क्या - क्या पूछे जा रही थी और मैं मूर्खों की तरह बस हाँ हूँ किये जा रहा था । दो दिन बाद वह फिर आई । उसने चारे का इक बोझा माँगा । मुझसे फिर इनकार न हो सका । फिर तो वह रोज़ ही आने लग पड़ी।

इक दिन हम चारपाई पर बैठे बातें कर रहे थे । पता नहीं किधर से सज्जन मास्टर आ गया ।लगा गालियाँ निकालने , 'क्यों बे हरामखोर ....! इस काम के लिए रखा है तुझे ...?तूने उजाड़ देना है कमीने मुझे ...! ..रुक जरा आज बताता हूँ तुझे.... !

मुझे थप्पड़ मार जब मास्टर बल्ली को मारने लगा तो मैंने दौड़ कर उसकी बांह पकड़ ली , ' इसे मत मारना मास्टर जी ...'

क्यों तेरी माँ लगती है ..? मास्टर रुक कर बोला । बल्ली को छोड़ उसने मुझे घेर लिया। कुदाल की हत्थी मार-मार उसने मेरी बांह तोड़ दी । पर वह मेरी और बल्ली की यारी न तोड़ सका ।

बल्ली ने तो खेत आना छोड़ दिया पर मैं रातों को घर जाने लग पड़ा । अपने दो बच्चों के साथ वह घर में अकेली रहती थी । उसके सास -ससुर और देवर तीर्थ यात्रा पर गए ट्रक एक्सीडेंट में मारे गए थे । और उसका घरवाला एक बार जत्थेदारों के घर बोर वाली खुही (कुआँ ) खोदने गया था , जब खासी गहरी खुद गई तो ऊपर से मिट्टी गिर पड़ी थी , वह उसी में दब कर मर गया ।

' मरे हुओं के साथ अब मरा तो नहीं जा सकता न बलकारी .....? यह तो जीता रहे तू जो मेरा दुःख बंटा लेता है ... । ' बल्ली का मेरे साथ और मेरा बल्ली के साथ खासा मोह पड़ गया था । लोग तो उसके पास और भी आते थे । पर अन्दर का दुःख वह मेरे साथ ही बांटती । उसके पहलू में बैठ मैं भी अपने सारे दुःख भूल जाता । पर एक वह दुःख सात जन्मों तक भूलने वाला न था ।

''सारे दुःख भुल्ल जाणगे ....पर नईओं भुल्लना विछोड़ा तेरा......!''भुक्की खाने का दरशा सड़क पर ऊंची आवाज़ में गाये जा रहा था .... ।

मेरे पास आ वह जरा धीमा हो गया , '' कौन सा बाई जी ....?

उसका सवाल सुन मुझे तोती बाबा का सवाल याद आ गया । बगैर कोई जवाब दिये मैंने चाल तेज कर ली । कंगाली ने मुझे जवाब देने लायक छोड़ा ही नहीं था । नहीं तो क्या अपने ही गाँव में मैं यूँ चोरों की तरह मुँह छुपाई फिरता ? चोर की माँ का कोठी में मुँह था ।( मुहावरा - अपने किये पर शर्मिंदा होना )

मैंने मुँह पर हाथ फिरा कर देखा , लगा जैसे मैं मुँह काला किये जा रहा हूँ । इक दिन कालू ने मुझे साथ ले बंटी की दूकान को सेंध लगा ली । पर पता नहीं कैसे किसी को हमारी खबर लग गई । पहले तो हमसे चोरी का माल निकलवाया फिर मुँह काला कर गुरूद्वारे के सामने खूब पीटा । सबसे ज्यादा मुझे सज्जन मास्टर ने पीटा । बोला , ''खबरदार ! जो अब से मेरे खेतों में पाँव भी रखा तो ....''

'' गाँव से ही निकाल बाहर करो ऐसे प्रेतों को !'' लोगों की भाषा सुन हम तो गाँव से ही भाग खड़े हुए थे ।

गाँव से भाग हम धुरी शहर जा पहुंचे । वहाँ कई दिन भूखे -प्यासे फिरते रहे । घूमते -घामते इक दिन हम चौंक में जा बैठे । वहाँ खासे देसी बन्दे और भइये बैठे थे । वे सारे दिहाड़ी जाने के बाद बाकी बचे हुए थे । मैं और कालू भी दीवार से टेक लगा बैठ गए । कुछ देर बाद वहाँ एक ट्रक आकर रुका । उसमें से एक सफेदपोश व्यक्ति उतरा और सभी से बोला , '' चलो भाई बैठो सारे जने ट्रक में ...! नेता जी की रैली में रौनक बढ़ानी है ....सबको पैसे , लड्डू और खुला लंगर मिलेगा ...!''

रैली में जाकर हमने सारा दिन जिंदाबाद- मुर्दाबाद के नारे लगाये । अगले दिन हम रैली में बने एक साथी के साथ एक साधकों के डेरे चले गए । सारा दिन वहाँ सेवा करते और रोटी-पानी छक लेते । रात भी वहीँ पड़े रहते । कुछ दिन तो सुख़ शांति से कट गए । पर इक रात बात उलटी पड़ गई । कालू ने रात डेरे की गोलक तोड़ ली । साधकों ने पहले तो हमें खूब पीटा और फिर थाने ले गए । थाने से छूट कालू तो फिरभी शहर में ही घूमता रहा पर कई महीने की ख़ाक छानने के बाद मैं गाँव वापस आ गया था । सारा दिन मैं पागलों का सा घूमता रहता कोई मुझसे बोलता तक न था । थक हार कर मैं रात बल्ली के पास जा कर पड़ा रहता ।

सामने मोड़ पर बल्ली का घर था । कुछ पलों बाद मैंने और बल्ली ने आमने सामने होना था । अचानक मेरा अंतर बैठने सा लगा । शरीर से ताप सा निकलने लगा । मेरा हाथ दाढ़ी की ओर चला गया । घोड़े की सी चाल चलता हुआ अचानक मैं हौले- हौले चलने लगा । मन किया लोई उतार कानों में ठूस लूँ । मेरे कानों के पास कुछ खड़कने लगा था ।

जिस बस में से उस दिन कालू उतरा था उसके इंजर - पिंजर भी कुछ ऐसे ही खड़क रहे थे । मैं चीने की दूकान पर बैठा था जब अड्डे पर रोडवेज की बस आकर रुकी । मैं नीचे उतरती सवारियों को देखने लगा । जब कालू नीचे उतरा मैं उठ कर खड़ा हो गया था ।

' कैसे हो बलकारी ....? मुझे देख वह हंसने लग पड़ा । '

'ठीक हूँ भाई ! तुम इतने दिन कहाँ थे ...?' भूख से मेरा बुरा हाल था । कालू को देख मुझे चाव सा हो आया । उस दिन सुबह से ही रोटी नहीं खाई थी । बल्ली कई दिनों से मेरे साथ रूठी हुई थी । वह मुझे एक ही बात कहती , ' देख मैं तो तुझे कोई काम-धंधा करने को कहती हूँ .....यूँ तेरा कब तक चलेगा बता ....?

चलना भी मुश्किल ही था । काफी वक़्त हो गया था मुझे गाँव रहते । पर गाँव के लोगों का अभी नखरा ही न उतरा था । सज्जन मास्टर और बंटी ने पता नहीं गाँव के लोगों को क्या पट्टी पढ़ा दी थी कि कोई मुझ से काम करवा राजी ही न था । कभी - कभार कोई बहुत जरूरतमंद दिहाड़ी पर ले जाता । जो पैसे मिलते वह मै दारू बीड़ी में उड़ा देता । मैंने तो अपना घर बेचने की भी सोच ली थी , पर बल्ली रोक लेती ...,'ना ..ना..बलकारी ....तुझे मेरी सौगंध जो घर बेचा ....! ..वे ! सर छुपाने की कोई जगह तो होगी तेरे पास अगर इससे भी बुरे दिन आ गए तो .....?'

' बुरे दिन क्यों बलकारी ....? अब तो अच्छे दिन आ रहे हैं अपने ....! अच्छा खाते हैं मंदा बोलते हैं ...। किसी साले का देना-लेना कुछ नहीं बस गिद्दा ही पड़ना है ....!' रात दारू पी के कालू ने मेरी पीठ थपथपाई थी ।

पर पीठ थपथपाते वक़्त जैसे उसका हाथ कांपा हो । पैग लगा कर मैंने उससे पूछा भी , '' मुझे भी बता जरा कौन से ताले की चाबी मिल गई है तुझे ...?''

बताऊँगा ....ले जाऊँगा तुझे भी ...! बीड़ी का कश खीँच वह बात को इकट्ठी सी कर गया ... ।

फिर भी मैंने उसे कई बार पूछा । पर दुसरे दिन जाने तक उसने मुझे कुछ न बताया । शराबी हुआ वह उट-पटांग कई कुछ बोलता रहा । नशे में मुझे उसकी कोई बात समझ न आई । पर मुझे वह कुछ बदला- बदला सा लगा था ।

'' मुझे तो लगता है वह चोरों के टोले संग मिल गया है ...। मैंने तुझे नहीं जाने देना उसके संग बलकारी ....ना..ना...!'' मेरे सीने पर सर रख बल्ली सारी रात रोती रही ।

पैसों की खातिर उलटी से उलटी बात कर जाने वाले कालू संग जाकर मैंने कितनी बड़ी भूल की थी । पर वह कौन सा मुझे धक्के मार ले गया था । मैं ही उसके साथ अपनी मर्ज़ी से गया था । उसके साथ जाते वक़्त बल्ली का मोह भी आँखों से ओझल हो गया था । कालू ने तो कहा भी था , ' देख भाई बलकारी ...! मैंने तो सारी बात तुझे सच्चाई के साथ बता दी । अब यह काम करना है या नहीं यह तुझे सोचना है ...सोच कर बता देना ....!''

पता नहीं क्या सोच मैंने कालू को हाँ कह दी थी । गलती तो मेरी अपनी ही थी। पर गालियाँ कालू को दीये जा रहा था । गधे से गिर मैं कुम्हार पर गुस्सा निकाल रहा था । अगर बल्ली कि बात मान लेता तो आज ये दिन न देखना पड़ता ।

सामने बल्ली का घर दिखाई दे रहा था । मेरे और बल्ली के बीच कुछ ही फासला था । ठण्ड बढ़ने से धुंध गहरी हो गई थी । मैंने लोई का लपेटा ठीक किया । बल्ली के घर के सामने जा डरा सा खड़ा था । उस वक़्त कुण्डी खड़कानी मुझे दुनिया का सबसे कठिन काम लगा था । हाथ भी उठ नहीं रहा था । बांह लकवे के मरीज़ सी लटक रही थी । मेरे अन्दर कुछ बैठा जा रहा था ।
अन्दर हल-चल सी हुई , फिर खुसर-फुसर हुई । बल्ली की आवाज़ के साथ किसी पुरुष की आवाज़ थी । सुनकर मुझे करंट सा लगा । यह तो ......? मेरे पैर धंस से गए । आग लगे घर की सी हालत में मैं दूर हट कीकर के नीचे जा खड़ा हुआ । मेरी आँखें दरवाज़ा खुलने की ताड़ में थी ।

चीं....चीं....करता ज्यों ही दरवाज़ा खुला ...आस-पास देखता हुआ सज्जन मास्टर हौले से सड़क की ओर चल पड़ा । मेरा दिल किया की दौड़ कर जाकर उसे गले से पकड़ लूँ और पीट- पीट कर उसकी बांह तोड़ दूँ । फिर गिरे पड़े को पूछूं , '' ना अब ये तेरी माँ लगती है ...?''

पर बंद हुए दरवाज़े ने मुझे उसी स्थान पर रोक लिया । अन्दर जलते बल्ब की रौशनी में मुझे दरवाज़ा बंद करती बल्ली का चेहरा दिखा । उसका चेहरा देखने ही तो मैं आया था ।

'बल्ली.!...बल्ली ...!!' कीकर के नीचे खड़ा- खड़ा मैं पता नहीं कब दरवाज़े के सामने जा खड़ा हुआ । मेरा हाथ कुण्डी खड़का रहा था ।

' बल्ली मैं ....!'

'बलकारी तू ....?'

कुण्डी खोलते सार ही हम दोनों के मुँह से एक ही बात निकली । पर पूरी न वह कर सकी न मुझसे हुई । मुझे तो यूँ ही दिखना-सुनना बंद हो गया था । बल्ली के शरीर की गर्मी से मुझे गर्मी आने लगी । मुझे साँस चढ़ गयीं , 'अन्दर चलते हैं ...बल्ली ...!'

मेरी बात सुन वह मेरे साथ अन्दर की ओर चल पड़ी । वह छनक-छनक करती जा रही थी । उसकी झाँझरों की झंकार सुन मेरी चाल धीमी पड़ गई । मुझे शेरू कुम्हार का घोडा याद आ गया । जिसकी पीठ पर चाबुक पड़ रही थी । पर मेरी पीठ पलोसती बल्ली तो मुझे अन्दर लिए जा रही थी ।

अन्दर बैठक में जाते ही मैं खाली पड़ी खाट पर चौपट गिर पड़ा । दूसरी खाट पर बल्ली के दोनों बच्चे सोये पड़े थे । खाट की बाही पर बैठ बल्ली रोने लग पड़ी , ' तू कहाँ चला गया था बलकारी ....? मैंने तुझे कहाँ नहीं ढूँढा ..किस-किस से नहीं पूछा...? बे तुझे कभी मेरी याद न आई ...? वह नामुराद कालू तुझे कहाँ ले गया था चंदरे ...?

बल्ली की बात सुन मेरे अन्दर से कुछ दरकने लगा । मेरे मुँह से चीख निकलती-निकलती बची ।

पर रेल-गाड़ी की चीख को मैं न रोक सका। मैंने चारपाई से उठकर भागना चाहा । पर बल्ली का चेहरा मेरे सामने था । पैरों में झाँझरें डाले वह मेरी शेव की दाढ़ी के काँटों पर हाथ फिराए जा रही थी । खेतों में बिछी पटरी पर से रेल-गाड़ी भागी जा रही थी ।

उस दिन भी रेल-गाड़ी ही जा रही थी । कंगाली का मारा मैं कालू के साथ चल पड़ा था । वह कम पर मैं पूरा शराबी था । बाज़ार पार का वह एक कच्चा रस्ता था । आस-पास कीकर के पेड़ थे और आगे रेल कि पटरी । पटरी पार कर वह एक बस्ती में जा घुसा । अधमुंदी आँखें खोल कर जब मैंने देखा वह मुझे एक छोटे से घर के सामने लिए खड़ा था ।

'यह नर्स है बलकारी ....!इसने करना है अपना काम ....!' इक खूबसूरत सी स्त्री के दरवाज़ा खोलने पर कालू मुझे अन्दर ले गया ।

अन्दर जाते ही मैं चारपाई पर धड़ाम से जा गिरा । डर और नशे से मेरी सुरती डूबती जा रही थी । मेरी आँखें कभी खुलती तो कभी बंद हो जातीं । मुझे फटाफट उस खूबसूरत स्त्री की उडीक थी । जब मैंने ध्यान से देखा वह तो मेरे पास खड़ी थी । पता नहीं मैंने कब कपडे उतारे । मेरे शरीर पर एक भी वस्त्र नहीं था । स्थिति भांप कर एक बार तो मैं बहुत ही डर गया । सब कुछ जानकर मैंने एक बार उठना भी चाहा । पर कालू ने पीछे से मेरी बाहें पकड़ लीं । साथ ही नर्स के हाथ में पकड़ी कोई चमकीली की सी चीज आरी सी चली । मेरे मुँह सी निकलती चीख पटरी पर दौड़ी
रेल की चीख के नीचे दब गई । उस दिन से ही मैं मूत्र त्याग बैठकर करने लगा था ।

अगले दिन मैं किन्नरों के डेरे में शामिल था ।

' क्यों बे मुए कालू ....!...बन गया न छोकरा मेरे काम का बंदा ....?' मुखिया ने जब ताली मार कर पूछा , सारे किन्नर ताली मार-मार हंसने लग पड़े ।

उनमें कालू भी शामिल था । हमारे जैसे और भी कई लड़के थे । चारों ओर तालियाँ बज रहीं थीं । महीना भर दवाई-पानी के बाद मैं भी ताली मारनी सीख गया था । कालू को मार कर ख़ुदकुशी करने का ख्याल हौले-हौले घुंघरुओं की छंकार में बदल गया था ।

बे तू तो बिलकुल बदल गया बलकारी .....! साल भर पता नहीं कहाँ रहा तू .....? मैं कबकी बुलाई जा रही हूँ तू बोलता ही नहीं ....? मुझे बाँहों में लपेटती बल्ली पैरों की झाँझरे बजा रही थी ।

मैं खाट पर बड़ी कठिनाई से बैठा था , ...ये..झाँझरें ....न ...छनका बल्ली ....!'

मेरी बात सुनकर वह मेरे साथ और जुड़ कर बैठ गई , ' झाँझरें न छनकाऊँ ....? बे तूने ही तो तब लाकर दी थीं ...? । कहते थे पहन कर रखाकर बल्ली सुन्दर लगतीं हैं ...!...तेरी तो यूँ शक्ल ही बदली पड़ी है ....!...न ...हुआ क्या है तुझे ....?

बल्ली का सवाल सुन मेरे अन्दर खासा कुछ गुत्थम-गुत्था सा हो गया । मुझे कोई जवाब न मिला । बस चुपचाप नीचे झुक कर मैं उसके पैरों से झाँझरे खोलने लगा ....!!


**************समाप्त ***************
लेखकः जसबीर 'राणा '
ग्र।मः अमरगढ़
जिलाः संगरूर-१४८०२२ (पंजाब)
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अनुवाद :हरकीरत 'हीर'
१८ ईस्ट लेन , सुन्दरपुर
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